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इतिहास के पन्नों से

आगरा के सेन्ट पीटर्स चर्च में पहुंचे महर्षि दयानन्द – फिर क्या हुआ ?

संकलन : भावेश मेरजा

आर्य धर्म के उन्नायक स्वामी दयानन्द सरस्वती 27 नवम्बर 1880 को मेरठ से आगरा पहुंचे । यहां उन्होंने विभिन्न विषयों पर अनेक व्याख्यान दिए जिनकी एक सूची ‘भारत सुदशा प्रवर्त्तक’ के जनवरी 1881 के अंक में प्रकाशित हुई थी । स्वामी के व्याख्यानों से उत्पन्न प्रभाव के परिणाम स्वरूप 26 दिसम्बर 1880 के दिन यहां आर्य समाज स्थापित हो गया ।

आगरा में एक दिन स्वामी ने ठाकुर श्यामलालसिंह के घर पर पधार कर उनके तीन पुत्रों का विधिवत् उपनयन संस्कार कराया । इस संस्कार को देखने के लिए एक यूरोपीय महिला भी आई थीं जो सम्भवतः रोमन कैथोलिक मिशनरी थीं ।
आगरा में रोमन कैथोलिक ईसाइयों का सेन्ट पीटर्स चर्च (गिरजाघर) प्रसिद्ध एवं दर्शनीय है । इस चर्च के अध्यक्ष लाट पादरी (बिशप) ने एक व्यक्ति को भेजकर स्वामी को सादर आमन्त्रित किया । अतः 12 दिसम्बर 1880 के दिन स्वामी मुन्शी गिरधारीलाल भार्गव आदि कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तिओं को साथ लेकर चर्च पहुंचे ।

स्वामी और चर्च के मुख्य पादरी (बिशप) प्रेम और सम्मान प्रदर्शन पूर्वक मिले और दोनों के बीच विभिन्न विषयों पर वार्तालाप हुआ ।

स्वामी ने प्रस्ताव रखा कि प्रथम सभी आस्तिक मत-पन्थ-मज़हबों को एक मत होना चाहिए और तत्पश्चात् सभी को मिलकर नास्तिक विचारधारा का निरसन करने में प्रवृत्त होने की आवश्यकता है । स्वामी ने यह भी कहा कि इसके लिए जिन-जिन बातों में परस्पर विरोध है उन बातों को दूर करने के लिए सभी आस्तिक मतों के नेताओं तथा धर्माचार्यों को प्रथम एक सत्य मतस्थ होना चाहिए । स्वामी ने कहा कि गोरक्षा जैसे सर्वोपकारक कार्य में सब को मिलकर चलने की आवश्यकता है । पादरी स्वामी के इस सुझाव से पूर्णतः सहमत नहीं हुए । उनका कहना था कि सभी आस्तिक वर्गों का भी एक मत होना आसान नहीं लगता, क्योंकि मुसलमान और ईसाई लोग मांसाहार का त्याग करने के पक्ष में तैयार नहीं होंगे । ऐसे में जो लोग मांसाहार को त्याज्य समझते हैं और उससे घृणा करते हैं, उन लोगों से मुसलमान, ईसाई आदि का सामंजस्य कैसे स्थापित हो सकता है ?

पादरी ने स्वामी से एक अन्य बात कही : पादरी ने कहा कि जैसे महारानी विक्टोरिया लण्दन में रहते हुए भारत में स्थित अपने वायसराय के माध्यम से इस देश का शासन चलाती हैं, वैसे ही परमेश्वर अपने एकमात्र पुत्र और दूत ईसा मसीह के माध्यम से समस्त धरती पर अपने आदेशों का प्रवर्त्तन करता है । परमेश्वर भी बिना प्रभु ईसा मसीह के मनुष्यों के धार्मिक शासन और मुक्ति का प्रबन्ध नहीं कर सकता है । स्वामी ने पादरी की इस बात का खण्डन किया । उन्होंने पादरी से कहा कि आपके द्वारा जो द्रष्टान्त दिया गया है उसमें दोष है । महाराणी विक्टोरिया की ईश्वर से क्या तुलना हो सकती है ? महाराणी तो एकदेशी, अल्पज्ञ, अल्प-शक्तिमान् हैं । अतः शासन चलाने जैसे महत् कार्य को कर पाने में वह अकेली असमर्थ हैं । इसलिए उन्हें अपने वायसराय आदि प्रतिनिधि एवं सहायकों की अपेक्षा रहती है । परन्तु परमेश्वर तो सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् है । अतः उसको अपने सृष्टि संचालन आदि कार्यों के लिए किसी अन्य की सहायता की बिल्कुल आवश्यकता नहीं रहती है । अपने समस्त कार्यों को करने में परमेश्वर स्वयं समर्थ है । स्वामी जी ने आगे कहा कि – यदि यह मान भी लिया जाए कि ईसा एक महात्मा थे तो भी यह कैसे मान लिया जाए कि ईसा की सिफ़ारिश को मान्य कर परमेश्वर अन्याय करे और किसी पाप कर्त्ता को उसके पाप का दण्ड न दे ? परमेश्वर तो न्यायकारी है, वह सब को कर्मानुसार यथायोग्य फल देता है । वह तो जो जैसा कर्म करेगा उसे वैसा फल अवश्य देगा ।

आगे वेद के विषय में बात चली : बिशप के प्रश्न करने पर स्वामी ने कहा कि परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में अग्नि-वायु-आदित्य-अंगिरा इन चार ऋषियों के द्वारा वेदों का ज्ञान प्रकाशित किया । बिशप ने स्वामी से पूछा कि –इन चारों आदि ऋषियों के देहावसान के पश्चात् उनका उत्तराधिकारी कौन हुआ और आगे आगे उनके उत्तराधिकारी कौन होते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में स्वामी ने कहा कि – सहस्रों-लाखों ऋषि-मुनि उन चार आदि ऋषियों के उत्तराधिकारी हुए । उदाहरण स्वरूप छः दर्शन, उपनिषद् तथा ब्राह्मण ग्रन्थ आदि के रचयिता ऋषि लोगों को उन चार आदि ऋषियों के उत्तराधिकारी के रूप में लिए जा सकते हैं । और सभी काल में जो भी व्यक्ति उन ऋषियों के द्वारा निर्दिष्ट वेदानुकूल जीवन पद्धति को अपनाएगा और तदनुसार अपनी दिनचर्या, व्यवहार आदि रखेगा उसे उन ऋषियों का उत्तराधिकारी माना जा सकता है । परन्तु आप मुझे यह बताइए कि ईसा के पश्चात् आपका यहां कौन प्रतिनिधि स्वरूप है ? बिशप ने कहा – रोम के पोप जो सबसे बड़े पादरी हैं उनको पृथ्वी पर परमेश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है । जो भूल या अपराध हम लोगों से होता है उसका सुधार पोप के द्वारा होता है । स्वामी ने पूछा – जो भूल या अपराध रोम के पोप से हो जाए उसका सुधार – संशोधन कौन करता है ? स्वामी ने रोम के पोपों के द्वारा की गई बुराइयों तथा मज़हबी जिहाद (क्रूजेड) के नाम पर किए गए अत्याचारों का उल्लेख कर बिशप से कहा कि इन सब का मूल कारण तो स्वयं ये पोप रहे हैं, फिर वे लोग स्वयं क्या सुधार कर सकते हैं ? इसलिए यह बात तो हमारे पौराणिकों जैसी है । बिशप स्वामी की इस बात का कोई समुचित उत्तर न दे सके ।

इसी के साथ वार्तालाप समाप्त हुआ । स्वामी ने गिरजाघर का भव्य भवन देखने की इच्छा व्यक्त की । बिशप की अनुमति लेकर वे गिरजाघर के भीतरी भागों को देखने के लिए गए । परन्तु वहां पर नियुक्त प्रहरी ने पाश्चात्य शिष्टाचार तथा गिरजाघर की प्रथा के अनुसार स्वामी को पगड़ी उतार कर भीतर जाने के लिए कहा । स्वामी स्वदेश की सभ्यता और संस्कृति के प्रति दृढ़ आस्था और अनुराग रखने वाले थे । अतः चर्च के प्रहरी का यह आदेश उन्हें कैसे मान्य हो सकता था ? उन्होंने प्रहरी से कहा कि – हमारे देश में पगड़ी पहनना सम्मान या प्रतिष्ठा सूचक है । यदि आप चाहें तो मैं जूते उतार सकता हूं, परन्तु पगड़ी नहीं । परन्तु प्रहरी अपनी बात पर अड़ा रहा । इस पर स्वामी भी उपासना गृह के भीतरी बाग में प्रविष्ट नहीं हुए और बरामदे में रखी माता मरियम और ईसा की प्रतिमाएं देखकर चले आए । स्वदेशी संस्कृति और राष्ट्रीय आचार-विचार तथा के प्रति स्वामी के हृदय में कितनी दृढ़ आसक्ति और स्वाभिमान था इसका अनुमान इस घटना से किया जा सकता है ।

[सन्दर्भ ग्रन्थ : पण्डित लेखराम संगृहीत महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवनचरित्र, देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय संगृहीत महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवनचरित, डॉ० भवानीलाल भारतीय कृत ‘नवजागरण के पुरोधा दयानन्द सरस्वती’ तथा मास्टर लक्ष्मण जी आर्योपदेशक कृत महर्षि दयानन्द सरस्वती का सम्पूर्ण जीवनचरित ।]

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