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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

धर्मनिरपेक्षता है एक राक्षसी भावना

धर्म की बड़ी विस्तृत परिभाषा है। इसके विभिन्न स्वरूप हैं। संसार की सबसे प्यारी चीज का नाम है-धर्म। आप सड़क पर चले जा रहे हैं, किसी की अचानक दुर्घटना हो जाती है, आप रूकते हैं, और अपने आप ही उधर सहायता के लिए दौड़ पड़ते है। सहायता के लिए आपके हृदय में करूणा उमड़ी-इस प्रकार आपकी करूणा का यह भाव उस समय आपका धर्म बन गया। जिसने भीतर की जाति, पंथ, सम्प्रदाय की कई दीवारों को गिराया और करूणा की नौका पर तैरती आ रही आपकी मानवता किसी के प्राणों की रक्षक बन गयी। कहीं यह आपका धर्म किसी के प्रति संवेदना व्यक्त करने में प्रकट होता है, कहीं सहानुभूति व्यक्त करने में प्रकट होता है। कहीं कोई कसाई मुर्गा, बकरा या किसी अन्य पशु को काट रहा होता है तो वहां आप दयाभाव से भर जाते हैं, तब आपका धर्म आपका दयाभाव बनकर आता है। कहीं आप किसी पर कृपालु हो जाते हैं तो आपकी कृपालुता वहां आपका धर्म बन जाती है।af उत्तेजना के क्षणों में आपका धर्म आपके लिए संयम, मोह के क्षणों में समभाव, घृणा के क्षणों में सदभाव, अकर्त्तव्य में कर्त्तव्यनिष्ठा, द्वेष में सम्मैत्री, शोक में उत्साह, रोग में जयवीविषा, अज्ञान में जिज्ञासा, आपत्ति में धैर्य, संबंधों की कटुता में सरसता, निंदा चुगली में वाचिक तप, बड़प्पन मिलने पर अहंकार शून्यता, स्वास्थ्य के लिए शरीर साधना, भवपार पाने के लिए ईश्वर की आराधना, आपके कार्यालय में अनुशासन का भाव इत्यादि बन जाता है। ये सभी धर्म के विभिन्न स्वरूप हैं। ये सारे भाव हमारी मानवता को ही बलवती करते हेँ उसे मुखरित करते हैं, और अंतत: उसी में विलीन हो जाते हैं। यह स्वचालित व्यवस्था है जो सारे विश्व को संचालित कर रही है। इन और इन जैसे जीवन प्रद भावों को अपनाकर चलना प्रत्येक मनुष्य के लिए उत्तम है। यही मेधा की उपासना है। क्योंकि संसार के प्रत्येक झंझावात में हमारी मेधा ही हमारा मार्गदर्शन करती है। ऐसे दिव्य भावों को अपनाकर चलना ही धर्म सापेक्षता कहलाती है। इन उच्च और जीवनप्रद भावों को न अपनाना ही धर्म निरपेक्षता है। इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता एक राक्षसी भावना है जो व्यक्ति को संयम के स्थान पर उत्तेजित करना, समभाव के स्थान पर मोह में फंसना, कर्त्तव्यनिष्ठा के स्थान पर अकर्त्तव्य इत्यादि धर्म के विपरीत आचरण करना सिखाती है। इस प्रकार स्पष्टï हो जाता है कि धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा कितनी खोखली है और मानवता के लिए कितनी हानिकारक है? वास्तव में यह धर्मनिरपेक्षता मजहबी पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देती है। भारत के वेद, उपनिषद इत्यादि धर्म ग्रंथ अथवा आर्षग्रंथ धर्म के विभिन्न स्वरूपों को जीवन साधना का एक संगीत बनाकर प्रस्तुत करते हैं। मानो ये सबके सब हर प्रकार से धर्म को बलवती कर रहे हैं। आज इसी साधना को सरल ढंग से ‘हिंदुत्व’ प्रस्तुत कर रहा है। इसीलिए हिंदुत्व को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक जीवन पद्घति माना है, यह कोई सम्प्रदाय नही माना गया है। हिंदुत्व उच्च मानवीय जीवन के सारे मूल्यों को समाहित करके चलता है और वह मानवता का विकास चाहता है, उसके किसी अंग या भाग का नही। इसलिए हिंदुत्व को इस देश का प्राणतत्व घोषित करने की आवश्यकता है क्योंकि हिंदुत्व का लक्ष्य किसी को सताना नही है, अपितु सबका सब प्रकार से विकास करना और विकास के अवसर उपलब्ध कराना उसका लक्ष्य है। हमारा धर्म हमें संकीर्णताओं से मुक्त हर हमारे व्यक्तित्व को विस्तार देता है। जबकि मजहब हमें संकीर्णताओं में जकड़ता है। धर्म हमें विस्तार देता है और कहता है कि हाथों को खोल दो, फेेला दो, सबके प्रति सम्मैत्री के लिए, प्रेम के लिए, सहृदयता के लिए, सहानुभूति के लिए। एक व्यवस्था स्थापित कर दो संपूर्ण संसार में। जिससे सबके मध्य ऐसा प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित हो जाए कि सारी मानवता एक परिवार बन जाए। अपने धर्म को शांति और व्यवस्था का पर्याय बना दो और इनके बीच ऐसा सामंजस्य स्थापित कर दो कि टूटे से भी ना टूट पाए। वेद ने हमें इस विषय में बड़े प्यार और रसभरे शब्दों में समझाया है। वेद ने जब हमसे कहा कि तू धर्म पर चल तो उस धर्म के लिए वेद ने शांतिपाठ की रचना की। क्योंकि धर्म और शांति का अन्योन्याश्रित संबंध है। उपद्रव, उत्पात, उन्माद और प्रत्येक प्रकार का उग्रवाद शांति में ही शामिल होता है। हमारे भीतरी जगत में यदि ये सारे विकार हैं तो बाहरी संसार शांतिमयी हो ही नही सकता। इसलिए हमारी आराधना, हमारी प्रार्थना, हमारी याचना और हमारी कामना अंन्तर्मुखी होनी चाहिए। पहले अंतर्मन पवित्र होना चाहिए। तब बाहर शांति होगी, इसलिए धर्म हमारी अंतर्मुखी प्रवृत्ति का नाम है। वह हमारे भीतरी जगत को शांत, पवित्र और निर्मल बनाता है, उसे सहज, सरल और उत्तम बनाता है। जबकि मजहब हमारे भीतरी जगत में व्याप्त उपद्रव, उत्पात, उन्माद और उग्रवाद की बारूद के ढेर में आग लगाता है। इसलिए मजहबी उन्माद से ग्रस्त व्यक्ति ‘फिदायीन’ बन जाता है। आज के विश्व की समस्या ही ये है कि हर व्यक्ति एक ‘फिदायीन’ बना घूम रहा है। भीतरी जगत में जातपात पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, प्रांत, क्षेत्र, गांव, परिवार आदि की बड़ी बडी दीवारें खड़ी हैं। संकीर्णताओं के घेरे में आत्मा रूपी पंछी तड़प रहा है। आईए!वेद की शांति के आदर्श का रसास्वादन लेते हैं। ओउम् द्यौ: शन्तिरन्तरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शांति रोषधय: शांन्ति। वनस्पतय: शांन्तिर्विश्वे देवा: शांनितर्ब्रहम् शांति: सर्व शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्ति रेधि। (यजु. 26/16)
वेद ने कहा कि द्यौ, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियां, वनस्पतियां, संपूर्ण विश्व, विश्व का रचयिता ब्रह्म और स्वयं शान्ति की भावना ये सब अपने आप में शांत हैं, व्यवस्थित हैं, पूरी तरह सिस्टेमेटिक है, कहीं कोई उपद्रव नही, उत्पात नही, किसी प्रकार का कोई उग्रवाद नही। सारे के सारे अपने मर्यादा पथ में रहकर या अपनी अपनी साधना में लगे रहकर शान्ति का संगीत निकाल रहे हैं। हे, अशान्त मना मानव ! तू शांति के इस संगीत का, मधुरस का दीवाना बन और फिर बड़ी मस्ती से उस दीनदयालु ईश्वर से कह कि ‘शांन्ति: सा मा’ अर्थात जिस व्यवस्था से द्यौलोक से लेकर वनस्पतियां तक व्यवस्थित हैं, शांति में झूम रही हंै, वही शांति हे जगन्नियन्ता तू मुझे भी दे। सारा संसार आज अव्यवस्थित है। इसके शांति के गीत में भी अव्यवस्था है, असंतुलन है, संकीर्णता है, और कुटिलता है। लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना इसने शांति के लिए की, लेकिन विभिन्न देशों से करोड़ों डालर खर्च कराके बनी वह शानदार बिल्डिंग विश्व में शांति का मंदिर नही बन पायी। क्योंकि वहां जितने भर भी पुजारी बैठे थे वे सब के सब स्वयंभू पुजारी थे। किसी की भी पूजा के पीछे साधना की शक्ति नही थी, भक्ति नही थी। सबके सब एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए स्वयं अव्यवस्थित असंतुलित और कुटिल होकर बैठे थे। परिणाम स्वरूप विश्व और भी अधिक तनाव की ओर बढ़ने लगा और द्वितीय विश्व युद्घ की विनाशकारी विभीषिकाओं में जाकर भारी विनाश का साक्षी बना। कारण था कि धर्म को व्यवस्था का और शांति का पर्यायवाची नही माना गया। बल्कि धर्म को (मजहब को) परस्पर ईर्ष्याभाव, द्वेषभाव व घ़णा के भावों का पर्याय बना दिया गया ये समझा ही नही गया कि शांति कहते किसे हैं, और इसकी मूल परिकल्पना का आधार क्या है? द्यौ से लेकर वनस्पतियों को किसी सृष्टïा की बेतरतीब चीजें समझा गया और माना गया कि इन सबमें उत्तम तो मानव है। इसलिए उसे किसी के धर्म को समझने की और उसका अनुकरण करने की आवश्यकता नही है। धर्म तो हम बनाएंगे, हम स्थापित करेंगे और अपने अपने धर्म में सारी मानवता को रंगने के लिए तलवारों का सहारा लेंगे। भौतिक धर्म नैसर्गिक धर्म पर हावी हो गया, फलस्वरूप सारा संसार अव्यवस्था और अशांति का शिकार हो गया। दुर्भाग्य है इस मानवता का कि आज भी इस विश्व में व्यवस्था के कथित पैरोकार भौतिक धर्मों की शरण में जाकर ही विश्वशांति की तलाश कर रहे हैं। नैसर्गिक और वास्तविक धर्म कहीं विस्मृत कर दिया गया।
हमारे ऋषि पूर्वजों को वेद ने बताया था-
ओउम! यां मेधां देवगणा: पितरश्चोपासते।
तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरू:।।
अर्थात शांति और व्यवस्था की स्थापना के लिए जिस मेधा की उपासना हमारे ऋषि पूर्वज देवगण करते आए हैं, आज बुद्घि प्रदाता दयानिधे…! वही मेधा तू मुझे भी दे। ऐसी मेधा जो संकीर्णताओं से मुक्त हो, जो मेरे व्यक्तित्व को विस्तार दे जो मुझे सबका और सबको मेरा बनाने में सहायता करे, मुझे दो। मैं सारे जगत में व्याप्त धर्म की व्यवस्था के मदमस्त संगीत का रसिया बनूं, और उस संगीत से झरने वाले अमृत रस को सारे संसार में बिखेरता घूमूं, जिससे कि विश्व में सर्वत्र ज्योतिर्लिंग स्थापित हो जाए। शांति की ऐसी प्रार्थना कहीं पर भी नही है। इसीलिए आज शांति के कहीं दर्शन नही हैं। विश्व को धर्म के नाम पर भ्रमित किया जा रहा है। जो धर्म है उसकी चर्चा नही होती और जो धर्म नही है उसे पूजा जा रहा है। उसी के नाम पर विश्व में खेमे बंदियां बढ़ रही हैं, उग्रवाद, आतंकवाद, उन्माद, उत्पात इत्यादि फैल रहे हैं। इन सबके बीच में शांति खोजी जा रही है। मरने पर शांति के द्वीप जलाए जाते हैं, मजारों पर रोशनी की जाती है, और जीते जी द्वीपों को बुझाया जाता है अंधेरा फैलाया जाता है। इस दोरंगी चालों के बीच शांति या तो शमशान में मिल रही है या फिर आतंकी घटनाओं के बाद फैली लाशों के पास दीखती है। यह अलग बात है कि आप उसे शांति की संज्ञा ना दें। परंतु आज के विश्व का सच यही है। धर्मनिरपेक्षता धर्म से निरपेक्ष भावों को बताती है। बात स्पष्टï है कि जीवनप्रद मूल्यों के विपरीत आचरण करना ही धर्मनिरपेक्षता है, जबकि मनुष्य के लिए धर्म से निरपेक्ष रह पाना संभव नही है। यदि मनुष्य ऐसी सोच बनाता है तो निश्चित रूप से यह उसके विनाश का रास्ता है। आवश्यकता धर्म के विषय में भ्रमित होने की नही है, अपितु धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझकर आत्मसात करने की है।

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