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आज का चिंतन

आज का चिंतन-18/07/2013

बच्चे भारत के भविष्य हैं

पैसा कमाने की मशीन न बनाएं

– डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

संस्कार निर्माण कार्य यों तो शैशव से ही आरंभ हो जाता है जब घर-परिवार, आस-पड़ोस तथा childrensपरिवेश एवं क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों, लोगों के हाव-भाव और विभिन्न घटनाओं का बाल मन पर सीधा प्रभाव पड़ने लगता है।
सामान्यतः यही वह अवस्था होती है जब संस्कारों के वंशानुगत एवं परिवेशगत बीजों का अंकुरण आरंभ हो जाता है जो किशोरावस्था आने तक धीरे-धीरे मन-मस्तिष्क में अपनी जड़ों को हमेशा-हमेशा के लिए जमाना शुरू कर देते हैं।इसी अवस्था में बच्चों व किशोरों के लिए एक छलनी जरूरी है जो यह तय करे कि कौनसी बातें और संस्कार बच्चों में स्थायी रहें, कौनसी हटाई जाएं तथा किन बातों से परहेज रखा जाए। कुछ दशकों पहले तक माहौल सभी तरफ ठीक-ठाक था और बच्चों को बिगाड़ने, उनकी एकाग्रता का खण्डन करने, असमय विलासी बना देने वाले और कामचोर किस्म दे डालने वाले आधुनिक संसाधनों का दुष्प्रभाव नहीं था।इसके साथ ही साथ घर-परिवार के लोग और गुरुजन भी बच्चों के भविष्य को लेकर हर क्षण सतर्क रहा करते थे। धन कमाने और घर भरने को ही जीवन की सफलता मान बैठे गुरुजन अब गुरु न होकर सरकारी नौकर हो गए हैं,और गुरुकुलों का स्थान ले लिया है एजुकेशन इण्डस्ट्रीज़ ने।दूसरी ओर घर-परिवार के लोग भी बच्चों को स्कूलों के हवाले छोड़ कर खुद किसी न किसी नौकरी-धंधों या फिर किसी न किसी तरीके से पैसा कमाने और बनाने की जुगाड़ में ऎसे स्वार्थी हो चले हैं कि उन्हें अपनी संतति से कहीं ज्यादा चिंता बैंक बेलेंस, आलीशान मकान बनाने और भोग-विलासिता के सारे के सारे तामझाम जुटाकर शरीर को सिर्फ और सिर्फ भोग देने और पाने का साधन बनाने पर ही केन्दि्रत होकर रह गई है।

ऎसे में बच्चों की स्थिति पेण्डुम की तरह होती जा रही है। एक ओर घरवाले समझते हैं कि स्कूल वाले सुधारेंगे,भविष्य बनाएंगे। दूसरी ओर स्कूलों में व्यवसायिक मनोवृत्ति इतनी हावी है कि इनके लिए बच्चे भारत का भावी भविष्य न होकर मुद्रा देने वाले हरकारे ही होकर रह गए हैं।

सभी तरफ संवेदनाएं और कत्र्तव्यपरायणता की मौत हो चुकी है। संस्कारहीनता और भोगवादी मानसिकता के चलते नई पीढ़ी के निर्माण पर संकट गहराता जा रहा है। और यही कारण है कि बच्चों को कोई राह नहीं सूझती दिखाई देती।

उन्हें न कोई आदर्श दिखता है और न सुनहरे भविष्य के रास्ते। चारों तरफ बच्चों को पैसा कमाने की मशीन के रूप में देखा जाने लगा है और ऎसे में बच्चों की मानसिक एवं शारीरिक स्थितियां कैसी हो रही हैं, यह हमें अच्छी तरह पता है। शिक्षाशास्ति्रयों और महान शिक्षाविदों के देश में शीर्षस्थ बुद्धिजीवी विदेशी मानसिकता से भरे हुए अपनी ही चवन्नी चला रहे हैं।

असमय बूढ़े होते जा रहे बच्चों की पीठ बस्तों के बोझ के मारे झुक गई है, कोई मरियल टट्टू हो रहे हैं तो कोई इतने थुलथुल कि खुद का वजन भी उठाये नहीं जाता। फिर ऊपर से आँखों को ढंकते जा रहे चश्मों की विवशता। आखिर हम कहाँ ले जा रहे हैं अपनी नई पीढ़ी को?  शारीरिक सौष्ठव और संस्कारों के बगैर पढ़ाई और पैसाेंं का कोई मूल्य नहीं है, इस बात को हम आज भले न समझ पाएं, आने वाला समय अपने आप समझा ही देगा।

बच्चों में संस्कार निर्माण के प्रति घर-परिवार वालों को ही जागरुकता लानी होगी। बच्चों को पौराणिक-ऎतिहासिक गाथाओं, महापुरुषों की जानकारी दी जाए, फालतू डेरों पर समय गुजारने की बुरी आदतों को छुड़वाया जाए,एकाग्रता भंग करने वाले सारे संसाधनों का उपयोग सीमित या प्रतिबंधित किया जाए तभी भारत के भावी नागरिकों को विदेशी मोह से छुटकारा दिलाकर संस्कारवान बनाया जा सकता है।

बिना संस्कारों के शिक्षा का कोई वजूद नहीं है। संस्कारों का ब्रेक ही है जो आदमी को मर्यादित करता है। वरना आजकल हम चारों ही तरफ देख ही रहे हैं। बड़े-बड़े लोकप्रिय और महान प्रतिष्ठित कहे जाने वाले लोग किस तरह संस्कारहीनता की सारी हदें पार करते जा रहे हैं और हम सारे के सारे चुपचाप बैठकर ऎसे देख रहे हैं जैसे हमारे प्राण ही किसी ने खींच कर निकाल दिए हों और मुर्दों को छोड़ दिया हो अपने भरोसे खाक होने।

हम जो हैं, जो रहे हैं अब सुधर नहीं सकते क्योंकि हम अपने स्वार्थों, उन्मुक्त व स्वच्छन्द भोग-विलास, परायी सामग्री, हराम से आयी दौलत के उपभोग आदि में इतने रम चुके हैं कि शायद ही बाहर निकल पाएं। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि हमारी नई पीढ़ी को उन सभी से बचाएं जिन्हें हम ठीक नहीं मानते। संस्कारों के संवहन पर ध्यान दें, सामाजिकता लाएं और पुरातन आदर्शों को खुद अपनाने की भले ही सामथ्र्य खो बैठे हों, कम से कम अपने बच्चों का तो ख्याल रखें।

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