वैश्विक समस्या बन चुका है,वायु प्रदूषण

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योगेश कुमार गोयल

अमेरिका के एक गैर सरकारी संगठन ‘हैल्थ इफैक्ट्स इंस्टीट्यूट’ (एचईआई) द्वारा 21 अक्तूबर को वायु प्रदूषण के दुनिया पर असर को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गई है, जिसमें बताया गया है कि भारत में स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा खतरा वायु प्रदूषण है।

प्रदूषण एक ऐसी वैश्विक समस्या बन चुका है, जिससे दुनियाभर में अनेक तरह की खतरनाक बीमारियां जन्म ले रही हैं और लाखों लोग हर साल असमय ही काल के गाल में समा रहे हैं। भारत में भी वायु प्रदूषण का प्रभाव खतरनाक रूप से पड़ रहा है। देश में और खासकर उत्तर भारत में पराली जलाने तथा कई अन्य इंसानी कारकों के कारण वायु प्रदूषण का स्तर इन दिनों खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। कमोवेश सर्दियों की शुरुआत के समय हर साल वायु प्रदूषण के कारण ऐसे ही चिंताजनक हालात देखने को मिलते हैं। हाल ही में वायु प्रदूषण की ऐसी ही एक भयावह रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें खुलासा किया गया है कि वर्ष 2019 में वायु प्रदूषण के कारण जहां पूरी दुनिया में 4.76 लाख बच्चों की मौत हुई, वहीं अकेले भारत में ही एक महीने से भी कम आयु के 1.16 लाख नवजातों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हो गई। हालांकि नवजात शिशुओं की अधिकांश मौतें जन्म के समय कम वजन और समय से पहले जन्म से संबंधित जटिलताओं के कारण हुईं लेकिन वायु प्रदूषण अब नवजातों की मौतों का दूसरा सबसे बड़ा खतरा बन रहा है, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।

अमेरिका के एक गैर सरकारी संगठन ‘हैल्थ इफैक्ट्स इंस्टीट्यूट’ (एचईआई) द्वारा 21 अक्तूबर को वायु प्रदूषण के दुनिया पर असर को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गई है, जिसमें बताया गया है कि भारत में स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा खतरा वायु प्रदूषण है। ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020’ नामक इस वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक देश में बाहरी और घरेलू वायु प्रदूषण के लंबे समय के प्रभाव के कारण 2019 में स्ट्रोक, दिल के दौरे, डायबिटीज, फेफड़े के कैंसर, पुरानी फेफड़ों की बीमारियों और नवजात रोगों के कारण ये मौतें हुईं। रिपोर्ट के अनुसार इनमें आधी से भी ज्यादा मौतों का संबंध बाहरी पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व से है जबकि बाकी मौतें कोयला, लकड़ी और गोबर से बने ठोस ईंधन के कारण होने वाले वायु प्रदूषण से जुड़ी हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि वायु प्रदूषण अब मौत के लिए सबसे बड़े खतरे वाला कारक बन गया है और नए विश्लेषण में अनुमान जताया गया है कि नवजातों में 21 फीसदी मौत का कारण घर और आसपास का वायु प्रदूषण है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा भी वर्ष 2018 में ‘एयर पोल्यूशन एंड चाइल्ड हैल्थ’ नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी, जिसमें कहा गया था कि वर्ष 2016 में दुनियाभर में पांच वर्ष से कम आयु के छह लाख बच्चों की मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण हुई थी और उनमें से एक लाख से भी अधिक बच्चे भारत के ही थे। वायु प्रदूषण के कारण नवजात शिशुओं की सर्वाधिक मौतें अफ्रीका तथा एशिया में होती हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार दुनिया भर में करीब नब्बे फीसदी बच्चे, जिनकी कुल संख्या लगभग 1.8 अरब है, ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं, जहां वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है। भारत जैसे विकासशील देशों में तो स्थिति और भी खराब है, जहां करीब 98 प्रतिशत बच्चे अत्यधिक प्रदूषित माहौल में रहते हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भी विश्वभर में करीब दो अरब बच्चे खतरनाक वायु प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमें से 62 करोड़ दक्षिण एशियाई देशों में हैं। हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित मेरी ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि वायु प्रदूषण से बच्चों के मस्तिष्क और दूसरे अंगों पर भी प्रभाव पड़ता है। जून 2018 में यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया जा चुका है कि भारत में लगभग सभी स्थानों पर वायु प्रदूषण निर्धारित सीमा से अधिक है, जिससे बच्चे सांस, दमा तथा फेफड़ों से संबंधित बीमारियों और अल्प विकसित मस्तिष्क के शिकार हो रहे हैं। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु में से दस फीसदी से अधिक की मौत वायु प्रदूषण के कारण उत्पन्न होने वाली सांस संबंधी बीमारियों के कारण होती हैं।

एचईआई (हैल्थ इफैक्ट्स इंस्टीट्यूट) के अध्यक्ष डैन ग्रीनबाम का कहना है कि किसी नवजात का स्वास्थ्य किसी भी समाज के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होता है और इन नए साक्ष्यों से दक्षिण एशिया और अफ्रीका में नवजातों को होने वाले अधिक खतरे का पता चलता है। ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020’ रिपोर्ट के मुताबिक गर्भ में पल रहे शिशुओं पर भी वायु प्रदूषण का घातक असर पड़ता है। इससे समय से पूर्व प्रसव या फिर कम वजन वाले बच्चे पैदा होते हैं और ये दोनों ही शिशुओं में मृत्यु के प्रमुख कारण हैं। पर्यावरण एवं प्रदूषण पर लिखी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के अनुसार अत्यधिक प्रदूषण में पलने वाले बच्चे अगर बच भी जाते हैं, तब भी उनका बचपन अनेक रोगों से घिरा रहता है। वायु प्रदूषण से नवजातों की मौतों में से दो तिहाई मौतों का कारण घरों के अंदर का प्रदूषण है। विश्व स्तर पर वाहनों से उत्सर्जित गैसों और पार्टिकुलेट मैटर के उत्सर्जन पर तो बहुत चर्चा होती है लेकिन घरों के अंदर के प्रदूषण के स्रोतों पर अक्सर कोई चर्चा नहीं होती। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के वैज्ञानिकों के मुताबिक खाना पकाने, साफ-सफाई तथा घर के अन्य सामान्य कामकाजों के दौरान पार्टिकुलेट मैटर और वोलाटाइल आर्गेनिक कंपाउंड्स (वीओसी) उत्पन्न होते हैं, जो प्रदूषण के कारक बनते हैं। पार्टिकुलेट मैटर खाना पकाने और साफ-सफाई के दौरान उत्पन्न होते हैं जबकि शैम्पू, परफ्यूम, रसोई और सफाई वाले घोल वीओसी के प्रमुख स्रोत हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस प्रकार के तत्व विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के अलावा कैंसरकारक भी होते हैं।

घरों में वायु प्रदूषण के बढ़ते दुष्प्रभावों का सबसे बड़ा कारण आजकल अधिकांश घरों में विभिन्न घरेलू कार्यों में तरह-तरह के रसायनों का बढ़ता उपयोग माना जा रहा है। ऐसे ही रसायनयुक्त पदार्थों के बढ़ते चलन के ही कारण घरों के अंदर फॉर्मेल्डीहाइड, बेंजीन, एल्कोहल, कीटोन जैसे कैंसरजनक हानिकारक रसायनों की सांद्रता बढ़ जा रही है, जिनका बच्चों के स्वास्थ्य पर घातक असर पड़ता है। विभिन्न अध्ययनों में ये तथ्य सामने आ चुके हैं कि घरों के भीतर का प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि वायु प्रदूषण के कारण बच्चे मंदबुद्धि हो रहे हैं, जन्म के समय कम वजन के बच्चे पैदा हो रहे हैं। गर्भ में भी बच्चे वायु प्रदूषण के प्रभाव से अछूते नहीं हैं, उनका तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो रहा है। बच्चों में सांस संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं, उनमें दमा और हृदय रोगों के मामले बढ़ रहे हैं और वायु प्रदूषण के कारण हर साल लाखों बच्चों की मौत वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों के कारण हो रही हैं। बहरहाल, वायु प्रदूषण के बच्चों पर पड़ते दुष्प्रभावों और हर साल वायु प्रदूषण के कारण हो रही लाखों बच्चों की मौतों को लेकर पूरी दुनिया को अब संजीदगी से इस पर विचार मंथन करने और ऐसे उपाय किए जाने की आवश्यकता है, जिससे मासूम बचपन प्रदूषण का इस कदर शिकार न बने।

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