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भारतीय संस्कृति

हमारी विस्मयकारी शब्द शक्ति

डॉ. मधुसूदन
ओउम्-गीतकार होना चाहते हो?
ओउम्-प्रचण्ड शब्द शक्ति का स्रोत।
ओउम् -प्रास रचना में भी सहायक ।
(एक) संस्कृत गीत रचना
आपने, पूजनीय, आदरणीय, माननीय, पठनीय, वाचनीय, निन्दनीय, वंदनीय, अभिनन्दनीय, दर्शनीय, श्रवणीय इत्यादि, शब्द प्रयोग सुने होंगे। ऐसे प्राय: 250 शब्द तो सरलता से भाषा में, मिल ही जाएंगे। इन सारे शब्दों के अर्थ भी जुडे हुए हैं। जो आपने अनेक बार पढे होंगे, जाने होंगे।
उदा वंदनीय= वंदन करने योग्य, या जिसका वंदन करना चाहिए;
पठनीय= पठन करने योग्य, या जिसका पठन करना चाहिए; ऐसे ही अर्थ होते हैं। अब नीचे दिया हुआ, एक छोटासा संस्कृत गीत देखिए।
यह गीत स्मरणीय, वदनीय, करणीय, रमणीय, शयनीय, जागरणीय, गणनीय, मननीय, त्वरणीय, तरणीय, चरणीय, भ्रमणीय, संचरणीय़ ऐसे शब्दों के प्रास (तुकान्त) पर रचा गया है। गीत सरल संस्कृत में ही लिखा गया है।इस गीत की रचना, स्व. पद्मश्री डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर जी ने, वनवासी क्षेत्रों में लगे शिविर के लिए की थी। विवेकानन्द शिला स्मारक स्थापक, श्री. एकनाथ जी रानडे के अनुरोधपर, ऐसे 164 सरल संस्कृत गीतों की पुस्तक तीर्थ भारत प्रकाशित की गयी थी।
उन्हीं गीतों में से, एक गीत प्रस्तुत है। पढिए न्यूनतम संस्कृत जानकारी से भी इसका अर्थ समझ में आ जाएगा।
(दो) लोकहितं मम करणीय मनसा सततं स्मरणीयम् । वचसा सततं वदनीय लोकहितं मम करणीय़म् ॥ध्रु॥
6 मनसा=मनसे , सततं= सदा, वचसा= वाचासे या वाणीसे, वदनीयम् = बोलना चाहिए 8
न भोगभवने रमणीयम्।न च सुखशयने शयनीय।
अहर्निशं जागरणीयम् । लोकहितं मम करणीय़।॥1॥
6 भोगभवने=भोग महलमें, सुखशयने = सुखदायी शय्या पे, अहर्निशं=दिन रात 8 न जातु दु:खं गणनीयम् । न च निजसौख्यं मननीय।
कार्यक्षेत्रे त्वरणीयम् । लोकहितं मम करणीय़ ॥2॥
6जातु=पैदा होता, निजसौख्यं= अपना सुख, त्वरणीयम् = शीघ्रता करनी है8
दु:खसागरे तरणीयम् । कष्टपर्वते चरणीय।
विपत्तिविपिने भ्रमणीयम् ।लोकहितं मम करणीय़म् ॥ 3॥
6 विपत्तिविपिने= संकटों के वन में, गह्वरे= गुफाओ में 8
गहनारण्ये घनान्धकारे। बन्धु जना ये स्थिता गह्वरे ।
तत्र मया संचरणीयम् । लोकहितं मम करणीय़॥ 4॥
6गहनारण्ये=घने जंगल में, घनान्धकारे=घने अंधेरे में, मया=मेरे द्वारा (तीन) इसी प्रत्यय के कुछ और उदाहरण करणीय (करने योग्य), स्मरणीय, पूजनीय, पठनीय, वाचनीय, प्रार्थनीय, गणनीय, तोलनीय, निन्दनीय, प्रशंसनीय, श्रवणीय, दर्शनीय, कम्पनीय, प्रकाशनीय, आदरणीय, दण्डनीय, चिंतनीय, कमनीय, त्यजनीय, भूषणीय, भ्रमणीय, शोभनीय, वरणीय, गमनीय, भरणीय, अटनीय, अर्चनीय, अर्थनीय, भवनीय, आसनीय, अध्ययनीय, निरीक्षणीय, कथनीय, कोपनीय, कल्पनीय, सेवनीय, क्रीडनीय, क्रोधनीय, क्षमणीय़, क्षयणीय, खेलनीय, गर्जनीय, गोपनीय, गानीय, ग्रहणीय, घटनीय, चलनीय, जननीय, जपनीय, जागरणीय, ज्ञानीय, तपनीय, तरणीय, दलनीय, दहनीय, दानीय, दीपनीय, धानीय, ध्यानीय, नमनीय, नर्तनीय, पचनीय, पानीय, पोषणीय, वचनीय, भाषणीय, भोजनीय, भ्रमणीय़ इत्यादि, और भी बहुत शब्द बन सकते हैं।
(चार)गीत या कविता में उपयोग।
विशेष इन सारे शब्दों का अंत -नीय या-णीय में होने से उनका प्रयोग कर गीत या कविता करना भी सरल ही होता है। ऐसे और भी प्रत्ययों वाले शब्द हैं। अभी तो 80 प्रत्ययोंमें से एक ही प्रत्यय का उदाहरण दिया है। लीजिए- नन्दन, मिलन, चलन, पूजन, अर्चन इत्यादि का दूसरा उदाहरण।और लीजिए- याचक, नायक, लेखक, सेवक, दर्शक इत्यादि तीसरा उदाहरण।लीजिए और एक- हर्ता, कर्ता, वक्ता, दाता, ज्ञाता, भोक्ता इत्यादि चौथा उदाहरण।और लीजिए -मानिनी, मालिनी, दामिनी, कामिनी, कुमुदिनी, नलिनी ऐसा पाँचवा उदाहरण।ऐसे बहुत सारे प्राय: 80 तक उदाहरण दिए जा सकते हैं। यह सारी उपलब्धि देववाणी संस्कृत के कारण है। लेखक ने, हिंदी, गुजराती, और मराठी में कविता लिखने में सरलता अनुभव की है।
(पाँच) संस्कृत शब्द थोक में
विश्वास नहीं होगा, पर कुछ पंक्तियाँ पढने पर आप भी समझ जाएंगे, कि, संस्कृत (अत: हिंदी भी) शब्द थोक में आकलन हो जाते हैं, जब अंग्रेज़ी के शब्द एक एक कर सीखे जाते हैं। क्यों कि अंग्रेज़ी के शब्द अन्य भाषाओं से उधार लिए गए हैं। इस लिए सामान्यत: आपस में जुडे हुए नहीं होते। कुछ अंश होता भी है, तो हमारे लिए लातिनी, और युनानी भी पराई भाषाएँ होने से हमें कोई लाभ नहीं। इसे एक सिद्धान्त के रूप में कहा जा सकता है।
सिद्धान्त संस्कृतजन्य (हिंदी) शब्द थोक में आकलन हो जाते हैं।
इस सत्य को समझने में, यदि साधारण पाठक कठिनाई अनुभव करता है; तो उसका कारण संस्कृत की हमारी उपेक्षा और ढूलमूल भाषा नीति-रीति उत्तरदायी है। शायद हमारे सम्मान्य समाज का अज्ञान भी उत्तरदायी है, शिक्षा उत्तरदायी है, शासन भी उत्तरदायी है।
दास्यता के भ्रम में डूबे शिक्षित समाज ने भी अपना दायित्व नहीं निर्वाह किया, जानकारों का कर्तव्य था, इस ओर ध्यान आकर्षित करने का।पर वे मैकाले के ही, समर्थक हो कर रह गए।
(छ:) संस्कृत शब्द-गुच्छ
आप जितना समय अंग्रेज़ी एक नया शब्द सीखने में लगा देते हैं, उतने समय में आप संस्कृत के अनेक शब्द अर्थसहित सीख सकते हैं। क्यों कि, संस्कृत के शब्द एक गुच्छे में होते हैं। उसके एक शब्द को समझते ही गुच्छेके अन्य शब्द भी सरलता से समझने में सहायता करते हैं। कुछ संस्कृत के उपसर्ग, प्रत्यय, और धातुओं का ज्ञान होने पर और सरलता अनुभव होती है।
बहुत से शब्दों का अर्थ भी आप हिंदी में प्रयोगों के कारण, जानते ही होंगे, हिन्दी में भी इनका प्रचुर मात्रा में प्रयोग होता है। ऐसे शब्दों से आपकी भाषा भी मंजी हुयी बन कर मोहक हो जाती है।
संस्कृत व्याकरण को बाहर रखकर भी आप इन शब्दों का अंतवाला अंश अनीय या अणीय जान गए होंगे।
यह शब्द रचना की प्रचण्डता दिखाने के लिए लिखा गया आलेख है।
संस्कृत व्याकरण का उपयोग करते हुए, नया शब्द कैसे रचा जा सकता है, यह उदाहरणों से पता चलता है। नियम नहीं समझाए हैं। पर, ऐसे शब्दों के उदाहरण मात्र दिए गए हैं।आलेख का उद्देश्य हमारी प्रचण्ड शब्द रचना शक्ति की झलक मात्र दिखाना भी है। संस्कृत व्याकरण ऐसे आलेख में समझाया नहीं जा सकता, न उसकी पर्याप्त जानकारी इस लेखक को है।
संस्कृत व्याकरण के अपवाद रहित, और दोषरहित नियम जाने बिना, नया शब्द रचना उचित नहीं है। वैसे हिन्दी में संस्कृत व्याकरण की दृष्टिसे कुछ अशुद्ध शब्द देखे जाते हैं।पर वे प्रचलित हो चुके हैं। कुछ हिंदी के हितैषी भी हिंदी को संस्कृत के द्वेष पर आगे बढाकर, विकृत कर रहें हैं। फिर कहते हैं, भाषा है बहती नदी। किसी को भी इस बह्ती नदी को प्रदूषित करने का अधिकार नहीं है। परिमार्जित कर ऊंचा उठाने का है, वैसी नदी अवश्य मान्य है। बदलाव विकृति की ओर न हो, संस्कृति की ओर, उन्नति की ओर स्वीकार्य हैं।
वैसे हिन्दी को संस्कृत के इस सर्व प्रदेश-स्पर्शी गुण पर आरूढ करने से सर्व-स्वीकृति कराने में न्यूनतम कठिनाई अपेक्षित है। संस्कृत के कुछ ही अध्ययन से ही आप अपना शब्द भण्डार भी बढाकर समृद्ध कर सकते हैं। यही सूत्र बचपन में सीखा था। और एक साथ तीन भाषाओं में मुझे लाभ प्रतीत हुआ था।
विषय बहुत गहरा है। यह केवल एक झलक मात्र देने का ही प्रयास है।

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