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नारी शक्ति के बारे में पौराणिक दृष्टिकोण

मार्कंडेय पुराण, जिसके एक हिस्से को “दुर्गा सप्तशती” कहते हैं, वो ऋषि मार्कंडेय और जैमिनी के बीच का संवाद है। ऋषि मृकण्ड के पुत्र का अल्पायु होना तय था। तो पति-पत्नी ने बालक मार्कंडेय को उसका भविष्य बताया और कहा कि काल को रोकने का सामर्थ्य सिर्फ भगवान शिव में है, तो तुम उन्हीं की उपासना करो। संभवतः इससे तुम्हारी आयु कुछ बढ़ जाए, और जो न भी बढ़ी तो जो पुण्य होंगे उनका लाभ तो मिलेगा ही। तो ऋषि मार्कंडेय बचपन में ही ऋग्वेद के महामृत्युंजय मन्त्र (7.59.12) जो कि यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी आता है, उसका जाप करने लगे।

ऐसा माना जाता है कि वाराणसी में गंगा-गोमती संगम पर स्थित कैथी में आज जिसे मार्कण्डेय महादेव मंदिर कहा जाता है, वहीँ मार्कंडेय ऋषि उपासना करते थे। जब उनकी बारह वर्ष की आयु हुई तो यमदूत उन्हें शिवमंदिर से ले नहीं जा पाए और अंततः काल को स्वयं ही आना पड़ा। ऋषि मार्कंडेय शिवलिंग से लिपटे थे तो उनके पाश में भगवान शिव ही आ गए! महामृत्युंजय मन्त्र शिव के रूद्र (सबसे उग्र रूपों में से एक) रूप का होता है। यमपाश में बंधे भगवान शिव जब प्रकट हुए तो काल को ऋषि मार्कंडेय को छोड़ना पड़ा। भगवान शिव को महाकाल या कालान्तक नाम से भी जानते हैं।

जब “काली” शब्द को देखेंगे तो स्पष्ट रूप से ये “काल” शब्द से ही आता है। थोड़ा और गौर से देखेंगे तो ध्यान जाएगा कि सृष्टि के विनाश को उद्दत देवी जब काली के रूप में होती हैं तो उन्हें रोकने का काम फिर से भगवान शिव के जिम्मे ही आता है। वो रोकने-टोकने की कोई कोशिश नहीं करते। संभवतः ललिता देवी के कामेश्वरी रूप से विवाह के लिए जो कामेश्वर रूप का वर था वो आड़े आ जाता है। विवाह इसी आधार पर हुआ था कि वो स्वतंत्र होंगी और उनके कुछ करने-बोलने पर कोई रोक-टोक नहीं होगी। भगवान शिव भी रोकने के बदले रास्ते में लेट जाते हैं। उनपर पैर पड़ते ही देवी जब देखती हैं कि पैर कहाँ रख दिया, तब वो स्तंभित होती हैं!

जहाँ स्वयं भगवान शिव की ये स्थिति होती हो, वहां मनुष्यों की कैसी होती होगी? देवी के गले में जो आठ नरमुंड होते हैं वो बुद्धि को जकड़ने वाले आठ पाशों को दर्शाते हैं। ये काम (वासना), क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, भय और घृणा के पाश हैं। एक-एक करके इन पाशों को काटकर देवी अपने भक्तों को मुक्त करती हैं। रक्तबीज वध के प्रसंग में देवी का ऐसा ही रूप प्रदर्शित होता है। जैसे रक्तबीज के खून की बूँद जमीन पर गिरते ही बीज की तरह, उतना ही शक्तिशाली, दूसरा राक्षस उत्पन्न करती थी, इक्छाओं के साथ भी वैसा ही माना जाता है। एक इच्छा, बीज की तरह उतनी ही बलवती कोई दूसरी इच्छा को जन्म देती जाती है। देवी इन सभी को चट कर जाती है।

त्वयेतद्धार्यते विश्वं त्वयेतत् सृज्यते जगत।
त्वयेतत् पाल्यते देवी त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥

सृजन और पालन का ही नहीं, अंत का जिम्मा भी उनका ही है, इसलिए वो देवी के सबसे उग्र रूपों में से एक है। महानिर्वाण तंत्र में भगवान शिव कहते हैं कि सबकुछ लीलने वाले काल का तुम भक्षण करती हो इसलिए तुम्हारा नाम महाकाली है, और सब तुमसे शुरू भी होता है इसलिए तुम्हारा नाम आद्या है। अब जहाँ से हम लोगों ने शुरू किया था, उन्हीं मार्कंडेय ऋषि के पास वापस चलें तो वो भृगु वंश के ऋषि थे। पूरी महाभारत भृगुवंशी ऋषियों की ही कहानियां कहती रहती है इसलिए वो महाभारत में भी आते हैं। यानी काली भी महाभारत में आती हैं। अश्वत्थामा शिवभक्त था और जब वो पांडवों के पुत्रों की हत्या करता है, तब देवी की चर्चा आती है।

महाभारत में देवी के हाथ में पाश होता है, जिसमें वो जीवों को बांध लिए जाती हैं। आमतौर पर मूर्तियों में जब देवी को दर्शाते हैं तो उनके हाथ में कमल होता है पाश नहीं। कुछ लोग शिव में से “इ” की मात्रा हटाते हुए बताते हैं कि ऐसा करते ही शिव, शव हो जाते हैं। यहाँ “शव” का अर्थ द्रव्य हो जाता है और “इ” का अर्थ उर्जा है। बिना उर्जा के शिव भी कुछ नहीं कर सकते, यहाँ ऐसा भाव है। वैसे भौतिकी (फिजिक्स) की परिभाषा कहती है कि ये द्रव्य, उर्जा और उससे सम्बंधित नियमों का विज्ञान है। शिव-शक्ति की धर्मग्रंथों में चर्चा का कोई वैज्ञानिक आधार है या नहीं है, इस बारे में हम कुछ नहीं कहते।

बाकी देवी काली, सनातनी देवी-देवताओं में सभवतः एकमात्र पूज्य देवी हैं जिनका जन्म सीधे क्रोध से होता है। हर व्यक्ति को उनके रूप सहज लगें ऐसा आवश्यक नहीं और कोई जबरदस्ती भी नहीं है। वैष्णव जैसे (शाकाहारी प्रकार की) मनोवृति के हो तो दूर से हाथ जोड़कर भी आगे बढ़ सकते हैं।

आपने मशहूर फिल्म “अवतार” देखी होगी, तो उसके अंतिम दृश्य का युद्ध भी देखा ही होगा। “अवतार” नाम ही हिन्दुओं के देवी-देवताओं के अवतार से लिया गया है, तो जाहिर है फिल्म में कई हिस्से भी हिन्दुओं की पुराण-कथाएँ हैं। नरकासुर से लड़ाई में कृष्ण एक प्रहार से जब बेहोश हो जाते हैं तो सत्यभामा नरकासुर से लड़ने उतर पड़ती है और नरकासुर की छाती में तीर मार गिराती है। अंतः कृष्ण सत्यभामा के संयुक्त प्रयासों से नरकासुर मारा जाता है और कृष्ण उसका सर सुदर्शन चक्र से काट कर उसकी जीभ खंडित कर देते हैं। “अवतार” फिल्म के अंतिम दृश्य की लड़ाई में नायक का गिरना और नायिका का तीर चलाना इसी कहानी से प्रेरित है।

नरकासुर की ग्यारह अक्षौहणी सेना इस युद्ध में मारी गई। इस सेना का सेनापति मुर नाम का था, और उसी के वध के कारण कृष्ण का एक नाम “मुरारी” भी होता है। कहते हैं, एक बार नरकासुर, देवी कामख्या से ही विवाह करने के पीछे पड़ गया। देवी ने शर्त रखी कि अगर रात भर में नीलांचल पहाड़ी के नीचे से ऊपर मंदिर तक की सीढ़ियाँ बना डालो तो मैं तुमसे विवाह कर लूं। नरकासुर फ़ौरन इस काम में जुट गया और जब देवी को लगा कि ये तो सचमुच सीढ़ी सुबह होने से पहले पूरी कर डालेगा तो उन्होंने एक मुर्गे को बांग देने का आदेश दिया। मुर्गा कुकडू कँे कर उठा और नरकासुर ने सोचा शर्त के मुताबिक मुर्गे के बांग देने से पहले सीढ़ी पूरी करनी थी ! तो वो आधे में ही, सीढ़ी बनाना बंद कर के चला गया।

बाद में जब नरकासुर को पता चला तो उसने मुर्गे को खदेड़ के मार डाला। जिस जगह बेचारा मुर्गा मारा गया उसे दर्रांग जिले का कुक्कूड़काता माना जाता है। अधूरी सीढ़ी को अब मेखेलौजा पथ बुलाते हैं। संस्कृत-हिंदी शब्द “घोर”, भय का परिचायक है। सनातन मान्यताओं में बुढ़ापा, बीमारी, तनाव, अहंकार, मृत्यु का भय सभी घोर हैं। जब साधक शक्ति की कृपा से माया को पार कर जाता है और शिव के अघोर (घोर का ठीक उल्टा) स्थिति को पा लेता है तो उसे अघोरी कहते हैं। मृत्यु का भय सबसे बड़ा माना जाता है, इसलिए अघोरियों की साधना शमशानों में ही शुरू होती है। शमसान अगर उत्तर दिशा में बहती नदी के पास हो तो और भी बेहतर। बंगाल के तारापीठ में तो शाकाहारियों और मांसाहारियों का शमशान अलग-अलग भी हैं।

शाक्त परम्पराओं के ऐसे ही साधकों के लिए कामख्या शक्ति पीठ का महत्व होता है। मान्यता है कि वामाचार की साधना इसी स्थल से कभी ऋषि वशिष्ठ ने आगे बढ़ानी शुरू की थी। कामख्या शक्ति पीठ, सती की योनी गिरने के स्थान पर बना है। साबर, नाथ या कालिकुल जैसे सम्प्रदायों में इसी वजह से कामख्या शक्तिपीठ की महत्ता और भी ज्यादा होती है। इसके गर्भगृह में कोई विग्रह (कोई मूर्ती) भी नहीं है, यहाँ भूमिगत गुफा जैसे स्थान में सतत जल प्रवाह होता रहता है। अम्बुबाची के चार दिनों के दौरान यहाँ पानी लाल हो जाता है। इसके किसी वैज्ञानिक कारण का मुझे पता नहीं, लेकिन इसे स्त्री के रजस्वला होने का प्रतीक माना जाता है। देवी का नहीं, ये भूदेवी यानि पृथ्वी के रजस्वला होने का प्रतीक है।

इस दौरान कामख्या और असम के मंदिर ही नहीं, काशी तक के सभी शक्ति पीठ बंद रहते हैं। कुछ समय से ये 22 से 26 जून के बीच पड़ रहा है। करीब करीब मानसून और नयी फसल की बुआई से ठीक पहले प्रकृति के रजस्वला होने का ये प्रतीक असमय तो नहीं लगता है। इस दौरान यहाँ तांत्रिक, अघोरी, दशनामी, सहजिया से लेकर शंकराचार्य पीठ के सन्यासी और दूसरे सभी मतों-सम्प्रदायों के योगी-साधक भी मिल जाते हैं। वामाचार में थोड़ी भी रूचि रखने वालों के लिए ये सबसे बड़ा पर्व होता है। हालाँकि उनकी राजनीती विरोध पर ही टिकी होती है, किसी सुधार की बात नहीं करती फिर भी स्त्रियों के लिए चार दिनों छुट्टी हर महीने मांगने वालों को सनातन परम्पराओं में मौजूद इस चार दिन की छुट्टी को देखना चाहिए। इस मंदिर और उस से जुड़ी मान्यताओं का असम के इतिहास में भी ख़ासा महत्व रहा है। अहोम राजवंश दिल्ली की सल्तनतों से कहीं ज्यादा लम्बे समय तक चले थे, ये अलग बात है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी और उनकी किराये की कलम राजधानी के नाम से देश को जानने की परिपाटी चलाती रही है।

तबाक़त ए नासिरी के हवाले से पता चलता है कि 1337 में एक लाख घुड़सवारों की फ़ौज को मुहम्मद शाह ने असम जीतने के लिए रवाना किया था। मगर इ.ए.गेट बताते हैं कि इस फ़ौज में से एक भी सिपाही नहीं लौटा। बाद में फिर जब औरंगजेब ने राजा राम कछवाहा और दुसरे सरदारों को असम पर हमला करने भेजने की कोशिश की तो कोई इस फ़ौज में भर्ती होने को तैयार ही नहीं होता था। आखिरकार सेना के साथ गुरु तेग बहादुर को ले जाया गया ताकि लोगों के मन से काले जादू का डर निकले। हालाँकि इस फ़ौज का भी हाल वही हुआ था, लोचित बोरफुकन (लोचित शायद लोकहित को कहा जाता होगा और फुकन सरदार होता है, यानि बोरफुकन सेनापति) ने खदेड़ खदेड़ कर मुग़ल और उसके पिट्ठुओं की फ़ौज को काटा था, लेकिन हाँ इस से ये जरूर हुआ कि गुरु तेगबहादुर के पहुँचने से असम में सिक्ख धर्म भी पहुंचा।

शायद सरायघाट के युद्ध में मुगलों के कुचले जाने के दौर में ही कामख्या शक्तिपीठ और उस से जुड़ी तांत्रिक परम्पराओं की धाक जम गयी होगी। पिछली कई शताब्दियों से मनाये जा रहे इस त्यौहार की हिन्दुओं को जानकारी कम होने का कारण इसका अज्ञात या गुप्त होना नहीं है। इसकी वजह ये है कि हिन्दुओं में पास एक बड़ा मासूम सा सवाल होता है : “ये हिंदी में मिलेगा क्या?” आपकी सभ्यता-संस्कृति के बारे में अगर विदेशी भाषाओँ में जानकारी थी, और आपकी भाषा में नहीं थी तो सीखकर अनुवाद करना किसकी जिम्मेदारी होती थी? पड़ोसी देश से कोई आएगा क्या? अगर खुद सीख नहीं सकते तो किसी योग्य अनुवादक को ढूंढकर, उचित मानदेय पर उस से ये काम करवा लेने से किसने रोका था? आज जब अम्बुबासी का त्यौहार अपने अंतिम दिन पर है तो एक बार अपने सामुदायिक निकम्मेपन पर भी विचार कीजियेगा।

बाकी ये याद रखियेगा कि हाल तक जो शाम ढले मंदिर से नीचे उतर आने की सलाह दी जाती थी, क्योंकि रात में डाकिनी, योगिनियाँ अपनी पद्दतियों से पूजा करती, वो भय भी “घोर” होता है। अघोर उस से आगे है!

भिमाक्षी भिषणे देवी सर्वभूताभयंकरी।
कराली विकराली च कामेश्वरी नमोस्तुते।।
– योगिनितंत्र
(जानकारी का ज्यादातर भाग, अध्यात्मिका की वेबसाइट से लिया है)

पर्वत की ऊँची चोटी के लिए संस्कृत में “शिखर”, और उसे धारण करने वाले, यानी पर्वत के लिए “शिखरि” शब्द प्रयुक्त होता है। इसी का स्त्रीलिंग “शिखरिणी” हो जाएगा। इसी शब्द “शिखरिणी” का एक और उपयोग “सुन्दर कन्या” के लिए भी होता है। शिखरिणी संस्कृत काव्य का एक छन्द भी है। इसी शिखरिणी छन्द में आदि शंकराचार्य ने सौंदर्यलहरी की रचना की थी। संस्कृत जानने वालों के लिए, शाक्त उपासकों के लिए या तंत्र की साधना करने वालों के लिए सौन्दर्यलहरी कितना महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी पैंतीस से अधिक टीकाएँ, केवल संस्कृत में हैं। हिन्दी-अंग्रेजी भी जोड़ें तो पता नहीं गिनती कहाँ तक जाएगी।

आदि शंकराचार्य के सौन्दर्यलहरी की रचना के साथ भी एक किम्वदंती जुड़ी हुई है। कहते हैं वो एक बार कैलाश पर्वत पर गए और वहां भगवान शिव ने उन्हें सौ श्लोकों वाला एक ग्रन्थ दिया। देवी के अनेक रूपों के वर्णन वाले ग्रन्थ को उपहार में पाकर प्रसन्न आदि शंकराचार्य लौट ही रहे थे कि रास्ते में उन्हें नन्दी मिले। नन्दी ने उनसे ग्रन्थ छीन लेना चाहा और इस क्रम में ग्रन्थ आधा फट गया! आदि शंकराचार्य के पास शुरू के 41 श्लोक रहे और बाकी लेकर नन्दी भाग गए। आदि शंकराचार्य ने वापस जाकर भगवान शंकर को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, 41वें से आगे के श्लोकों को देवी की स्तुति में तुम स्वयं ही रच दो!

तो इस तरह तंत्र के साधकों का ये प्रिय ग्रन्थ दो भागों में बंटा हुआ है। पहले 41 श्लोक देवी के महात्म्य से जुड़े हैं और आनन्दलहरी के नाम से जाने जाते हैं। जहाँ से देवी के सौन्दर्य का बखान है उस 42वें से लेकर सौवें श्लोक को सौन्दर्यलहरी कहते हैं। अब जिस छन्द में ये रचा गया है उस “शिखरिणी” पर वापस चलें तो उसका पहला अर्थ पहाड़ की चोटी बताया जाता है। नन्दा देवी या वैष्णो देवी जैसी जगहों के बारे में सुना हो तो याद आ जायेगा कि देवी को पर्वत की चोटी पर रहने वाली भी बताया जाता है। दूसरे हिस्से के लिए अगर “शिखरिणी” का दूसरा अर्थ सुन्दर कन्या लें, तो नवरात्र में कन्या पूजन भी याद आ जायेगा।

एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानि मानवविज्ञानी जब धर्म का अध्ययन करते हैं तो उसे दो भागों में बांटने की कोशिश करते हैं। रिलिजन या मजहब के लिए संभवतः ये तरीका आसान होगा। वृहत (ग्रेटर) धारा में वो उस हिस्से को डालते हैं जिसमें सब कुछ लिखित हो और उस लिखे हुए को पढ़ने, समझने और समझाने के लिए कुछ ख़ास लोग नियुक्त हों। छोटी (लिटिल) धारा उसे कहते हैं जो लोकव्यवहार में हो, उसके लिखित ग्रन्थ नहीं होते और कोई शिक्षक भी नियुक्त नहीं किये जाते। भारत में धर्म की शाक्त परम्पराओं में ये वर्गीकरण काम नहीं करता क्योंकि आदि शंकराचार्य को किसी ने “नियुक्त” नहीं किया था। रामकृष्ण परमहंस या बाम-खेपा जैसे शाक्त उपासकों को देखें तो बांग्ला में “खेपा” का मतलब पागल होता है। इससे उनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं आती, ना ही उनकी उपासना पद्दति कमतर या छोटी होती है।

तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है। सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता श्रृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं।

इसके अंतिम के तीन-चार श्लोक (सौवें के बाद के) जो आज मिलते हैं, उन्हें बाद के विद्वानों का जोड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है। शायद यही वजह होगी कि इसपर हिन्दी में कम लिखा गया है। इसपर दो अच्छे (अंग्रेजी) प्रचलित ग्रन्थ जो हाल के समय में लिखे गए हैं उनमें से एक रामकृष्ण मिशन के प्रकाशन से आता है और दूसरा बिहार योग केंद्र (मुंगेर) का है। दक्षिण और उत्तर में एक अंतर समझना हो तो ये भी दिखेगा कि सौन्दर्यलहरी में श्लोकों की व्याख्या और सम्बन्ध बताया जाता है। श्लोक का स्वरुप, उसके प्रयोग या अर्थ से जुड़ी ऐसी व्याख्या वाले ग्रन्थ दुर्गा सप्तशती के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।

बाकी आस पास के रामकृष्ण मिशन या दूसरे जो भी योग अथवा संस्कृत विद्यालय हों, वहां तक जाकर भी देखिये। संस्कृति को जीवित रखना समाज का ही कर्तव्य है।
✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहित
शक्ति पूजन के नवरात्रि पर्व की मंगलकामनाएं

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