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इतिहास के पन्नों से

कल्याण मार्ग के पथिक वीर विप्र योद्धा ऋषि भक्त स्वामी श्रद्धानंद

ओ३म
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स्वामी श्रद्धानन्द ऋषि दयानन्द के शिष्यों में एक प्रमुख शिष्य हैं जिनका जीवन एवं कार्य सभी आर्यजनों व देशवासियों के लिये अभिनन्दनीय एवं अनुकरणीय हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी का निजी जीवन ऋषि दयानन्द एवं आर्यसमाज के सम्पर्क में आने से पूर्व अनेक प्रकार के दुर्व्यसनों से ग्रस्त था। इन दुव्यर्सनों के त्याग में ऋषि दयानन्द के साक्षात दर्शनों से प्राप्त प्रेरणा एवं आर्यसमाज के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के अध्ययन का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा। स्वामी श्रद्धानन्द ने अपनी आत्मकथा ‘कल्याण मार्ग का पथिक’ नाम से लिखी है। इस कथा में स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अपने जीवन के सभी पक्षों का प्रकाश किया है। उनकी आत्मकथा शायद पहली आत्मकथा है जिसमें एक महापुरुष ने अपने चारित्रिक पतन की घटनाओं का भी विस्तृत एवं समालोचनात्मक वर्णन करते हुए अपने हृदय के सभी भावों को अपने पाठकों के सम्मुख खोलकर रखा है। ऐसा साहस नगण्य लोग ही कर सकते हैं। स्वामी जी की आत्मकथा एवं उनके किये कार्यों पर दृष्टि डालने से उनके प्रति श्रद्धा एवं प्रेम उमड़ता है। आज के युग में हम किसी व्यक्ति से ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते कि वह अपने जीवन की अनेक बुराईयों को दूर कर स्वामी श्रद्धानन्द जी जैसा जीवन व्यतीत कर सकता है। इस लेख में हम उनके प्रमुख कार्यों व घटनाओं को स्मरण कर रहे हैं।

 

स्वामी श्रद्धानन्द जी का बचपन का नाम बृहस्पति था। आपका जन्म गुरुवार (फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी 1913 व्रिकमी) 3 अप्रैल, सन् 1856 को ग्राम तलवन जिला जालंधर (पंजाब) में लाला नानकचन्द जी क्षत्रिय के घर में हुआ था। पिता पुलिस विभाग में सेवारत रहे। जन्म के कुछ समय बाद पिता से आपको मुंशीराम नाम प्राप्त हुआ था जो संन्यास से पूर्व तक रहा। जन्म के तीन वर्ष बाद बरेली नगर में आपकी शिक्षा आरम्भ हुई थी। 10 वर्ष की अवस्था होने पर सन् 1866 में काशी में आपका उपनयन संस्कार हुआ था। इन दिनों आपके पिता इसी स्थान पर सेवारत व पदासीन थे। 17 वर्ष की अवस्था में आप क्वीन्स कालेज, बनारस में अध्ययन हेतु प्रविष्ट हुए थे। श्री मोतीलाल नेहरू इस कालेज में आपके सहपाठी थे। 21 वर्ष की आयु में मुंशीराम जी का विवाह हुआ। आपकी धर्मपत्नी श्रीमती शिवदेवी जी धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत थी। अपने पतिधर्म का इतनी उत्तमता से निर्वाह किया जिसे स्वामी श्रद्धनन्द जी की आत्मकथा पढ़कर ही जाना जा सकता है। माता शिवदेवी जी के पिता सोंधी परिवार के लाला शालिग्राम थे। सन् 1879 में मुंशीराम जी के जीवन में अनेक घटनायें घटी जिन्होंने पौराणिक रीति से पूजापाठ करने वाले मुंशीराम जी को नास्तिक विचारों का युवक बना दिया था। जिन दिनों आप अपने पिता के साथ बरेली में रह रहे थे, सौभाग्य से तब वहां वेदों के अपूर्व विद्वान तथा वेदों के प्रचारक ऋषि दयानन्द का उपदेशार्थ पधारना हुआ।

स्वामी दयानन्द के उपदेशों में सुरक्षा की दृष्टि से आपके पिता नानक चन्द जी को ड्यूटी पर नियुक्त किया गया था। ऋषि दयानन्द के उपदेश सुनने उन दिनों बरेली के बड़े बड़े अंग्रेज अधिकारी भी आया करते थे। उपदेशों में सत्यधर्म व मान्यताओं का मण्डन तथा असत्य व तर्कहीन बातों का खण्डन किया जाता था। ऋषि दयानन्द ईश्वर में विश्वास रखने वाले उच्चकोटि के महापुरुष व महात्मा थे। अतः मुंशीराम जी के पिता ने मुंशीराम जी को ऋषि दयानन्द के व्याख्यान सुनने के लिए वहां जाने की प्रेरणा की। पिताभक्त मुंशीराम जी अपने पिता की प्रसन्नता के लिये ऋषि दयानन्द के प्रवचनों में गये थे। उन्होंने न केवल उनके उपदेश ही सुने थे अपितु उनसे शंका समाधान भी किया था। इसे हम नास्तिक-आस्तिक संवाद भी कह सकते हैं। ऋषि दयानन्द ने मुंशीराम जी के सभी प्रश्नों व शंकाओं का समाधान कर दिया था। इससे मुंशीराम जी के मन व आत्मा में सच्ची आस्तिकता का बीज पुनः अंकुरित हो गया। समय आने पर वह विचार फला व फूला और उसने स्वामी श्रद्धानन्द जी को भी एक आदर्श ईश्वर-भक्त तथा देश व समाज का सुधारक ही नहीं बनाया अपितु देश का निर्माता एवं वैदिक धर्म का आदर्श प्रचारक व सेवक बनने का गौरवपूर्ण अवसर भी प्रदान किया। इससे मुंशीराम जी एक आदर्श देशभक्त, समाज सुधारक तथा वैदिक धर्म के उद्धारक व प्रचारक बने। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अपनी आत्मकथा ‘कल्याण मार्ग का पथिक’ नाम से लिखी है। इस पुस्तक को सभी पाठकों को पढ़ना चाहिये। इससे उन्हें भी कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त होगी।

मुंशीराम जी संन्यास धारण करने से पूर्व अपने जीवन में महात्मा मुंशीराम जी के नाम से प्रसिद्ध हुए। आप सत्यार्थप्रकाश पढ़कर व उससे प्रभावित होकर सन् 1875 में आर्यसमाज की स्थापना के 9 वर्ष बाद सन् 1884 में आर्यसमाज, जालन्धर के सदस्य बने थे। अपनी विद्वता, सामाजिक कार्यों एवं संगठन विषयक योग्यता सहित वैदिक धर्म के प्रति समर्पण के कारण आर्यसमाज का सदस्य बनने के दो वर्ष बाद सन् 1886 में ही आप आर्यसमाज जालन्धर के प्रधान चुने गये। आपकी शिक्षा मुख्तारी की परीक्षा पास करने तक हुई थी। आपने सन् 1888 में जालन्धर में वकालत करनी आरम्भ की थी। आप वही मुकदमें लिया करते थे जो सत्य हुआ करते थे। किसी मुकदमें का झूठे होना यदि आपको पता चलता तो उसे आप छोड़ देते थे। अपने ज्ञान एवं पुरुषार्थ से शीघ्र ही आप एक सफल वकील सिद्ध हुए थे। आपने अपनी आय से जालन्धर में एक बड़ी कोठी बनवाई थी जिसे बाद में आपने अपने अन्तिम सम्पत्ति के रूप में वेद प्रचारार्थ गुरुकुल कांगड़ी को दान कर दी थी। सन् 1889 की बैसाखी के दिन आपने जालन्धर से ‘सत्-धर्म प्रचारक’ नामक एक उर्दू पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया था। यह पत्र भी अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। बाद में हिन्दी की महत्ता के कारण आपने भारी घाटा उठाकर इसका प्रकाशन हिन्दी भाषा में कर दिया। इस पत्र में प्रकाशित महात्मा मुंशीराम जी के लेख व सम्पादकीय पंजाब के पाठकों द्वारा बहुत रुचि से पढ़े जाते थे।

सन् 1890 में महात्मा मुंशीराम जी ने लाला देवराज जी के साथ मिलकर जालन्धर में एक ‘आर्य कन्या महाविद्यालय’ स्कूल व कालेज की स्थापना की थी। यह वह समय था जब माता-पिता अपनी कन्यायों को स्कूल भेजकर पढ़ाते नहीं थे। ऐसे समय में कन्यायों का विद्यालय खोलना एक क्रान्तिकारी कार्य था। वर्तमान में यह जालन्धर का कन्याओं का सबसे बड़ा महाविद्यालय है। अथर्ववेद, सामवेद भाष्यकार तथा अनेक वैदिक ग्रन्थों के लेखक पं. विश्वनाथ विद्यालंकार वेदोपाध्याय जी की धर्मपत्नी माता कुन्ती देवी इसी महाविद्यालय की छात्रा थी। हमारा सौभाग्य है कि हमें पंडित विश्वनाथ विद्यालंकार जी सहित माता कुन्ती देवी जी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त रहा है। अपने इस कार्य के कारण भी महात्मा मुंशीराम जी, जो बाद में स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए, अमर हैं। सन् 1891 में महात्मा जी की धर्मपत्नी माता शिवदेवी जी का निधन हुआ। इस समय महात्मा ही का वय मात्र 35 वर्ष का था। इससे आप पर अपने दो पुत्रों तथा तीन पुत्रियों के पालन पोषण का भार भी आ गया था। सभी सामाजिक कर्तव्यों को करते हुए आपने इस दायित्व को भी बहुत कुशलता से निभाया और अपने बच्चों को माता पिता दोनों का ही प्यार व स्नेह दिया।

महात्मा मुंशीराम जी सन् 1892 में आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के प्रधान निर्वाचित हुए। महर्षि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश में वर्णित प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के प्रतिनिधि गुरुकुलों की परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए आपने ऋषि दयानन्द के स्वप्नों के अनुरूप गुरुकुल की स्थापना के लिये सन् 1892 में तीस हजार रुपये एकत्र करने का संकल्प लेकर गृह त्याग कर दिया था। कुछ ही समय में आपने अपना संकल्प पूरा कर लिया और संकल्प से अधिक धनराशि प्राप्ती की थी। उन दिनों तीस हजार रूपये बहुत बड़ी धनराशि हुआ करती थी। इसी धनराशि से हरिद्वार के निकट कांगड़ी ग्राम की भूमि को दान में प्राप्त किया गया था जहां सन् 1902 में आपके स्वप्नों का प्रसिद्ध गुरुकुल कागड़ी स्थापित हुआ। आपके समर्पण व योग्यता से यह गुरुकुल दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति को प्राप्त हुआ। इसकी प्रसिद्धि को सुनकर इंग्लैण्ड श्री रैमजे मैकडानल जो बाद में इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री बने, गुरुकुल पधारे थे और स्वामी श्रद्धानन्द जी के साथ रहे थे। उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द जी की प्रशंसा की थी और उन्हें ईसाई मत के संस्थापक ईसामसीह के समान जीवित ईसामसीह बताया था। कुछ समय बाद इस गुरुकुल में भारत के वायसराय श्री जेम्स फोर्ड भी आये थे। गुरुकुल की सफलता को बताने वाले अनेक उदाहरण हैं परन्तु स्थानाभाव के कारण उनका उल्लेख नहीं कर रहे हैं। इतना अवश्य लिख देते हैं कि इस गुरुकुल से देश को वेदों के बहुत बड़े आचार्य व विद्वान, क्रान्तिकारी, देशभक्त, समाचार पत्रों के सम्पादक, इतिहासकार, आजादी के आन्दोलनकारी आदि मिले हैं। पाठको से अनुरोध हैं कि वह डा. विनोदचन्द्र विद्यालंकार लिखित ‘एक विलक्षण व्यक्तित्व: स्वामी श्रद्धानन्द’, पं. सत्यदेव विद्यालंकार लिखित ‘स्वामी श्रद्धानन्द’ तथा 11 खण्डों में प्रकाशित ‘स्वामी श्रद्धानन्द ग्रन्थावली’ का अध्ययन करें। इससे वह स्वामी श्रद्धानन्द जी के व्यक्तित्व तथा कार्यों को विस्तृत रूप से जान सकेंगे।

महात्मा मुंशीराम जी ने सन् 1917 में मायापुर, हरिद्वार में संन्यास लिया था और नया नाम स्वामी श्रद्धानन्द धारण किया था। स्वामी जी ने शिक्षा जगत सहित देश की आजादी, दलितोद्धार, शुद्धि, सामाजिक आन्दोलनों व समाज सुधार के महनीय कार्यों को किया। इनका संक्षिप्त परिचय हम इस लेख में दे रहे हैं। सन् 1901 में स्वामी जी ने अपनी पुत्री अमृत कला का जाति-बंधन तोड़कर डा. सुखदेव जी से विवाह कराया था। सन् 1907 में देश में जन-जन की भाषा हिन्दी के महत्व के कारण अपने उर्दू पत्र ‘सद्धर्म प्रचारक’ को हिन्दी में प्रकाशित करना आरम्भ कर दिया था। स्वामी श्रद्धानन्द जी सन् 1909 में आर्यसमाज की शिरोमणी सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली के प्रथम प्रधान बने थे। सन् 1909 में स्वामी जी ने गुरुकुल कुरुक्षेत्र की स्थापना की थी। आज भी यह गुरुकुल फल फूल रहा है। स्वामी जी को सन् 1913 में भागलपुर (बिहार) में ‘अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ का अध्यक्ष बनाया गया था। आजादी के इतिहास में दिल्ली में एक अद्भुत घटना घटी थी। सन् 1919 में 30 मार्च को चांदनी चैक में अंग्रेजों की गोरी सेना की संगीनों के सामने स्वामी श्रद्धानन्द ने अपना सीना तानकर सिंह-गर्जना की थी। वह बोले अंग्रेज सैनिको को बोले थे ‘हिम्मत है तो चलाओ गोली’। इस सिंह-गर्जना को सुनकर गोरे सैनिकों की संगीने नीचे झुक गयी थी। आजादी के इतिहास की यह एक दुर्लभ अद्वितीय घटना है। इस घटना से दिल्ली में सभी भारतवासी प्रसन्न, आह्लादित व रोमांचित हुए थे। इसके वीरता के लिए स्वामी जी को सम्मानित करने के लिये 4 अप्रैल, 1919 को दिल्ली की जामा मस्जिद में आमंत्रित कर उसके मिम्बर से स्वामी जी का सम्बोधन कराया गया था। यहां स्वामी जी ने वेदमंत्र बोल कर हिन्दू व मुसलमानों को देशभक्ति व परस्पर प्रेम का सन्देश दिया था। इसके बाद किसी हिन्दू विद्वान व नेता को यह जामा मस्जिद के मिम्बर से लोगों को सम्बोधन करने का सौभाग्य नहीं मिला।

सन् 1919 में बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक शान्तिपूर्ण सभा में उपस्थित सभी देशभक्त लोगों पर अंग्रेजों ने गोलियां चलाकर मार डालने का प्रयत्न किया। बड़ी संख्या में स्त्री, पुरुष व बच्चे इसमें मारे गये थे। इसके विरोध में 26 दिसम्बर, 1919 को अमृतसर में कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ था। इस अधिवेशन का स्वागताध्यक्ष स्वामी श्रद्धानन्द जी को बनाया गया था। इसकी विशेषता यह रही कि स्वामी श्रद्धानन्द जी ने कांगे्रस के मंच से प्रथमवार हिन्दी में अपना स्वागत भाषण पढ़ा। इसमें उन्होंने दलितोद्धार की भी चर्चा की थी। इसका विस्तृत विवरण स्वामी श्रद्धानन्द जी विषयक ग्रन्थों में पढ़ने को मिलता है जिसे सभी बन्धुओं को पढ़ना चाहिये। स्वामी जी ने 1920 में बर्मा की यात्रा की थी। उन्होंने नागपुर कांग्रेस में दलितोद्धार की योजना वा कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया था। दलितोद्धार के कार्यो से प्रभावित दलितों के सबसे बड़े नेता डा. भीमराव अम्बेडकर जी ने लिखा है कि स्वामी श्रद्धानन्द दलितों के सबसे बड़े हितैषी थे। दलितों के प्रति उनकी की गई सेवा का मूल्यांकन कौन कर सकता है?

स्वामी जी समाजहित के सभी कार्यों अग्रणीय भूमिका निभाते थे। सिखों के सन् 1922 के आन्दोलन ‘गुरु का बाग मोर्चा’ के अवसर पर स्वामी श्रद्धानन्द जी ‘अकाल तख्त, अमृतसर’ में भाषण देकर जेल गए थे। उनको पशुओं को रखे जाने वाले पिंजड़े में रखकर यातनायें दी गई थी। स्वामी जी ने सन् 1923 में आगरा में ‘शुद्धि सभा’ का स्थापना की थी। इसके अन्तर्गत बड़े पैमाने पर धर्मान्तरित हिन्दु बन्धुओं की शुद्धि की गई थी। स्वामी जी दलितोद्धार के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग हुए थे। राजनीति में हिन्दू हितों की पूर्णतया उपेक्षा की जाती थी। इस कारण स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सन् 1923 में हिन्दू महासभा में प्रवेश किया था। उन्होंने हिन्दू संगठन नाम से एक लघु ग्रन्थ भी लिखा है जो सभी हिन्दुओं के पढ़ने योग्य है। आश्चर्य है कि आज भी हिन्दू नेता, संगठन तथा विशाल हिन्दू समाज अपने हितों की स्वयं ही उपेक्षा कर रहे हंै तथा अपने भविष्य की चिन्ता नहीं करते। यदि वह स्वामी श्रद्धानन्द जी की हिन्दू-संगठन पुस्तक को पढ़ लंे तो आज भी हम हिन्दू समाज की रक्षा कर सकते हैं और इसको नष्ट करने के जो षडयन्त्र हो रहे हैं, उस पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए हिन्दुओं को जागने व जगाने की आवश्यकता है।

स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सन् 1924 में गांधी जी के निमन्त्रण पर बेलगाम-कांग्रेस में दर्शक-रूप में भाग लिया था। स्वामी जी ने सन् 1924 में वायकम (केरल) में जाति-पाँति तथा ऊंच-नीच की सामाजिक प्रथाओं के विरुद्ध सत्याग्रह का नेतृत्व भी किया था। स्वामी जी ने कर्नाटक, आंध्र तथा चेन्नई प्रान्तों व नगरों की भी ऐतिहासिक यात्रायें की थीं। सन् 1925 में मथुरा में ऋषि दयानन्द जी की जन्म शताब्दी के अवसर पर एक विशाल समारोह का आयोजन किया गया था। इसका नेतृत्व भी स्वामी जी ने ही किया। सन् 1925 में स्वामी जी दक्षिण भारत में वेद प्रचारार्थ गये थे। स्वामी जी के एक शिष्य व उच्चे कोटि के वैदिक विद्वान पं. धर्मदेव विद्यामार्तण्ड जी ने जीवन भर दक्षिण भारत में रहकर वेद प्रचार का कार्य किया।

स्वामी जी के दलितोद्धार व शुद्धि के कार्यों से विधर्मी उनके शत्रु बन गये थे। 23 दिसम्बर, 1926 को एक षडयन्त्र करके एक क्रूर हत्यारे अब्दुल रशीद द्वारा रुग्णावस्था में छल से स्वामी जी पर गोलियों का प्रहार किया गया जिससे वह वीरगति को प्राप्त हुए। ऋषि दयानन्द और पं. लेखराम जी के बाद धर्म के लिये बलिदान होने वाले वह तीसरे प्रमुख विप्र योद्धा थे। हम स्वामी श्रद्धानन्द जी के गौरवपूर्ण जीवन व कार्यों को स्मरण कर उनको श्रद्धांजलि देते हैं और स्वबन्धुओं से निवेदन करते हैं कि वह स्वामी श्रद्धानन्द जी के विस्तृत जीवन चरित्र का अवश्य अध्ययन करें जिससे वैदिक धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के साथ हिन्दू समाज से अन्धविश्वासों व कुरीतियों को दूर किया जा सके। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्यj

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