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धर्म-अध्यात्म

ओ३म् “आर्यसमाज सत्य के प्रचार और असत्य को छुड़ाने का एक सार्वभौमिक आन्दोलन है”

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आर्यसमाज विश्व का ऐसा एक अपूर्व संगठन है जो किसी मनुष्य व महापुरुष द्वारा प्रचारित मत का प्रचार नहीं करता अपितु सृष्टि में विद्यमान सत्य की खोज कर सत्य का स्वयं ग्रहण करता व उसके प्रचार द्वारा विश्व के सभी मनुष्यों से उसे अपनाने, ग्रहण व धारण करने का आग्रह करता है। ऋषि दयानन्द के जीवन पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि उन्होंने अपने परिवार में प्रचलित अतार्किक मूर्तिपूजा का इस कारण से विरोध किया था कि मूर्ति में अपने ऊपर ऊछल-कूद करने वाले चूहों को भी हटाने व भगाने की शक्ति नहीं थी और न अब है। उन्होंने अपने पिता व पण्डितों से मूर्ति के ईश्वर होने व उसमें दैवीय शक्ति होने पर प्रश्न किये थे? तत्कालीन कोई विद्वान उनकी शंकाओं का समाधान नहीं कर सका था। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ईश्वर के नाम पर बनाई जाने वाली मूर्तियों व उनकी पूजा किये जाने पर भी उन मूर्तियों में ईश्वर की दैवीय शक्ति का किंचित न्यून अंश भी विद्यमान नहीं है। उसके बाद ऋषि दयानन्द ने तथा उनके अनुगामी सभी बुद्धिमान विवेकयुक्त मनुष्यों ने भी इस बात का अनुभव किया। वेद सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से चार ऋषियों को प्राप्त ज्ञान है। उनमें ईश्वर के सत्यस्वरूप का विस्तार से वर्णन है। ईश्वर की उपासना का भी वेदों में विस्तृत वर्णन है। वेदों के आधार पर ही ऋषि पतंजलि ने ईश्वर की उपासना की विधि व उसके विवेचन पर ‘‘योगदर्शन” ग्रन्थ का प्रणयन किया था। इनमें से किसी भी ग्रन्थ में ईश्वर की मूर्ति बनाकर पूजा व उपासना करने का विधान नहीं है। विचार व परीक्षा करने पर भी मूर्तिपूजा द्वारा ईश्वर की पूजा व उपासना होनी सिद्ध नहीं होती और न ही इससे मनुष्य को कोई लाभ होता है। मूर्तिपूजा से हानियां अवश्य होती हैं जिनका दिग्दर्शन ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के ग्यारहवें समुल्लास में कराया है। अतः ईश्वर का सत्यस्वरूप जानने के बाद ईश्वर की उपासना का एक ही विधान विदित होता है और वह है ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव का चिन्तन, मनन, विचार व ध्यान करते हुए उसकी उसके सत्य गुण, कर्म व स्वभाव से स्तुति, प्रार्थना व उपासना करना। ऐसा ही आदि काल से वर्तमान काल के सभी धार्मिक विद्वान, विचारक, चिन्तक, वेदानुयायी करते आ हैं और इस ध्यानोपासना मार्ग से ही ईश्वर को काई भी मनुष्य प्राप्त कर सकता है। ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग यही है कि उसके वेदवर्णित गुणों का चिन्तन, मनन, विचार व ध्यान किया जाये और अष्टांग योग का अभ्यास कर समाधि अवस्था को प्राप्त होकर उसके ध्यान के द्वारा उसका साक्षात्कार किया जाये।

ऋषि दयानन्द को अपने जीवन में ईश्वर का साक्षात्कार करने तथा वेदाध्ययन से जो यर्थाथ ज्ञान प्राप्त हुआ उसमें उन्होंने पाया कि संसार में ईश्वर ही सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, सृष्टिकर्ता, अनादि व नित्य स्वरूप वाला है़़। ईश्वर से इतर जीवात्मा सूक्ष्म, अल्प प्रमाण, एकदेशी, ससीम, अल्पज्ञ एवं अल्पशक्तियों वाली जन्म व मरण धर्मा सत्ता है। जीवात्मा का कल्याण ईश्वर को जानकर वेद की ज्ञान-विज्ञान पर आधारित ध्यान विधि से स्तुति, प्रार्थना व उपासना करने से होता है। इस उपासना में मूर्तिपूजा का कोई स्थान व महत्व नहीं है। ईश्वर सर्वव्यापक होने से मूर्ति के भीतर व बाहर दोनों स्थानों पर होता है। वह हमारी आत्मा के भीतर व बाहर तथा शरीर के भीतर व बाहर सर्वत्र विद्यमान है। वह संसार के प्रत्येक पदार्थ व वस्तु में व्यापक व समाया हुआ है। अतः सभी पदार्थों व वस्तुओं में उसकी समान रुप से उपस्थिति व विद्यमानता को जानना, उसका अनुभव करना व उसके गुणों का चिन्तन करते हुए उससे एकाकार हो जाना ही उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना होती है। इस वेदादि सम्मत ईश्वरी की उपासना ही संसार के प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य व धर्म होता है। इन तथ्यों व रहस्यों का देश व विश्व में प्रचार करने के लिये ऋषि दयानन्द को आर्यसमाज नामी संगठन को स्थापित करना पड़ा था।

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में देश के अधिकांश भागों का भ्रमण किया था। वह देश के अधिकांश धार्मिक स्थानों पर गये थे जहां कोई विद्वान, मनीषी, चिन्तक व विचारक हो सकता था। वह हिमालय प्रदेश के धर्म स्थलों सहित पर्वतों की कन्दराओं में भी गये और वहां उन्होंने तपस्वी योगी व ध्यान व समाधि का अभ्यास करने वाले सिद्ध पुरुषों व विद्वानों की खोज की थी। उन्होंने सभी मनीषी व विद्वानों से वार्तालाप कर उनसे ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने अपने समय में देश में उपलब्ध समस्त धार्मिक साहित्य का भी अध्ययन किया था। वह संस्कृत के विद्वान थे, अतः प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन करने में उन्हें किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती थी। अपनी अध्ययनशीलता, कठोर तप एवं साधनाओं के कारण ही वह समाधि अवस्था को प्राप्त कर ईश्वर का साक्षात्कार लेने के बाद भी सन्तुष्ट नहीं हुए थे। उनकी विद्या की भूख अतृप्त बनी हुई थी। ईश्वर का साक्षात्कार कर लेने पर भी पूर्ण विद्या की उपलब्धि न होने के वह कारण सन्तुष्ट नहीं थे। अपने गुरु स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से उन्हें मथुरा के दण्डी स्वामी प्रज्ञाचक्षु विरजानन्द जी के आर्षप्रज्ञावान् वा वेदज्ञानी होने का ज्ञान हुआ था। उनकी प्रेरणा से ही सन् 1860 में वह स्वामी विरजानन्द जी को प्राप्त हुए और तीन वर्ष तक उनके सान्निध्य में रहकर वेद व वेदांगों का अध्ययन किया। इस अध्ययन के परिणाम से वह वेदविद् विद्वान बने और वेदों के मर्मज्ञ बनकर ऋषित्व को प्राप्त हुए थे।

गुरु विरजानन्द जी की प्रेरणा व परस्पर चर्चा से ऋषि दयानन्द को यह विदित हुआ था कि संसार में दुःखों का कारण अविद्या ही है। उन दिनों जितने मत प्रचलित थे वह सब अविद्या से ग्रस्त थे। ज्ञान व विद्या एक ही व सर्वत्र एक समान हुआ करता है। वह परस्पर भिन्न व परस्पर विपरीत कदापि नहीं होता। यदि सभी मतों में अविद्या न होती तो वह एक समान विचार, समान नियमों, मान्यताओं व सिद्धान्तों को मानने वाले होते। उनके नियम व परम्परायें पृथक-पृथक कदापि न होती। अविद्या के कारण ही मत-मतान्तरों में भेद व अन्तर विद्यमान है। इस अविद्या रूपी अज्ञान को विद्या वा वेद के प्रचार से ही दूर किया जा सकता था। गुरु की इस प्रेरणा से ही उन्होंने अविद्या के विरुद्ध आन्दोलन किया और देश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर जाकर वहां के लोगों को असत्य व अविद्या को छोड़ने तथा सत्य और विद्या का ग्रहण करने का प्रचार वा आन्दोलन किया था। ऋषि दयानन्द ने अपने प्रचार में अविद्या व असत्य पर आधारित सभी असत्य मान्यताओं पर आधारित अन्धविश्वासों एवं पाखण्डों का खण्डन भी किया था। उन्होंने अविद्या पर आधारित सभी सामाजिक कुरीतियों व परम्पराओं का खण्डन कर विद्या पर आधारित सुरीतियों व परम्पराओं को ग्रहण व धारण करने का आन्दोलन व प्रचार किया। उनके अनुयायियों ने भी उनके बाद इसी कार्य को जारी रखा है जिसका प्रभाव देश व विश्व में पड़ा है।

ऋषि दयानन्द के प्रचार रूपी आन्दोलन के परिणामस्वरूप मत-मतान्तरों ने अपनी मान्यताओं पर विचार किया और उनकी व्याख्यायें बुद्धि पूर्वक करने के उनके प्रयत्न देखे गये हैं। देश से अविद्या को दूर करने के लिये भी ऋषि दयानन्द के विचारों के अनुकूल उनके अनुयायियों ने गुरुकुल व दयानन्द ऐंग्लो वैदिक स्कूल व कालेज खोले जिससे देश से अविद्या रूपी अन्धकार दूर करने में सफलता मिली है। देश को आजादी की प्रेरणा भी ऋषि दयानन्द ने ही की थी। ऐसा माना जाता है कि देश की आजादी के आन्दोलन में 80 प्रतिशत लोग ऋषि दयानन्द व आर्यसमाज के देश भक्ति व स्वतन्त्रता के विचारों से प्रेरित व प्रभावित थे। स्वामी श्रद्धानन्द, पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द, पं. रामप्रसाद बिस्मिल तथा वीर भगत सिंह आदि अगणित लोग ऋषि दयानन्द से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े व प्रभावित थे।

समाज कल्याण व उत्थान का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने आन्दोलन कर उसका सुधार न किया हो। अतः आर्यसमाज विश्व में सत्य का प्रचारक एक अपूर्व संगठन है। आर्यसमाज की सभी मान्यतायें व सिद्धान्त सर्वांश में सत्य अर्थात् ईश्वरीय ज्ञान ‘वेद’ पर आधारित हैं। अन्धविश्वासों व अविद्या का उनमें किंचित भी अंश नहीं है। मनुष्यों व विश्व के व्यापक हित में आर्यसमाज सत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों को सभी मनुष्यों के जीवन में स्थापित करना चाहता है। इस कारण यह प्रचलित मत-मतान्तरों से सर्वथा भिन्न सत्य विद्याओं का प्रचार करने वाला वेद-प्रचार का आन्दोलन है। इसी से मनुष्यों का कल्याण होकर न केवल हमारे देश का अपितु विश्व का भी कल्याण होगा। सर्वत्र शान्ति स्थापित होगी। घृणा, द्वेष व हिंसा समाप्त होकर प्रेम तथा अहिंसा का वातावरण बनेगा। सबके सुख व उन्नति के लिये ही ऋषि दयानन्द ने अपना जीवन वेद प्रचार आन्दोलन के लिये समर्पित किया था। भविष्य में विश्व को वेद रूपी वट वृक्ष की छांव में आकर बैठने से शान्ति प्राप्त होगी। मनुष्य जीवन, समाज तथा देश-देशान्तर में शान्ति स्थापना का प्रमुख आधार व उपाय वेदों का अध्ययन व उसकी शिक्षाओं का प्रचार सहित उनका धारण व पोषण करना ही सिद्ध होता है। आईये! वेदों के अध्ययन का व्रत लें और दूसरों को भी वेद को अपनाने की प्रेरणा करें। वेदाध्ययन से हम ईश्वर सहित सुख व शान्ति को प्राप्त होंगे और हमारा मनुष्य जीवन अपने इष्ट लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होगा। सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा से प्राप्त वेदज्ञान की रक्षा करना व उसकी शिक्षाओं के अनुरूप आचरण करना संसार के प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य एवं धर्म है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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