हिंदू धर्म दुनिया का सबसे सहिष्णु धर्म

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अनिल जोशी

(कल्चरल अटेची, भारत सरकार)

हम बचपन से ही सुनते आए थे कि भारत एक सहिष्णु देश है, हिंदू धर्म दुनिया का सबसे सहिष्णु धर्म है। एकाएक उल्टी गंगा बह चली। भारत की असहिष्णुता की चर्चा दुनिया भर में हुई। चर्चा चलाने वाले भारत के बौद्धिक और लेखक ही थे। गहराई से विचार करने के बाद ऐसा लगता है, यह बहस सहिष्णुता या असहिष्णुता की नहीं रह जाती बल्कि भारत की अवधारणा के सवाल को अलग-अलग तरह से देखने की हो जाती है। भारत की अवधारणा के बारे में इस तरह का विरोध करने वालों में वामपंथी हैं, नेहरूवादी और आधुनिकतावादी चेता (पश्चिमी चेतना) वाले तथाकथित बुद्धिजीवी हैं, जिन्होंने भारत की अवधारणा को नेहरू जी द्वारा दी गई अवधारणा को स्थापित तथ्य के रूप में स्वीकार कर लिया। अब उसमें कोई और रंग भरना या सवाल उठाना उन्हें भारत की बुनियाद पर सवाल उठाना लगता है।
शायद यही परेशानी असहिष्णुता की बहस के मूल में थी। भारत और जापान के प्रधानमंत्राी का गंगा आरती करना, उसे करोड़ों भारतीयों द्वारा देखा जाना, जहां बड़ी संख्या में हिदंुस्तानियों के लिए आत्मगौरव की प्रतीक है, वही कुछ बुद्धिजीवी बेचैन हैं, उन्हें यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों का उल्लंघन लगता है। ऐसे में अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक श्री राजा राव की पुस्तक ’दि मीनिंग ऑफ इंडिया’ के एक अध्याय से कुछ प्रसंगों को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा। यह अध्याय नटवर सिंह द्वारा संपादित लिगेसी ऑफ नेहरू में भी हैं।
फ्रांस के मालरो 30 के दशक में फ्रांस के और कुछ अर्थों में यूरोप के सबसे चर्चित लेखक थे। वर्ष 1931 में नेहरू जी कमला नेहरू को लेकर जर्मनी के एक सेनेटोरियम में इलाज के लिए गए। इस समय वे राजाराव के संपर्क में रहे। बीच में कुछ दिनों के लिए वे फ्रांस आए जहां उन्होंने राजा राव से अनुरोध किया कि वे मालरो से मुलाकात का प्रयास करें। इस मुलाकात में राजा राव उनके साथ थे। फ्रांस के इस सबसे लोकप्रिय लेखक के साथ इस मुलाकात का विवरण पुस्तक में है। बातचीत में भारत, भारतीय शास्त्रों और विद्वानों के प्रति मालरो के विचार सुन नेहरू जी आश्चर्य में पड़ जाते है। मालरो कहते हैं – यूरोप विचारों की कब्रगाह है। यूरोप ने कभी भी अच्छे-बुरे (द्वैत) से बाहर होकर नहीं सोचा। भारत एक विकसित सभ्यता है… आपने उपनिषद् दिए, गीता दी…. मैं भारत से प्यार करता हूं। मैंने गीता पढ़ने के लिए संस्कृत भी सीखी। यह महान किताब है। सच्चे अर्थों में क्रांतिकारी। यह सच्ची क्रांति की बाईबल है। मनुष्य का उद्देश्य अपनी नियति को पाना है। अपने धर्म को पाना है।… मुझे भीष्म का चरित्रा बहुत पसंद है। भारत के शत्राु नहीं होते, प्रतिद्वंदी होते हैं।…. भारत अजंता है, जहां एक तरफ शिव श्मसान में तांडव कर रहे हैं। पिकासो को शिव का चित्रा लेने के लिए एक और जन्म लेना होगा… आपके देश में वो ताकत है जो पराजय को जीत में बदल सकता है। जैसा शंकर कहते हैं आप अपनी मृत देह देख सकते है, तो अस्तित्व को लेकर कई सवाल उठते हैं।
मुलाकात खत्म होने और विदा होने का समय आ गया था। मालरो ने नेहरू का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा – मैं अंतिम रूप से एक बात कहना चाहता हूं कि जब आप भारत के प्रधानमंत्राी बन जाएं…. नेहरू और राजा राव में उत्सुकता थी कि मालरो स्वाधीन भारत का कैसा स्वरूप चाहते हैं? मालरो आग्रह से बोले – आप शंकराचार्य के दिखाए रास्ते पर भारत को लेकर चलें। रामराव लिखते हैं कि पंडित जी भौचक्के थे, उसके बाद देर तक उन्होंने एक शब्द भी नहीं बोले।
बात यहीं खत्म नहीं होती। राजाराव ने नोट्स में लिखा है – द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब जयप्रकाश नारायण मालरो से मिलने पेरिस में गए। तो मालरो का पहला सवाल था वर्तमान सरकार पर शंकराचार्य का क्या प्रभाव है। जयप्रकाश स्तब्ध रह गए। उन्हें ऐसा प्रश्न यूरोप के प्रख्यात लेखक से अपेक्षित नहीं था। उनके पास कोई जवाब नहीं था। वे केवल मुस्कराए।
अपने समय के प्रख्यात लेखक जिसके नेहरू जी और जयप्रकाश घोर प्रशंसक थे और उनसे मिलने, बात करने की इच्छा रखते थे, वे मालरो चाहते थे कि भारत की मेधा शंकराचार्य के दार्शनिक सिद्धांतों के अनुसार विकसित हो। वे चाहते थे कि नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया में शंकराचार्य का सर्वोच्च स्थान होना चाहिए। भारतीय विचार और महान विभूतियों की परंपरा अद्भुत है। यह कैसी भारत की अवधारणा है जिसमें अशोक और अकबर तो महान हैं पर महान चंद्रगुप्त और उसे महान बनाने वाला चाणक्य हाशिए पर हैं! क्या चाणक्य से बड़ी निस्वार्थ क्रांति की दुनिया में कोई मिसाल है? व्यास, शंकर, कबीर, सूर, अष्टावक्र, तुलसी जैसे विचारक, कवियों के स्थान पर प्रश्नचिन्ह हैं!
एक बड़े राज्य पर शासन करने के कारण धर्मांध औरंगजेब तो जगह पाता है पर उपनिषदों का अनुवाद करने वाला दारा शिकोह, तुलसी का प्रिय मित्रा रहीम और पद्मावत का लेखक जायसी नहीं है। अकबर और औरंगजेब के महिमामंडन के चलते शिवाजी और महाराणा प्रताप कई कारणों से नायक की जगह प्रतिनायक नजर आते हैं। भारत की अवधारणा को विदेशी आयातित जुमलों और मुहावरों से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता।

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