आखिर महिलाओं को लेकर पुरुषों में ही इतनी कुंठाएं क्यों है?

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ललित गर्ग

हाथरस प्रकरण से एक बार फिर अनेक सवाल खड़े हुए हैं कि आखिर कितनी बालिकाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती इस कालिख को कौन पोछेगा?

दरिन्दों एवं वहशियों के चलते एक और निर्भया ने दम तोड़ दिया। एक बार फिर गैंगरेप और भीषण यातनाओं का शिकार हुई यूपी के हाथरस जिले की 19 साल की दलित लड़की ने 15 दिनों तक मौत से जूझने के बाद मंगलवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया। इस जघन्य, वीभत्स एवं दरिन्दगीपूर्ण गैंगरेप कांड से न केवल समूचा देश अशांत एवं शर्मसार हुआ है बल्कि कलंकित भी हुआ है। एक बार फिर नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नौंचने वाली इस घटना ने हमें झकझोर दिया है। यह त्रासद घटना बता रही है कि देश में लड़कियां अभी भी सुरक्षित नहीं हैं। समूचे देश को करुणा-संवेदनाओं में डुबोने वाली इस घटना ने अनेक सवाल फिर से खड़े कर दिये हैं।

दिल्ली के निर्भया मामले के बाद जैसी जनक्रांति देखने को मिली थी, उससे यह उम्मीद बंधी थी कि अब शायद देश में महिलाओं को इस तरह की त्रासदियों से नहीं गुजरना पड़ेगा। लेकिन बलात्कार कानूनों की सख्ती के बावजूद ना बलात्कार रुके, ना दरिन्दगी, ना ही महिलाओं की हत्याएं। हाथरस की बेटी से दरिन्दगी हुई, इसकी पुष्टि उसकी मौत से होती है। उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ी गई और जीभ काटी गई। उत्तर प्रदेश में खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों का जैसे सिलसिला चल पड़ा है। इस राज्य को महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित राज्य में शामिल कर दिया गया है। यह राज्य लम्बे समय से अपराध का गढ़ रहा है, यहां की पुलिस एवं प्रशासन भ्रष्ट एवं अराजक रहा है, अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से इन अपराधी मानसिकताओं पर नियंत्रण पाने की कोशिशें हो रही हैं।

बेटी तो बेटी होती है, हाथरस की दलित बेटी भी बेटी ही है, भले उसे व्यक्तिगत रूप से कम ही लोग जानते रहे होंगे, लेकिन वह दरिन्दगी के 15 दिन तक जीवन और मृत्यु से संघर्ष करने के बाद अंततः वह हार गयी। उसकी दर्दनाक दास्तान ने देश की करोड़ों महिलाओं की वेदना को मुखर ही नहीं किया है बल्कि वह समाज को फिर सोचने को मजबूर कर गई। हाथरस की यह क्रूर एवं अमानवीय घटना महाभारतकालीन उस घटना का नया संस्करण है जिसमें राजसभा में द्रौपदी को बाल पकड़ कर खींचते हुए अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के समक्ष उसकी विद्वत मंडली के सामने निर्वस्त्र करने का प्रयास हुआ था। इस वीभत्स घटना में मनुष्यता का भद्दा एवं घिनौना स्वरूप सामने आया है। एक बार फिर अनेक सवाल खड़े हुए हैं कि आखिर कितनी बालिकाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती इस कालिख को कौन पोछेगा? कौन रोकेगा ऐसे लोगों को जो इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं, नारी को अपमानित करते हैं।
इन ज्वलंत सवालों के उत्तर हमने निर्भया के समय भी तलाशने की कोशिश की थी। लेकिन इस तलाश के बावजूद इन घटनाओं का बार-बार होना दुःखद है और एक गंभीर चुनौती भी है। इस मौत ने गैंगरेप जैसे अपराध से निपटने में प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की घोर विफलता को भी उजागर किया है, यह भी जाहिर किया है कि उत्तर प्रदेश की पुलिस एवं प्रशासन की जड़ों में भ्रष्टता एवं अराजकता तीव्रता से व्याप्त है, किसी बड़े क्रांतिकारी सफाई अभियान एवं सख्त उपायों से ही उनमें बदलाव लाया जा सकता है। भले ही अब स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि हाथरस के सभी दोषियों के लिए कठोरतम सजा सुनिश्चित की जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की जांच के लिए एसआईटी भी गठित कर दी है। हाथरस कांड की विडम्बना एवं वीभत्सता यह है कि कुछ लोग बाकायदा एक मंच का बैनर लेकर आरोपियों को बचाने की कोशिश करते नजर आए। यह घटना सीधे तौर पर बताती है कि निर्भया कांड के बाद जो भी कदम उठाए गए, वे ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नाकाफी साबित हुए हैं।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि जांच और सजा के लिए बनाए गए लंबे-चौड़े तंत्र का संभावित अपराधियों में कोई खौफ क्यों नहीं दिख रहा है? दिल्ली के निर्भया मामले के बाद उमड़े जनाक्रोश के दबाव में जो बदलाव कानूनों में किए गए उनका भी समाज पर कोई खास असर नहीं देखने को मिल रहा। कुछ असर हुआ है तो सिर्फ इतना कि बलात्कार के जघन्य मामलों में अपराधियों को तुरत-फुरत मृत्युदंड देने की मांग हर संभव मंच से उठने लगी है। इसका नतीजा हैदराबाद पुलिस मुठभेड़ के रूप में देखने को मिला, जहां बलात्कार के संदिग्ध अपराधियों को उससे भी ज्यादा संदिग्ध ढंग से मौत के घाट उतार दिया गया। अपराधियों को अदालत से जल्दी सजा मिलनी चाहिए, जिसके लिए न समाज में कोई आग्रह दिखता है, न सरकारी तंत्र में। युवती दलित पृष्ठभूमि से थी और गिरफ्तार चारों आरोपी उच्च जाति के हैं। यही कारण है कि अपराधियों को दंडित करने की बजाय उनकी जाति और धर्म के आधार पर उनके बचाव में खड़े होने की प्रवृत्ति जरूर दिखने लगी है जो कठुआ रेप कांड के बाद अब हाथरस कांड में भी सामने आई है। ऐसी सोच के रहते क्या भारत कभी सभ्य समाज बन पाएगा? पुलिस-प्रशासन पर संदेह करने के अनेक कारण हैं, रात के अंधेरे में बिना पारिवारिक भागीदारी के पीड़िता का अंतिम संस्कार क्यों किया गया? पुलिस एवं प्रशासन की मंशा एवं भूमिका पर सवाल ही सवाल हैं। उम्मीद करें कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश और मुख्यमंत्री योगी की तत्परता से इन सवालों के अधिक भरोसेमंद जवाब सामने आएंगे और ऐसी त्रासद घटनाओं पर नियंत्रण की दृष्टि से चेतना जगेगी।

हर बार की इस तरह की घिनौनी घटना सवाल तो खड़े करती हैं, लेकिन बिना उत्तर के वे सवाल वहीं के वहीं खड़े रहते हैं। यह स्थिति हमारी कमजोर मानसिकता के साथ-साथ राजनीतिक विसंगतियों को भी दर्शाती है। शासन-व्यवस्था जब अपना राष्ट्रीय दायित्व नैतिकतापूर्ण नहीं निभा सके, तब सृजनशील शक्तियों का योगदान अधिक मूल्यवान साबित होता है। हमारी मानसिकता में बदलाव नहीं हो रहा है, तभी बार-बार निर्भया, कठुआ एवं हाथरस जैसे कांड हमें झकझोर कर रख जाते हैं। हमारी सुसुप्तावस्था के कारण ही बलात्कार-व्यभिचार-गैंगरेप और बच्चियों के साथ भीषण यातनाओं की घटनाएं बढ़ रही हैं बल्कि कड़े कानूनों की आड़ में निर्दोष लोगों को फंसाने का धंधा भी पनप रहा है। जिसमें असामाजिक तत्वों के साथ-साथ पुलिस भी नोट छाप रही है।

हमें जीने के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने को विवश होना पड़ता है। जरूरत सख्ती बरतने की है, अगर बलात्कारियों के बच निकलने के रास्ते बंद करने के साथ ही उनको दिया जाने वाला दंड बाकी समाज के लिए एक कठोर सबक का काम करेगा तभी यह अपराधी मानसिकता के लोगों को ऐसे अपराध करने से रोकेगा। लेकिन इसके बावजूद अगर ऐसी वारदात नहीं रुक रही हैं, तो यह सोचना जरूरी है कि इस दिशा में और क्या किया जाए? इस समस्या का केवल कानून में समाधान खोजना भी एक भ्रांति है, समस्या के समाधान की दिशा में आधा-अधूरा प्रयत्न है। सबसे जरूरी है उन स्थितियों को खत्म करना, जो ऐसे अपराधों का कारण बनती हैं। बलात्कार जैसे अपराध कुंठित मानसिकता के लोग करते हैं, लेकिन ऐसी कुंठाएं कई बार महिलाओं के प्रति हमारी सामाजिक सोच से उपजती हैं। महिलाओं को सिर्फ कानूनों में ही नहीं, सामाजिक धारणा के स्तर पर बराबरी का दर्जा देकर और उनकी सार्वजनिक सक्रियता बढ़ाकर ही इस मानसिकता को खत्म किया जा सकता है। इससे हम ऐसा समाज भी तैयार करेंगे, जो कुंठित मानसिकता वालों को बहिष्कृत कर सकेगा। प्रश्न यह भी है कि आखिर हमारे देश में महिलाओं को लेकर पुरुषों में ही इतनी कुंठाएं क्यों है? इन कुंठाओं को समाप्त कैसे किया जाये, इस पर भी तटस्थ चिन्तन जरूरी है।

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