अंग्रेजी भाषा से ज्यादा संस्कृत भाषा में है रोजगार की संभावनाएं

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उगता भारत ब्यूरो

समाज में पूर्वाग्रह के कारण आमतौर पर यह माना जाता है कि संस्कृत भाषा का अध्ययन करने के बाद रोजगार की बहुत कम संभावनाएं शेष रहती है। यह धारणा तथ्यहीन होने के साथ-साथ समाज की अपरिपकृता का उदाहरण भी है। संस्कृत भाषा एंव विषय के अध्ययन के पश्चात युवाओं के लिए रोजगार के अनेक अवसर उपलब्ध है, जिसके बार में विद्यार्थियों और अभिभावओं को जानकारी होना अति आवश्यक है। तभी वे संस्कृत भाषा के अध्ययन की ओर अभिमुख होंगे। इसी दृष्टि से संस्कृत भाषा के अध्ययन के पश्चात् प्राप्त होने वाले रोजगार के अवसरों की यहां पर चर्चा की जा रही है। ये अवसर सरकारी निजी और सामाजिक सभी क्षेत्रों में मौजूद है।
सरकारी क्षेत्र में प्रशासनिक सेवा: यह सेवा भारत की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में एक है, जिसके प्रति युवाओं का रुझाान सबसे अधिक होता है। पद एवं वेतनमान दोनों स्तरों पर इस सेवा में उच्च स्तर तक पहुचां जा सकता है। केन्द्रीय स्तर पर संघ लोक सेवा आयोग एंव राज्य स्तर पर राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा इसके लिए प्रतिवर्ष रिक्तियां निकाली जाती है। जो युवा संस्कृत से सात्तक , शास्त्री, आचार्य है, वे इसके लिए आवेदन कर सकते है।
प्राथमिक आध्यापक के रूप में: प्राथमिक स्तर पर अध्यापन के लिए देश भर में शिक्षकों की आवश्यकता रहती है, किसी राज्य में बारहवीं कक्षा तो कहीं सातक कक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थी शिक्षक-प्रशिक्षक के पात्र होते है। इस प्रशिखक के पश्चात् ही प्राथमिक स्तर पर अध्यापन के लिए पात्रता सुनिशित होती है। जिन छात्रों ने संस्कृत विषय के साथ विशारद या शास्त्री, आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण की है वे भी इस प्रशिक्षण के लिए पात्र होते है राज्वानुसार प्रशिक्षण एंव भर्ती के नियम अलग-अलग है।
प्रशिक्षित अध्यापक के रूप में: देश भर में माध्यमिक विद्यालयों में कही अनिवार्य और कहीं ऐच्छिक विषय के रूप में संस्कृत विषय का अध्यापन किया जाता है, जिसमें पढ़ाने वाले प्रशिक्षित अध्यापकों का चयन राज्य भर्ती बोर्ड के माध्यम से होता है। संस्कृत से खातक परीक्षा उत्तीर्ण और अध्यापन में प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थी इसके लिए पात्र होते है।
व्याख्याता के रूप में: देश भर मैं उच्च माध्यमिक विद्यालयों में ऐच्छिक विषय के रूप् में संस्कृत का अध्यापन किया जाता है, जिसमें अध्यापन करने वाले व्याख्याताओं का चयन केंन्द्र एंव राज्य भर्ती बोर्ड के माध्यम से होता है। संस्कृत विषय से परास्त्रतक आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यार्थी इसके लिए पात्र होते है।
सहायक प्रवक्ता के रूप में: देश भर के केंन्द्रीय विश्वविद्यालयों एंव राज्य विश्वविद्यालयों में,उच्च शिक्षा विभाग के महाविद्यलयों में ऐच्छिक विषय के रूप में संस्कृत का अध्यापन किया जाता है, जिसमें अध्यापन करने वाले सहायक प्रवक्ताओं का चयन विश्वविद्यालय अथवा राज्य भर्ती बोर्ड के माध्यम से होता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एंव राज्य विश्वािवद्यालयों द्वारा संचालित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा/कनिष्ठ शोध अध्येतावृत्ति परीक्षा उत्तीर्ण छात्र इसमें चयन के लिए पात्र होते है।
अनुसंधान सहायक के रूप में: संस्कृत में शोध कार्य करन वाले विद्यार्थियों की सहायता के लिए सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र के शोध-संस्थान अपने यहां अनुसंधान सहायकों की नियुक्ति करते है। इस पद के लिए अनिवार्य योग्यता संस्कृत विषय में पराखातक, आचार्य अथवा विद्यातारिधि है। ये नियुक्यिों कहीं-कहीं पर वेतनमान औश्र कहीं पर निश्चित मानदेय पर की जाती है।
सेना में धर्मगुरु के रूप में: भारतीय सेना की तीनों शाखाओं में अधिकारी स्तर का धर्मगुरू का पद होता है। जिन छात्रों ने संस्कृत विषय के साथ खातक शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की है तथा निर्धारित शरीरिक मानदण्ड को पुरा करते है, वे इस परीक्षा में बैठने के लिए पात्र होते है। सेना के भर्ती बोर्ड द्वारा समय-समय पर इस पद हेतु रिक्तियां निकाली जाती है।
अनुवादक के रूप में: सरकारी प्रतिष्ठान और सामाजिक क्षेत्र के कुछ उपक्रमों में अनुवादक का पद होता है, विभिन्न भाषाओं में आर्य पन्नों तथा अन्य साहित्य के अनुवाद कार्य के लिए इस पद पर नियुक्ति की जाती है। खातक, शास्त्री स्तर पर संस्कृत का अध्ययन तथा अनुवाद में डिप्लोमा प्राप्त करने वाले छात्र इसमें आवेदन करने के लिए अहं होते है। इस पद के लिए माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापाकें के बराबर ही वेतनमान निर्धारित होता है।
योग शिक्षक के रूप में: आज दुनियां भर में जिस प्रकार स्वास्थ्य और योग के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, उसमें योग प्रशिक्षकों की मांग भी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। सस्कृत के जिन स्त्राताकं ने गुरुकुल में योग का अभ्यास किया है और योगशिक्षा में कोई उपाधि प्राप्त की है, वे इस क्षेत्र में आसानी से रोजगार पा सकते है?। सरकारी विद्यालयों एवं गैर सरकारी उपक्रमों में योग प्रशिक्षितों के लिए पर्याप्त मात्रा में रिक्तियां निकलती रहती है, आजकल बहुराष्ट्रीय संस्थाएं भी योग प्रशिक्षकों की सेवाएं लेने लगी है।
पत्रकार के रूप में: पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथ्ज्ञा स्तम्भ माना जाता है। भारत में यह फलता-फूलता उद्योग हैं, जो युवाओं के लिए न केवल रोजगार के अवसर उपलब्ध करता है, अपितु चुनौतिपूर्ण कार्यों के माध्यम से वश और प्रतिष्ठा भी प्रदान करता है। जिन छात्रों ने संस्कृत में खातक शास्त्री उपाधि प्राप्त की है तथा पत्रकारिता में प्रशिक्षण लिया है वे इस क्षेत्र में कार्य के लिए पात्र होते है। भाषा पर मजबूत पकड़ के कारण सस्कृत के छात्रों को अन्य प्रतियोगितां की अपेक्षा वरौयता प्राप्त होती है। सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में कार्य के अनेक अवसरों के साथ वेतन व सुविधाओं की यहां कोई सीमा नहीं होती है।
सम्पादक के रूप में: किसी पुस्तक, पत्र-पत्रिका के प्रकाशन मैं सम्पादक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जो छात्र भाषा व साहित्य आदि की अच्छी समझा रखते है, वे इस चुनौतिपूर्ण कार्य के लिए अहं होते है। हिन्दी भाषा क्षेत्र में पत्र पत्रिका या पुस्तकों के प्रकाशन संस्थाओं में सम्पादक का कार्य करने के लिए संस्कृत क अण्येताओं को वरीयता दी जाती है। इस क्षेत्र में कार्य करने के लिए सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र में अवसर है, जहां वेतन और प्रतिष्ठा की लिए असीम संभावनाएं है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के आ जाने के बाद वह क्षेत्र बहुत ही आकर्षक और चुनौतिपूर्ण हो गया है।
लिपिक के रूप में: सरकारी क्षेत्र (कर्मचारी चयन आयोग एवं रेलवे आदि) में लिपिक संवर्ग में नियूक्ति के लिए बारहवीं कक्षा, उपाध्याय उत्तीर्ण होना आवश्यक है संस्कृत के वे छात्र जिन्होंने बारहवीं, उपाध्याय, विशारद परीक्षा उत्तीर्ण की है वे इस नौकरी के लिए आवेदन कर सकते है। पूरे वर्ष किसी न किसी विभाग में इस पर भर्ती के लिए रिक्तियां आती रहती है। इसके लिए कम्प्यूटर का ज्ञान भी अनिवार्य हो गया है।
अन्य सरकारी सेवाएं: उपर्युक्त सेवाओं के अतिरिक्त भी सरकारी क्षेत्र में अनेक ऐसे अवसर है, जहां संस्कृत के अध्येता रोजगार पा सकते है, विद्यार्थियों को चाहिए कि वे अपनी जागरुकता का स्तर बढ़ाएं तथा नवीनतम तकनीक का उपयोग करने में पीछे न रहे। संस्कृत भाषा के अध्ययन के साथ तकनीक की जानकारी एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का अध्ययन रोजगार के नए-नए अवसर उपलब्ध करा सकता है।
निजी एंव सामाजिक क्षेत्र में लेखक के रूप में: लेखन एक कला है, जिसके लिए प्रेरणा एंव कौशल के समय से पूर्व का साहित्य देता है। शब्दकोश, साहित्यिक मान्यताएं, विषयवस्तु और लेखकीय दृष्टि के लिए भी परम्परागत साहित्य ही सबसे बड़ा स्त्रोत होता है। संस्कृत में न केवल दुनियां का सबसे विशाल साहित्य सुरक्षित है, अपितु वर्णन और विषय वैविध्य की दृष्टि से भी सबसे अनूठा है। जिन छात्रों की साहित्य विमर्श एंव सृजन में अभिरुचि है, वे संस्कृत साहित्य से प्रेरणा लेकर लेखन कार्य कर सकते है। आजकल लेखन का क्षेत्र बहुत व्यापक है, जिसमें प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रनिक मीडिया, विज्ञापन, रेडियो, टेलीविजन, आदि के लिए लेखन भी आता है। इस क्षेत्र में रोजगार के असीमित अवसर उपलब्ध है।
ज्योतिषी के रूप मेें: ज्योतिष का अध्ययन न केवल स्वयं के बौद्धिक व्यायाम और भविष्य के ज्ञान के रोमांच से युक्त है, अपितु आमजन की जिज्ञासा का भी विशिष्ट केन्द्र है। दुनियां भर में प्राय: इसके जानने वालों के पास भीड़ लगी रहती है। व्यक्ति से लेकर सरकारें तक इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का उपयोग करने में पीछे नहीं है। जहां तक आय की बात है, ये अध्येता के ज्ञान और कौशल पर आश्रित है।
वास्तु सलाहकार के रूप में: संस्कृत के ग्रन्थों में वास्तुपुरुष की चर्चा की गयी है, जिसका गृह, कार्यालय आदि के निर्माण में बड़ा महत्व है। आजकल वास्तु सलाहकार के रूप में रोजगार का एक नया विकल्प उपलब्ध है। संस्कृत के खतक, शास्त्री आचार्य वास्तुविज्ञान में दक्ष होकर रोजगार का अवसर सृजित कर सकते है। इस क्षेत्र में भी आय अध्येता के ज्ञान और कौशल पर आश्रित है।
पुरोहित के रूप में: भारत जैसे देश में जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सोहल संस्कारों एंव अन्य उपासना अनुष्ठानों में पुरोहित की आवश्यकता पड़ती है। इसके विशेषज्ञ पुरोहित वर्ग के लिए रोजगार का यह एक अच्छा विकल्प है। लोकजीवन के साथ स्वयं के संस्कार और जीविका हेतु धन की प्राप्ति का इससे अच्छा कौन सा मार्ग हो सकता है। सुसस्कृतज्ञों के इस क्षेत्र में आने से न केवल कर्मकाण्ड के प्रति आमलोगों में विश्वसनीयता की बृद्धि होगी अपितु उपासन कर्ता भी फलदायी होगी। अस्तु परम्परागत संस्कृत के अध्येताओं को इस विकल्प पर विचार कर विशेषज्ञ सेवाएं देने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस क्षेत्र में में आर्य अघ्येता के ज्ञान और कौशल पर आश्रित है।
कथा प्रवाचक उपदेशक के रूप में: भारत सहित दुनियां भर में लोगों को बुराईयों से हटाकर समार्ग पर ले जाने के प्रयास में प्रवाचकों उपदेशकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जीवन और समपति के प्रति लोगों की असुरक्षा की भावना और उससे उत्पन्न तनाव की स्थिति गम्भीर होती जा रही है। इससे मुक्ति दिलाकर समाज को पुन: आशावाद और सहज जीवन की ओर मोडने का कार्य प्रवाचकों और उपदेशकों के ऊपर है। भारतीय दर्शन और लोक जीवन की बेहतर समग्र रखने वाले संस्कृत के अध्येता इस क्षेत्र में आकर सामाजिक कल्याण के साथ आजीविका के लिए श्रेष्ठ अवसर पा सकते है। इस क्षेत्र में यश और प्रतिष्ठा के साथ जीवनवृत्ति की अपार सम्भावनाएं है।
शिक्षाशास्त्री के रूप में: संस्कृत ग्रन्थों एंव भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन और उसमें निहित शैक्षिक मूल्यों का की समझ रखने वाले अध्येता शैक्षिक क्षेत्र में उन्नवन क कार्य कर सकते है। नवीनताम शैक्षिक तकनीक और प्रविधियां के साथ बदलते समाज पर शोध और विमर्श करने वाले अध्येताओं को निजी क्षेत्र में बड़ी प्रतिष्ठा और आय के अवसर प्राप्त होते है। शैक्षिक एंव शोध संस्थानों के साथ-साथ अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए इनकी विशेष मांग रहती है।
समाजशास्त्री और दार्शनिक के रूप में: दर्शन व्यक्ति से लेकर समाज और राष्ट्र तक की दिशा तय करता है। समाज में कुछ ऐसे प्रश्नों पर विमर्श करने, जिनके समाधान आम सामाजिक व्यवस्था और तन्त्र के पास नहीं होते है। अथवा बदलते सामाजिक और वैश्विक परिदृश्य में पराम्परागत मूल्यों के साथ नवीन जीवन दृष्टि का तालमेल बिठाने में दार्शनिकों और समाजशास्त्रियां की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए समाज में इन्हें सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। इनके लेखों और व्याख्यानों से प्राप्त होने वाली आर्य उच्चस्तरीय जीवनयापन के लिए पर्याप्त होती है। इसके अतिरिक्त ऐसे अध्येताओं को औपचारिक रूप से कुछ संस्थाओं में सेवा करने के अवसर भी प्राप्त होते है।
समाजसुधारक के रूप में: सामाजिक समरसता की स्थापना और समाज को जोडऩे में समाज सेवको की बड़ी भूमिका होती है। छोटे-बड़े आयोजन हों या आपदा, गरीबों की शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य हो या अन्य ऐसे कार्य जिस और सुविधा सम्पन्न वर्ग का ध्यान नही जाता, है उस और समाज सुधारक कार्य करते है। समकालीन अव्यवस्थाओं और बुराइयों से समाज को बचाकर रखना सत्ता और धर्म को स्थापनाओं को समाज के निबले तक्के तक पहुंचाने का कठिन कार्य भी इन्हीं समाज सुधारकों का है। समाज में ऐसे लोगों की बड़ी प्रतिष्ठा है। कई राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्र्रीय संस्थाएं ऐसे लोगों के कार्य की सराहना करती है और बउ़े-बडे पुरस्कारों से उनका सम्मान करती है। ऐसे लोगों की जीवनवृत्ति सस्थालन का दायित्व समाज अथवा स्वंयसेवी संस्थाएं स्वयं अपने ऊपर ले लेती है।
समाज एवं राजनैतिक क्षेत्र में नेता के रूप में: छोटी से छोटी लोकतान्त्रिक ईकाई से लेकर प्रदेश और राष्ट्र में नेतृत्व और व्यवस्था बनाने का गुरुत्त्व दायित्व नेता के कन्धों पर होता है। नेेता समाज या राष्ट्र को जिस दिशा की ओर ले जाना चाहता है, जनता उसी की ओर उन्मुख होकर चलने को तैयार हो जाती है। इसलिए किसी भी राष्ट्र में नेतृत्व का शिक्षिक और सरकारी होना अत्यावश्क है। भारत जैसे बहुल जनसंख्या प्रधान और विशाल देश में केवल राजनीति में ही नहीं अपितु प्रत्येक क्षेत्र में कुशल नेतृत्व की आवश्यकता है। संस्कृत के अध्येताओं से ये अपेक्षा रहती है कि वे जिस क्षेत्र में जायेंगे वहां पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करेंगे इसलिए उनके लिए यह क्षेत्र भी खुला हुआ है। इस क्षेत्र में पद, प्रतिष्ठा चुनौतियां अवसर और कार्यक्षेत्र की कोई सीमा नहीं है।
अन्वेषक के रूप में: पूरे संसार में इतिहास आदि के ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत संस्कृत साहित्य है। वेद, पुराण, रामायण और महाभारत से लेकर संस्कृत के ललित साहित्य में तत्कालीन समाज एंव वयवस्था का चित्रण है? इतिहास, भूगोल, शासन, व्यवस्था, व्यापार, कृषि, जलवायु, नदियां, बादल, अधिवास, ग्रह-नक्षत्र सबके बारे में संस्कृत के विशाल साहित्य में चर्चा मिलती है। इन तत्वों के बारे में विमर्श करना तथा समय की आवश्कता के अनुसार इनका विश्लेषण करना अन्वेषकों का कार्यक्षेत्रहै। नासा जैसी संस्थाएं इस पर महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। भारत में भी ऐसे विद्वानों की आवश्यकता है, जो तथ्यों को जुटाकर उनकी प्रामाणिकता पर कार्य करें।
उद्योगपति के रूप में: भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में कल कारखाने लगाना बहुत ही लाभ देने वाला रोजगार मन जाता है। संस्कृत का अध्येता उद्योग लगाकर कितना प्रगति कर सकता है, इसका अनुमान बाबा रामदेव जी का पंतजलि प्रतिष्ठान जैसे उपक्रमों से लगाया जा सकता है। खान-पान स्वासथ्य, सौन्दर्य प्रसाधन पूजा सामग्री आदि ऐसे अनेक क्षेत्र है, जिसमें संस्कृत का ज्ञान सहायता करता है। भावात्मक रूप से भी लोग इस क्षेत्र में आदर प्राप्त विद्वानों के उत्पाद प्रयोग करने में आगे देखे जाते है। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई उद्योग-व्यापार नहीं है, जहां संस्कृत अध्येता के लिए अवसर न हो।
और भी अन्य बहुत से क्षेत्र है जहां पर संस्कृत से सातक, सासकोत्तर, शास्त्री, आचार्य किये हुए छात्रों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते है प्रवधन के क्षेत्र में कुशल प्रबंधक के रूप में, भारत सरकार द्वारा दूतावासों मे सांस्कृतिक राजदूत के रूप में फैमिली एडवाइजर के रूप में आयुर्वेद चिकित्सा के क्षेत्र में वैद्य और शिक्षक के रूप् में प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैद्य और शिक्षक के रूप में प्राकृतिक चिकित्सक के रूप में आप अपना कैरियर बना सकते है।
(साभार)

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