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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

प्रधानमंत्री जी! फारूक अब्दुल्ला के ‘बिगड़े हुए दिमाग’ का इलाज अब होना ही चाहिए

जम्मू कश्मीर का अब्दुल्ला परिवार भारत के प्रति पहले से ही दोगला रहा है । इसका इतिहास यह बताता है कि इसने जुबान से चाहे जो कुछ बोला हो परंतु इसके अंतर में भारत को लेकर सदा कतरनी चलती रही है । शेख अब्दुल्ला हों चाहे फिर फारूक अब्दुल्ला हों या उमर अब्दुल्ला हों इन तीनों का ही यही हाल रहा है । फारुख अब्दुल्ला कभी कहा करते थे कि जम्मू कश्मीर को भारत से कोई ताकत अलग नहीं कर सकती, क्योंकि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। अब वही फारूक अब्दुल्ला कह रहे हैं कि कश्मीर के लोग भारत के साथ नहीं बल्कि चीन के साथ रहना चाहते हैं ।
कुछ समय पहले यही फारूक अब्दुल्ला अपने पिता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की मजार से अपनी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस के धड़ों से अपील करते हुए कह गए थे कि ‘एक हो जाओ’। फारूक ने उस समय अपने भारत विरोधी दृष्टिकोण का परिचय देते हुए अलगाववादी हुर्रियत से कहा था कि अपने संघर्ष में हमें अपना शत्रु मत समझो, हम तुम्हारे साथ हैं। कहने का अभिप्राय है कि जम्मू कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा देने में हम आपके साथ हैं । उनके इस प्रकार के बयानों से पता चलता है कि उनकी नीति और नियत में भारत नहीं बल्कि ‘कुछ और’ ही बसता है। अब उनके इस ‘कुछ और’ का इलाज करने का समय आ गया है । भारत सरकार को उन्हें ‘अस्पताल’ में भर्ती कर उपचार में लेना चाहिए। ऐसा ना हो कि समय निकल जाए और फिर हम हाथ मलते रह जाएं। जिनके दिल और दिमाग भारत में न तो धड़कते हैं और न ही भारत के अनुसार चलते हैं , उन्हें भारत का शत्रु समझकर उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाना चाहिए। कुछ लोगों के लिए अब्दुल्लाह का यह बयान ‘भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक हो सकता है, परंतु जो लोग ऐसा सोचते हैं उन्हें यह पता होना चाहिए कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी अपनी सीमाएं हैं।
नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख ने कहा कि जो लोग यह कहते हैं कि जम्मू कश्मीर के लोगों ने पिछले वर्ष अगस्त में आर्टिकल 370 को हटाने के फैसले को स्वीकार कर लिया उन्हें यह पता होना चाहिए कि यदि कश्मीर की सड़कों से सेना को हटा लिया जाए तो इस निर्णय के विरुद्ध बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन करते हुए लोग सामने आएंगे।
फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीरियों को अब सरकार पर कोई भरोसा नहीं है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने धोखा दिया है। अब्दुल्ला ने कहा कि जब उन्होंने घाटी में बढ़ते हुए सैनिकों की संख्या को लेकर प्रश्न किया तो उन्हें बताया गया कि यह केवल सुरक्षा कारणों से किया जा रहा है। वास्तव में अब्दुल्ला परिवार ने धारा 370 और 35a की आड़ में प्रदेश को लूट – लूट कर अपनी तिजौरियों में भर लिया। इसके साथ ही भारत सरकार को ‘ब्लैकमेल’ करने में भी उसने कभी कमी नहीं छोड़ी, बड़ी – बड़ी धनराशि केंद्र सरकार से आर्थिक पैकेज के नाम पर लेकर उसका कहां प्रयोग किया गया ? – अब्दुल्ला परिवार के किसी भी मुख्यमंत्री ने कभी यह बताना उचित नहीं माना।
प्रधानमंत्री मोदी को ‘झूठा’ कहने वाले फारूक अब्दुल्ला और उनका परिवार स्वयं कितना झूठा और बेईमान रहा है ? – उन्हें यह भी स्पष्ट करना चाहिए।
जो लोग अब्दुल्ला परिवार और उसकी तीन पीढ़ियों के इतिहास से परिचित रहे हैं, उन्हें अब्दुल्ला के इस बयान पर कोई भी आश्चर्य नहीं हुआ है । क्योंकि वे जानते हैं कि इस परिवार का इतिहास, चाल, चरित्र और चेहरा कैसा रहा है ? हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि शेख अब्दुल्लाह ने जब नेशनल कांफ्रेंस की स्थापना की थी तो उसका नाम उस समय नेशनल कॉन्फ्रेंस न रखकर ‘मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ रखा था। बाद में नेहरू की सलाह पर उन्होंने इसका छद्म नाम ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ रखा। ‘नेशनल कांफ्रेंस’ के इन नेताओं का इतिहास बताता है कि इनकी सोच ‘नेशनल’ न होकर ‘मुस्लिम’ ही रही।
शेख अब्दुल्ला ने भारत के साथ विलय न करके जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान के साथ ले जाने का भी मन बनाया था , परंतु उस समय जिन्नाह से उचित मोल भाव ना मिलने के कारण मजबूरी में शेख अब्दुल्ला ने भारत के साथ रहना स्वीकार किया था। दोगले शेख अब्दुल्लाह का यह संस्कार उसकी अगली पीढ़ियों में आज तक देखा जा रहा है। शेख अब्दुल्ला ने उस समय समझ लिया था कि जिन्नाह मूल रूप में ‘हिंदू’ है और नेहरू वैचारिक रूप से पूर्णतया ‘मुस्लिम’ है।अतः उसके लिए जिन्नाह की अपेक्षा नेहरू कहीं अधिक उदार थे। नेहरू के प्रति उसके इसी दृष्टिकोण ने उसे भारत के साथ रहने के लिए प्रेरित किया।
भारत के साथ बने रहने के शेख अब्दुल्लाह के इस ‘उपकार’ का बदला नेहरू ने संविधान में धारा 370 और 35a को रखवाकर चुकाया। इतना ही नहीं नेहरू ने शेख अब्दुल्लाह की कश्मीर की स्वायत्तता की मांग को भी कुछ सीमा तक स्वीकार कर लिया था । इसी स्वायत्तता की मांग के चलते कश्मीर में ‘दो विधान, दो प्रधान और दो निशान’ की व्यवस्था पर भी नेहरू ने अपनी सहमति और स्वीकृति की मुहर लगा दी । बाद में इस देशविरोधी व्यवस्था का विरोध करते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया। इस व्यवस्था के अंतर्गत कश्मीर जाने वाले प्रत्येक भारतीय को भी परमिट लेने की आवश्यकता अनिवार्य कर दी गई थी।
भारत से इतना कुछ मिलने के उपरांत भी फारूक अब्दुल्ला के पिता और उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा की भूख बढ़ती ही चली गई । वह ‘कुछ बड़ा’ करने की तैयारी में था और अपने इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वह ब्रिटेन और कई अन्य देशों के राजनयिकों के साथ गुप्त मंत्रणाएं कर रहा था । जब नेहरू को उसकी इन देश विरोधी गतिविधियों की जानकारी हुई तो उसके प्रति पूर्णतः उदार रहने वाले नेहरू को भी ‘कठोर’ होकर उसे बर्खास्त करना पड़ा। नेहरू ने शेख को नजरबंदी की स्थिति में डाल दिया था और नेशनल कांफ्रेंस के टूटने के पश्चात बख्शी गुलाम मोहम्मद को जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री बना दिया गया था।
शेख अब्दुल्ला का बढ़ा हुआ अहंकार उस समय टूटा जब 1971 में इंदिरा गांधी के तेजस्वी नेतृत्व के चलते भारत ने पाकिस्तान को न केवल करारी पराजय दी बल्कि उसके दो टुकड़े भी कर दिए। तब शेख अब्दुल्ला ने ‘नाक रगड़ते’ हुए इंदिरा गांधी के सामने नतमस्तक होकर भारत के साथ रहना स्वीकार किया और जम्मू कश्मीर को भारत का ‘अभिन्न अंग’ माना। परंतु शेख अब्दुल्लाह के इस प्रकार के आचरण को उसका भारत के नेतृत्व के सामने ‘नाक रगड़ना’ मानना भी भूल होगी । हिंदू की ‘उदारता’ उसे ऐसा मानने के लिए प्रेरित करती रही है , जबकि वास्तविकता यह होती है कि किसी भी मुस्लिम शासक ने कभी भी ईमानदारी से भारत के साथ रहना स्वीकार नहीं किया। इसी मुस्लिम परंपरा का निर्वाह शेख अब्दुल्ला परिवार ने ही भारत को लेकर किया है अब उसी बात को फारूक अब्दुल्ला ने अपने उपरोक्त बयान से स्पष्ट कर दिया है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अनुच्छेद-370 को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ‘राष्ट्र के साथ द्रोह’ कहते हुए इसे संविधान में स्थान देने से मना कर दिया था। इसके उपरांत भी अनुच्छेद-370 पर सरदार पटेल को इसके समर्थन में आने के लिए विवश किया गया। इतना ही नहीं ,अनुच्छेद 35a को 1954 में शेख अब्दुल्ला की नजरबंदी के समय संसद की बिना किसी सहमति अस्वीकृति के चुपचाप संविधान में स्थान दे दिया गया । देश की पहली सरकार और पहले प्रधानमंत्री की भारत के साथ यह बहुत बड़ी गद्दारी थी।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार को भारत विरोधी बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है। शेख अब्दुल्लाह ने एक प्रकार से भारत के भीतर ही नया पाकिस्तान बनाने की नींव रख दी थी । जिस पर वह चुपचाप दीवार बनाने लगा । दीवार को ऊंचाई देने में फारूक अब्दुल्ला व उमर अब्दुल्ला लगे हुए थे । बस, छत पड़ने की देर थी । इतने में ही भारत के राजनीतिक गगनमंडल पर नरेन्द्र मोदी नाम के महानक्षत्र का उदय हुआ । जिसने एक ही विस्फोट से या कहिए कि अपने तेज और दिव्य आभामंडल से पड़ती हुई इस छत को ध्वस्त कर दिया । आज बना बनाया वह खेल जब अब्दुल्ला परिवार को ध्वस्त हुआ दिखाई दे रहा है तो उस पर उनके मानस का वह भारत विरोधी चेहरा उन्हें बार-बार दुखी करता है। बस , उसी भावना से प्रेरित होकर शेख अब्दुल्ला के बेटे फारूक अब्दुल्ला ने उपरोक्त भारत विरोधी बयान दिया है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि 1990 के हिंदू पलायन की सीधी जिम्मेदारी भी तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की ही है। 1989 के जून और सितंबर महीनों के बीच 70 से अधिक कैदी-आतंकियों को रिहाकर उन्होंने घाटी में मार-काट के लिए छोड़ दिया था। जब पानी सिर के ऊपर चला आया तब फारुक त्यागपत्र देकर लंदन चले गए।1971 में लंदन में जब जेकेएलएफ का गठन हुआ था तो उसकी संस्थापक टोली के साथ फारूक का चित्र आज भी उपलब्ध है। कश्मीर को एक परिवार के इस एकाधिकार से मुक्त कराने के लिए ही वाजपेयी सरकार के ‘प्रोत्साहन’ पर मुफ्ती मुहम्मद सईद ने पीडीपी का गठन किया।
इस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपेक्षा उदार कहे जाने वाले अटल जी भी जम्मू कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार को समाप्त करके ही कश्मीर का उज्जवल भविष्य देखते थे । यह अलग बात है कि उनकी इस परिवार को समाप्त करने की अपने ढंग की रणनीति थी और आज नरेंद्र मोदी जी की अपने ढंग की रणनीति है । कुल मिलाकर इस परिवार की राजनीतिक समाप्ति के पश्चात ही जम्मू-कश्मीर पूर्ण शांति की ओर आगे बढ़ सकता है । इसीलिए हम कहते हैं कि फारूक अब्दुल्लाह को उपचार के अधीन लेकर उनका सही उपचार भारत सरकार को करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी से देश की कोटि कोटि जनता को यह अपेक्षा है कि वह ‘बिगड़े हुए दिमागों’ को ठीक करने के लिए निश्चित ही कोई न कोई कठोर कदम उठाएंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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