सप्लाई चैन की मज़बूती के लिए भारत के साथ आ रहे हैं जापान, आस्ट्रेलिया एवं अन्य विकसित देश

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भारत, जापान एवं आस्ट्रेलिया अभी हाल ही में भारतीय-प्रशांत महासागर के क्षेत्र में सप्लाई चैन को मज़बूत करने के उद्देश्य से आपस में प्रयास करने के लिए सहमत हुए हैं। पूरे विश्व में सप्लाई चैन के मामले में चीन का एक तरह से वर्चस्व है, इस दृष्टि से यह एक अति महत्वपूर्ण क़दम माना जाना चाहिए। इन तीनों देशों के इस तरह आपस में जुड़ने से इन देशों की विदेशी व्यापार की दृष्टि से चीन पर निर्भरता कुछ कम होगी। भारत, जापान एवं आस्ट्रेलिया के व्यापार मंत्रीयों ने इस क्षेत्र के अन्य देशों का भी आह्वान किया है कि विश्व में मुक्त, न्याय संगत एवं पूर्वानुमान योग्य व्यापार वातावरण बनाए जाने के उद्देश्य से इस तरह के प्रयासों के साथ उन्हें भी जुड़ना चाहिए। इस आह्वान का तुरंत जवाब देते हुए जर्मनी ने भी घोषणा की है कि वह भी इस क्षेत्र में उक्त तीनों देशों के साथ कार्य करना चाहेगा। यह भी हर्ष का विषय है कि जर्मनी की तरह अमेरिका ने भी उक्त तीनों देशों द्वारा किया जा रहे इस प्रकार के प्रयास की सराहना की है एवं यह सम्भावना जताई है कि इस तरह के आपसी सहयोग के कार्य को अमेरिका नाटो देशों की तरह का दर्जा देने के बारे में विचार कर सकता है।

हाल ही के समय में चीन के साथ विदेश व्यापार करने वाले कई देशों को उत्पादों की आपूर्ति में दिक्क्तों का सामना करना पड़ा है। अतः आज सप्लाई चैन में विविधता लाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। इस तरह के प्रयासों से सप्लाई चैन के क्षेत्र में चीन का एकाधिकार कम होगा एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस क्षेत्र में स्वस्थ प्रतियोगिता की शुरुआत होगी।

चीन आज विश्व के 100 से अधिक देशों का विदेशी व्यापार में मुख्य व्यापारिक भागीदार है। अतः चीन को सप्लाई चैन के क्षेत्र में प्रतियोगिता देना आसान नहीं हैं परंतु कहीं से तो शुरुआत करनी ही होगी। यह हर्ष का विषय है कि आज कई विकसित देश भी भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेशी व्यापार की सम्भावनाएँ तलाश रहे हैं एवं सप्लाई चैन के क्षेत्र में भी भारत के साथ जुड़ना चाह रहे हैं।

भारत आज फ़ार्मा उद्योग के लिए 70 प्रतिशत कच्चा माल चीन से आयात करता है। इसी प्रकार इलेक्ट्रॉनिक्स एवं मोबाइल फ़ोन उद्योग के लिए 45 प्रतिशत, ऑटो उद्योग के लिए 25 प्रतिशत एवं केमिकल एवं ओरगेनिक उद्योग के लिए 38 प्रतिशत सामान का आयात चीन से किया जा रहा है। इस स्थिति को देखकर अब देश में उद्योगपतियों एवं व्यापारियों को भी आभास होने लगा है कि कच्चे माल के लिए किसी एक देश पर आवश्यकता से अधिक निर्भर रहना ठीक नहीं हैं। अतः एक विकल्प को खड़ा करना आज पूरे विश्व में ही आवश्यक हो गया है। आदर्श स्थिति तो दर असल आत्मनिर्भर होने में ही है परंतु किन्हीं उद्योगों में यदि यह सम्भव नहीं है तो सप्लाई चैन की वैकल्पिक व्यवस्था तो की ही जाना चाहिए।

भारत के साथ साथ विश्व के अन्य कई देशों को भी अब यह समझ में आ गया है कि कच्चे माल के लिए केवल एक देश पर निर्भरता उचित नहीं है। आगे आने वाले समय में चीन अपनी अधिनायकवादी नीतियों के चलते इसका ग़लत फ़ायदा इन देशों से उठा सकता है एवं अपना अधिकार इन देशों पर जता सकता है।

साथ ही, चीन अपने देश में उत्पादों के आयात को आसानी से आने नहीं देता है। अभी हाल ही में चीन ने आस्ट्रेलिया से आयात होने वाले शराब आदि सहित कई अन्य उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस कारण से भी आस्ट्रेलिया चीन से नाराज़ होकर भारत के साथ सप्लाई चैन के मामले में जुड़ गया है। इसी प्रकार जर्मनी भी जुड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के आक्रामक व्यवहार के चलते अब कई देशों का चीन पर भरोसा कम होता जा रहा है। कोई भी देश इस तरह का आक्रामक व्यवहार करने वाले देश के साथ अपने व्यापार को जारी नहीं रख सकता है। क्योंकि कभी भी यह उन्हें व्यापार में धोखा भी दे सकता है। इसके कारण भी ये देश अब भारत की ओर आशा भरी नज़रों से देख रहे हैं एवं भारत के साथ खड़े होने को भी तैयार हो रहे हैं।

विश्व के देशों का अपने लिए आत्मनिर्भरता हासिल करने के बारे में सोचना, चीन के विरुद्ध उठाए जा रहे किसी क़दम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। हर देश का अधिकार है कि वह अपने देश में आर्थिक तरक़्क़ी के बारे में सोचे। जापान ने तो अपने देश में बक़ायदा 200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का एक फ़ंड ही इस उद्देश्य के लिए बना दिया है कि जो भी जापानी कम्पनी अपनी विनिर्माण इकाई को चीन से बाहर स्थानांतरित करेगी उसे इस फ़ंड से आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। इस प्रकार कई जापानी कम्पनियों एवं अन्य देशों की कई कम्पनियों ने चीन से अपनी विनिर्माण इकाईयों को स्थानांतरित करना प्रारम्भ कर दिया है।

पिछले 30 वर्षों के दौरान चीन पूरे विश्व के लिए एक विनिर्माण इकाई एवं सप्लाई चैन के तौर पर विकसित हो गया है। वैश्विकीकरण की नीतियों के चलते यह सम्भव हो पाया था। परंतु, इस बात की ओर पूरे विश्व का ही ध्यान नहीं गया कि चीन जैसे राष्ट्र पर अति विश्वास किस प्रकार किया गया क्योंकि इस देश का इतिहास भी बहुत सहयोगकारी नहीं रहा है। यह देश अपनी आक्रामक नीतियों के कारण पूर्व में भी बदनाम रहा है। जैसे ही चीन आर्थिक तरक़्क़ी करता है वह विश्व के अन्य देशों को दबाने लगता है। अतः अब विश्व के अन्य देश भी इस विद्वेषपूर्ण चक्र से बाहर आना चाहते हैं एवं बदलाव अब एक आवश्यक आवश्यकता बन गया है। हालाँकि चीन की तरह उत्पादों की लागत कम रखने में शुरू में परेशानी तो होगी परंतु यदि इन देशों के नागरिक तुलनात्मक रूप से थोड़ी सी महँगी वस्तु, परंतु उच्च गुणवत्ता वाली, ख़रीदने को तैयार हो जाते हैं तो चीन को कड़ी टक्कर देना सम्भव होगा। अब तो देश किसी भी क़ीमत पर आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। एकाधिकार को इस तरह के कूटनीतिक साझेदारी से भी कड़ी टक्कर दी जा सकती है। अतः भारत, जापान एवं आस्ट्रेलिया का आपस में जुड़ना एक बहुत ही अहम फ़ैसला है। मानवतावाद दृष्टिकोण को साथ लेकर आगे बढ़ने से पूरे विश्व में आपस में बंधुत्व की भावना का विकास भी होगा। इस प्रकार, यदि मध्यम आकार वाले यूरोपीयन एवं अन्य कई देश भारत के साथ जुड़ जाते हैं एवं कूटनीतिक गठबंधन आपस में कर लेते हैं तो निश्चित ही चीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी टक्कर देने में ये सभी देश सक्षम हो जाएँगे। भारत के प्रति विश्व के अन्य देशों में विश्वास की कोई कमी नहीं है। ये देश भारत के साथ जुड़ने को तैयार हैं।

चीन की सप्लाई चैन से टक्कर लेने के लिए उस स्तर के व्यापारिक संस्थानों को खड़ा करना भी ज़रूरी है। अन्यथा, चीन के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता करना सम्भव नहीं होगा। इसके लिए भारत सरकार ने हाल ही में कुछ उद्योगों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना की घोषणा की है। मोबाइल उत्पादन इकाईयों को इस तरह का पैकेज प्रदान किया गया है। इस घोषणा से उत्साहित होकर ऐपल एवं नोकिया जैसी कम्पनियाँ भारत में अपनी इकाईयाँ स्थापित करने जा रही हैं। इसी प्रकार फ़ार्मा उद्योग एवं अन्य कई उद्योगों को भी यह पैकेज दिए जाने पर विचार चल रहा है। केंद्र सरकार की यह नीति निश्चित रूप से सफल होगी एवं इससे चीन पर कई देशों की निर्भरता कम होगी।

अब समय आ गया है कि भारत को भी अब अन्य देशों के साथ साझेदारियों को निभाना पड़ेगा। अन्य देशों के साथ मिलकर हमारे अपने सप्लाई चैन विकसित करने होंगे एवं हमें अपनी स्वयं की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तैयार करना होगा ताकि वे वैश्विक स्तर पर चीन से कड़ी टक्कर ले सकें। आत्मनिर्भर भारत एवं उत्पाद आधारित प्रोत्साहन योजना इस सम्बंध में केंद्र सरकार के बहुत अच्छे एवं महत्वपूर्ण निर्णय कहे जा सकते हैं।

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