राहुल गांधी ने सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों को बचाने के लिए लाये गये अध्यादेश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अचानक मीडिया के सामने प्रस्तुत होकर टिप्पणी की है कि यह अध्यादेश ‘बकवास’ है और इसे फाड़कर फेंक दें। यह अच्छी बात है कि राजनीति को ‘बकवास’ होने से बचाने के लिए कांग्रेस के युवा नेता ने इस अध्यादेश पर इस प्रकार की टिप्पणी की है। वैसे भी वह ‘कागज फाड़ने’ की परंपरा पूर्व में उत्तर प्रदेश चुनावों के समय सपा के चुनावी घोषणा पत्र को फाड़कर डाल चुके हैं। अब इसी परंपरा को राहुल राष्ट्र की राजनीति का एक संस्कार बना देना चाहते हैं, पर इस संदर्भ में हमें कई बातों पर विचार करना होगा।

सर्वप्रथम, हम संसदीय लोकतंत्र की मर्यादाओं का चिंतन करें। इसमें अपने विरोध को व्यक्त करने के लिए मीडिया कभी भी पहला माध्यम नही है। निश्चित रूप से मीडिया इस काम के लिए अंतिम विकल्प है। पहला मंच पार्टी है, दूसरा मंच सरकार है, तीसरा मंच संसद है और चौथा मंच प्रैस है। राहुल गांधी के लिए यह आसान था कि वह पार्टी से अपनी बात मनवा लेते, और यह स्पष्ट कर देते कि यदि सरकार ने कोई गलती की तो वह पार्टी मुखिया के नाते इसका विरोध करेंगे और पार्टी सरकार के साथ नही होगी। मनमोहन सिंह जैसी स्थिति में हैं, उसके दृष्टिगत वह राहुल गांधी की इसी मंशा को समझकर ही तुरंत पीछे हट जाते। लेकिन राहुल गांधी ने ऐसा नही किया, संसदीय लोकतंत्र की पहली मर्यादा और प्रक्रिया का उन्होंने पालन नही किया। दूसरे, सारा देश जानता है कि देश की सरकार को राहुल और उनकी माताश्री ही चला रही हैं। प्रत्येक मंत्री और प्रधानमंत्री स्वयं भी उनकी इच्छा को ही आज्ञा मानकर चलते हैं। ऐसी स्थिति में बात साफ थी कि यदि राहुल गांधी सरकार को कहते हैं कि ऐसे ‘बकवास’ अध्यादेश को लाने की आवश्यकता नही है, तो किसी का साहस नही होता कि वह इस प्रकार के अध्यादेश को लाने की योजना बनाता। संसदीय लोकतंत्र की दूसरी मर्यादा और परंपरा को तोड़ दिया गया।

तीसरी बात, संसद के सर्वोच्च मंच पर सरकार के विरूद्घ बोलने की मर्यादा और परंपरा भी संसदीय लोकतंत्र में नेहरू के समय से ही रही है। राहुल और उनकी मां सांसद हैं। वह संसद में सरकार के विरूद्घ बोल सकते थे। वह माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आए तत्संबंधी आदेश को संसद में उचित ठहरा सकते थे और इसके लिए संसद में अपने विचार रखते हुए स्पष्ट कर सकते थे कि उनकी दृष्टि में माननीय न्यायालय का आदेश उचित है और वह अपनी पार्टी से ही नही अपितु इस सदन से भी इस आदेश का सम्मान कराना चाहेंगे। निश्चित रूप से उनके इस कथन से ही लोकतंत्र अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ चलता। लेकिन उन्होंने इस परंपरा या मर्यादा का निर्वाह करना भी उचित नही समझा।

वह सीधे चौथे मंच पर गये और अपनी ही पार्टी के प्रवक्ता से माइक लेकर अध्यादेश के विरूद्घ अपने विचार व्यक्त कर दिये। वह एक और शालीनता दिखाते हुए राष्ट्रपति से मिल सकते थे और उन्हें अपनी तथा अपनी  पार्टी की राय से अवगत करा सकते थे। पर उन्होंने वह भी नही किया। राजनीति में कई बार ‘होशहीन जोश’ को भी बड़ा महिमामंडित करके पेश किया जाता है। क्योंकि कई बार ऐसे जोश से राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना लोगों को होती है। उसके घातक परिणाम बाद में चाहे जो आयें पर तात्कालिक लाभ को लोग अधिक उपयोगी मानते हैं और ऐसे निर्णयों को ‘मील का पत्थर’ सिद्घ करने का प्रयास करते हैं। हमें महाभारत के विषय में भली प्रकार ज्ञात है कि कृष्ण युधिष्ठर के दूत बनकर शांति प्रयास के लिए हस्तिनापुर आए। शांति स्थापना के लिए भरसक प्रयास किये, परंतु कोई लाभ नही हुआ। हस्तिनापुर की राज्यसभा का बहिष्कार कर दुर्योधन, कर्ण, दु:शासन, शकुनि और दुर्योधन के मंत्रीगण उठकर चले गये। कृष्ण, भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, विदुर ही सभा में बैठे रह गये थे। सचमुच दुर्योधन का यह ‘होशहीन जोश’ ही था, जो उसके समर्थकों को बड़ा प्रिय लग रहा था, और वो मान रहे थे कि एक इतिहास लिख दिया गया। पर परिणाम क्या हुआ, सभी जानते हैं। कुछ ऐसा ही हम राहुल गांधी  के विषय में देख रहे हैं। लोग इस घटना को इतिहास में नया अध्याय जोड़ने वाली मान रहे हैं। परंतु मर्यादाओं का और परंपराओं का उल्लंघन भी साथ ही साथ हो गया है-ये नही देखा जा रहा है।

राहुल गांधी ने इस प्रकार की घोषणा से दुर्योधन वादी हठधर्मिता, उच्छ्रंखलता और बचकानेपन का परिचय दिया है। उन्होंने धृतराष्ट्र बने मनमोहन को बताया है कि उनकी सीमाएं क्या हैं, और उन्हें अपनी सीमाओं में रहना है। राहुल गांधी ने इस निर्णय के साथ ही प्रधानमंत्री के लिए बड़ी ही दयनीय स्थिति उत्पन्न कर दी है। ऐसी स्थिति में मनमोहन सिंह ने निश्चित रूप से विदेश यात्रा में निराशा और हताशा का अनुभव किया होगा। जब उन्हें संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के दौरान पूर्णत: आत्मविश्वास से भरा होना चाहिए था, तब उनके आत्मविश्वास को तोड़ने की घटना को अंजाम देकर उनके साथ लगभग विश्वासघात किया गया है। राहुल ेके इस सारे नाटक के पीछे वास्तव में ‘मोदीभय’ काम कर रहा है। वह ‘मोदी’ नाम की बीमारी से भय ग्रस्त है। मोदी को जिस प्रकार पूरे देश में जनसमर्थन मिल रहा है, उससे कांग्रेस की नींद हराम है और उसके नेता को कुछ सूझ नही रहा है। इसलिए हड़बड़ी में मीडिया में छाने के लिए ‘शहीदी बयान’ राहुल गांधी ने दिया है। इससे देश में फिर एक संकेत और  संदेश गया है कि देश में पी.एम. मनमोहन सिंह केवल कठपुतली पी.एम. हैं। जबकि नेहरू गांधी परिवार उन्हें कठपुतली नही बल्कि पूर्णत: शक्ति संपन्न पी.एम. दर्शाने की बातें कहता रहा है। अब नेहरू गांधी परिवार अपने आप ही फंस गया है-उसने सिद्घ कर दिया है कि मनमोहन हमारी कठपुतली हैं और हम चुनावी लाभ के लिए अपनी कठपुतली की बलि भी ले सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में मनमोहन सिंह के लिए यही उचित होगा, कि वह स्वयं त्यागपत्र देकर अपनी बलि दे दें। अब से आगे यदि वह कुर्सी पर बैठे भी रहेंगे तो लोग उन्हें ‘आत्माविहीन’ ही मानेंगे। अपयश से बेहतर है कि अपयश की बढ़ती दर को रोकने के लिए अपयश से पल्ला झाड़ लिया जाए। इसके दो लाभ होंगे, एक तो लोगों को उनके अपयश के पराभव के निम्नतम बिन्दु का पता नही चलेगा और दूसरे कांग्रेस को चुनाव पूर्व अपना नया पी.एम. चुनने का और उसके नेतृत्व में चुनाव लड़ने का अवसर मिल जाएगा। तब जिस ठीकरा को कांग्रेस मनमोहन के सिर फोड़ना चाहती है, वह कम से कम मनमोहन सिंह के नाम तो फोड़ ही नही पाएगी। ऐसी स्थिति में मनमोहन सिंह फिर भी सम्मानजनक स्थिति में राजनीति से विदा हो जाएंगे, अन्यथा कांग्रेस में उनके लिए पी.वी. नरसिम्हाराव से भी बुरे दिन आने वाले हैं।

राहुल गांधी की आत्मा जाग रही है, और वह भी चुनाव से पहले। अच्छा होता कि यह आत्मा तब जागती-जब 2005 में आईपीओ डीमैट घोटाला (146 करोड़) हो रहा था और-

-जब 2005 में ही रूसी पनडुब्बी घोटाला (18,995 करोड़) हो रहा था।

-जब पंजाब सिटी सेंटर परियोजना घोटाला (2006) 1500 करोड़ का हो रहा था।

-जब 2006 में ही ताज कॉरिडोर घोटाला 175 करोड़ का हो रहा था।

-जब हसन अली खान घोटाला 2008 में 20,000 करोड़ का हो रहा था।

–जब 2008 में ही सत्यम् घोटाला 10,000 करोड़ का हो रहा था।

-जब 2008 में ही सेना शासन चोरी घोटाला 5,000 करोड़ का हो रहा था।

-जब 2008 में ही 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला 1,76,000 करोड़ का हो रहा था।

-जब स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र घोटाला 95 करोड़ का हो रहा था।

-जब 2008 में झारखण्ड चिकित्सा उपकरण घोटाला 130 करोड़ का हो रहा था।

-जब चावल निर्यात घोटाला (2009) में 2500 करोड़ का हो रहा था।

-जब उड़ीसा खाद्यान घोटाला (2009) में 7,000 करोड़ का हो रहा था।

-जब मधुकोड़ा घोटाला (2009) में 4,000 करोड़ का हो रहा था।

-जब राष्ट्रमंडल खेल घोटाला (2010) में 70,000 करोड़ का हो रहा था। इत्यादि।

बड़ी लंबी सूची है। इसी का योग किया जाए तो 910603234300000 रूपये इन बीते 9 वर्षों में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गये। कांग्रेस ने लूट में अंग्रेजों को पीछे छोड़ दिया। इतने धन से सारा देश ‘सुपर पावर’ बन सकता था। पर सुपर पावर बनने का अरमान देश का पूरा नही हो सका? जिन्होंने देश को ‘सुपर पावर’ बनने से रोका, क्या उनमें कांग्रेस शामिल नही है? और यदि है तो उसमें राहुल गांधी के परिवार की जिम्मेदारी कितनी है? अपराधी तो अपराधी है उसे कानून को सौंपना ही चाहिए, यही बात यह देश चाहता है। राहुल जी क्या कहेंगे? राहुल की घोषणा से पूर्व देश ‘सर्वोच्च न्यायालय’ के निर्णय को नमन कर चुका है। हमें याद रखना होगा कि 1858 में महारानी विक्टोरिया ने भी एक घोषणा की थी कि अब कंपनी का राज समाप्त हो रहा है और ब्रिटिश राज्य प्रारंभ हो रहा है। उस घोषणा के परिणाम क्या निकले? सबको पता है। घोटालेबाजों को संरक्षण देती कांग्रेस के युवा नेता की इस घोषणा का भी बस यही हश्र होगा।

राकेश कुमार आर्य

Comment:

Latest Posts

kolaybet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vdcasino
betgaranti
betpark giriş
betpark güncel giriş
vdcasino
vdcasino
jojobet güncel
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
jojobet
jojobet
favorisen giriş
hitbet giriş
betpas giriş
restbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş