अन्य कार्य करते हुए ईश्वर के उपकारों का चिंतन आवश्यक है

IMG-20200916-WA0010

ओ३म्
==========
मनुष्य को जीवन में अनेक कार्य करने होते हैं। उसे अपने निजी, पारिवारिक व सामाजिक कर्तव्यों की पूर्ति के लिये समय देना पड़ता है। धनोपार्जन भी एक गृहस्थी मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है। इन सब कार्यों को करते हुए मनुष्य को अवकाश कम ही मिलता है। अतः सभी कामों को समय विभाग के अनुसार करना चाहिये जिससे किसी अनावश्यक कार्य में हम अधिक समय न लगायें और कोई आवश्यक काम छूट न जायें। सांसारिक काम कितने भी महत्व के हों परन्तु इन सबसे महत्व का कार्य है इस संसार के रचयिता व पालक ईश्वर के सत्यस्वरूप, गुण, कर्म व स्वभाव सहित उसके उपकारों का चिन्तन एवं ध्यान तथा उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उसका धन्यवाद करना। जो मनुष्य ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं उनको बहुत भारी हानि उठानी पड़ती है। इसका अनुमान हम इस विषय का चिन्तन कर जान सकते हैं। ईश्वर का चिन्तन व ध्यान क्यों करें? इस प्रश्न पर विचार करने पर हमें ज्ञात होता है कि हमारा अतीत, वर्तमान एवं भविष्य में मनुष्य व अन्य किसी प्राणी के रूप में जो अस्तित्व होना है, वह हमें ईश्वर से ही प्राप्त हुआ व होना है।

ईश्वर ने हमें व सब प्राणियों को इस जन्म में मनुष्य व अन्यान्य योनियों में उत्पन्न किया है। इसके बदले में उसने हमसे कोई मूल्य नहीं लिया। हम किसी मनुष्य से छोटी से छोटी सेवा भी लेते हैं तो हमें उसका मूल्य देना होता है। घर में हम जिन व्यक्तियों से किसी प्रकार की सेवा लेते हैं, तो उसका उनकी सेवा के अनुरूप धन तय करके भुगतान करना होता है। कोई मनुष्य बिना किसी लाभ, हित व स्वार्थ के किसी अन्य व्यक्ति को अपनी सेवायें नहीं देता है। परमात्मा ने हमारे व हमारे समान अन्य जीवों के सुख व कल्याण के लिये इस संसार की रचना लगभग 1.96 अरब वर्ष पूर्व की है। यह संसार व ब्रह्माण्ड कितना विशाल है, नियमों के अन्तर्गत व्यवस्थित रूप से चल रहा है, इसका हम अनुमान ही कर सकते हैं। परमात्मा का यह कार्य ऐसा है जिसे संसार में उसके अलावा कोई नहीं कर सकता। यह सृष्टि परमात्मा ने हमारे सुख व उन्नति के लिए बनाई है। उसी ने इस सृष्टि व इसके अनेक प्रकार के पदार्थों को बनाकर हमें माता-पिता के द्वारा यह मानव की श्रेष्ठ देह प्रदान की है। इस देह के माध्यम से ही हम सुखों का अनुभव करते हैं। हमारे सुख के सभी पदार्थ भी परमात्मा ने बना रखे हैं। हम जब कोई अनैतिक व बुरे काम करते हैं तो उससे हमें दुःख होता है। कुछ ही समय बाद परमात्मा हमें उस दुःख से भी मुक्त करा देते हैं और हम पुनः स्वस्थ व शक्ति से युक्त हो जाते हैं। हम पुनः सुख प्राप्ति के कार्यों में लग जाते हैं। विचार करने पर ज्ञात होता है कि हमेें जो भी सुख, आनन्द वा कल्याण की प्राप्ति होती है वह सब परमात्मा द्वारा हमारे पुरुषार्थ के अनुरूप प्रदान की जाती है। ऐसे परमात्मा के, न केवल इस जन्म में अपितु इससे पूर्व के ऐसे असंख्य जन्मों में भी, हमारे ऊपर इतने उपकार है जिनकी गणना भी नहीं की जा सकती। परमात्मा के उन ऋणों व उपकारों से उऋण होने के लिए हमारे पास कोई साधन व उपाय भी नहीं हैं। अतः हमारा कर्तव्य बनता है कि हम प्रतिदिन प्रातः व सायं न्यूनतम एक घंटा स्वच्छ होकर, संसार से अपने मन को हटा कर, ईश्वर के सत्यस्वरूप व उसके उपकारों का स्मरण करें व स्तुति वचनों से उनके गान से, भक्ति व उपासना से उसका ध्यान करें। ऐसा करने से हम कृतघ्ना के पाप से मुक्त हो सकते हैं। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो हमें सबसे कृतघ्नता का बड़ा दोष लगता है जिसके परिणाम हमारे भविष्य के जीवन में दुःख, रोग, तनाव व विफलताओं के रूप में सामने आते हैं।

ईश्वर व संसार के प्रति अपने कर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये हमें वेदों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान होने से उनका अध्ययन व अध्यापन हमारा कर्तव्य व परम धर्म है। वेदों का अध्ययन करने से हमें ईश्वर व आत्मा सहित संसार का सत्यस्वरूप समझ में आ जाता है। वेदों के अध्ययन के लिये हम वेदों के हिन्दी, अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं में वैदिक विद्वानों की टीकाओं की सहायता ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त भी वेदों के आशय को जानने व अनेकानेक विषयों पर ज्ञान लाभ करने के लिये हम उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि सहित आर्य वैदिक विद्वानों के वेदविषयक ग्रन्थों का अध्ययन कर सकते हैं। रामायण तथा महाभारत प्राचीन भारतीय वैदिक इतिहास के ग्रन्थ हैं। इनके अध्ययन से भी लाभ होता है। यह हम इस साहित्य को अपने जीवन में नियमित रूप से पढ़ते हैं तो हमारा जीवन ज्ञान की दृष्टि से सफल हो सकता है। हम ईश्वर, आत्मा व संसार के बारे में इतना ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं जो अनेक मत-मतानत्रों के आचार्यों तक को नहीं होता। ज्ञान को प्राप्त होकर ज्ञान के अनुरूप ही हमारे कर्म होने चाहियें। अधिकांश स्थिति में ऐसा होता भी है। अतः हमें ज्ञान प्राप्ति पर ध्यान देना चाहिये और अपने जीवन के सभी कार्यों की प्राथमिकतायें निर्धारित कर सबको उचित समय देना चाहिये जिसमें हमें स्वाध्याय व सन्ध्या (ईश्वर का ध्यान, चिन्तन, मनन, विचार, स्तुति, प्रार्थना, उपासना व भक्ति आदि) सहित अपने शरीर को स्वस्थ रखने के सभी उपाय भी करने चाहियें। ईश्वर का ध्यान करने के लिये भी हमें सन्ध्योपासना विधि तथा ऋषि दयानन्द के अन्य ग्रन्थों में अनेक स्थानों में उपलब्ध उपासना विषयक महत्वपूर्ण वचनों से सहायता लेनी चाहिये। ऐसा करने से निश्चय ही हमारा कल्याण होगा और इसकी उपेक्षा करने से निश्चय ही हमें हानि होगी जिससे हमें बचना चाहिये।

ईश्वर का सत्यस्वरूप कैसा है, इस पर हम सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द के दिये कुछ वचनों को प्रस्तुत कर रहे हैं। वह कहते हैं कि जो सब दिव्य गुण, कर्म, स्वभाव, विद्यायुक्त और जिसमें पृथिवी सूर्यादि लोक स्थित हैं और जो आकाश के समान व्यापक सब देवों का देव परमेश्वर है, उस को जो मनुष्य न जानते, न मानते और उस का ध्यान नहीं करते, वे नास्तिक मन्दमति सदा दुःखसागर में डूबे ही रहते हैं। इसलिये सर्वदा उसी को जानकर सब मनुष्य सुखी होते हैं। ऋषि दयानन्द ने यह भी बताया है कि वेदों में अनेक ईश्वरों का नहीं अपितु केवल एक ही ईश्वर का वर्णन उपलब्ध होता है। उनकी दृण आस्था है कि संसार में केवल और केवल एक ही ईश्वर का अस्तित्व है और इसे वह युक्तियों व प्रमाणों से सिद्ध भी करते हैं। कुछ वेदमन्त्रों का अर्थ करते हुए वह कहते हैं हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है उस सब में व्याप्त होकर जो नियन्ता है वह ईश्वर कहाता है। उस से डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरण-रूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग। वह कहते हैं कि ईश्वर सब को उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! मैं ईश्वर सब के पूर्व विद्यमान सब जगत् का स्वामी हूं। मैं सनातन जगत्कारण और सब धनों का विजय करनेहारा और दाता हूं। मुझ ही को सब जीव जैसे पिता को सन्तान पुकारते हैं, वैसे पुकारें। मैं सबको सुख देने वाले जगत् के लिए नाना प्रकार के भोजनों वा खाद्य पदार्थों का विभाग पालन के लिये करता हूं। एक वेदमन्त्र का अर्थ करते हुए वह बताते हैं कि परमेश्वर कहता है कि मैं परमेश्वर परमैश्वय्र्यवान् हूं, सूर्य के सदृश सब जगत का प्रकाशक हूं। कभी पराजय को प्रापत नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूं। मैं ही जगत रूप धन का निर्माता हूं। सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले मुझ ही को जानो। हे जीवों! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगों और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होवो। ऋषि के इन वचनों से ईश्वर के सत्यस्वरूप, उसके गुण, कर्म व स्वभाव तथा उसकी भक्ति आदि पर प्रकाश पड़ता है।

ईश्वर की सगुण व निर्गुण स्तुति पर प्रकाश डालते हुए ऋषि दयानन्द बताते हैं कि वह परमात्मा सब पदार्थों व जगत् में व्यापक, शीघ्रकारी और अनन्त बलवान् है। वह शुद्ध, सर्वज्ञ, सब का अन्तर्यामी, सर्वोपरि, विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा कराता है। यह सगुण स्तुति कहलाती है अर्थात् जिस-जिस गुण से सहित परमेश्वर की स्तुति करते है वह सगुण स्तुति होती है। उसी एक परमात्मा की निर्गुण स्तुति का उल्लेख कर वह बताते हैं कि ईश्वर कभी शरीर धारण व जन्म नहीं लेता, जिस में छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिसमें क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि जिस-जिस राग, द्वेषादि गुणों से पृथक मानकर परमेश्वर की स्तुति करना है वह निर्गुण स्तुति है। इस दोनों प्रकार की स्तुति का फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण, कर्म व स्वभाव उपासक को अपने भी करना। जैसे वह न्यायकारी है तो हम भी न्यायकारी होवें। और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुण कीर्तन करता जाता है और अपने चरित्र को नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है। इसी प्रकार से प्रार्थना करने से मनुष्य में निरभिमानता आती है। वह विनम्र होता है एवं दूसरों की सहायता करने की प्रेरणा ग्रहण करता है। उपासना से मनुष्य के दुःख, दुर्गुण व दुव्र्यस्न दूर होते हैं और कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव व पदार्थों की प्राप्ति होती है। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का स्वरूप सहित इसके अनेकानेक लाभ को जानने के लिये सत्यार्थप्रकाश का सातवां समुल्लास अवश्य पढ़ना चाहिये।

हमने ईश्वर के प्रति मनुष्य के कर्तव्यों पर प्रकाश डाला है। हम आशा करते हैं कि पाठक ऋषिकृत ग्रन्थों का अध्ययन कर इस विषय को विस्तार से जानने व समझने का प्रयत्न करेंगे और अपने जीवन को सुखी व कल्याण से युक्त करेंगे। ऐसा करने से सबको धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का ज्ञान व लाभ प्राप्त करने के अवसर मिलेंगे व उनकी उन्नति होगी। हम ईश्वर से सबके कल्याण की कामना करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
xslot
xslot
hititbet
kralbet
kralbet
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
Hititbet Giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
bettilt giriş