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इतिहास के पन्नों से

हरियाणा का स्वतंत्रता संग्राम , भाग – 1

लेखक- स्वामी ओमानन्द सरस्वती (आचार्य भगवान् देव)
प्रस्तोता- अमित सिवाहा

दिल्ली के चारों ओर डेढ़ सौ – डेढ़ सौ मील की दूरी तक का प्रदेश हरयाणा प्रान्त कहलाता है । सारे प्रान्त में जाट, अहीर, गूजर, राजपूत आदि योद्धा (जुझारू) जातियां बसती हैं । इसीलिये हरयाणा ने इस युद्ध में सब प्रान्तों से बढ़-चढ़कर भाग लिया था । इसी प्रान्त के एक भाग मेरठ में यह क्रान्ति की चिन्गारी सब से पहले सुलगी और शनैः-शनैः सारे भारत में फैल गई । इस स्वतन्त्रता के युद्ध के शान्त होने पर हरयाणा प्रान्त की जनता पर जो भीषण अत्याचार अंग्रेजों ने किए उनको स्मरण करने से वज्रहृदय भी मोम हो जाता है । कोटपुतली जयपुर राज्य के ठिकाने खेवड़ी के राजा को दे दिया । इसी के फलस्वरूप अंग्रेजों ने इस प्रान्त को अनेक भागों में विभाजित करके इस वीर प्रान्त की संगठन शक्ति को चूर-चूर कर दिया । मेरठ, आगरा, सहारनपुर आदि इसके भाग उत्तर-प्रदेश में मिला दिये । भरतपुर, अलवर आदि राजस्थान में मिला दिये । कुछ भाग को दिल्ली प्रान्त का नाम देकर के पृथक कर दिया । नारनौल को पटियाला राज्य, बावल को नाभा और दादरी-नरवाना को जीन्द स्टेट, जो फुलकिया राज्य कहलाते हैं, उन में मिला दिया जो झज्जर प्रान्त के भाग थे । शेष गुड़गावां, रोहतक, हिसार, करनाल आदि को पंजाब में मिला दिया । इस प्रकार हरयाणा की वीर-भूमि को खण्डशः करके नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ।

हरयाणा के एक एक ग्राम ने बड़ी वीरता से अंग्रेज के साथ युद्ध किया है, आज उन सब का इतिहास नहीं मिलता । आज तक सन् 57 के क्रान्तियुद्ध में भाग लेने वाले अनेक ग्रामों के वीर भूमिहीन कृषक के रूप में अपने कष्टपूर्ण दिन काट रहे हैं । जैसे लिबासपुर, कुण्डली, भालगढ़, खामपुर, अलीपुर, हमीदपुर, सराय इत्यादि जी. टी. रोड, जो दिल्ली से लाहौर की ओर जाता है, उस पर बसते हैं । कुछ ग्रामों के विषय में संक्षेप से लिखता हूं ।

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लिबासपुर का बलिदान
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जी० टी० रोड में से एक टुकड़ा सड़क का सोनीपत को जाता है, उसी स्थान पर यह गाँव बसा हुआ है । उस समय से अब तक इसमें जाटकुल क्षत्रिय बसते हैं । क्रांतियुद्ध के समय उदमी राम नाम का एक वीर युवक इसी ग्राम का निवासी था, जो अंग्रेज सैनिक दिल्ली से भागकर इधर से जते थे, यह उनके साथ युद्ध करता था । इसने अपने 22 वीर योद्धाओं का एक संगठन बना रखा था, जो अत्यन्त वीर, स्वस्थ, सुन्दर, सुदृढ़ शरीर वाले युवक थे । अतः उस सड़क पर से गुजरने वाले अंग्रेज सैनिकों को चुन-चुन कर मारते थे और सब को समाप्त कर देते थे । एक दिन एक अंग्रेज अपने धर्मपत्नी सहित ऊंटकराची में जी० टी० रोड पर देहली से पानीपत को जा रहा था । जब वह लिबासपुर के निकट आया तो इन वीरों ने उसे पकड़ लिया और अंग्रेज को तो उसी समय मार दिया, किन्तु भारतीय सभ्यता के अनुसार उस अंग्रेज औरत को नहीं मारा । ग्राम के कुछ दुष्ट प्रकृति के लोगों ने उस अंग्रेज स्त्री को गांव के चारों ओर मई की धूप में चक्कर लगवाया और खलिहान (पैर) में बैलों का गांहटा भी हंकवाया । इस प्रकार की घटनाओं को कुछ इतिहास लेखक झूठी और अंग्रेजों की घड़ी हुई बतलाते हैं । हरयाणा के ही नहीं, बल्कि सभी भारतीयों ने अंग्रेजी देवियों और बच्चों पर कहीं अत्याचार नहीं किए । सायंकाल भालगढ़ में रहने वाली बाई जी (ब्राह्मणी) को उस अंग्रेज स्त्री की देखभाल के लिए सौंप दिया । उसे समुचित भोजन वस्त्रादि देकर सेवा की । इस घटना के समाचार आस पास के सभी ग्रामों में फैल गये । कितने ही बाहर के ग्रामों के लोग समाचार जानने के लिए लिबासपुर आये । इनमें राठधना निवासी सीताराम भी था । उसने ग्राम में आकर सब वृत्त को जानने का विशेष यत्न किया और भालगढ़ ग्राम में बाई जी के पास, जहां वह अंग्रेज स्त्री ठहरी थी, उसके पास भी पहुंच गया । उस अंग्रेज स्त्री को इन्होंने बता दिया कि लिबासपुर के उदमीराम, गुलाब, जसराम, रामजस, रतिया आदि ने बहुत से अंग्रेजों को मृत्यु के घाट उतारा है और तुझे भी मारने का षड्यंत्र कर रहे हैं । सीताराम और बाई जी ने उस अंग्रेज महिला के साथ गुप्त मन्त्रणा की । उस अंग्रेज देवी ने इन्हें अनेक प्रकार के वचन दिये और प्रलोभन दिया कि यदि आप मुझे रातों रात पानीपत के सुरक्षित स्थान पर जहां अंग्रेजों का कैंप है, पहुंचा दो तो बहुत सारी सम्पत्ति मैं दोनों को दिलवाऊंगी । उन दोनों ने सवारी का प्रबन्ध करके उसे पानीपत में अंग्रेजों के कैम्प में पहुंचा दिया । युद्ध शान्त होने पर क्रांतियुद्ध के समय की कई रिपोर्टों के आधार पर अंग्रेजों ने लोगों को दण्ड और पारितोषिक देना आरम्भ किया और अपने निश्चित कार्यक्रम के अनुसार एक दिन अंग्रेज सेना ने प्रातःकाल चार बजे लिबासपुर ग्राम को चारों ओर से घेर लिया । उदमी, जसराम, रामजस, सहजराम, रतिया आदि वीर योद्धाओं ने अपने साधारण शस्त्र जेली, तलवार, गण्डासे, लाठियां और बल्लम संभाले, किन्तु ये गिने चुने वीर साधारण शस्त्रों के एक बहुत बड़ी अंग्रेज सेना के साथ जो आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित थी, कब तक युद्ध कर सकते थे ? बहुत से मारे गए और शेष सब गिरफ्तार कर लिए गए । गिरफ्तार हुए व्यक्तियों की पहचान के लिए देश-द्रोही बाई जी और सीताराम को बुलाया गया । उन्होंने जिन जिन व्यक्तियों को बताया कि इन्होंने अंग्रेज मारे हैं, गिरफ्तार कर लिए गए । सारे ग्राम को बुरी प्रकार से लूटा गया । तीस पैंतीस बैलगाड़ियां गांव के तमाम धन-धान्य, मूल्यवान सामान से भर कर देहली भेज दीं गईं । ग्राम की सब स्त्रियों के आभूषण बलपूर्वक छीन लिए गए । किसी व्यक्ति के पास कुछ भी न रहने दिया । शेष गांव के निवासी मृत्यु के भय से गांव छोड़कर भाग गये और जीन्द राज्य के रामकली ग्राम, झज्जर तहसील के खेड़का ग्राम में और सोनीपत तहसील के कल्याणा और रत्नगढ़ ग्राम में जाकर बस गये । ये लोग इन ग्रामों में तीन वर्ष तक बसे रहे । जब तीन वर्ष के पश्चात् पूर्ण शान्ति हो गई, लौटकर अपने ग्राम में आये । ग्राम तीन वर्ष तक सर्वथा उजड़ा हुआ (निर्जन) पड़ा रहा । शान्ति होने पर सीताराम ने अपने सम्बन्धियों को मुरथल से तथा अन्य स्थानों से लाकर उस में बसा दिया और लिबासपुर का निवासी लिखवा दिया । उसने इस प्रकार की धूर्तता की । सीताराम ने इस ग्राम के कागजात में अपना नाम लिखवा दिया और लिबासपुर ग्राम को खरीदा हुआ बताया और कागजी कार्यवाही पूरी कर दी । तभी से लिबासपुर ग्राम सीताराम के बेटे पोतों की अध्यक्षता में है और कागजात में भी इसी प्रकार लिखा हुआ है ।

ग्राम के यथार्थ निवासी भूमिहीन (मजारे) के रूप में चले आ रहे हैं । गांव का कोई भी व्यक्ति एक बीघे जमीन का भी (बिश्वेदार) स्वामी नहीं है । ग्रामवासियों ने जो कष्ट सहन किये उनका लिखना सामर्थ्य से बाहर है । इन कष्टों को तो वे ही जानते हैं जिन्होंने उन्हें सहर्ष सहन किया है । जिन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था उन्हें राई के सरकारी पड़ाव में ले जाकर सड़क पर लिटाकर भारी पत्थर के कोल्हूओं के नीचे डालकर पीस दिया गया । उन कोल्हुओं में से एक कोल्हू का पत्थर अब भी 23वें मील के दूसरे फर्लांग पर पड़ा हुआ है ।

वीर योद्धा उदमीराम को पड़ाव के पीपल के वृक्ष पर बांधकर हाथों में लोहे की कीलें गाड़ दीं गईं, उनको भूखा-प्यासा रक्खा गया । पीने को जल मांगा तो जबरदस्ती उसके मुख में पेशाब डाला गया । अंग्रेजों का सख्त पहरा लगा दिया गया । भारत मां का यह सच्चा सपूत 35 दिन तक इसी प्रकार बंधा हुआ तड़फता रहा । इस वीर ने अपने प्राणों की आहुति देकर सदा के लिए हरयाणा प्रान्त और अपने गांव का नाम अमर कर दिया । उसके शव को भी अंग्रेजों ने कहीं छिपा दिया ।

यह लेख लिखने में श्री बलवीरप्रसाद चतुर्वेदी मुख्याध्यापक “संस्कृत हाई स्कूल लिबासपुर” बहालगढ़ से मुझे पूरी सहायता मिली । यह सामग्री एक प्रकार से आप ने ही इकट्ठी करके दी है । इसके लिए मैं आपका आभारी हूं । जब मैं आपके पास पहुंचा तो आपने तुरन्त स्कूल के सब कार्य छोड़कर मुझे यह लेख लिखने के लिए सामग्री लाकर दी और श्री भगवानसिंह आर्य भी लिबासपुर बुलाने से तुरन्त उसी समय आ गये । यह स्कूल पं. मनसाराम जी आर्य जाखौली निवासी ने खोला हुआ है जहाँ बैठकर मैंने यह सामग्री एकत्रित की । आपका सारा जीवन आर्यसमाज के प्रचार में बीता है।

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मुरथल का बलिदान
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मुरथल ग्रामवासियों ने भी इसी प्रकार अत्याचारी अंग्रेजों के मारने में वीरता दिखाई थी । अंग्रेज शान्ति होने पर मुरथल ग्राम को भी इसी प्रकार का दण्ड देना चाहते थे । किन्तु नवलसिंह नम्बरदार मुरथल निवासी अंग्रेज सेना को मार्ग में मिल गया । अंग्रेज सेना ने उससे पूछा कि मुरथल ग्राम कहाँ है? तो नम्बरदार ने बताया कि आप उस गांव को तो बहुत पीछे छोड़ आये हैं । उस समय अंग्रेज सेना ने पीछे लौटना उचित न समझा और यह बात नम्बरदार की चतुराई से सदा के लिए टल गई । देशद्रोही सीताराम को इनाम के रूप में लिबासपुर ग्राम सदा के लिए दे दिया और उस बाई जी (ब्राह्मणी) को बहालगढ़ गांव दे दिया । आज भी इन दोनों ग्रामों के निवासी भूमिहीन (मजारे) कृषक के रूप में अपने दिन कष्ट से बिता रहे हैं । देश को स्वतन्त्र हुए 38 वर्ष हो गए किन्तु इनको कोई भी सुविधा हमारी सरकार ने नहीं दी । इनके पितरों (बुजुर्गों) ने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने सर्वस्व का बलिदान दिया । किन्तु किसी प्रकार का पारितोषिक तो इनको देना दूर रहा, इनकी भूमि भी आज तक इनको नहीं लौटाई गई । सन् 1957 में स्वतन्त्रता के प्रथम युद्ध की शताब्दी मनाई गई, किन्तु देशभक्त ग्रामों को पारितोषिक व प्रोत्साहन तो देना दूर रहा, किसी राज्य के बड़े अधिकारी ने धैर्य व सान्त्वना भी नहीं दी । मेरे जैसे भिक्षु के पास देने को क्या रखा है, यह दो चार पंक्तियां इन देशभक्तों के लिए श्रद्धांजलि के रूप में इस बलिदानांक में लिख दी हैं । इस प्रकार के सभी देशभक्त ग्रामों के लिए यही श्रद्धा के पुष्प भेंट हैं ।

[पुस्तक सन्दर्भ- हरयाणा के वीर योद्धेय]

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