रबर स्टैम्प नहीं राष्ट्रपति जी

download (9)लालकृष्ण आडवाणी
बीते बुधवार को मंत्रिमंडल द्वारा दागी सांसदों एवं विधायकों से सम्बन्धित अध्यादेश तथा साथ ही इस संदर्भ में संसद में लम्बित विधेयक वापस लेने से यूपीए सरकार के भौण्डे इतिहास का एक और भद्दा अध्याय समाप्त हो गया है। इस घटनाक्रम पर अधिकार मीडिया रिपोर्टों द्वारा इसे राहुल गांधी की विजय बताया जाना-इन दिनों मीडिया द्वारा सामान्य तौर पर की जा रही सतही रिपोर्टिंग पर एक टिप्पणी है। वास्तव में, अमेरिका में राष्ट्रपति ओबामा तथा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिलने के बाद रवाना होते समय प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा कि वह वापस लौटने के बाद अध्यादेश के बारे में पार्टी के उपाध्यक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों के बारे में अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों से बात करेंगे, इस पर मैंने अपने एक मित्र से कहाकि साढ़े तीन मिनट के अपने भाषण में राहुल गांधी ने जो कुछ कहा है वह कुल मिलाकर यह है कि विधेयक ‘एकदम बकवास’ है और यह फाड़कर फेंकने लायक है।’ इस क्रुध्द टिप्पणी में ऐसा क्या था जिसे प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल से सलाह-मशिवरा करते?
आखिरकार राहुल गांधी ने एक भी तर्क नहीं दिया कि वह क्यों मानते हैं कि अध्यादेश गलत है। इसकी तुलना में, जब 26 सितम्बर की शाम को दोनों सदनों में हमारे नेताओं श्रीमती सुषमा स्वराज और श्री अरुण जेटली और मैं जब राष्ट्रपति भवन गए और राष्ट्रपति को चार पृष्ठों का ज्ञापन सौंपा तब हमारे ज्ञापन में उल्लेख किया गया था कि क्यों हम इस अध्यादेश को न केवल असंवैधानिक और गैर-कानूनी मानते हैं अपितु अनैतिक भी, साथ ही प्रक्रियागत रुप से भी गलत क्योंकि यह अध्यादेश जिस विधेयक का स्थान लेने वाला था उसे पहले ही राज्यसभा की स्थायी समिति को भेजा जा चुका था। मुझे स्मरण आता है कि 24 सितम्बर मंगलवार को मंत्रिमंडल ने अध्यादेश को स्वीकृत दी जिसमें दागी सांसदों और विधायकों सम्बन्धी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को निष्प्रभावी बनाना था। विपक्ष की और से पहली प्रतिक्रिया सुषमाजी का ट्वीट था कि भाजपा इस अध्यादेश का विरोध करेगी। उसके कुछ ही समय बाद उन्होंने मुझसे परामर्श किया और हमने राष्ट्रपति से मिलकर यह अनुरोध करने का निर्णय लिया कि वे इस पर हस्ताक्षर न करें। जब उन्होंने राष्ट्रपति भवन से समय लेने हेतु सम्पर्क किया तो उन्हें ज्ञात हुआ कि राष्ट्रपति पुडुच्चेरी गए हुए हैं और 26 सितम्बर को शाम 4 बजे ही लौटेंगे। उसी दिन हम उनसे शाम 5.30 बजे मिले और उनके साथ लगभग 45 मिनट थे। हमारी मुलाकात की समाप्ति पर हमें यह साफ लगा कि वह इससे सहमत थें कि इस स्थिति में उनका हस्तक्षेप जरुरी है। उसके थोड़ी देर बाद जब टी.वी. चैनलों ने दिखाना शुरु किया कि उन्होंने शिंदे और सिब्बल तथा बाद में कमलनाथ को बुलाया है, तो यह और साफ हो गया कि घटनाक्रम इस दिशा में बढ़ना शुरु हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन मंत्रियों को बता दिया गया है कि राष्ट्रपति को इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने पर ऐतराज है। इससे अवश्य ही मंत्रियों के कान खड़े हुए होंगे। राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश को बगैर हस्ताक्षर के वापस लौटाना सरकार के लिए बड़ा धक्का होता। तब शायद सोनियाजी ने सोचा होगा कि इस उद्देश्य से राहुल का उपयोग कर नुक्सान की कुछ भरपाई की जाए।
हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि किसी ने भी उन्हें परामर्श नहीं दिया कि इस काम को कैसे अंजाम दिया जाए। यदि राहुल ने साधारणतथा यह कहा होता कि सरकार द्वारा लिये गए निर्णय पर पुनर्विचार की जरुरत है, तो उनका उद्देश्य पूरी तरह से हासिल हो गया होता। इसके बजाय जो उन्होंने कहा उसके चलते दि इण्डियन एक्सप्रेस (3 अक्टूबर, 2013) ने ‘लूसिंग फेस’ शीर्षक से एक व्यगांत्मक सम्पादकीय प्रकाशित किया। इसका उप शीर्षक है वह भले ही विजयी हुए होंगे लेकिन राहुल गांधी ने यू.पी.ए. की शक्ति को और मिटा दिया है। राहुल की जीत वास्तव में न केवल प्रधानमंत्री की अपितु यू.पी.ए. के अधिकारों को मिटाने की है। पहले दिन से ही यूपीए का अर्थ सदैव डा. मनमोहन सिंह श्रीमती सोनिया गांधी हैं। अत: मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत अध्यादेश को ‘बकवास’ कहना न केवल प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों पर लागू होता है। सोनियाजी को भी इसमें भागीदारी लेनी होगी। स्वदेश वापसी में प्रधानमंत्री के विशेष विमान में डा. मनमोहन सिंह ने बरखा दत्त (एनडीटीवी) से बात करते हुए जोर दिया कि अध्यादेश को हरी झण्डी 21 सितम्बर को हुई बैठक में दी गई जिसमें पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित वरिष्ठ कांग्रेस नेता मौजूद थे। अत: इस गैर कानूनी और अनैतिक अध्यादेश की वापसी से जो देश को विजय मिली है उसके लिए सिर्फ राष्ट्रपतिजी धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि यूपीए यह समझता है कि राष्ट्रपति के उच्च पद पर बैठने वाले अधिकांश अन्य कांग्रेसजनों की भांति वह भी एक ‘रबड़ स्टैम्प राष्ट्रपति’ सिध्द होंगे, तो यह अत्यंत गंभीर भूल होगी!
(विस्फोट से साभार)

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