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आज का चिंतन

आज का चिंतन(31/10/2013)

downloadबीच राह आएंगे, भौंकते भी रहेंगे

आखिर कुत्ते जो ठहरे

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

श्वानों को लेकर किसी को मन खट्टा नहीं करना चाहिए। इनका तो स्वभाव ही है भौंकना, भौंकते ही रहना, गुर्राना और बीच रास्ते सुस्ताना या उछलकूद करते हुए भागदौड़ करना। कुछ वर्षों पहले तक श्वानों की गिनी-चुनी प्रजातियां हुआ करती थी इसलिए इस बारे में कोई ज्यादा चिंतन नहीं करता था।

जब से उदारीकरण और वैश्वीकरण का महा व्यापक दौर शुरू हुआ है कुत्तों की नई-नई नस्लों से हम लोग रूबरू हो रहे हैं। इससे यह भी साफ हो गया है कि हमारे यहां ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में कुत्तों का विशाल कुनबा फैला हुआ है। इनकी नस्लों के नाम भी देशी-विदेशी विचित्र नामों से भरे हैं। यथा नाम-तथा गुण के अनुसार इनके काम-धाम, हरकतें और मायावी करतब भी ऎसे ही हैं।

पहले कहा जाता था कि कुत्ते चोर-डकैतों को पहचान लेते हैं और उन्हें ही देखकर भूँकते हैं मगर अब ऎसा नहीं रहा। अब अपनी सुरक्षा से लेकर संबल और सहयोग तक के सारे काम कुत्तों के जिम्मे हैं। जो अपना है उसे पुचकारते हैं, जो पराया है, या हो जाता है उसकी ओर आँख उठाते हैं, भौंकते-गुर्राते भी हैं और मौका पा जाने पर झपट भी लेते हैं, काट भी खाते हैं।

अब कुत्तों को इतनी स्वच्छन्दता प्राप्त हो गई है कि वे अपने हक में चाहे जो कर सकते हैं। उनके लिए कुछ भी वज्र्य नहीं है। कुत्तों की सर्वव्यापकता और अपनी-अपनी गलियों में शेर होने का जुमला भी उतना ही सच है जितना हम अपने समाज और देश के बारे में सोचते हैं और सोच-सोच कर दुःखी होते हैं।

हम सब घिरे हुए हैं, सभी जगह विभिन्न प्रजातियों के कुत्तों का बाहुल्य है। अलग-अलग रंगों, अदाओं भरे कुत्तों का मायाजाल सभी क्षेत्रों में इस कदर पसरा हुआ है कि हमें लगता है कि अब गायों और दूसरे जानवरों की बजाय चारों तरफ कुत्ते ही कुत्ते नज़र आएंगे।

आम आदमी की जिन्दगी में कुत्तों का इतना अहम और व्यापक वजूद कभी नहीं रहा जो पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है। किसी जमाने में महावत और बाबाओं की जमात अपने-अपने हाथियों को लेकर इधर-उधर दिखाई देती थी आज हाथी तो गायब हो गए, उनकी जगह ले ली है कुत्तों ने।

आदमी उठते ही सारे काम-धाम छोड़कर कुत्तों को भ्रमण पर ले जाता है। बाहर जाकर जाने क्या-क्या करवाता है और फिर श्वान देवता की आराधरा का प्रथम चरण पूरा कर घर लौटता है।  आदमी की जिन्दगी में जब से कुत्तों की अहमियत बढ़ गई है तभी से कुत्तों ने भी अपनी मूँछों पर ताव देकर आदमी को अपने आगे-पीछे घुमाने को मजबूर कर दिया है।

कुत्तों से आदमी का पाला सभी जगह पड़ता है। घर में, रास्तों में और दूसरी सभी जगहों पर। कुत्तों के साथ रह-रहकर कई इंसान भी आजकल उन जैसे हो गए हैं। बात-बात में बाधाएं बनकर सरे राह आड़े आते रहते  हैं, बिना सोचे-समझे अविराम भौंकने लगते हैं, जहाँ जो कुछ मिल जाए उसे अपना लेते हैं, जमाने भर का माल खा जाने लगते हैं, कीचड़ उछालते हैं, गुर्रा-गुर्रा कर अपनी बात मनवाने का जतन करते हैं और आदमी बेचारा विवश होकर उन सारे कु(कर्मों) को करने को विवश हो गया है जो उसके बाप-दादाओं ने कभी नहीं किए।

कोई राह नहीं बची है जहाँ कुत्तों का आवागमन और पैनी निगाह हम पर नहीं हो। कुत्तों को सिर्फ अपनी रोटी और हड्डी की पड़ी होती है। कौन कितना अच्छा है, किस का काम बढ़िया है, कौन देश और समाज के लिए वरदान या  उपयोगी  है, इससे कुत्तों को कोई सरोकार नहीं।

कुत्तों की बढ़ती व्यापकता के दौर में जो लोग अच्छा काम करते हैं वे पूरी तल्लीनता से अपने कामों में लगे रहते हैं, क्योंकि उन्हें कुत्तों की सभी प्रजातियों की सोशल इंजीनियिंरंग का भान है। इन्हें साफ पता होता है कि कुत्ते आजकल  ‘स्टेटस सिंबोल’ हो चले हैं। जिसके घर-आँगन और आस-पास जितनी उम्दा नस्ल के हुनरनमंद कुत्ते, वो ही दिखता है जमाने का सिकंदर।

इंसान की पूरी जिन्दगी में कई उतार-चढ़ाव और स्पीड़ ब्रेकर आते हैं। खूब सारे अवरोधकों से भरा पड़ा है समाज और देश। ये हर काम में टाँग भी अड़ाते हैं, टाँग ऊँची करने की मुद्रा का प्रदर्शन भी करते हैं, बीच रास्ते अड़ भी जाते हैं, भौंकते और गुर्राते भी हैं, क्योंकि आखिर ये हैं तो कुत्ते ही।

दुर्भाग्य कहें या आश्चर्य कि इन सभी नस्लों के कुत्तों को यह भ्रम मरते दम तक बना रहता है कि वे ही हैं जो समाज और देश का भविष्य हैं और मरने पर वैसे ही स्वर्ग जाएंगे जैसे कि महाराज युधिष्ठिर के साथ उनका कोई पूर्वज। और कुत्तों को संगी-साथी बनाकर चलने वाले लोग भी अपने आपको युधिष्ठिर से कम कहाँ समझते है। उन सभी को लगता है कि वे जो कहें वही धर्म है, वही सत्य है।

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