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आज का चिंतन

आज का चिंतन ( 20/12/2013)


राज्याश्रय के उत्सुक न रहें,

लोकमान्य बनने का प्रयास करें

download– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

दुनिया में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति अपने आपको कुछ बनाने, समाज में प्रतिष्ठित होने और नाम कमाने के लिए कुछ न कुछ ऎसा करना चाहता है जो अपने आप में अन्यतम हो, औरों से एकदम अलग दिखे, आकर्षण जगाने वाला हो और जन-मन एवं परिवेश को महकाने वाला हो। इस लक्ष्य को लेकर इंसान कितने ही घुमावदार रास्तों, घाटियों और गलियारों से होकर राजमार्गों की ओर आने के लिए आतुर रहता है।

कुछ लोग अच्छे कामों से नाम कमाना चाहते हैं और कुछ लोग ऎसे कर्मों से जो निंदित कहे गए हैं किन्तु इनकी लोकेषणा के आगे निंदा कोई मायने नहीं रखती। आदमी को जिंदा रहने के लिए आजीविका की जरूरत होती है। कुछ के लिए उनकी मौलिक अभिरुचियां और संकल्प ही आजीविका का माध्यम बन जाते हैं और इनके जीवन के आनंद को बहुगुिणत कर देते हैं।

काफी सारे लोग ऎसे हैं जिनकी मौलिक रुचि और लक्ष्य दूसरे होते हैं लेकिन जीवननिर्वाह के लिए उन्हें ऎसे कामों में लगना पड़ता है जिनमें उनकी दिली रुचि नहीं हुआ करती। ऎसे में ये लोग जैसे-तैसे आजीविका चलाते रहते हैं। इनमें दो किस्मों के लोग होते हैं। एक वे हैं जो मनमाफिक नौकरी या काम-धंधा नहीं मिल पाने का मलाल ताजिन्दगी रखते हैं और अपनी मौलिकता या उच्चाकांक्षाओं से जुड़ी गतिविधियों में टाँग फँसाये रखते हैं लेकिन अपने कत्र्तव्य कर्म के प्रति लापरवाह या उदासीन रहते हैं।

कई लोग अपने फर्ज को अच्छी तरह निभाते हैं तथा मनोनुकूल आजीविका नहीं होने का रोना कभी नहीं रोते बल्कि अपने काम-धंधों और नौकरी को अच्छी तरह पूर्ण कर लेने के बाद बचे हुए समय में अपनी मौलिक प्रतिभाओं और रुचि के विषयों के प्रति एकाग्र होते हुए कुछ न कुछ करते रहते हैं। इन लोगों को कभी मलाल नहीं होता कि उनकी आजीविका चाहे अनुरूप नहीं है। ये लोग अपने इतर रचनात्मक कर्म में इतने डूबे हुए होते हैं कि इन्हें अपने ही आनंद में रमे रहने की आदत पड़ जाती है।

महत्त्वाकांक्षाओं, उच्चाकांक्षाओं की पूर्ति से लेकर चाहे-अनचाहे मार्गों से अपने लक्ष्यों में कामयाबी पाने की हड़बड़ाहट में आजकल हर कोई उन्मुक्त और स्वच्छन्द हो चला है। न उसे मर्यादाओं का भान है, न अपने से बड़ों और वरिष्ठों के मान-सम्मान का। इस अंधी और एक दूसरे को पछाड़कर आगे निकल जाने वाली दौड़ में अधिकांश लोगों की मानसिकता किसी न किसी प्रकार मुख्य धारा में आकर सम्मान, अभिनंदन और पुरस्कार पाने की होती है।

खासकर उन लोगों में यह आदत बेशुमार होती है जो किसी न किसी सृजनधर्म में रमे होते हैं। कम समय से ज्यादा पद-कद और मद पा लेने के इच्छुक लोगों को लगता है कि उनके सृजन धर्म में शुचिता और धीर-गंभीरता की बजाय राज्याश्रय प्राप्त करने से उनकी राह और अधिक आसान हो जाएगी।

आजकल सृजनधर्मियों का स्पष्ट ध्रुवीकरण हो चला है। एक वे हैं जो राज्याश्रय पाने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे हैं, इसे किसी को बताने की जरूरत नहीं है। दूसरे वे हैं जो लोक में अपने सृजनधर्म को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए जी भर कर संघर्ष कर रहे हैं। तीसरी किस्म उनकी है जो अपने सृजन धर्म और अपने आपको ‘स्वान्तः सुखाय….’ मान बैठे हैं। इनसे न समाज को कोई अपेक्षा करनी चाहिए, न देश को।

राज्याश्रयी मार्गों पर बढ़ने वाले लोग पुरस्कारों, सम्मानों और अकादमियों की कृपा के आकांक्षी हो चले हैं और अपने आपको प्रतिष्ठित करने के लिए इन्होंने सृजन धर्म को गुणात्मकता एवं पैनापन दिए जाने की बजाय जाने कैसे-कैसे समझौतों में अपने आपको लगा दिया है जहाँ न स्वाभिमान शेष बचा है, न अपने आपके इंसान होने का गौरव। अब तो ऎसे लोगों के कई सारे गिरोह जहाँ-तहाँ नज़र आने लगे हैं जो अहो रूपं अहो ध्वनि की परंपरा के संवाहक बने हुए हैं।

जो लोग राज्याश्रयी हैं उनका सृजनधर्म कालान्तर में स्थूल, सौंदर्यहीन और गंधहीन होने लगता है और इसकी निश्चित अवधि होती है उसके बाद इन सृजनधर्मियों का दम निकल जाता है। जबकि लोकाश्रयी सृजनधर्मी लोकमान्य होने लगते हैं और उनका यश निरन्तर बढ़ता ही रहता है।  इन लोकामान्य सृजनधर्मियों का सृजन ही कालजयी हो पाता है।

राज्याश्रयी लोगों का रचनाकर्म थोड़े समय उबाल लाकर फिर हमेशा के लिए ठण्डा पड़ जाता है, अपनी गरिमा खो देता है और ऎसे सृजनधर्मियों को आदर-सम्मान से याद करने की बजाय लोग इनकी आलोचना करने लगते हैं। राज्याश्रयी लोग पानी के बुलबुलों की तरह एक समय बाद अपना अस्तित्व खो देते हैं क्योंकि उनके लिए सृजन गौण हो जाता है और पुरस्कार, सम्मान, अभिनंदन आदि यश-कीर्ति भरी माया का मोह सबसे ऊपर। यही कारण है कि लोकमान्य सृजनधर्मी युगों तक याद किए जाते हैं और उन्हीं का साहित्य कालजयी होकर पीढ़ियों तक जुबान पर चढ़ा रहता है।

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