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भारतीय संस्कृति

योगवासिष्ठ : एक विलक्षण दार्शनिक ग्रन्थ

ममता त्रिपाठी
योगवासिष्ठ का भारतीय दर्शन में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । एक ओर जहाँ इस ग्रन्थ में उच्च दार्शनिक विमर्श के दर्शन होते हैं, वहीं दूसरी ओर यह साहित्यिक मञ्जुलता को समाहित करता हुआ चलता है । आख्यान, कथा, कहानियों जैसे सर्वजनग्राह्य माध्यम का सहारा लेकर बहुत ही ललित शैली में दर्शन के गूढ़तम सिद्धान्तों का कथन इस ग्रन्थ में किया गया है । अपनी समग्रता में पूरा ग्रन्थ एक बृहद् आख्यान है जो अपने अन्दर अनेक दीर्घ-लघु आख्यानों-उपाख्यानों की शृंखला को समाहित किये है । सामान्यत: दार्शनिक ग्रन्थों की भाषा-शैली एवम् उनका प्रस्तुतीकरण बहुत जटिल एवं दुरूह भाषा में होता है, परन्तु योगवाशिष्ठ में इस दार्शनिक-ग्रन्थ-प्रणयन की शैली से इतर ललित, कोमल, सुग्राह्य साहित्यिक शैली का समावेश कर दार्शनिक विषयों का प्रतिपादन किया गया है । ज्ञान का आगार होते हुये भी योगवासिष्ठ बहुत दिनों तक आधुनिक विद्वानों एवं दार्शनिकों द्वारा उपेक्षित रहा । डॉ. भीखन लाल आत्रेय, जिन्होंने योगवाशिष्ठ-अध्ययन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है एवम् योगवासिष्ठ-दर्शन-प्रकाशन में भी जिनका अमूल्य अवदान है, योगवासिष्ठ की इस उपेक्षा के सन्दर्भ में कहते हैं कि योगवासिष्ठ का दार्शनिक ग्रन्थों में गणना न होने का विशेष कारण उसकी लेखन शैली ही जान पड़ती है । इस ग्रन्थ में दार्शनिकों के बाल की खाल निकालने वाले तर्क वितर्क और नीरस और शुष्क सूत्रमयी भाषा का सर्वथा अभाव है । न इसमें उत्तरकालीन लेखकों की नांई अनुमान की परिभाषा का ही प्रयोग पाया जाता है, न ही प्रमाण ग्रन्थों की उक्तियाँ । इस ग्रन्थ का लेखक जो भी कहना चाहता है वह सरल एवं सीधी भाषा में कहता है, और इस ढंग से कहता है कि उसका कथन हृदय में तीर की नांई प्रवेश करके मन में बैठ जाता है, और फिर पढऩे अथवा सुनने वालों को न किसी प्रमाण की आवश्यकता रहती है और न ही किसी शास्त्र की उक्ति की। इस ग्रन्थ की भाषा बहुत ही सरल, सरस, सुन्दर, सुबोध तथा काव्यमयी है एवं शैली बहुत ही लालित्यपूर्ण है । यह ग्रन्थ दृष्टान्तों एवं उपमाओं के माध्यम से कठिन से कठिन विषय को बहुत ही सहजता से सम्प्रेषित करने करने का सामथ्र्य रखता है । ग्रन्थकार दार्शनिक सिद्धान्तों का अख्यानों एवं दृष्टान्तों द्वारा सर्वत्र समर्थन करता है । यही कारण है कि यह ग्रन्थ अन्य दार्शनिक ग्रन्थों की भाँति मात्र विद्वानों एवं दार्शनिकों के लिये ही प्रिय एवं समादृत नहीं अपितु सामान्य सहृदय-जनों एवं साहित्य-प्रेमियों को भी बहुत प्रिय है । आख्यानों, उपाख्यानों एवं दृष्टान्तों की मधुरता के कारण सर्वसाधारणजन भी यह ग्रन्थ पढ़कर अथवा सुनकर आनन्द का अनुभव करते हैं । स्वयं योगवासिष्ठकार ने इस ग्रथ की उपर्युक्त विशेषता का कथन किया है । वे कहते हैं कि-
शास्त्रं सुबोधमेवेदं सालंकार विभूषितम् ।
काव्यं रसमयं चारु दृष्टान्तै: प्रतिपादितम् ॥ योगवासिष्ठ, 2.18.33
अर्थात् यह शास्त्र सुबोध है, अच्छी प्रकार से समझ में आने योग्य है, अलंकारों से विभूषित है, रसों से युक्त सुन्दर काव्य है । इसके सिद्धान्त दृष्टान्तों द्वारा प्रतिपादित हैं । दृष्टान्तों और कथा-कहानियों का प्रयोग विषय-बोध को सरल बनाता है । हमारे देश में कथा-कहानियाँ, आख्यान-उपाख्यान शताब्दियों से ज्ञान-प्रवाह के साधन रहे हैं । यही कारण है कि श्रुति परम्परा का अवलम्बन लेकर पुष्पित-पल्लवित-प्रवाहित हमारी संस्कृति इसके ज्ञान-सम्पदा से आप्लावित रही है। यहाँ साधारण जन से लेकर राजप्रासादों तक ज्ञानियों का अभाव कभी नहीं रहा । योगवासिष्ठकार स्वयं कठिन एवं दुरूह भाषा के सन्दर्भ में अपनी अरुचि को व्यक्त करते हुये कहते हैं कि कठिन और रसहीन भाषा श्रोता के हृदय में न प्रवेश कर पाती है न ही उसे आह्लादित कर पाने की क्षमता उसमें होती है । इस सन्दर्भ में योगवासिष्ठकार कहते हैं-
यत्कथ्यते हि हृदयंगमयोपमान-
युक्त्या गिरा मधुरयुक्तपदार्थया च ।
श्रोतुस्तदंग हृदयं परितो विसारि व्याप्नोति तैलमिव वारिणि वार्य शंकाम् ॥, योगवासिष्ठ, 3.84.45
अर्थात् जो कुछ ज्ञान ऐसी भाषा में कहा जाता है जो मधुर शब्दों से युक्त है एवं जिसमें समझ में आने वाली उपमाओं, दृष्टान्तों एवं युक्तियों का प्रयोग किया गया है, वह भाषा सुनने वाले के हृदय-प्रदेश में प्रवेश करके वहाँ पर इस प्रकार फैल जाती है जैसे तेल की बूँद जल के ऊपर फैल जाती है ।
जल पर तेल के समान फैलकर मधुर दृष्टान्तों से युक्त भाषा श्रोताओं के हृदय को प्रकाशित करती है एवं उनकी शंकाओं का समाधान करती है । योगवासिष्ठकार ने कठिन, शुष्क एवं दुरूह भाषा को राख में पड़े हुये घी के समान बताया है-
त्यक्तोपमानममनोग्यपदं दुरापं
क्षुब्धं धराविधुरितं विनिगीर्णवर्णम् ।
श्रोतुर्न याति हृदयं प्रविनाशमेति
वाक्यं किलाज्यमिव भस्मानि हूयमान् ॥, योगवासिष्ठ, 3.84.46
अर्थात् जो भाषा कठिन, कठोर एवं कठिनाई से उच्चारण किये जाने वाले शब्दों से युक्त एवं दृष्टान्तों से रहित है, वह श्रोता के हृदय में प्रवेश नही कर सकती और वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसे राख में पड़ा हुआ घृत ।
योगवासिष्ठकार का विचार था की भाषा की दुरूहता ज्ञानप्राप्ति में बाधक नहीं बननी चाहिये । सरल भाषा एवं सम्यक् दृष्टान्तों के प्रयोग द्वारा सामान्यजनों को भी ज्ञानियों के समान ज्ञान प्रदान किया जा सकता है । इसके लिये उन्होंने मञ्जुल भाषा, दृष्टान्तों, उपमाओं एवं सूक्तियों का प्रचुर प्रयोग करके दार्शनिक ज्ञानराशि को सर्वजनबोधगम्य बनाने का प्रयास किया । दार्शनिक ज्ञान को सरलतम माध्यम से सर्वजनग्राह्य बनाने के अपने इस विचार का उन्होंने इस ग्रन्थ में कथन एवं समर्थन भी किया –
आख्यानकानि भुवि यानि कथाश्च या या यद्यत्प्रमेयमुचितं परिपेलवं वा ।
दृष्टान्तदृष्टिकथनेन तदेति साधो
प्रकाश्यमाशु भुवनं सितरश्मिनेव ॥, योगवासिष्ठ, 3.84.47
अर्थात् इस संसार में जितनी भी कथायें और आख्यान हैं और जितने भी उचित और गूढ़ विषय हैं, वे सब दृष्टान्तों के माध्यम से कहने से वैसे ही प्रकाशित होते हैं जैसे कि यह संसार सूर्य की किरणों द्वारा प्रकाशित होता है । योगवासिष्ठकार का यह कथन न केवल सत्य है अपितु भारतीय कथा-साहित्य उनके इस कथन की पुष्टि भी करता है। यदि हम आचार्य विष्णुशर्मा द्वारा रचित, कथा-साहित्य के शिरोमणि पञ्चतन्त्र की रचना की पूर्वपीठिका पर दृष्टिपात करें तो योगवासिष्ठकार का यह मत कि दृष्टान्त, उपमायें और शैली का लालित्य अधिक बोधगम्य होता है, स्वत: सिद्ध हो जायेगा ।

विष्णुशर्मा के समक्ष यही प्रश्न था की गम्भीर राजनीति-कूटनीति विद्या को अल्पबोधक्षमता रखने वाले राजकुमारों को कैसे समझाया जाये, उस विद्या में कैसे प्रवीण बनाया जाये? इस प्रश्न के सामाधानस्वरूप ही उन्होंने पञ्चतन्त्र की रचना कथा शैली में की । पञ्चतन्त्र भी अपने समग्र रूप में एक वृहद् आख्यान है जिससे विभिन्न कडिय़ों के रूप में अन्य कथायें गुम्फित हैं ।

कथा शैली की इसी ऋजुता को देखते हुये योगवासिष्ठकार ने ब्रह्मविद्या को काव्यमयी मधुरता के साथ संसार के समक्ष रखा । वैराग्य से निर्वाण तक की यात्रा करने वाला, पथ-प्रदर्शन करने वाला यह ग्रन्थ समान रूप से साहित्यप्रेमियों के मध्य समादृत है । डॉ. आत्रेय ने इस अनुपम ग्रन्थ के महात्म्य को रेखांकित करते हुये लिखा है कि यह ग्रन्थ “काव्य, दर्शन एवं आख्यायिका का सुन्दर संगम-त्रिवेणी के समान महत्व वाला है। तीर्थराज जिस प्रकार पापों का विनाश करता है उसी प्रकार योगवासिष्ठ भी अविद्या का विनाश करता है । इसका पाठ करने वाला यह अनुभव करता है कि वह किसी जीते जागते आत्मानुभव वाले महान् व्यक्ति के स्पर्श में आ गया है, और उसके मन में उठने वाली सभी शंकाओं का उत्तर बालोचित सुबोध, सुन्दर और सरस भाषा में मिलता जा रहा है, दृष्टान्तों द्वारा कठिन से कठिन विचारों और सिद्धान्तों का मन में प्रवेश होता जा रहा है, और कहानियों द्वारा यह दृढ़ निश्चय होता जा रहा है कि वे सिद्धान्त, जिनका प्रतिपादन किया गया है, केवल सिद्धान्त मात्र और कल्पना मात्र ही नहीं हैं बल्कि जगत् और जीवन में अनुभूत होने वाली सच्ची घटनायें हैं। दुर्भाग्य और आश्चर्य की बात यह है कि योगवासिष्ठ बहुत दिनों तक विद्वानों द्वारा उपेक्षित रहा । योगवासिष्ठ की विषयवस्तु भी बहुत दिनों तक ठीक से प्रकाश में नहीं आयी और विद्वानों के मध्य इसकी भ्रमपूर्ण स्थिति बनी रही और इस ग्रन्थ को ‘साम्प्रदायिक’ एवं ‘धार्मिक’ ग्रन्थ की कोटि में परिगणित किया गया । यही कारण है कि प्रो. राधाकृष्णन्, जिन्होंने भारतीय दर्शन पर नामक पुस्तक लिखी, ने अपनी पुस्तक के द्वितीय भाग में फुटनोट के रूप में लिखा कि “पीछे लिखे हुये बहुत से उपनिषद्-यथा महोपनिषद् और योगवासिष्ठ तथा अध्यात्म रामायण जैसे साम्प्रदायिक ग्रन्थ भी अद्वैतवाद का प्रतिपादन करते हैं । यह भ्रामक मान्यता योगवासिष्ठ के प्रारम्भिक अध्ययन से ही दूर हो जाती है । यही नहीं भारतीय दर्शन के इतिहास लेखकों से इस ग्रन्थ को घोर उपेक्षा भी मिली । डॉ. आत्रेय बड़ी पीड़ा के साथ लिखते हैं कि “हमारे दर्शन के इतिहास लेखकों ने इसकी अक्षम्य अवहेलना की है । डॉ. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त के ‘भारतीय दर्शन के इतिहास’ के प्रथम भाग में, जहाँ कि इस ग्रन्थ का उच्च स्थान होना चाहिये था, योगवासिष्ठ का नाम तक भी नहीं आया । हर्ष की बात यह है कि दूसरे भाग में उन्होंने अब इसको स्थान दे दिया है । प्रो. राधाकृष्णन् के ‘भारतीय दर्शन’ में भी योगवासिष्ठ पर कुछ नहीं लिखा गया है । प्रो. हिरयण्य की अभी हाल ही की छपी पुस्तक ‘ह्रह्वह्लद्यद्बठ्ठद्ग शद्घ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ क्कद्धद्बद्यशह्यशश्चद्ध4’ में भी योगवासिष्ठ का नाम तक नहीं लिया गया है । प्रो. अभ्यंकर ने अपने सम्पादन किये हुये ‘सर्वदर्शनसंग्रह’ के अन्त में दी हुयी भारत के दार्शनिक ग्रन्थों की नामावली में भी योगवासिष्ठ का नाम नहीं दिया।” वर्तमान में स्थिति में परिवर्तन हुआ है और योगवासिष्ठ पर अध्ययन-अनुसंधान बढ़ा है । भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों में योगवासिष्ठ पर शोध हो रहा है ।

योगवासिष्ठ को योगवासिष्ठ महारामायण, महारामायण, आर्षरामायण, वासिष्ठरामायण, ज्ञानवासिष्ठ, वासिष्ठ एवं मोक्षोपाय आदि विभिन्न नामों से भी जाना जाता है ।

ग्रन्थ के महात्म्य का प्रतिपादन करते हुये स्वयं योगवासिष्ठकार कहते हैं कि-

अस्मिंन्श्रुते मते ज्ञाते तपोध्यानजपादिकम् ।

मोक्षप्राप्तौ नरस्येह न किंचिदुपयुज्यते ॥, योगवासिष्ठ, 2.18.34

सर्वदु:खक्षयकरं परमाश्वासनं धिय: ।

सर्वदु:खक्षयकरं महानन्दैककारणम् ॥, योगवासिष्ठ, 2.10.9, 2.10.7

य इदं शृणुयान्नित्यं तस्योदारचमत्कृते: ।

बोधस्यापि परं बोधं बुद्धिरेति न संशय: ॥ , योगवासिष्ठ, 3.8.13

अर्थात् मोक्ष प्राप्ति के लिये इस ग्रन्थ का श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन कर लेने पर तप, ध्यान और जप आदि किसी साधन की आवश्यकता नहीं रहती । यह ग्रन्थ सब दु:खों का क्षरण करने वाला, बुद्धि को अत्यन्त आश्वस्त करने वाला, विश्वास प्रदान करने वाला और परमानन्द की प्राप्ति का एकमात्र साधन है । जो इसका नित्य श्रवण करता है उस प्रकाशमयी बुद्धि वाले को बोध से भी परे का बोध हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है । योगवासिष्ठ के इसी महत्त्व के विषय में लाला बैजनाथ जी ने योगवासिष्ठ भाषानुवाद के भूमिका में लिखा है , जिसे डॉ. आत्रेय ने अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है “वेदान्त में कोई ग्रन्थ ऐसा विस्तृत और अद्वैत सिद्धान्त को इतने आख्यानों और दृष्टान्तों और युक्तियों से ऐसा दृढ़ प्रतिपादन करने वाला आज तक नहीं लिखा गया, इस विषय से सभी सहमत हैं कि इस ग्रन्थ के विचार से ही कैसा ही विषयासक्त और संसार में मग्न पुरुष हो वह भी वैराग्य-सम्पन्न होकर क्रमश: आत्मपथ में विश्रान्ति पाता है । यह बात प्रत्यक्ष देखने में आयी है कि इस ग्रन्थ का सम्यक् विचार करने वाला यथेच्छाचारी होने के स्थान में अपने कार्य को लोकोपकारार्थ, उसी दृष्टि से कि जिस दृष्टि से श्रीरामचन्द्र जी करते थे, करते हुये उनकी नाईं स्व-स्वरूप में जागते हैं ।” डॉ. आत्रेय ने पं. भगवान दास जी की पुस्तक ‘रू4ह्यह्लद्बष् श्व&श्चद्गह्म्द्बद्गठ्ठष्द्गह्य’ से उद्धृत करते हुये लिखा है कि “वेदान्तियों में तो यह उक्ति प्रचलित है कि यह ग्रन्थ सिद्धावस्था में अध्ययन करने के योग्य है और दूसरे ग्रन्थ भगवद्गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र साधनावस्था में अध्ययन किये जाने योग्य हैं ।”

बत्तीस हजार श्लोकों वाला यह ग्रन्थ जो अपने कलेवर में रामायण से भी बड़ा है, अपने अन्दर पचपन आख्यानों-उपाख्यानों को समाहित किये हुये है । इनमें से दो दीर्घ उपाख्यान लीलोपाख्यान और चूडालोपाख्यान बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं, एक ओर जहाँ ये गूढ़ दार्शनिक ज्ञान प्रदान करते हैं दूसरी ओर ये स्त्री-सशक्तिकरण का एक मानदण्ड भी प्रस्तुत करते हैं । डॉ. आत्रेय ने इन दोनों उपाख्यानों को ‘योगवासिष्ठ के हृदय’ कहा है ।अपनी शैली से विलक्षण यह दार्शनिक ग्रन्थ अबोध बालकों को अपनी कथायें सुनाकर प्रसन्न करने की सामथ्र्य रखता है तो महान् विद्वानों को भी अपनी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाने की शक्ति रखता है । यद्यपि साहित्य की रमणीय शैली का अनुकरण करने के कारण यह ग्रन्थ प्राय: उपेक्षित रहा परन्तु आज इस ग्रन्थ की ज्ञानराशि एवं इसकी प्रतिष्ठा के प्रति विद्वानों का यथेष्ट ध्यान गया है । यह निश्चित ही इस ग्रन्थ के अध्ययन-अनुशीलन के प्रति एक शुभ संकेत है ।

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