भारत के लिए अनुकूल समय है,चीन पर से हर तरह की निर्भरता ख़त्म करने का

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प्रह्लाद सबनानी

अब यदि भारत को आत्म निर्भर बनाने की स्थिति में लाना है तो हमें अपने मौलिक चिंतन में भी परिवर्तन करना होगा। आज यदि हम वैश्विक बाज़ारीकरण की मान्यताओं पर विश्वास करते हैं तो इस पर देश को पुनर्विचार करने की सख़्त ज़रूरत है।

वर्ष 1991 में भारत में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू होने के बाद से उत्पादों के आयात के मामले में हम पूरे तौर पर चीन की ओर झुक गए हैं इसका हमें आभास हुआ कोरोना वायरस की महामारी के दौरान जब यह सोचा जाने लगा कि यदि कोरोना महामारी का प्रभाव चीन में लम्बे समय तक चला तो हमारे फ़ार्मा उद्योग के लिए कच्चे माल की आपूर्ति कैसे होगी क्योंकि हमारा फ़ार्मा उद्योग, कुछ विशेष दवाओं की स्थिति में, कच्चे माल के आयात के लिए लगभग पूरे तौर पर चीन पर निर्भर है।

भारत में वित्तीय वर्ष 1997 में आयात की दृष्टि से चीन का 18वाँ स्थान था, हमारे देश के कुल आयात में चीन का मात्र 1.9 प्रतिशत हिस्सा था और आज देश के कुल आयात में चीन का हिस्सा बढ़कर 13.8 प्रतिशत हो गया है। वित्तीय वर्ष 2001 से वित्तीय वर्ष 2008 तक भारत में चीन से आयात तेज़ी से बढ़े। वित्तीय वर्ष 2013 तक यह स्थिर रहे परंतु फिर वित्तीय वर्ष 2013 से वित्तीय वर्ष 2018 तक आयात पुनः तेज़ी से बढ़े। परंतु, अब वित्तीय वर्ष 2018 के बाद से चीन से आयात लगातार कम हो रहे हैं जिसके फलस्वरूप भारत का चीन के साथ विदेशी व्यापार घाटा जो वित्तीय वर्ष 2017-18 में 6300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का था वह वर्ष 2018-19 में घटकर 5356 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा वहीं यह वर्ष 2019-20 में और भी घटकर 4866 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया।

वित्तीय वर्ष 1997 से वित्तीय वर्ष 2020 तक देश का कुल आयात जहाँ 11.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष चक्रवृद्धि की दर से बढ़ा तो वहीं चीन से हमारा आयात इसी अवधि में 21.4 प्रतिशत प्रतिवर्ष चक्रवृद्धि की दर से बढ़ा। इसी कारण से आज भारत में आयातक देशों की सूची में चीन सबसे ऊपर है। चीन लगातार यह प्रयास करता रहा है कि वह तो भारतीय बाज़ार में अपनी प्रविष्टि कर ले लेकिन भारतीय उत्पादों को अपने बाज़ार में आसानी से घुसने नहीं दे रहा है। चीन में विनिर्माण क्षेत्र में अत्यधिक तेज़ी से विकास हुआ है एवं सस्ते उत्पादों के चलते चीन ने कई उत्पादों को अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी निर्यात करने में सफलता पाई है।

निम्न आँकड़ों के माध्यम से यह समझने में ज़रा भी देर नहीं लगेगी कि किस हद तक भारत उत्पादों के आयात के मामले में चीन पर निर्भर हो गया है। आज 829 उत्पाद ऐसे हैं जिनका भारत 90 से 100 प्रतिशत तक हिस्सा चीन से आयात करता है, 384 उत्पाद ऐसे हैं जिनका भारत 80 से 90 प्रतिशत तक हिस्सा चीन से आयात करता है, 395 उत्पाद ऐसे हैं जिनका भारत 70 से 80 प्रतिशत तक हिस्सा चीन से आयात करता है, 446 उत्पाद ऐसे हैं जिनका भारत 60 से 70 प्रतिशत तक हिस्सा चीन से आयात करता है, 430 उत्पाद ऐसे हैं जिनका भारत 50 से 60 प्रतिशत तक हिस्सा चीन से आयात करता है एवं 580 उत्पाद ऐसे हैं जिनका भारत 40 से 50 प्रतिशत तक हिस्सा चीन से आयात करता है। आज भारत, चीन से कुल 6844 उत्पादों का आयात करता है जिसकी क़ीमत 455,000 करोड़ रुपए एवं 6530 करोड़ अमेरिकी डॉलर है। इसमें अधिकतम उत्पाद सस्ती क़ीमत वाले उत्पाद हैं। जिनका उत्पादन भारत में आसानी से किया जा सकता है।

निम्न वर्णित कई ऐसे उत्पाद हैं जिनका चीन से आयात, वित्तीय वर्ष 1997 में, शून्य था। परंतु, आज इन उत्पादों का चीन से आयात हज़ारों करोड़ रुपयों का हो रहा है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं- लकड़ी एवं लकड़ी से बने उत्पाद, पेड़-पौधे, वनस्पति, फूल, तम्बाकू एवं इससे सम्बंधित उत्पाद, आर्ट वर्क के उत्पाद, कोको के उत्पाद, समुद्री जीवों के पदार्थ, स्ट्रॉ से बने पदार्थ, स्प्रिट एवं शराब के उत्पाद, तथा इस प्रकार के अन्य कई उत्पाद। अब आप सोचें कि क्या उक्त वर्णित उत्पादों का भारत में आसानी से निर्माण नहीं किया जा सकता है। आज हम दरअसल निर्माणकर्ता से व्यापारी बन गए हैं। अब तो कई बार ऐसा लगता है कि हमारे देश में सभी बड़े त्योहारों को मनाने के लिए भी हम चीन पर निर्भर हैं क्योंकि आज हम चीन से भगवान की मूर्तियाँ, दीपावली पर्व पर उपयोग किए जाने वाले दीये, पटाखे, बिजली से चलने वाली झालरें, खिलौने, होली पर्व पर उपयोग होने वाले रंग आदि भी भरपूर मात्रा में चीन से आयात करने लगे हैं। क्या अभी तक हम उक्त सभी उत्पाद भारत में ही निर्मित नहीं करते थे। उक्त समस्त उत्पाद छोटे-छोटे कुटीर एवं लघु उद्योगों में निर्मित किए जा सकते हैं। चीन से आयात का सीधा-सा आश्य है कि भारत के कुटीर, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग की हत्या करना। देश के छोटे-छोटे उद्योगों को बचाने के लिए आज आवश्यकता इस बात की है कि चीन से उक्त वर्णित वस्तुओं एवं इसी प्रकार के अन्य उत्पादों के आयात को येन केन प्रकारेण रोका जाये एवं इनका निर्माण भारत में ही पुनः प्रारम्भ किया जाये। प्रायः देखा गया है कि जैसे-जैसे चीन से भारत का व्यापारिक रिश्ता बढ़ा है वैसे-वैसे भारत में औद्योगिकीकरण का ख़ात्मा होता चला गया है।

उक्त परिस्थितियां निर्मित करने में दरअसल देश की जनता ही अधिक जवाबदार है, क्योंकि देश के नागरिक विदेशी उत्पादों के पीछे दीवानगी की हद तक भागते हैं। और फिर, चीन के निम्न स्तरीय उत्पाद तो बहुत सस्ते दामों पर ही उपलब्ध हो जाते हैं। देश के व्यापारी बंधुओं ने भी इन उत्पादों का चीन से भारी मात्रा में आयात कर देश की जनता को उपलब्ध कराने में अपनी अहम भूमिका अदा की। इससे इन उत्पादों का भारत में निर्माण बंद हो गया। जिसके परिणामस्वरूप देश में रोज़गार के कई अवसर नष्ट हो गए एवं कई कुटीर, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग बंद हो गए। कई उद्योगपतियों से जब इस संदर्भ में चर्चा की जाती है तो एक ही उत्तर मिलता है कि चीन में उद्योगों को स्थापित करना बहुत आसान है एवं वहाँ उद्योगों को चलाने सम्बंधी नीतियां बहुत सरल हैं। इस संदर्भ में जब हम ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस की विश्वस्तरीय रैंकिंग की ओर ध्यान देते हैं तो पाते हैं कि उक्त कारण अब कम से कम भारत के लिए तो एक मिथक ही बन गया हैं क्योंकि हाल ही के वर्षों में भारत ने इस विश्वस्तरीय रैंकिंग में लंबी छलाँग लगाई है एवं तीन मापदंडो में तो अब हम चीन से भी बेहतर स्थिति में पहुँच गए हैं। यथा, निर्माण सम्बंधी परमिट के मापदंड में जहाँ भारत की रैंकिंग विश्व में 27वें स्थान पर है तो चीन की रैंकिंग 33वें स्थान पर है, ऋण प्राप्त करने सम्बंधी मापदंड में भारत की रैंकिंग विश्व में 25वें स्थान पर है तो चीन की रैंकिंग 80वें स्थान पर है इसी प्रकार अल्पमत निवेशकों के हित सुरक्षित रखने सम्बंधी मापदंड में भारत की रैंकिंग विश्व में 13वें स्थान पर है तो चीन की रैंकिंग 28वें स्थान पर है। कुछ अन्य मापदंडों में भी भारत चीन से बहुत पीछे नहीं है। यथा, दिवालियापन के मुद्दों का समाधान करने सबँधी मापदंड में भारत की रैंकिंग विश्व में 52वें स्थान पर है तो चीन की रैंकिंग 51वें स्थान पर है, विदेशी व्यापार सम्बंधी मापदंड पर भारत की रैंकिंग विश्व में 68वें स्थान पर है तो चीन की रैंकिंग 56वें स्थान पर है। बिजली कनेक्शन सम्बंधी मापदंड पर भारत की विश्व में रैंकिंग 22वें स्थान पर है तो चीन की रैंकिंग 12वें स्थान पर है एवं टैक्स अदा करने सम्बंधी मापदंड पर भारत की विश्व में रैंकिंग 115वें स्थान पर है तो चीन की रेकिंग 105वें स्थान पर है। इस प्रकार अब भारत में भी नए उद्योग स्थापित करने सम्बंधी नियमों को बहुत आसान बना दिया गया है। अतः देश के उद्योगपतियों को आगे बढ़कर भारत में ही कुटीर, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों की स्थापना करनी चाहिए ताकि देश में ही उत्पादों का निर्माण प्रारम्भ हो और चीन पर से इन उत्पादों के आयात को ख़त्म किया जा सके। दरअसल भारतीय उद्योगपतियों को कोरोना वायरस महामारी को एक अवसर में बदलने का मौक़ा मिला है, इसे किसी भी क़ीमत पर हमें चूकना नहीं चाहिए एवं देश में लघु उद्योग एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी तेज़ी से की जानी चाहिए ताकि रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर गांवों में ही पैदा हो सकें।

देखा जाये तो भारत की अपनी एक अलग शक्ति है, जिसमें युवा जनसंख्या, उत्पादों की भारी माँग इसके चलते सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को स्थापित किए जाने की आवश्यकता, रोज़गार के लिए अधिक से अधिक अवसर निर्मित किए जाने की क्षमता, कच्चे माल की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता, उत्पादित माल के लिए बहुत बड़े बाज़ार की उपलब्धता, आदि कुछ ऐसे तथ्य हैं जो भारत को विश्व के अन्य देशों से कुछ अलग करते हैं। इसी कारण से ही भारत आज विश्व में एक सबसे बड़े बाज़ार के रूप में उभर रहा है एवं कई देशों की नज़र निवेश की दृष्टि से आज भारत पर टिक गई है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय नागरिक भी अपनी सोच में गुणात्मक परिवर्तन लाएँ एवं चीन के निम्न गुणवत्ता वाले सामान को केवल इसलिए नहीं ख़रीदें क्योंकि यह सस्ता है। इस प्रकार की सोच में आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। भारत में निर्मित सामान, चाहे वह थोड़ा महँगा ही क्यों न हो, को ही उपयोग में लाया जाना चाहिए। ताकि भारत की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता की ओर तेज़ी से आगे बढ़ाया जा सके एवं रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर भारत में ही उत्पन्न होने लगें।

साथ ही, अब यदि भारत को आत्म निर्भर बनाने की स्थिति में लाना है तो हमें अपने मौलिक चिंतन में भी परिवर्तन करना होगा। आज यदि हम वैश्विक बाज़ारीकरण की मान्यताओं पर विश्वास करते हैं तो इस पर देश को पुनर्विचार करने की सख़्त ज़रूरत है। चीन सहित अन्य देशों से हमें शुरुआती दौर में कम से कम उन वस्तुओं के आयात को बलपूर्वक रोकना चाहिए जिनका निर्माण हम भारत में ही आसानी से कर सकते हैं। इस बात पर अब मौलिक चिंतन की आवश्यकता है कि चीन से हम किस हद तक के रिश्ते क़ायम रखें।

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