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इतिहास के पन्नों से

गांधी के चलते अंग्रेज लंबे समय तक भारत में जमे रहे , यदि गांधी न होते तो 20 वर्ष पहले देश आजाद होता : श्याम सुंदर पोद्दार

१८५७ के बाद जब कूका विद्रोह हुआ तो अंग्रेजों ने भारतीयों में ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध भविष्य में फिर कभी विद्रोह नही उपजे इस निमित्त भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की। कालांतर में इस संगठन में दो तरह के विचार बलवान हो गए। एक नरम दल कहलाया जिसके नेता बाल कृष्ण गोखले थे। नरम दल वालों का उद्देश्य अंग्रेज़ी हुकूमत को बनाए रखते हुए भारतीयों की उन्नति करना था। दूसरा दल गरम दल कहलाया , उसके नेता बाल गंगाधर तिलक थे। इनका उद्देश्य अंग्रेज़ी राज को येन केन प्रकारेण उखाड़ फेंकना था।

१९०९ में खुदीराम बोस को फांसी दिए जाने के विरुद्ध सम्पादकीय लिखने पर लोकमान्य तिलक को ६ वर्ष के लिए बर्मा की मॉंडले जेल भेज दिया गया। कांग्रेस के प्राय: सब बड़े नेता लाला लाजपत राय,बिपिन चंद्र पाल आदि गरम दल में थे। गरम दल के आंदोलन के चलते अंग्रेजों को बंग -भंग वापस लेना पड़ा। कलकत्ता में वे स्वयम को सुरक्षित नही समझने लगे तो अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले गये।
गोखले का क़ोई उत्तराधिकारी नरमदल में तिलक के समान व्यक्तित्व वाला नही था। राज मोहन गांधी की पुस्तक मोहन दास के अनुसार गोखले ने १९१० में गांधी को प्रस्ताव दिया कि वे कांग्रेस के अध्यक्ष बन जाएं । इस पर गांधी का जवाब था कि अध्यक्ष बनने के बाद वे दक्षिण अफ़्रीका चले जाएँगे, बात बनी नही। (पेज- १६८) बाद में गोखले का स्वास्थ्य गिरने लगा तो अंग्रेजों को भी जल्दी हुई कि गोखले अपना उत्तराधिकारी सामने लाएं। क्योंकि तिलक के छूटने का समय नज़दीक
आ रहा था।

अब गांधी ने गोखले को प्रस्ताव दिया कि दक्षिण अफ़्रीका में मैंने कोई कामयाबी नही हासिल की है। आप अपना प्रभाव इस्तेमाल करके मेरी कुछ माँगे मनवा दें तो मैं भारत आ सकूँगा। १९१२ में गोखले ने गांधी को सूचित किया कि वे दक्षिण अफ़्रीका आने को तैयार है।(पेज १६७)गांधी को अत्यंत ख़ुशी हुई कि गोखले भारत सरकार की तरफ़ से यानि साम्राज्य की तरफ़ से बात करेंगे तो दक्षिणअफ़्रीका की सरकार के लिए ना करना असम्भव होगा। (पेज-१६८)
जुलाई १९१२ में लंदन से गांधी को सूचना दी कि राज्य मामलों के सचिव ने उनके साउथ अफ़्रीका जाने के कार्यक्रम पर अपनी सहमति जतायी है। (पेज-१६८) गोखले साउथ अफ़्रीका के प्रीटोरिया पहुँच कर प्रधानमंत्री बोथा व जेनरल स्मिथ से मिल कर उनकी कुछ माँगें मनवा लीं। (पेज-१६९)अंग्रेजों ने इस तरह साउथ अफ़्रीका के गांधी को हीरो बनाया। इसी तरह चंपारन में ,अहमदाबाद में श्रमिकों के बीच हीरो बनाया।

गांधी का अहिंसा आंदोलन क्रांतिकारियों के हाथों अंग्रेजों को बचाना था। इसके लिए उसने जैन सन्यासी का वस्त्र पहन कर महावीर की वाणी अहिंसा को प्रचारित करने का एकमात्र उद्देश्य अंग्रेजों को क्रांतिकारियों के जानलेवा आक्रमण से बचाना था। यदि सच में गांधी को महावीर की तरह अहिंसा से लगाव होता तो वे कभी केरल में हिंदुओं के नसंहार को जायज़ नही ठहराते न स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद के कुकृत्य को जायज़ ठहराते तथा भगत सिंह द्वारा सैंडरसन की हत्या नाजायज़ ठहराते।
गांधी का सौभाग्य था कि ने गांधी की तरह तिलक को आगा खान पैलेस में नही रखा । उन्हें बर्मा की मांडले जेल में रखा ताकि वे अस्वस्थ होकर जल्दी मर जाएं हुआ भी ऐसा ही। तिलक बहुत जल्दी चल बसे। गांधी को चुनौती देनेवाला कोई नही मिला। सुभाष बाबू कांग्रेस में रहकर कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव जीते भी पर उन्हें दल से ही निकाल दिया गया।
यदि हम गांधी के आंदोलनों की समीक्षा करते है तो पाते हैं कि गांधी ने स्वतंत्रता का क़ोई भी आंदोलन नही किया। जब उन्होंने कांग्रेस का पहला आंदोलन प्रारंभ किया तो – ‘एक साल में स्वराज ला दूँगा’ – ऐसा कह कर कांग्रेस पर ही क़ब्ज़ा लिया। मजेदार बात यह थी कि उन्होंने अपना पहला आंदोलन देश की स्वाधीनता के लिए नहीं बल्कि मुसलमानों के खलीफा के लिए किया । जिसे इतिहास में खिलाफत आंदोलन के नाम से जाना जाता है। जिसका देश की स्वतंत्रता से दूर का भी सम्बंध नहीं। कांग्रेस के अंदर के विरोध के चलते गांधी ने १९३० में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव खुद रखा। पर पूर्ण स्वराज की लड़ाई न लड़कर नमक सत्याग्रह किया। जिसका पूर्ण स्वराज से दूर का भी सम्बंध नही।
१९४२ में :भारत छोड़ो’ पर अपनी सेना यहाँ रखो। अंग्रेज अपनी सेना यहाँ रखेंगे तो भारत क्यों छोड़ेंगे ? सुभाष बाबू की कांग्रेस सभापति पद पर विजय के बाद गांधी को लगने लगा कि कांग्रेस के ५८ प्रतिशत सदस्य गरम दल वाले हैं। नरम दल मात्र ४२ प्रतिशत है। सुभाष बाबू जब देश के बाहर जाकर लड़ रहे हैं। वे जब देश में अपनी सेना के साथ प्रवेश करेंगे तो ये ५८ प्रतिशत गरम दल वाले कांग्रेसी उनका समर्थन ज़ी जान से विरोध करेंगे तो उनको जेल में भिजवाने की व्यवस्था इस आंदोलन को करके गांधी ने कर दी। गांधी के अनुयायियों को तो १९४५ के आम चुनाव के पहले अंग्रेजों ने जेल से रिहा कर दिया पर गरम दल वालों को देश स्वाधीन होने तक नही छोड़ा।
ऐसी परिस्थितियों में मेरा स्पष्ट निष्कर्ष है कि यदि गांधी को अंग्रेज भारत नही लाए होते तो हम २० वर्ष पूर्व स्वाधीन हो जाते। जैसे क्रांतिकारियों के आंदोलन के चलते अंग्रेजों ने बंग भंग वापस लिया , वैसे ही उन्हें मजबूर होकर क्रांतिकारियों के आंदोलन के सामने घुटने टेकने पड़ते। क्रांतिकारी आंदोलन के चलते १९३० से पहले हमें स्वतंत्र करने को क्रांतिकारी लोग मजबूर कर देते।

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