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भारतीय क्षत्रिय धर्म और अहिंसा स्वर्णिम इतिहास

भारतीय क्षात्र धर्म और अहिंसा (है बलिदान इतिहास हमारा), अध्याय — 6, गुप्तकालीन क्षत्रिय धर्म और अहिंसा

प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्त वंश के शासन काल को स्वर्ण युग की संज्ञा दी जाती है। इस वंश में एक से बढ़कर एक कई महान शासकों की स्वर्णिम श्रंखला हमें दृष्टिगोचर होती है । यद्यपि इस वंश से पूर्व अशोक के पश्चात कई शासकों एवं वंशों ने शासन किया , जिनमें शुंग , सातवाहन , कुषाण आदि सम्मिलित हैं। इन राजवंशों में गुर्जर कुषाण वंश का शासक कनिष्क एक ऐसा महान शासक था जिसने न केवल भारत के बहुत बड़े भू-भाग पर शासन किया अपितु भारत से बाहर भी अपना विशाल साम्राज्य स्थापित किया। उसने भारत की प्राचीन क्षत्रिय परम्परा का निर्वाह करते हुए शत्रु के साथ कठोरता से निपटने का वही उपक्रम किया जिसे हमारे प्राचीन शासकगण करते आए थे ।

कहने का अभिप्राय है कि गुर्जर सम्राट कनिष्क ने किसी भी प्रकार की छद्म अहिंसा को अपनाना उचित नहीं माना। यही कारण रहा कि वह एक प्रतापी और महान शासक सिद्ध हुआ । उसके शासनकाल में भारत फिर एक राजनीतिक इकाई के रूप में अपनी एकता को स्थापित करने में भी सफल हुआ। इस प्रकार कनिष्क के शासन ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि जब शासक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ और शत्रुओं या देशद्रोही तत्वों के साथ कड़ाई से निपटने का संकल्प लेकर शासन करता है तो उससे देश मजबूत होता है।

प्राचीन आर्यावर्त का विस्तार

राहुल सांकृत्यायन जी ‘मध्य एशिया का इतिहास’- खंड – 1 ,पेज 159 , पर लिखते हैं कि यूची , कुषाण, तुखार , बुसुन , श्वेत हूण , आभीर , पार्थ , खश , सरमात आदि शकों की प्रमुख शाखाएं थीं । जबकि खण्ड 1 के पेज 138 पर वह यह भी लिखते हैं कि शकों की विचरण भूमि सप्तनद थी । जहाँ तुखारी प्राकृत भाषा और भारतीय लिपि की प्रधानता थी। अनेक पुराणों में शक गुर्जरों का विशद वर्णन हुआ है। ‘हरिवंश पुराण’ में उल्लेख है कि नरिष्यन्त के पुत्रों का नाम शक है । पण्डित रघुनन्दन शर्मा विभिन्न पुराणों एवं महाभारत से उद्धरण प्रस्तुत कर यह स्पष्ट करते हैं कि शक नरिष्यन्त के ही पुत्र थे। ‘वैदिक सम्पत्ति’ के खंड – 3 में पण्डित रघुनंदन शर्मा जी हमें यह भी बताते हैं कि यह शक लोग राजा सगर से हारने पर जम्बूद्वीप छोड़कर चले गए थे । जहाँ जाकर वह बसे उस स्थान का नाम कालान्तर में शक द्वीप हो गया।
राहुल सांकृत्यायन जी कहते हैं कि – ” ईसा पूर्व 7वीं – 8वीं शताब्दी से देखते हैं कि सारे मध्य एशिया में हिन्द-यूरोपीय वंश की शक आर्य शाखा का ही प्राधान्य है । मध्य एशिया में उन्होंने मुण्डा द्रविड़ के प्राधान्य को नष्ट किया और स्वयं उनका स्थान लेकर आगे उत्तरापथ और सिक्यांग में शक और दक्षिणापथ में आर्य के रूप में अपने को प्रकट किया ।’
पण्डित रघुनन्दन शर्मा लिखते हैं कि – ”जहाँ से सारी मनुष्य जाति संसार में फैली है , उस मूल स्थान का पता हिन्दुओं , पारसियों , यहूदियों और क्रिश्चियनों की धर्म पुस्तकों से इस प्रकार लगता है कि वह स्थान कहीं मध्य एशिया में था । इस प्रकार सच्चे आर्यों की प्रधान ईरानी शाखा ने हिमालय का इशारा किया है।”
इस प्रकार इन विद्वानों के प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि शक , कुषाण आदि बाहरी जाति न होकर आर्यों की ही शाखा थीं। हमें यहाँ पर यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि जिस समय की बात हम कर रहे हैं , उस समय का भारतवर्ष आज के भारत वर्ष जितना नहीं था । ध्यान रहे कि 1857 की क्रांति के समय भी भारतवर्ष 83 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ था । उससे पहले तो इसका क्षेत्रफल और भी अधिक था । जबकि आज यह लगभग 32 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का ही देश है । उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि हिन्दूकुश कभी हमारे देश की सीमा हुआ करती थी और उससे पहले जाएं तो और भी अधिक विस्तार भारतवर्ष का देखने को मिलता है।
‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ ( खण्ड 2 , पृष्ठ 513 , लन्दन ) के अनुसार मध्य एशिया का दक्षिणी भाग तिब्बत तक फैला हुआ था । तिब्बत व भारत की भौगोलिक व सांस्कृतिक अस्मिता निकटता सदियों से रही है। तिब्बतियों और भारतीयों के बीच आपसी व्यापार के लिए दोनों देशों की सीमाएं सदा खुली रही हैं तथा पारस्परिक अधिग्रहण भी रहा है। एक अन्य विद्वान बिलांची महोदय के अनुसार मध्य एशिया , आर्मीनिया , इरान , बैक्ट्रिया व सोगदियाना का क्षेत्र है। निश्चित ही यह क्षेत्र आर्यवर्त क्षेत्र में ही आते थे।
मौर्य वंश का पतन छद्म अहिंसा के कारण हुआ था । उसके पश्चात के भी कई राजवंशों का पतन लगभग वैसी ही परिस्थितियों के कारण शीघ्र ही हो गया । भारतीय इतिहास में हूण और कुषाण वंश के गुर्जर शासकों ने भारतीय राजनीति को वही ऊंचाई प्रदान की , जो कभी भारत के क्षत्रिय धर्म को अपनाने के कारण भारत के प्राचीन सम्राट प्रदान किया करते थे।

गुप्त वंश ने निभाया क्षत्रिय धर्म

जब भारतीय राजनीति में गुप्त वंश ने अपनी आभा बिखेरनी आरम्भ की तो उसने भी भारत के प्राचीन क्षत्रिय धर्म का ही पालन करना आरम्भ किया अर्थात शत्रुदमन के प्रति कठोर नीति का अनुसरण करते हुए जागतिक और आत्मिक कल्याण में अपने आपको समर्पित कर दिया। गुप्तकालीन शासकों ने क्षत्रिय धर्म की अवहेलना न करते हुए राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वाह किया । प्रजा के समुचित विकास के लिए यथोचित प्रयास किए। समाज में शांति व्यवस्था बनी रहे इसके लिए प्रजा उत्पीड़क व समाज विरोधी तत्वों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की गई । परिणामस्वरूप समाज में जनसाधारण के लिए सुख-चैन उपलब्ध हो गया ।
इस वंश ने राजधर्म की पुनः प्रतिष्ठा की । साथ ही विदेशों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया ।जिस कारण इस वंश के शासकों की धाक विदेशों में भी जमी और उनके यश व कीर्ति से भारत के राजधर्म की गरिमा में आशातीत वृद्धि हुई । इस प्रसंग में एक अरबी कविता उल्लेखनीय है । जिसका हिन्दी अनुवाद पी.एन. ओक ने अपनी पुस्तक “वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास” भाग – 2 में इस प्रकार किया है :–
” भाग्यशाली हैं वह जो विक्रमादित्य के शासनकाल में जन्मे या जीवित रहे । वह सुशील ,उदार , कर्तव्य परायण शासक दक्ष था । परन्तु उस समय हम अरब के लोग परमात्मा का अस्तित्व भूलकर वासनासक्त जीवन व्यतीत कर रहे थे । इसमें दूसरों को नीचे खींचने की और छल की प्रवृत्ति बनी हुई थी । अज्ञान का अंधेरा हमारे पूरे प्रदेश पर छा गया था । भेड़िए के पंजे में तड़फड़ाने वाली भेड़ की भान्ति हम अज्ञान में फंसे थे । अमावस्या जैसा अंधकार सारे अरब प्रदेश में फैल गया था । उस अवस्था में वर्तमान सूर्योदय जैसे ज्ञान और प्रकाश यह उस दयालु राजा विक्रम की देन हैं। जिसने हम पराए होते हुए भी हमसे कोई भेदभाव नहीं बरता । उसने निजी पवित्र संस्कृति (वैदिक संस्कृति ) हममें फैलाई और निजी देश से यहाँ ऐसे विद्वान ,पंडित , पुरोहित आदि भेजे जिन्होंने निजी विद्वता से हमारा देश चमकाया । यह विद्वान पंडित और धर्म गुरु आदि जिनकी कृपा से हमारी नास्तिकता नष्ट हुई , हमें पवित्र ज्ञान की प्राप्ति हुई और सत्य का मार्ग दिखा कर वे हमारे प्रदेश में विद्यादान में संस्कृति प्रसार के लिए पधारे थे।”

अरब वाले भी स्वीकारते थे हमारी संस्कृति की महानता को

इस कविता के पाठ से कई तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं। प्रथम तो यह कि हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति को बाहर पुनः प्रस्तुत किया गया । दूसरे , यह कि इस महान और गौरवपूर्ण संस्कृति की मिसाल अन्यत्र विश्व में कहीं पर भी उपलब्ध नहीं थी । जिसे अरबी विद्वान भी स्वीकार करते थे तीसरे , इसी संस्कृति को ही लोग संसार में सर्वोच्च स्वीकार करते थे । अरब वाले लोग भी इस संस्कृति को अपनाकर अपने आपको धन्य समझते थे । चौथे , भारतीय राजधर्म के प्रति भारतीय शासकों की उदासीनता के कारण वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में आई कमी के कारण विदेशों में लोग पथभ्रष्ट होकर अज्ञानता , पाखण्डवाद, अंधविश्वास और नास्तिकता के भंवर में फंस चुके थे। यह लोग वासनासक्त जीवन व्यतीत कर रहे थे । पांचवें , हमारे शासकों ने विदेशी जनता के प्रति अन्याय अथवा अत्याचार के आधार पर नहीं बल्कि प्रेमपूर्ण रूप से उनके हृदय को जीतने का प्रयास करते हुए उन्हें सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया । यहाँ पर यह भी स्मरणीय है कि इस्लाम ने भी यद्यपि अपनी संस्कृति के प्रचार व प्रसार के लिए संघर्ष किया और संसार में सर्वत्र प्रस्थान भी किया,किन्तु इस्लाम ने मानवता को कुचल कर पाशविकता और अमानवीयता की संस्कृति फैलाई ,जबकि हमने मानवता और मानव धर्म आस्तिकता की दुन्दुभि बजाकर संसार को मार्ग दिखा कर सच्चा ज्ञान दिया।
भारतीय क्षत्रिय धर्म के अनुरूप गुप्त काल में यह प्रयास गुप्त वंश के कई शासकों के माध्यम से किया जाता रहा । जिसका भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान है और भारतीय राजधर्म को पुनः अपनाने की नीति के कारण ही यह काल और उसके शासक महान कहलाए । उनका युग ‘स्वर्णिम युग’ के नाम से जाना जाता है।

फिर से जम गई भारतीय संस्कृति की धाक

मौर्य वंश के पतन के पश्चात अथवा अशोक के पश्चात भारतीय राष्ट्र की सीमाएं अहिंसावाद की नीति के कारण पहली बार सर्वाधिक असुरक्षित हो गई थीं। इस सच्चाई को समझ कर गुप्त वंश के शासकों ने मौर्य वंश या उसके पश्चात के किसी भी ऐसे शासक की उन नीतियों को त्याग दिया जिनके कारण भारत के क्षत्रिय धर्म को हानि उठानी पड़ी थी । गुप्त वंश के महान और प्रतापी शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने शक वंश के शासकों को भी पराजित किया । जिससे उसे भारतवर्ष में राजनीतिक एकता स्थापित करने में सहायता मिली । इसके पश्चात गुप्त वंश के शासकों के समय में भारतीय राजधर्म के पुनरुत्थान के समय भारतीय संस्कृति की भी पुनः प्रतिष्ठा हुई।
शक वंश के शासक या आक्रमणकारी जब भारतवर्ष में आए तो चूंकि वह पहले से ही भारतीय संस्कृति के एक अंग रहे थे , इसलिए उन्हें भी भारतीय संस्कृति को अपनाने में देर नहीं लगी । वह वैसे ही भारतीय संस्कृति की धारा में विलीन हो गए जैसे छोटी – छोटी नदियां बड़ी नदी में अपना अस्तित्व अपने आप विलीन कर देती हैं। जैसे छोटी नदियों के बड़ी नदी में मिलने के बाद भी बड़ी नदी का नाम ही बना रहता है और छोटी नदियों के नाम को लोग भूल जाते हैं , वैसे ही शक या किसी भी अन्य विदेशी कही जाने वाली जाति ने भारत की महान सांस्कृतिक धारा में अपने आपको विलीन कर अपने नाम की चिन्ता नहीं की। इसका कारण यही था कि इन तथाकथित विदेशी आक्रमणकारियों या जातियों ने भारत की मूल सांस्कृतिक धारा को अपनी धारा समझते हुए स्वेच्छा से उसमें अपना अस्तित्व विलीन किया था।

विदेशी यात्री फाह्यान का कथन

हमें फाह्यान नाम के विदेशी यात्री के विवरण से पता चलता है कि गुप्त काल में सैन्य संगठन पर शासक वर्ग अपना समुचित ध्यान देता था । समाज में शांति व्यवस्था को बनाए रखने हेतु पुलिस व्यवस्था भी सुदृढ़ थी । इसके बारे में फाह्यान का कहना है कि हजारों मील की लम्बी यात्रा करने के उपरान्त भी उसे कोई चोर या डाकू नहीं मिला । गुप्त काल में गुप्तचर व्यवस्था भी उत्कृष्ट थी । पुलिस का सर्वोच्च अधिकारी दण्ड पाशिक कहा जाता था । देश में अपराधों की संख्या अति न्यून थी । फाह्यान न्यायिक दण्ड के विषय में लिखता है – “व्यवहार की लिखा पढ़ी एवं पञ्च पंचायत कुछ भी नहीं है । राजा न तो प्राण दण्ड देता है न शारीरिक दण्ड देता है । अपराधी को उत्तम अथवा मध्यम साहस का अर्थदण्ड किया जाता है । बार-बार अपराध करने वाले का दाहिना हाथ काट दिया जाता है।”
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि गुप्तकालीन शासन व्यवस्था में दण्ड में मानवोचित उदारता तथा साथ ही अपेक्षित कठोरता दोनों का समुचित सम्मिश्रण था। जिसके परिणामस्वरुप देश में शांति व्यवस्था बनी रही । समाज विरोधी और प्रजा पीड़क आततायियों का वर्चस्व समाज में स्थापित ना हो सका। देशद्रोही लोगों को पनपने का अवसर ही उपलब्ध नहीं हो सका । इस काल में क्योंकि बौद्ध धर्म की हिंसावादी नीति का त्याग कर दिया गया था, तथा सैन्य संगठन और पुलिस व्यवस्था के आधार पर समाज में शान्ति व्यवस्था स्थापित थी , इसलिए अशोक के पश्चात पहली बार हमारे शासकों ने बाहरी देशों से भी सम्बन्ध स्थापित किए। भारतीय सभ्यता व संस्कृति की पताका विदेशों में भी फहरायी । इस काल में हमारे सम्बन्ध जावा , सुमात्रा ,बोर्नियो , बालि , स्याम , कम्बोडिया , मलाया, चम्पा आदि द्वीपों से भी स्थापित हुए । भारतवासियों ने यहाँ जाकर अपने उपनिवेश स्थापित किये । यही कारण है कि इस काल में कितने ही नगरों व स्थानों के नाम भारतीय अनुकरण पर रखे गए । भारतीय वैदिक संस्कृति के प्रतीक रामायण , महाभारत एवं संस्कृत साहित्य के शास्त्रों को भी विदेशों में सम्मान मिला । भारतीय भाषा एवं संस्कृति ने विदेशों में अपना विशिष्ट स्थान बनाया ।
गुप्त काल में भारतीय शासकों की शूरवीरता , धर्म परायणता और राजधर्मोचित व्यवहार के कारण भारत की आवाज अन्तरराष्ट्रीय जगत में पुनः ध्यान और सम्मान के साथ सुनी व मानी जाने लगी । क्योंकि इस काल में शासक यह भली-भांति जानता था कि उचित या अनुचित क्या है ? हिंसा क्या है ,अहिंसा क्या है ?

साम्प्रदायिक अनेकता लगी उपजने

भारतीय समाज की तत्कालीन परिस्थितियों का यदि सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात भारतीय समाज में जैन व बौद्ध नाम के दो प्रमुख सम्प्रदाय अथवा मत प्रचलित हो चले थे । इसके अतिरिक्त भारतीय वैदिक धर्म अन्य कई मतों में विभक्त हो चुका था । इससे भारत की धार्मिक एकता भंग होकर साम्प्रदायिक अनेकता में परिवर्तित हो गई । भारत के सामाजिक क्षेत्र का यह परिवेश भारतीय राष्ट्रवाद के पतन के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुआ। क्योंकि सम्प्रदायवाद ने भारत के पतन की कहानी लिखनी आरम्भ कर दी थी ।
इन सारी परिस्थितियों दुखद पहलू यह रहा कि ये सम्प्रदाय एक ही वैदिक संस्कृति के परिवारजन होते हुए भी एकत्व के उपासक नहीं बन पाए । इनकी चाल , इनकी सोच और उनकी कृति विपरीत दिशा में ही कार्यरत रही । किसी भी देश की सांस्कृतिक एकता के लिए एक धर्म , एक विचार , एकमत और एक शास्त्र का होना आवश्यक है । दुर्भाग्यवश जब भारत में सम्प्रदायों का जन्म होना आरम्भ हुआ तो सांस्कृतिक एकता के लिए आवश्यक इन तत्वों का विलोपीकरण होने लगा । पतन का यह आरम्भिक दौर था । इसलिए बीमारी के मात्र लक्षण ही दिखाई देते थे। जिनके प्रति स्वाभाविक रूप से इस काल के शासक भी उदासीन बने रहे । इस बीमारी के प्रति उनके उदासीनता के भाव को हमारे कितने ही इतिहासकार सहिष्णुता एवं उदारता की नीति करार देते हैं। हमारी मान्यता इसके विपरीत है कि यदि इस काल में शासक वर्ग द्वारा भारतीय समाज में भारतीयता को ही अथवा अर्थात वैदिक संस्कृति को ही प्राथमिकता दी जाती तो सम्भवत: हमारे समाज में व्याप्त आज की कितनी ही बुराइयों का समूल नाश हो गया होता।

हम फिर जा पड़े पतन के गड्ढे में

समाज को रुढ़िवाद और अन्धविश्वासों में फंसने से रोकने की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया । मठाधीश और धर्माधीश बने लोगों ने धर्म का निहित स्वार्थों में योग करना आरम्भ किया। यद्यपि आदि शंकराचार्य जैसे महान पुरुषों के पुरुषार्थ से यह बात अवश्य अच्छी रही कि बौद्ध धर्म भारत में उतना प्रचारित प्रसारित नहीं हुआ , जितना वह विदेशों में हो गया था। यदि बौद्ध धर्म की अहिंसा और विचारधारा पूरे देश में फैल गई होती तो भारत को और भी अधिक हानि उठानी पड़ती ।
आरम्भ में गुप्तकालीन शासकों ने बौद्ध धर्म से दूरी बनाने की नीति को ही उचित समझा। पर कालान्तर में इसके शासकों ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। यह न केवल इस महान राजवंश के पतन का कारण बना , अपितु भारत के सम्मान के लिये राष्ट्रीय उत्थान की जो स्थिति निर्मित हुई थी वह भी बाधित हो गई। पतन के गड्ढे में हम फिर से जा पड़े । यदि इस धर्म को गुप्तकालीन शासन द्वारा आरम्भ से ही मान्यता एवं प्राथमिकता दी जाती तो यह बहुत सम्भव था कि गुप्त काल में जो एक के बाद एक योग्य शासक हमें मिले वह न मिलते । यदि मिलते भी तो भारत में उस समय बौद्ध धर्म के प्रचार – प्रसार में जो कमी आ गई थी वह नहीं आती । इसका परिणाम यह होता कि आज बौद्ध धर्म ही भारत में प्रमुख सम्प्रदाय होता अथवा सारा सन्देश इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुका होता।
गुप्त काल के परवर्ती शासकों द्वारा बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लेने से हमारे राष्ट्रीय चरित्र में पुनः अकर्मण्यता ने स्थान बना लिया । अन्तरराष्ट्रीय जगत में हमने अपनी सैन्य क्षमता , सांस्कृतिक एकता और पराक्रम से जो स्थान बनाया था वह हमारी मिथ्या अहिंसावाद की नीति ने फिर से समाप्त कर दिया । परिवर्तित परिस्थितियों में पूर्णतया अहिंसक बनकर हमने अपनी कायरता का परिचय दिया ।
अन्तरराष्ट्रीय जगत में जो देश हमारे सैन्य बल और राजनीतिक कौशल का लोहा मानते लगे थे, वह फिर से हमारे सामने आ खड़े हुए । इस प्रकार भारतीय इतिहास का सूर्य संकट के बादलों से आच्छादित हो गया । अब भारत की केन्द्रीय सत्ता फिर दुर्बलता का शिकार हो गई और मजबूत केन्द्र के स्थान पर छोटे-छोटे छत्रप अस्तित्व में आ गये । इस काल में भारतीय अन्तरात्मा फिर किसी राजधर्मोचित वीर की प्रतीक्षा में तड़पने लगी । जो उसे पुराने गौरवपूर्ण स्थान पर विराजमान करने में सक्षम और समर्थ हो।
इतिहास की यह विवशता होती है कि वह शक्ति संपन्न और प्रभुसत्ताधारी व्यक्तियों पर ही अपनी दृष्टि रखता है अर्थात उसे अपने कैमरे का केन्द्र बिन्दु मानता है । जब उसको इस प्रकार का सर्वप्रिय और लोकप्रिय जननायक मिल जाता है तो वह बड़ी शीघ्रता से आगे बढ़ता है । जब किसी समाज अथवा राष्ट्र के राजनीतिक पटल पर ऐसा लोकप्रिय जननायक उभर नहीं पाता है तो इतिहास की आगे बढ़ने की चाल भी धीमी पड़ जाती है। वह छोटे-छोटे शासकों की सत्ता और पद की स्वार्थपूर्ण राजनीति को अपनी दृष्टि से ओझल करते हुए उनके प्रति उपेक्षा भाव अपनाकर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अधिक ध्यान नहीं देता।
इतिहास को व्यक्ति की कर्मशीलता प्रभावित करती है सत्ता पद नहीं । यथास्थितिवाद में जीने वाले अकर्मण्य व निष्क्रिय समाज को इतिहास नकार देता है। वह लीक से हटकर किए गए किसी बड़े कार्य को ही ग्रहण करता है । इससे स्पष्ट होता है कि इतिहास उन शूरवीरों का गुणगान करता है जो लीक से हटकर महान कार्य करते हैं और समाज को एक ऐसी व्यवस्था देने में सफल होते हैं , जिससे धर्म और न्याय की स्थिति बनी रहे ।
वह रूढ़िवाद को नहीं अपितु प्रगतिशीलता व परिवर्तनशीलता को प्राथमिकता देते हुए उन्हें पसन्द करता है। मौर्य काल के पश्चात जिन – जिन राजाओं शासकों या नायकों पर इतिहास ने अपनी दृष्टि जमायी वे सभी के सभी भारत की इसी नीति में विश्वास रखते थे कि – “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।”
अतः भारत का इतिहास आज भी हमें यही सन्देश दे रहा है कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता को प्रथम स्थान पर रखते हुए राष्ट्र के लिए समर्पित होकर राजधर्म जब अपना काम करता है तो देश उन्नति , विकास और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता है । इतिहास की शिक्षा है कि कर्मशील , लोकप्रिय जननायक बनकर समाज विरोधी और राष्ट्र विरोधी तत्वों का समूल नाश कर दो। इतिहास के इस आवाहन को हमें सुनना चाहिए। शस्त्र और शास्त्र की नीति का पालन करते हुए हम इस प्रकार के आचरण को अपनाकर इतिहास में अपना स्थान निर्धारित कर सकते हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य संपादक उगता भारत

राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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