ईश्वर और उनकी वाणी वेद ही अमृत है

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हमको रूढ़िवाद , सांप्रदायिकता , जातिवाद और अज्ञान के अंधेरे को नष्ट करना होगा । क्योंकि यह मानव की अज्ञानता के द्योतक हैं और इनका भयंकर परिणाम आता है। जो समाज किसी भी प्रकार से इन्हें अपनाता है वह पतन के गर्त में समा जाता है। प्रगतिशील समाज की निशानी यही है कि वह अपने आप को प्रत्येक प्रकार की रूढ़िवादी संकीर्णता से मुक्त रखे । जब ऐसी स्थिति समाज सतत प्रवाह के साथ बनाए रखता है तब वह सनातन हो जाता है। सनातन अर्थात पुराना होकर भी नवीन रहता है , अधुनातन रहता है , उसमें पुरातन का दोष नहीं लगता। वह अपने आप को पुराण – पुराना , नहीं बना पाता बल्कि हर स्थिति परिस्थिति में नवीन बना रहता है , जीवंत बना रहता है , सार्थक बना रहता है।
आपने देखा होगा नदी स्वयं अपनी दिशा तय करती है। इसी को कहते हैं कि जिस प्रकार माता पृथ्वी के गर्भ से निकला स्रोत स्वयं प्रवाह के लिए स्थान बना लेता है । ठीक उसी प्रकार से ऋषि मुनियों की अमृतवाणी भी जन कल्याण के लिए निरंतर बहती रहती है और श्रद्धालु एवं बुद्धिजीवी इस मार्ग को प्रशस्त करने में अपना तन ,मन ,धन से संलग्न रहते हैं। सनातन में विश्वास रखने वाले लोग अपनी बुद्धि को सनातन बनाए रखने के लिए ऋषियों की अमृतवाणी का सतत रसास्वादन लेते रहते हैं अर्थात उसे ग्रहण कर अपने जीवन में अपनाते रहते हैं, इससे उनके जीवन में नैरन्तर्य बना रहता है ,प्रगतिशीलता बनी रहती है।

महर्षि दयानंद ने आर्य समाज के 10 नियमों में लिखा कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है वेद का पढ़ना पढ़ाना सभी आर्यों का परम धर्म है। अर्थ का अनर्थ मत कर लेना । आर्य का मतलब कोई विशेष व्यक्ति या समाज से नहीं है , बल्कि भारतवर्ष में प्राचीन काल से रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति आर्य है। इसलिए हम सब का प्रत्येक का पावन उत्तरदायित्व है कि हम वेद की वाणी को स्वीकार करें। उसी का अनुसरण करें। क्योंकि वेद सब सत्य ज्ञान विज्ञान के भंडार हैं और संसार में जितने भी सत्य विद्या उपलब्ध हैं ,उनके आदि स्रोत हैं । वेद ज्ञान किसी व्यक्ति विशेष या वर्ग विशेष के लिए न होकर संपूर्ण मानवता के लिए है , इसलिए वेद पर प्रत्येक व्यक्ति का समान अधिकार है।
अतः साहित्यिक दृष्टिकोण से उत्कृष्टतम हैं ।जिनको ऋषि-मुनियों ने ,साधक तपस्वियों ने ,विद्वान मनीषियों ने, आत्मसात करके धर्म के वास्तविक स्वरूप को प्रत्यक्षीकरण द्वारा केवल अपने ही जीवन को सार्थक नहीं किया अपितु इनमें जो रहस्य छिपे हुए हैं उन्हें जनसाधारण के लिए भी स्पष्टीकरण करके सुगम बना दिया। हम इनकी श्रेष्ठता, महिमा व गरिमा का कहां तक वर्णन करें ,यह तो उस परमपिता परमात्मा की अमृतवाणी है। वास्तव में अमृत कहीं मिलता नहीं , ना ही उसका कहीं कोई खजाना है, अमृत स्वयं ईश्वर है । उनकी वेदवाणी है , जो इसका रसास्वादन करता है अर्थात वेदवाणी को ग्रहण करता है , उसका रसिक है , वह वह उस ‘रसिया’ ईश्वर का प्रियतम होता है।
परमात्मा की सृष्टि बहुत ही चित्र विचित्र है ।यह भी तो उसकी सुंदर रचना है। उसकी कलाकृति है अर्थात काव्य है ।इसीलिए वेद में प्रभु को ‘कवि मनीषी’ कहकर संबोधित किया है।
वेदों में यत्र तत्र अनेक इस प्रकार की अलंकारिक गाथाएं हैं जिनके यदि वास्तविक अर्थों को न समझा जाए उनका जो आशय अथवा अभिप्राय है उसको न जानकर केवल मात्र शब्दों का प्रचलित रूढ़िगत अर्थ मान कर चलते हैं तो अनर्थ हो जाता है । जो अधिकांश रूप में असंभव प्रतीत होने लगती है और उनसे आज के वैज्ञानिक युग में जब तर्कसंगत व समुचित अर्थ नहीं बनते तो उपहास की अथवा श्रद्धा के नाम पर प्रवंचना की वस्तु हो जाती है । अतः यह आवश्यक है कि हम उनके सही – सही अर्थों को जानें और उस गहराई ऊंचाई पर पहुंचने के लिए उनके यौगिक अर्थ को समझने की नितांत आवश्यकता प्रतीत होती है ।इसके कारण ही अज्ञान का अंधकार छंटेगा। आर्ष साहित्य ,वैदिक साहित्य में ज्ञान का अपार भंडार है।
साहित्य का अर्थ भी यही है ‘हितेन सहितम’ अर्थात जो सबके हित का साधन हो वह साहित्य है। परंतु चाहे शिल्पी कोई हो और उसने किस वृतांत को के संदर्भ में क्यों प्रस्तुत किया है ? इसको ग्रहण करने व समझने के लिए हमें भी उसी पृष्ठभूमि से चिंतन करना होगा अन्यथा अनर्थ करके अज्ञानता का प्रसारण किया करते हैं।
जैसे बहुत से शब्द बहु अर्थी होते हैं। संस्कृत का एक वाक्य ‘सेंधव म आनय’ के शाब्दिक अर्थ हैं घोड़ा लाओ , दूसरा नमक लाओ । अब यदि कोई व्यक्ति भोजन करते हुए आदेश स्वरूप यह वाक्य उच्चारे तो नमक अर्थ होगा और युद्ध भूमि को जाता हुआ योद्धा इसी आदेश का पालन कराए तो यहां तात्पर्य अश्व होगा। स्पष्ट है कि प्रकरण अनुसार एक ही वाक्य उसके पूर्णतया भिन्न-भिन्न अर्थ हुए। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम सही और उचित अर्थ का प्रयोग करें।
भारतीय साहित्य इन्हीं विस्तृत मानदंडों के अंतर्गत ही समझा या पढ़ा जा सकता है।
क्या अहिल्या पत्थर की शिला थी ? क्या ऋषि गौ मांस खाते थे ? क्या कुंभकरण छह मास सोता था ?क्या कृष्ण 16,000 गोपियों के पति थे ? क्या महाराज अगस्त्य ने तीन आचमन में ही समुद्र को निगल लिया था ? अथवा क्या हनुमान ने सूर्य ही मुंह में रख लिया था ? क्या रावण के 10 सिर व 20 भुजाएं थीं ? विष्णु का चतुर्भुज रूप क्या है ? समुद्र मंथन के 14 रत्न क्या हैं ? अथवा अक्षय क्षीर सागर वीणा या नारद का वास्तविक अर्थ क्या है ? गणेश क्या है ?शिवलिंग क्या है ? गंगा अवतरण क्या है ? कैलाशपति शिव कौन है ? अथवा विष्णु या दुर्गा किसको कहते हैं ?
वास्तव में यह सब अलंकारिक विषय हैं और इन्हें तभी समझा जा सकता है जबकि इनके वास्तविक मर्म को तार्किक दृष्टि से जानने का प्रयास करें। इतना ही नहीं हमारे वैदिक साहित्य में भी प्रक्षेप किया गया है। जिसको समय – समय पर सही किया गया है। प्रक्षेपों के कारण ही महाभारत व रामायण को काल्पनिक कहा जाने लगा।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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