दलाई लामा के नाम से क्यों इतना चिढ़ता है चीन?

images (44)

अभिनय आकश

तिब्बत को लेकर चीन हमेशा से ही काफी चौकस रहता है। इसकी असली वजह यह है कि तिब्बत उसका धोखे से कब्जाया हुआ क्षेत्र है। राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा। दलाई लामा ने 1959 में निर्वासन में शुरू हुए एक बिखरे हुए आंदोलन को अकेले दम पर दुनिया में वैधता और मान्यता दिलवाई है। साथ ही दुनिया में अकेले शख्स है जो चीनियों की कमजोर नस को प्यार से दबा सकते हैं।

यह 1950 के दशक के मध्य की बात है जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पिता शी झांगशुन कि तिब्बत की युवा दलाई लामा से पेकिंग में मुलाकात हुई थी और दोनों में दोस्ती हो गई थी। दलाई लामा ने उन्हें घड़ी भेंट की थी जो वे 1980 तक पहनते रहे थे। इस बात की पुष्टि दलाई लामा के राजदूत ने की थी जब उस वक्त वो बीजिंग में शी से मिले थे। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ जो चीन दलाई लामा का नाम सुनते ही आंखे तरेरने लग जाता है, उसके चेहरों की हवाईयां उड़ने लगती है। सत्तर सालों बाद शी झांगशुन के बेटे आज भी दलाई लामा से इतनी ही नफरत करते हैं जितना प्रेम किसी वक्त में उनके पिता किसी जमाने में दलाई लामा से किया करते थे। दलाई लामा ने कभी कहा था कि जिस दिन तिब्बत चीन का क्षेत्र बन गया तो यह केवल तिब्बत का अंत नहीं होगा बल्कि चीन भारत के लिए भी एक स्थायी खतरा बन जाएगा। इतने सालों बाद आज ये बात ठीक नजर आ रही है। आज तिब्बत का पूरा इतिहास, दलाई लामा से चीन के खौफ की वजह और चीन द्वारा धोखे से तिब्बत पर कब्जे की पूरी कहानी बताएंगे। साथ ही तिब्बत को लेकर इतिहास में भारत की नीतियों के बारे में भी बात करेंगे।

तिब्‍बत को लेकर चीन हमेशा से ही काफी चौकस रहता है। इसकी असली वजह यह है कि तिब्‍बत उसका धोखे से कब्‍जाया हुआ क्षेत्र है। आकार के लिहाज से तिब्‍बत और चीन में काफी अंतर नहीं है। चीन की सेना ने यहां पर लोगों का शोषण किया और आखिर में वहां के प्रशासक दलाई लामा को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था।

तिब्बत का इतिहास

राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा। ईसा से एक शताब्दी पूर्व मगध के एक राजा ने तिब्बत के विभिन्न समुदायों को संगठित किया था। यह सम्बंध अनेक वर्षों तक बना रहा। 7वीं शताब्दी तक मध्य एशिया के एक भू-भाग पर तिब्बत का आधिपत्य रहा। उन दिनों सोंगत्सेन गैम्पो तिब्बत के शासक हुआ करते थे। यह साम्रज्य उत्तर में तुर्कीस्तान और पश्चिम में मध्य एशिया तक फैला था। 763 में तिब्बतियों ने चीन की तत्कालीन राजधानी चांग यानी आज के शियान को अपने कब्जे में ले लिया था। तब से लेकर ढाई सौ सालों तक चीन की राजधानी तिब्बत के अधीन रही थी। चंगेज खान और मंगोल साम्रज्य का नाम इतिहास में आपने खूब पढ़ा होगा। 12वीं सदी के दौर में मंगोल साम्राज्य विस्तार के दौर में मंगोल ने चीन पर हमला कर दिया और 1280 के करीब चीन ने मंगोल के सामने घुटने टेक दिए।

तिब्बत का सवाल

विडंबना यह है कि 1644 में चिंग राजवंश द्वारा स्थापित मूल चीन 1911 के विद्रोह में ध्वस्त हो गया, जिससे एक नए गणराज्य का मार्ग प्रशस्त हुआ। शाही चीन के विघटन और आधुनिक चीन के एकीकरण का काम लगभग 50 वर्षों के कालखंड में हुआ। उस दौर की शुरुआत विदेशी शक्तियों, ईसाई मिशनरियों, स्थानीय धर्मांतरित लोगों के खिलाफ़ अशांति से हुई थी और उसकी पूर्णता लॉन्ग मार्च के साथ अंतत: अक्टूबर 1949 में माओ द्वारा, महज 15 साल के संघर्ष और हिंसक लड़ाई के बाद, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) की स्थापना के साथ हुई। चेयरमैन माओत्से तुंग के एजेंडे में तिब्बत को हड़पना (और दंडित करना) शामिल था, जिसे उन्होंने ’चीन की दाहिनी हथेली’ कहा था, जबकि लद्दाख, सिक्किम, भूटान, नेपाल और अरुणाचल प्रदेश हथेली की ‘पांच अंगुलियां’ हैं। चीन ने 7 अक्टूबर 1950 को तिब्बत पर अपने आक्रमण के साथ भारत का सामना किया और न केवल तिब्बत और भारत की बल्कि पूरे एशिया की स्थिरता को खतरे में डाल दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अंग्रेजों से परामर्श की सलाह दी गई, जिन्होंने सुझाव दिया कि ‘तिब्बत के लिए भारत से जो हो सकता है वो करना चाहिए… सैन्य सहायता दिए बिना,’ और ‘तिब्बती स्वतंत्रता को मान्यता देने से इनकार करना चाहिए। यह महसूस करते हुए कि तिब्बत नाममात्र के प्रतिरोध से अधिक कुछ भी करने में असमर्थ है. नेहरू ने ब्रिटिश सरकार की सलाह को मान लिया जैसा कि 18 नवंबर 1950 के एक नोट में खुलासा किया गया है कि ‘न तो भारत और न ही कोई बाहरी शक्ति तिब्बत के चीनी अधिग्रहण को रोक सकती है।’ इस रुख को अपनाने और सैन्य विषमता पर विचार करते हुए, नेहरू ने भारत की चिंताओं को देश की सुरक्षा और सलामती सुनिश्चित करने, तिब्बत पर चीनी दावे को स्वीकार करने और चीन के साथ दोस्ती को आगे बढ़ाने तक सीमित कर दिया।

शिमला में बैठक

1912 ईस्‍वी में चीन से मांछु शासन का अंत होने के साथ तिब्बत ने अपने को दोबारा स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया था। सन् 1913-14 में बैठक शिमला में हुई, जिसमें इस विशाल पठारी राज्य को भी दो भागों में विभाजित कर दिया गया। इसमें पूर्वी भाग जिसमें वर्तमान चीन के चिंगहई एवं सिचुआन प्रांत हैं उसे इनर तिब्‍बत कहा गया। जबकि पश्चिमी भाग जो बौद्ध धर्मानुयायी शासक लामा के हाथ में रहा उसे आउटर तिब्‍बत कहा गया। जो इतिहास की भयंकर भूल है। गृहमंत्री सरदार पटेल ने नवम्बर, 1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में परिस्थितियों का सही मूल्यांकन करते हुए लिखा- “मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि चीन सरकार हमें शांतिपूर्ण उद्देश्यों के आडम्बर में उलझा रही है। मेरा विचार है कि उन्होंने हमारे राजदूत को भी “तिब्बत समस्या शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने” के भ्रम में डाल दिया है। मेरे विचार से चीन का रवैया कपटपूर्ण और विश्वासघाती जैसा ही है।” सरदार पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को “किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा” कहा है। भविष्य में इसी प्रकार के उद्गार देश के अनेक नेताओं ने व्यक्त किए। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने चीनियों को तिब्बत का लुटेरा, राजर्षि टण्डन ने चीन सरकार को “गुण्डा सरकार” कहा। इसी प्रकार के विचार डा. भीमराव अम्बेडकर, डा. राम मनोहर लोहिया, सी. राजगोपालाचारी तथा ह्मदयनाथ कुंजरू जैसे विद्वानों ने भी व्यक्त किए हैं।

यह इतिहास तथा भूगोल का सामान्य छात्र भी जानता है कि भारत के तिब्बत के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सम्बंध अत्यन्त प्राचीन हैं। तिब्बत को विश्व की छत कहा गया है। स्वामी दयानन्द ने इसे “त्रिविष्टप” अर्थात् स्वर्ग कहा है, साथ ही आर्यों का आदि देश माना। सम्राट हर्षवर्धन कालीन तिब्बत के सम्राट सौगंत्सेन गैम्पों (617-649 ई.) के काल में उसने चीन को परास्त कर वहां की राजकुमारी वैन चैंग से विवाह किया तथा नेपाल की राजकुमारी भृकुटी से भी विवाह किया। तभी उन्हें भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा भी भेंट में मिली और तभी से बौद्ध धर्म वहां का धर्म बन गया। इसी समय तिब्बती यात्री थानंमी सान का भारत आना हुआ तथा भारत की भाषा तथा व्याकरण के आधार पर तिब्बती भाषा को संजोया गया।

दलाई लामा के नाम से क्यों इतना चिढ़ता है चीन?

गहरे कत्थई रंग का लबादा ओढ़े इस भिक्षु के प्रति चीन में एक विशेष किस्म का रोष अब भी व्याप्त है। वहां उन्हें हर तरह की गालियां दी गई हैं। दलाई लामा की मेजबानी को रोकने या फिर शांति सुख व भाईचारे जैसे उनके प्रवचनों के प्रसार को बाधित करने के लिए चीनी लोगों ने सरकार पर दवाब डाला है, नागरिक समाज को डराया धमकाया है और स्वयंसेवी संस्थाओं को धमकाया है कि अगर उन्होंने ऐसा कुछ किया तो उनसे सहयोग वापस ले लिया जाएगा। दलाई लामा हालांकि आज अपनी उम्र के 85 वें पड़ाव पर भी एक रॉकस्टार बने हुए हैं और बराक ओमामा से लेकर रिचर्ड गेरे और डेसमंड टूटू तक हर प्रभावशाली व्यक्ति उन्हें बराबर का सम्मान देता रहा है। असलियत यह है कि दलाई लामा ने 1959 में निर्वासन में शुरू हुए एक बिखरे हुए आंदोलन को अकेले दम पर दुनिया में वैधता और मान्यता दिलवाई है। साथ ही दुनिया में अकेले शख्स है जो चीनियों की कमजोर नस को प्यार से दबा सकते हैं भले ही दलाई लामा ने तिब्बत को छोड़ दिया था लेकिन वहां उनके चाहने वालों की तादाद काफी बड़ी है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपने अलावा किसी और संगठन या नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकती जिस का जनाधार इतना बड़ा हो।

13वें दलाई लामा ने 1912 में तिब्बत को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।
करीब 40 साल बाद चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया।
चीन ने तब आक्रमण किया जब 14वें दलाई लामा को चुनने कि प्रक्रिया चल रही थी।
तिब्बत को इस लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा था।
1950 में चीनी सेनाओं ने तिब्बत पर बलपूर्वक कब्जा कर लिया।
दलाई लामा के नेतृत्व में चीन के खिलाफ आजादी के लिए विद्रोह हुआ।
बाद में 14वें दलाई लामा तेंजिन ग्यात्सो को तिब्बत छोड़ना पड़ा।
1959 में दलाई लामा अपने कई समर्थकों के साथ भारत आए।
उस समय उनकी उम्र सिर्फ 23 साल की थी।
दलाई लामा को भारत में शरण मिलना चीन को अच्छा नहीं लगा।
तब चीन में माओत्से त्युंग का शासन था।
चीन और दलाई लामा के बीच तनाव बढ़ता गया और उसे डर सताता रहा कि वो भारत के साथ मिलकर कोई साजिश न रचें।

निर्वासन में आजादी

तिब्बत पर चीन के हमले के बाद दलाई लामा को पूर्ण राजनीतिक सत्ता देने के लिए बुलाया गया। उन्होंने लासा और बीजिंग के बीच अधिकारों के बंटवारे पर चीन के साथ 17 सूत्रों वाला एक समझौता किया।

1954 में बीजिंग में चेयरमैन माओ त्सेतुंग, झाउ एन लाइ और देंग स्याओ से मिलने गए।
1956 में बुध की 2500 वीं जयंती पर्व दिल्ली आए लेकिन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन्हें तब लौट जाने को कहा। लेकिन 1959 में जब वे ल्हासा से भागकर आए तो नेहरू ने उनका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। वे तब से ही मैकलियोडगंज में रह रहे हैं।
1963 में उन्होंने तिब्बत के लिए एक लोकतांत्रिक संविधान का मसौदा तैयार किया जिसमें निर्वासित तिब्बतियों सरकार के काम करने के लिए दृष्टि दिशा निर्देश थे।
1989 में दलाई लामा को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया।
1990 में भारत और दुनिया के 33 देशों में निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों ने 11वीं तिब्बती असेंबली के लिए एक व्यक्ति एक मत के आधार पर 46 सदस्यों का चुनाव किया।
2000 में करमापा लामा धर्मशाला आए।
2011 में उन्होंने तिब्बती असेंबली से कहा कि वे अपनी पदेन सत्ता को त्यागना चाहते हैं। इस तरह दलाई लामाओं को मिली दोहरी अध्यात्मिक और राजनीतिक सत्ता का अंत होता है।
दलाई लामा एक ऐसे देश के निर्वासित शासक हैं जिसका न तो दुनिया के राजनीतिक नक्शे में कोई जिक्र बचा है और न धर्मशाला से चलने वाली उनकी निर्वाचित सरकार को किसी देश ने मान्यता दी है। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दलाई लामा की गिनती सबसे लोकप्रिय और सम्मानित व्यक्तियों में होती है। उनकी लोकप्रियता का राज उनकी सादगी, करूणा, अहिंसा, सार्वभौमिक जिम्मेदारी का विचार है। भारत में उन्हें यहां के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न देने की मांग भी हो रही है।

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
orisbet giriş
orisbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
parobet giriş
parobet giriş