‘उगता भारत’ का संपादकीय : भारत के भाल अजीत डोभाल का अभिनंदन

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किसी भी देश की राजनीति को सुचारू रूप से संचालित करने में राजनयिकों का बहुत बड़ा योगदान होता है । राजनयिक लोग जितने अधिक सुलझे हुए गंभीर और अनावश्यक प्रचार प्रसार की भावना से अपने आपको बचाकर रखने वाले होते हैं उतने ही वह देश के लिए अधिक उपयोगी हो पाते हैं । सफल राजनय के माध्यम से राजनीतिक लोग दो देशों के बीच आ रहे किसी भी प्रकार के गतिरोध को बातचीत के माध्यम से सुलझाने में सफल होते हैं । इतना ही नहीं वह अपने इन प्रयासों को इस दृष्टिकोण से पूर्ण करते हैं कि उनके अपने देश के हितों पर उनकी बातचीत का कोई विपरीत प्रभाव न पड़े बल्कि उनके अपने देश का सम्मान भी बचा रहे हो और बात भी बन जाए ।

हमारे यहाँ वैदिक आर्ष ग्रंथों में राजनयिकों के बारे में कई प्रकार की व्यवस्थाएं मिलती हैं । रामायण, महाभारत सहित कई स्मृतियों में राजनयिकों के कार्य कर्तव्यों का वर्णन किया गया है । वर्तमान राजनीति के लिए आदर्श प्रेरणा पुंज के रूप में कौटिल्य का अर्थशास्त्र काम करता है । इसमें उच्च कोटि की शासन व्यवस्था, सरकार, राजा तथा नीतिशास्त्र के विषय में ऐसी जानकारी दी गई है जिसे पढ़कर आज के भी राजनीतिक हस्तियों को दांतो तले उंगली दबानी पड़ जाती है । राजनीति के प्रकांड पंडित महामति चाणक्य ने अपने इस ग्रंथ में प्रथम खण्ड के सोलहवें अध्याय में राजनय व राजदूतों के कार्यों के बारे में विस्तार से वर्णन किया है। इसका सातवां खण्ड विदेश नीति, संधियों और राष्ट्रीय हितों की रक्षार्थ किए जाने वाले उपायों से संबंधित है ।
किसी भी देश की विदेश नीति तभी सफल मानी जाती है जब उसकी नीति के परिणाम देश के हितों के अनुकूल आते हैं । यदि कहीं पर भी देश के हितों को गिरवी रखती हुई नीति दिखाई देती है तो उसे सफल विदेश नीति नहीं कहा जा सकता । उसके विषय में मानना पड़ेगा कि राजनयिक और राजनेता दोनों ही सफल विदेश नीति का निर्वाह करने में असफल हुए हैं। ‘नय’ शब्द का अर्थ ही नीति से है , राजनेता और राजनयिक में यही अंतर होता है कि राजनयिक बोलता नहीं है और वह अपनी नीति का सफलतापूर्वक निर्वाह करने के लिए शांत मन होकर अपना काम करता रहता है । वह पर्दे के पीछे से देश का संचालन करता है , जबकि राजनेता पर्दे पर आकर अपनी बात रखता है ।
विद्वानों का मानना है कि किसी भी देश की नीति के गुणों का मूल्यांकन उनके द्वारा सम्पादित कार्यों के परिणामों के आधार पर किया जा सकता है। उत्तम इच्छाओं के गलत परिणाम खराब नीति के द्योतक हैं। द्वितीय, राजनीति की प्रेरणा तथा उनके परिणाम दोनों ही चूंकि मानव द्वारा निर्मित हैं अतः परिकलनीय है।
भारत में इस समय अजीत डोभाल भारत के भाल के रूप में काम कर रहे हैं । देश के लोगों में अपने इस राजनयिक के प्रति असीम प्रेम देखा जा रहा है । इसके उपरांत भी वह कभी पर्दे पर आकर या मीडिया से रूबरू होकर आत्मप्रशंसा में या अपने कार्य की योजना के बारे में कुछ नहीं बोलते । उनकी कार्यशैली से देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्र की आराधना करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है । इस समय देश के युवाओं के लिए श्री डोभाल आइकॉन बन चुके हैं।
भारत और चीन के बीच चल रहा तनाव ऐसी स्थिति में पहुंच चुका था कि कभी भी युद्ध का बिगुल बज सकता था , परंतु अभी चीन पीछे हटने के लिए सहमत हो गया है। इसके पीछे हमारे इसी राजनयिक का मस्तिष्क काम कर रहा था । अजीत डोभाल ने को चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ बातचीत की। मीडिया में आई खबरों के अनुसार डोभाल के साथ बातचीत का ही परिणाम है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास गलवन घाटी में अब चीनी सेना पीछे हट गयी है। एनएसए डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी की बातचीत पूरी तरह से और स्थायी तौर पर शांति वापस लाने और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए एक साथ काम करने पर केंद्रित रही।
श्री डोभाल प्रत्येक विषम परिस्थिति में सरकार के लिए संकट मोचन का कार्य करते रहे हैं । चीन के द्वारा जिस प्रकार पिछले दिनों भारत को घेरने , तंग करने या अपना सैनिक दबदबा दिखाकर भारत को डराने की कोशिशें की जा रही थीं , उस पर श्री डोभाल पहले दिन से ही नजर गड़ाए हुए थे। समाचार यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो लद्दाख जाने का अचानक प्लान बना वह डोभाल की रणनीति का हिस्सा था। उनकी इस रणनीति का सकारात्मक परिणाम भी निकला । प्रधानमंत्री मोदी को सीमा पर दहाड़ते देखकर ड्रैगन डर गया । उसे यह आभास हो गया कि भारत इस समय दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है । साथ ही वह यह भी समझ गया कि मोदी ने अपने रणनीतिक कौशल के अंतर्गत सारे विश्व का समर्थन अपने लिए प्राप्त कर लिया है । ऐसे में अब भारत को हाथ लगाने का अर्थ होगा चीन का विनाश करा लेना । अजीत डोभाल यह भली प्रकार जानते थे कि श्री मोदी के लेह जाने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव चीन पर क्या पड़ेगा ? उन्होंने ही यह रणनीति भी बनाई कि जैसे ही श्री मोदी मनोवैज्ञानिक रूप से चीन को परास्त कर घर लौट आएंगे , वैसे ही चीन के साथ वह अपने स्तर पर बातचीत आरंभ कर देंगे ।
डोभाल ने ऐसी योजना बनाई के प्रधानमंत्री के लेह जाने की भनक किसी को भी नहीं लगी । इतना ही नहीं चीनी घुसपैठ के प्रयास को सफल कराने में भारत ने जिस प्रकार की अपनी रणनीति का परिचय दिया उसमें भी डोभाल का ही मस्तिष्क काम कर रहा था। श्री डोभाल पहले दिन से ही सरकारों को यह परामर्श देते आए हैं कि शत्रु के समक्ष डटे रहना चाहिए , भागना नहीं चाहिए । क्योंकि युद्ध से जितना हम डरते हैं उतना ही शत्रु भी डरता है । हम यदि मैदान छोड़ देंगे तो वह बिना लड़े ही बहादुर हो जाएगा । जबकि उसकी बहादुरी की अकड़ निकालने के लिए जरूरी है कि मौके पर डटकर खड़ा रहना चाहिए। यही कारण है कि भारत में चीन को इस बार आक्रामक ढंग से जवाब दिया । भारत की पूरी रक्षा तैयारी देखकर चीन पहले दिन से ही ठिठक गया था।
समाचार एजेंसी एएनआइ के अनुसार, भारतीय सेना के सूत्रों ने कहा कि पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में पीछे हटने को लेकर दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति बनी है। इसमें पैट्रोलिंग प्वाइंट 14 (गलवन घाटी), पीपी -15, हॉट स्प्रिंग्स और फिंगर एरिया सम्मिलित है।
इस समय इस समय जैसी परिस्थितियां भारत चीन सीमा पर बन चुकी थीं ,उन्हें देखकर सारा विश्व इस बात को लेकर आशंकित था कि कभी भी तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो सकती है । परन्तु अजीत डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ टेलीफोन पर बातचीत करके ही तनाव के गंभीरतम क्षणों को टलाने में सफलता प्राप्त कर ली। इस संबंध में, वे आगे इस बात पर सहमत हुए कि दोनों पक्षों को एलएसी पर पीछे हटने की प्रक्रिया को शीघ्रता से पूरा करना चाहिए। दोनों पक्षों को सीमा पर चरणबद्ध तरीके से पीछे हटना सुनिश्चित करना चाहिए। इस बात पर भी सहमति व्यक्त की गई कि एनएसए अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी द्विपक्षीय समझौते और प्रोटोकॉल के अनुसार भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में शांति की स्थायी बहाली सुनिश्चित करने के लिए अपनी बातचीत जारी रखेंगे।
इसके उपरांत भी हम अपने देश के नेतृत्व से यह अपेक्षा करते हैं कि सीमा की सुरक्षा के संबंध में किसी प्रकार की शिथिलता या प्रमाद चीन जैसे शत्रु से एक महंगा सौदा पड़ सकता है । यह मानना चाहिए कि चीन पीछे नहीं हटा है । इसमें उसकी कोई चाल भी हो सकती है । विश्व जनमत को भारत के साथ आता हुआ देखकर चीन समय के अनुसार पीछे हट गया हो यह भी संभव है । उसकी योजना यह भी हो सकती है कि समय आने पर भविष्य में वह भारत को सबक सिखाएगा । इसलिए चीन के प्रति पूरी चौकसी ओर सावधानी बरतने की आवश्यकता है । इस सबके उपरांत भी श्री डोभाल के प्रयत्न , उनका साहस , सूझबूझ और देशभक्ति निश्चय ही अभिनंदनीय है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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