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भारतीय संस्कृति

देवता और दैत्य का अंतर

वेद का संदेश है कि मनुष्य जितेंद्रीय बने अर्थात अपनी इंद्रियों पर विजय पाये। लेकिन इंद्रियों को जीतने की बात करने से पहले इंद्रियों के बारे में जान लेना भी अच्छा होगा।
प्राय: सभी जानते हैं कि इंद्रियां 10 प्रकार की हैं ; – पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियां। दसों इंद्रियों के विषय में पूर्व के प्रस्तर में विस्तारपूर्वक विवरण उपलब्ध है। तीनों शरीर स्थूल, सूक्ष्म और कारण ।
कारण के बिना जीव की योनि का निर्धारण शरीर का धारण नहीं हो सकता। जो शरीर हम प्राप्त कर रहे होते हैं वह कोई न कोई कारण से प्राप्त होता है। यहां तक कि संसार में बंधु – बांधव , माता – पिता सगे – संबंधी तथा हमारे यहां आने वाले पशु – पक्षी सभी के प्राप्त होने के पीछे भी पूर्व जन्म का कारण होता है। जिनसे हमारा पूर्व जन्म का कर्म फल भी जुड़ा होता है और प्रारब्ध भी साथ – साथ चलता है। पूर्व का कर्म फल भाग्य व प्रारब्ध बनाता है।

बाद में शरीर बनता है , पहले भाग्य बनता है। एक वास्तविकता है कि जिस मनुष्य ने दसों इंद्रियों को वश में किया हो , वह साधारण मनुष्य नहीं होता बल्कि देवता लोग उसी को ब्राह्मण की संज्ञा देते हैं ।भारतवर्ष राष्ट्र की उच्च परंपराओं, रीति-रिवाजों ,संस्कृति और सभ्यता में वास्तव में मौलिकता का दर्शन होता है। प्रभु से मिलने की चाह व राह के लिए प्राणी मनुष्य आयु पर्यंत प्रयास करता है। यहां यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित उच्च कोटि के आदर्श विश्व में अन्यत्र कहीं परिलक्षित नहीं होते। यह हमारे लिए गर्व एवम् गौरव का विषय है ।प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में ऐसे ही उच्च आदर्शों का पालन करते हुए मात्र एक ही शब्द जो उक्त श्लोक का प्रथम शब्द जितेंद्रिय है, का अनुकरण करें तो ,हर मनुष्य भी महापुरुष बन जाएगा। सभी को यह प्रेरणा लेनी चाहिए। तभी संसार से छल, कपट, धोखा ,बेईमानी ,पाप , अधर्म समाप्त हो पाएगा।

अंतर्द्वंद

बड़ा भयंकर युद्ध चल रहा है ।बड़ा रहस्यमय युद्ध है। दोनों तरफ की सेना रणक्षेत्र में युद्धरत हैं , परंतु दिखती नहीं हैं । दोनों ओर से सेनापति प्राण – पण से युद्ध कर रहे हैं ।दोनों ही ओर के रथी ,अतिरथी, महारथी अपना-अपना युद्ध कौशल का परिचय दे रहे हैं। इस युद्ध का समय मानव के विकास से लेकर अद्यतन चल रहा है और सृष्टि के अंत तक चलता रहेगा। सृष्टि समाप्त हो जाएगी तभी समाप्त होगा। ऐसे रहस्य मय युद्ध से मैं भी साधारण बुद्धि वाला कैसे अलग रह सकता हूं ?
मैं भी उस युद्ध में शामिल हो गया। एक तरफ महारथियों का सेनापति मन है । मन जो अपने आप में अनेकानेक आयामों को छुपाए रखता है ।मन बड़ा बलवान ,बड़ा बेईमान है, बड़ा चलायमान है ।इसकी गिरफ्त में जो आ गया वह बच नहीं पाया ।इसके यहां सिद्धांत पानी भरते हैं,और बेमौत मरते हैं । संसार के उत्तम से उत्तम पदार्थ, अर्थात विषय संबंधी वस्तु आकर्षित करती है। मन के साम्राज्य में सिद्धांत एवं शिवसंकल्पमस्तु का उद्घोष असफल हो जाता है।
परंतु दूसरी ओर की सेना भी कम नहीं है , जिनकी अधिपति व सेनापति आत्मा है जो धर्म के अनुसार व्यवहार करने का निर्देश करती है।आत्मा के महारथी हैं धैर्य रखना, दूसरा क्षमा, तीसरा दम , चौथा अस्तेयम् चोरी त्याग , पांचवा शौच , छठा इंद्रिय निग्रह , सातवां धी,आठवां विद्या ,नवा सत्य, दसवां अक्रोद्ध।
इन गुणों को धारण करने के बाद आत्मा बलवती होती है अर्थात आत्मा की सेना की जीत हो जाती है और मन की सेना पराजित हो जाती है।
उदाहरण के तौर पर एक तरफ से विद्या महारथी है। जो आदेश दे रहा है कि जो सत्य है उसको उसी रूप में स्वीकार कर ।लेकिन नहीं कभी मद के कारण तो कभी मोह के कारण, सत्य को सत्य स्वीकार नहीं किया जाता ,तो हम मन के कारण द्वंद्व में फंस जाते हैं । युद्ध में घिर जाते हैं।
दम रूपी महारथी का आदेश है कि मन को कुमार्ग से रोककर मन को सन्मार्ग पर लगा। धर्म में प्रवर्त कर ,लेकिन काम , अहंकार आदि अपना नया आदेश दे रहे हैं। अब जो इस अंतर्द्वंद से, इस युद्ध से बच गया, और धर्म के 10 लक्षणों को पहचान कर उनका अधिपति बन गया। वही तो जीवन को सफल कर गया ।उसी को मुक्ति की युक्ति मिल गई। वह परब्रह्म के शरण में चला गया। वह ईश्वर की अनंत अनुकंपा का पात्र बन गया ,जो देवासुर संग्राम में दिव्य गुणों की जीत को प्राप्त कर गया।

दैत्य और देव

रावण को दशानन कहते हैं , क्योंकि वह चार वेद और 6 शास्त्रों का ज्ञाता था, जो उसको कंठस्थ थे ,अर्थात उसके मुख या जिव्हा पर रखे होते थे, 10 ग्रंथों को कंठस्थ करने वाला प्रकांड पंडित था रावण ।इसलिए दशानन कहते हैं। उसके वास्तव में 10 सिर और 10 मुंह नहीं थे । यह केवल मूर्खता है , ऐसा समझना या ऐसा बताना, लेकिन वह घमंडी था और निंदा, स्तुति, मान, अपमान, हानि, लाभ ,सुख, दुख में समान व सहनशील नहीं था ।
राम की स्तुति उसको पसंद नहीं थी । राम की निंदा में प्रसन्न होता था। इस प्रकार उसके अंदर धृति का अभाव था, और न ही उसके अंदर क्षमा का भाव था । उसका मन धर्म में प्रवृत्त होकर अधर्म करने से रुका नहीं। इसीलिए दम का भी अभाव था, सीता को कपट पूर्वक छल से, वन की पर्णकुटी से पर स्त्री को वेद विरुद्ध कार्य कर हरण करके ले गया ।इसके अलावा शुचिता भी नहीं थी। वह अंदर व बाहर से एक समान नहीं था। रावण में इंद्रिय निग्रह का भी अभाव था। उसके अंदर विद्या भी नहीं थी , क्योंकि विद्या वह होती है जो सत्य को सत्य स्वीकार करती कराती है।
अब प्रश्न उठता है कि जिस व्यक्ति को चार वेद और छह शास्त्र कंठस्थ हो , वह विद्याहीन कैसे हो सकता है? इसके उत्तर के लिए विद्या की परिभाषा को समझना होगा ।विद्या अर्थात पृथ्वी से लेकर परमेश्वर पर्यंत यथार्थ ज्ञान अर्थात जैसा आत्मा में वैसा मन में ,जैसा मन में वैसा वाणी में ,और जैसा वाणी में वैसा व्यवहार में , व कर्म मे लाना ही विद्या है। इस कसौटी पर रखकर देखें तो रावण विद्यावान ,विद्वान, पंडित कहलाने का अधिकारी नहीं है ।रावण के अंदर क्रोध और अहंकार भी बहुत था , इसीलिए रावण जैसे महारथी का दुखद अंत हुआ।
भारतवर्ष में या आर्यावर्त में 33 करोड़ लोग एक काल में निवास करते थे । सारे लोग दिव्य गुणों से ओतप्रोत थे, सर्वत्र शांति ,सुख, संयम, साधना, सफलता, सत्य का बोलबाला था। इसलिए उस समय तक की आर्यावर्त की समस्त जनसंख्या को देवता कहते थे ।आज भी जन श्रुति है कि भारतवर्ष में 33 करोड़ देवता निवास करते हैं। यह जनश्रुति उसी समय से प्रचलित है। यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक होगा कि 33 करोड़ देवता और कोई नहीं होते , इसके विपरीत सभी केवल भ्रांति है।
वर्तमान में रावण जैसों की संख्या बढ़ रही है ।वर्तमान भारत की जनसंख्या सवा अरब से ऊपर हो चुकी है। लेकिन आज यहां कितने देवता निवास करते हैं ? शायद मुट्ठी भर लोग होंगे।
जो धर्म के विपरीत आचरण करता है वही राक्षस है। इसलिए रावण को दशानन होने के बावजूद राक्षस कहते हैं ।जो धर्म का पालन करते हैं, जो धर्म की मर्यादा पर चलते हैं ,जो समाज के और लोक लिहाज के नियमों को मानते हैं,जो भारत की प्राचीन सभ्यता संस्कृति के वाहक हैं, वे आज भी देवता हैं, क्योंकि देवता और राक्षस मनुष्य के शरीर में ही होते हैं। लेकिन जिसके अंदर मनुष्यता के गुण , कर्म , स्वभाव और प्रवृतियां होती हैं उसे देवता और जिसमें नहीं होती हैं उनको राक्षस कहते हैं। जो धर्म का पालन करते हैं वे देवता जो नहीं करते हैं वे राक्षस होते हैं।
राक्षसों का शरीर कहीं भी नहीं होता , राक्षसों के सिर पर सींग नहीं होते । राक्षसों के लंबे दांत नहीं होते। राक्षसों के चेहरे कुरुप भी नहीं होते , बल्कि वह हमारे अंदर ही छिपे होते हैं । हमारे जैसे शरीर में होते हैं।
गर्भ में भ्रूण हत्या इसलिए करा देना कि होने वाला बच्चा लड़की है ,ऐसा मनुष्य राक्षस है। अर्थात शिक्षित और दीक्षित बहुत हैं । कथा सुनने वालों की अपार भीड़ लगी है। कथा में दान देकर पुण्य का भागी बनना और फिर दान देकर उस पर गर्व और गौरव दिखाना ।अपने किए हुए दान का व्याख्यान करना कराना जैसे कार्य करने वाले पुण्य के भागी नहीं हो सकते ।यह सब नीति के विरुद्ध है,। लेकिन आज के कुछ गुरु भी इसी प्रकार के हैं जो कथा में उपदेश करते हैं। लेकिन निजी जिंदगी में ये गुरु उपदेश के ,प्रवचन के, कथा के पांच-पांच लाख लेते हैं। शिष्य के कान में नाम देते हैं ।शिष्य को नाम देने के नाम पर धर्म भीरु बनाते हैं कि किसी को नाम बताना नहीं। ऐसे धर्मगुरु अपनी तयशुदा रकम को प्राप्त करने के लिए आयोजकों से झगड़ते हैं। उनकी कथनी और करनी में अंतर होता है । यह गुरु वास्तव में हो ही नहीं सकते।
जो वेद की शिक्षा के विपरीत कार्य कर रहे हैं, उनके सामने बैठी हुई भोली भाली भीड़ पर भी उनके उपदेश का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता । उनके द्वारा कही गई कथा शिष्यों में आती नहीं है ।कथा में भीड़ कितनी आई यह महत्व नहीं बल्कि कथा कितने लोगों में आईं यह महत्वपूर्ण है ।ऐसे लोग रावण कुल के हैं जो रावण की तरह अपने लिए सोने की लंका का निर्माण करना चाहते हैं ,जो अपने लिए सुख साधन और ऐश्वर्य जुटा रहे हैं ।
परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि रावण रूपी गुरुओं को गायत्री मंत्र का अर्थ समझ में आ जाए। परमात्मा ऐसे गुरुओं को सन्मार्ग की तरफ प्रेरित करें। ताकि ऐसे गुरुओं की कथनी व करनी में अंतर नहीं रहे ।इनके उपदेश में प्रभावोत्पादक हो , जिससे शिष्यों के जीवन में प्रकाश फैले। ऐसे गुरु विरजानंद जिन्होंने दयानंद जैसे शिष्य के हृदय में प्रकाश फैला या।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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