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भारतीय संस्कृति

कैसे हो ज्ञानी की पहचान ?

सर्व भूते हिते रता, की भावना जिस व्यक्ति के भीतर मिलती है समझिए कि वह वास्तविक ज्ञानी है । जो तन से निस्वार्थ भाव से जनहितार्थ कार्य करता है , वही ज्ञानी है। माया के मर्म को समझने वाला ही ज्ञानी है।
जो पुत्र की शादी करके पुत्र के लिए छल कपट से कार, कोठी ,बैंक बैलेंस बढ़ाकर द्रव्य संचय करके मर जाता है वह मूढ है । इसके विपरीत जो व्यक्ति पुत्र को सदाचारी और आत्मज्ञानी बनाकर संसार से विदा लेता है और इसी में पुत्र का परमहित समझता है ,वही ज्ञानी है। जो मर्म को समझ कर धर्म के रूप में अंगीकार कर ले , वही ज्ञानी है।

तन से सेवा ,मन से प्रेम।
बुद्धि से निष्ठा कर लो नेम।।

जिस व्यक्ति की ऐसी भावना हो जाती है समझो कि वह ज्ञानी है। जो दृश्यमान जगत को मिथ्या न समझ कर बल्कि नाशवान मानकर उसको सीढी सम साधन मान ले , जो ईश्वर जीव , प्रकृति की पृथक – पृथक सत्ता को पहचान ले,एवं अदृश्य ब्रह्म को सत्य जान व मान लेता है , वही ज्ञानी है।

जो वर्तमान को ठीक प्रकार से समझे और स्थितप्रज्ञ होकर परिस्थिति के अनुसार आचरण करे , वह ज्ञानी है। जो वर्तमान को प्रभु की सर्वोत्तम भेंट समझे ,जो प्रगति पथ पर आरूढ़ होने के लिए अग्रसर है , जिसमें आत्मविश्वास है तथा परमात्मा में जिसकी आस्था है ,श्रद्धा है ,वही ज्ञानी है।

जिंदगी को समझना है तो मुझको देख।
कह गया टूट के एक बुलबुला बहते बहते।।

जो पानी के इस बुलबुले से सबक ले ले , वही ज्ञानी है। जो आत्ममंथन करता है ,जो आत्म चिंतन करता है, जो आत्मसाक्षात्कार करता है, जो अपने आपको पहचानता है, जो अपने अंतर्मन से स्वयं वार्ता करता है ,जो मन पर बुद्धि की लगाम लगाता है, जो अपनी दिव्य शक्ति को पहचानता है, जो समाज को नेतृत्व एवं गति देता है, वह ज्ञानी है ,जो काया और माया के चक्कर में या भवर में नहीं फंसता है वह ज्ञानी है।
माया अर्थात संस्कृत में’ मा’ का अर्थ ‘नहीं ‘होता है तथा ‘या ‘का अर्थ होता है कि है भी या नहीं , इसको इस प्रकार समझ लेना चाहिए कि माया केवल माया है, वह वास्तव में है नहीं ।वह केवल छल है। वह सदैव अस्तित्व में रहने वाली नहीं है। जो इस मर्म को समझ गया , वह ज्ञानी है।
‘काया ‘का संधि विच्छेद करने पर ‘का’ का तात्पर्य क्या से है ‘या ‘अर्थात है भी कि नहीं । इसी प्रकार यह सिद्ध हुआ कि क्या यह काया हमेशा हमेशा रहने वाली है भी कि नहीं। निश्चित रूप से काया और माया दोनों ही सदैव नहीं रहने वाली है बल्कि दोनों ही नाशवान हैं , दोनों ही चलायमान हैं।इसको जो समझ ले , वह ज्ञानी है।
जो काया और माया के अतिरिक्त अहम केंद्रिता से भी दूर है , वह ज्ञानी है ।जो धन पद पाने की लालसा में नहीं, वह ज्ञानी है।
जो मंत्र विद नहीं , बल्कि आत्मविद है ,वह ज्ञानी है।जो ब्रह्म सत्य और जगत नाशवान इस भावना को दृढ़ करके रूपात्मक जगतपिता जगदीश्वर, समस्त सृष्टि के आधार, जगदाधार , जगताकार, सृजनहार वृत्ति का बोध रखता है, वह ज्ञानी है।
जो कारण शरीर ,सूक्ष्म शरीर ,स्थूल शरीर तीनों का दर्शन करता है ,वह ज्ञानी है। जो दसों इंद्रियों को अपने वश में कर लेता है ,जो प्रतिदिन स्वाध्याय करता है, जो धर्म का आचरण करता है, वह ज्ञानी है।
जो मृत्यु को याद रखता है, जो भोगों से दूर है, जो संसार में रहकर संसार में लिप्त नहीं रहता, जो कीचड़ में कमल की तरह खिलता है, जो जन्म व मृत्यु दोनों को प्रतीति भ्रांतिमान समझ गया, जैसे जल में तरंग, स्वर्ण में आभूषण ,मृतिका में घट आदि की उत्पत्ति विनाश की स्थिति की भांति अपने देह आदि की उत्पत्ति व विनाश को मानता है, वही ज्ञानी है। जबकि वास्तव में उत्पत्ति और विनाश होता ही नहीं है ।
जैसे बार-बार मरने के लिए केवल कफन का कपड़ा ही बदलता है पर लाश वही होती है। इस स्थिति को ज्ञानी अपने ज्ञान से देखता है, क्योंकि असत् की तीन काल प्रतीति नहीं होती। किंतु आत्मा था, आत्मा है, और आत्म रहेगी ।इसलिए आत्मा सत्य है। सत और आत्मा चेतन है ।आत्मा साक्षी है ,इसको जो पहचान गया – वह ज्ञानी है। शरीर में छिपा हुआ चेतन जिसको दिखाई देता है और जो उसकी चेतावनी को स्वीकार करता है ,वही ज्ञानी है।
जो नियत ,नीति,नियति, अर्थात नियंता में परस्पर संबंध को समझ लेता है, वही ज्ञानी है ।जिसने काम, क्रोध ,मद ,लोभ ,मोह के घूंघट उतार कर ‘पिया मिलन’ की राह में कदम रख दिए वही ज्ञानी है। जिसका दर्शन बदल गया ,जिसकी दृष्टि बदल गई, जिसकी मानसिकता बदल गई, जिसकी सदप्रवृत्ति जाग गई, वह ज्ञानी है। जो दान देता है पर अभिमान नहीं करता। गुणगान करने के लिए दान नहीं देता ,वह ज्ञानी है ।इसलिए आत्म विद बनो ।आत्म संयम करो। क्योंकि बकौल शायर :–

उजाले बांटते फिरते हैं सारी दुनिया को ।
खुद अपने घर में रोशनी का मातम है।।
तू संभल ए राही कुछ सबक ले ले ।
कहां जा रहा है तू ए जाने वाले ।
मन में अंधेरा तू दिया तो जला ले।।

उपरोक्त गुणों को अंगीकार करोगे तो एक दिन ज्ञानी बन जाओगे ।संसार से नेह करोगे तो दुख का कारण भी उत्पन्न होगा। प्रभु से नेह करो।

हमारी तमन्नाओं ने हमें अंधा बना दिया ।
वरना हम खुद खुदा होते।।

इसलिए छोड़ दो अपनी तमन्नाओं को और अब भी अंत में सीख जाओ कि :–

जीना है तो जीने की एक ऐसी अदा हो जा ।
अरे जो देखे खुदा तो कह दे आ मेरा खुदा हो जा।।

जो जितेंद्रिय ,शुभ गुणों को धारण करने वाला ,मुमुक्षु, तत्ववेत्ता, सम दृष्टा, मर्मज्ञ एवं अदृश्य उत्तरदायित्व को समझने वाला, परनिंदा, परछिद्रान्वेषी की भावना से ऊपर उठकर कार्य करने वाला है, वही वास्तव में ज्ञानी है :–

जितेंद्रिय धर्म पर: स्वाध्याय निरतः शुचि।
काम क्रोधवशे यस्य तम देवा ब्राह्मण विदु।।

भावार्थ जो जितेंद्रिय अर्थात जिसने दसों इंद्रियों को जीत लिया हो, जो धर्म के अनुसार आचरण करता हो, जो स्वाध्याय करता हो, और जो निरंतर पवित्र बना रहता हो,अर्थात मन वचन और कर्म से पवित्र, काम और क्रोध जिसके बस में हो उसी को देवता लोग ब्राह्मण कहते और ऐसा ब्राह्मण ही ज्ञानी कहा जाता है , रावण जैसा ब्राह्मण ज्ञानी नहीं कहा जा सकता। बल्कि उसको विद्वान होते हुए ब्राह्मण होते हुए राक्षस कहते हैं , इसलिए जीवन में बहुत समझदारी से चलने की आवश्यकता है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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