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भाजपा को आपातकाल से जो सबक सीखना चाहिए था, वह उसने नहीं सीखा

कुलदीप नायर

आपातकाल में जो हुआ वह संविधान के बुनियादी ढांचे को संशोधन के दायरे से बाहर मानने वाले आजादी के योद्धाओं तथा संविधान निर्माताओं का अपमान है। लेकिन राष्ट्रपति के एक आदेश के सहारे उन्होंने चुनाव और नागरिक अधिकारों को स्थगित कर दिया।

नोट- वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय कुलदीप नायर वर्षों तक नियमित रूप से लिखते रहे। स्वर्गीय नायर साहब का आपातकाल पर लिखा यह आलेख दिनाँक 27 जून 2018 को प्रकाशित हुआ था। चूँकि नायर साहब स्वयं आपातकाल के दौरान जेल में रहे और इंदिरा शासन की अलोकतांत्रिक नीतियों का खुलकर विरोध किया इसीलिए आपातकाल पर लिखा उनका कोई भी आलेख आज भी सामयिक है।

राष्ट्र के इतिहास में कई तिथियां इतनी महत्वपूर्ण होती हैं कि उन्हें भुलाया नहीं जा सकता है। ऐसी ही एक तारीख 25 जून है, जब उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र की बत्ती बुझा दी थी। चुनाव में अवैध तरीके अपनाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने पर उन्होंने संविधान स्थगित कर दिया था और बेहद ज्यादतियां की थीं। एक लाख लोगों को बिना सुनवाई के हिरासत में रखा गया और कई लोग मार दिए गए या गायब कर दिए गए, क्योंकि वे इंदिरा गांधी के कट्टर विरोधी थे।

काफी देर बाद कांग्रेस पार्टी जिसका नेतृत्व इंदिरा गांधी करती थी, ने यह शासन थोपने के लिए खेद व्यक्त किया जिसमें कोई व्यक्तिगत आजादी नहीं थी और प्रेस को खामोश कर दिया गया था। लेकिन उन्हें काफी पहले ही राष्ट्र से माफी मांगनी थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 43 साल पहले जो हुआ उसे सुधार नहीं सकते, लेकिन कम से कम राष्ट्र को यह कह सकते हैं कि उनकी दादी और पार्टी, दोनों गलत थे।

बाद में, मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी सत्ता में आई तो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेसी शाह ने आपातकाल की ज्यादतियों की जांच की और श्रीमती गांधी के विरोधियों समेत लोगों पर की गई ज्यादतियों को उजागर किया। शाह कमीशन की रिपोर्ट एक मूल्यवान दस्तावेज है जिससे कई सबक सीखे जा सकते हैं।

इसे स्कूल तथा कालेज के पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनाना चाहिए कि आपातकाल के 21 महीनों में राष्ट्र को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। लेकिन भारत में अभी की किताबों में मुस्लिम शासकों के लेकर इतने पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं कि इतिहासकारों ने उनकी आलोचना की है। वास्तव में, हिंदुत्व की सनक ने देश के हर राज्य को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। लगता है कि नौकरशाही का भी भगवाकरण हो गया है।

संविधान अभी भी एक पवित्र ग्रंथ है। लेकिन मुझे डर है कि 2019 के चुनावों में भाजपा तिहाई बहुमत पाने का प्रयास करेगी और अगर उसे यह बहुमत मिल जाता है तो वह संविधान को बदल देगी। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 तथा अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने वाली विविधता की भावना उसके निशाने पर होगी। भाजपा जो आरएसएस की राजनीतिक शाखा है, सेकुलरिज्म की सोच को कमजोर करने की कोशिश करेगी।

आपातकाल में जो हुआ वह संविधान के बुनियादी ढांचे को संशोधन के दायरे से बाहर मानने वाले आजादी के योद्धाओं तथा संविधान निर्माताओं का अपमान है। लेकिन राष्ट्रपति के एक आदेश के सहारे उन्होंने चुनाव और नागरिक अधिकारों को स्थगित कर दिया। उस अवधि में गिरफ्तार किए गए उनके राजनीतिक विरोधियों को जेल में यातना दी गई और हजारों को मार या गायब कर दिया गया। अन्य अत्याचार भी हुए जिसमें उनके बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में चले लाखों का सामूहिक बंध्याकरण शामिल है।

आपातकाल में हुई ज्यादतियों की जांच के लिए बने शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट तीन भागों में दी− अंतिम भाग अगस्त 1978 में सौंपी गया। अगर रिपोर्ट के सिर्फ आकार को ही लिया जाए तो इसके छह अध्याय, 530 पेजों में दिए गए तीन अनुबंध लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा नैतिक मूल्यों के साथ हुई हिंसा की घोरता को दर्शाते हैं। यह शासन व्यवस्था के साथ हुई छेड़छाड़ और इसे पहुंचाए गए नुकसान पर चिंता भी व्यक्त करती है।

जस्टिस शाह ने तुर्कमान गेट की घटना जिसमें मकान तोड़ने की कार्रवाई के खिलाफ लोगों के विरोध−प्रदर्शन करने वाली भीड़ पर पुलिस ने गोली चलाई थी, में पुलिस की कार्रवाई और संजय गांधी की भूमिका पर भी चर्चा की थी। वास्तव में, 1980 में सत्ता में वापस आने पर श्रीमती गांधी ने जहां भी संभव हुआ वहां से रिपोर्ट उठवा ली थी। यह रिपोर्ट इतना नुकसान पहुंचाने वाली थी कि उन्होंने अपने हर दांव का उपयोग किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

लेकिन डीएमके के संस्थापक सदस्यों में से एक और उस समय सांसद इरा सेझियन ने उस रिपोर्ट की कापी किताब की शक्ल में फिर से प्रकाशित की जिसका नाम था− ”शाह कमीशन रिपोर्ट−खोई और ढूंढ़ निकाली हुई’। इसमें उन्होंने ठीक ही कहा था, ”यह सिर्फ एक जांच रिपोर्ट नहीं है यह एक शानदार ऐतिहासिक दस्तावेज है जो भविष्य में सत्ता में आने वालों को सावधान करती है कि वे एक गतिशील लोकतंत्र के बुनियादी−ढांचे से छेड़छाड़ न करें और निरंकुश शासन से दबे लोगों को भी आजादी वापस पाने के लिए दिलोजान से संघर्ष करने की आशा भरी राह बताती है।

लेकिन लगता नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी जिसने आपातकाल में सबसे ज्यादा तकलीफें सही, ने वह सबक सीखा है जो उसे सीखना चाहिए था। श्रीमती इंदिरा गांधी पर एक व्यक्ति के शासन की सनक सवार थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आरएसएस के निर्देश पर उसी घोड़े पर सवार हैं और राष्ट्र को एक मायने देने वाले विविधता से भरे समाज को बदलना चाहते हैं।

वास्तव में, लोग मोदी के शासन की तुलना श्रीमती गांधी के शासन से करने लगे हैं। यह इस हद तक है कि ज्यादातर अखबार तथा टेलीविजन चैनलों ने सोच में न सही, कार्यशैली में उनके हिसाब से अपने को बदल लिया है जैसा उन्होंने इंदिरा गांधी के शासन में किया था।

बुजुर्ग भाजपा नेता एलके आडवाणी ने कुछ समय पहले कहा था कि आपातकाल को दोहराए जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के शासन के तरीके की हंसी उड़ाते हुए कहा कि नेताओं का अहंकार तानाशाही की ओर ले जाता है। संयोग से, आपातकाल−विरोध के कारण आडवाणी को झिड़की देने के लिए भाजपा ने उन्हें उस कार्यक्रम में नहीं आमंत्रित किया जिसमें आपातकाल में जेल जाने वालों को सम्मानित किया गया।

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को जिस तरह फेंक दिया गया, वही साबित करता है कि भाजपा के अगले कदम के बारे में कुछ भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। पार्टी ने उन्हें बताए बगैर समर्थन वापस ले लिया जिससे राज्य में राष्ट्रपति शासन अनिवार्य हो गया। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उचित ही वर्तमान परिस्थितियों के लिए भाजपा और पीडीपी दोनों को जिम्मेदार बताया है। वास्तव में, ज्यादातर विपक्षी नेताओं की भावना थी कि अव्वल तो यह गठबंधन होना ही नहीं चाहिए था।

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