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भारतीय संस्कृति

परमात्मा और जीव का संबंध

आत्मा परमात्मा का बालक है।जैसे एक मनुष्य का बालक अपने माता – पिता की आज्ञा के अनुसार कार्य करने पर उन्नत होता है ,उसी प्रकार आत्मा प्रभु की आज्ञा में चलकर ही उच्च बनता है।
प्रभु की कौन सी आज्ञा है ?
प्रभु ने ज्ञान दिया जो अपनी बालक आत्मा को दिया। उसी ज्ञान को प्राप्त करके आत्मा उच्च होता है। यह विद्या परमात्मा की दी हुई है। इसी ज्ञान और विद्या का सदुपयोग करके तथा वेद के अनुकूल अपने कार्य करके जीवन उच्च हो जाता है अर्थात सुंदर बन जाता है और जीवात्मा ऐसा हो जाता है , जैसे सूर्य तीन लोकों को तपायमान करने वाला है ,आत्मा भी अपने जीवन को इसी प्रकार बना लेता है।

मानव को संसार में आकर क्या प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए ?
मानव को संसार में आकर त्रिविद्या पाने का प्रयास करना चाहिए।
त्रि विद्या कौन-कौन सी हैं?
ज्ञान, कर्म और उपासना।
इन 3 विद्याओं को आकाशगंगा ,अंतरिक्ष लोकों की गंगा और मृतमंडल की गंगा कहते हैं।
सर्वप्रथम यह तीन विद्या किसके पास आईं ?
सर्वप्रथम ब्रह्मा ने त्रिविद्या को जानकर उसके प्रकाश को समझ कर संसार को ज्ञान कराने के लिए वेद वाणी ऋषियों पर अवतरण की और इन ऋषियों ने मनुष्य के लिए प्रसारित की।
मृत मंडल की गंगा कौन सी बह रही है ?
जिसमें हम कर्म करते हैं। जो कर्मकांड है। जो कर्म है।
वास्तव में यही कर्म एक प्रकार की विद्या होती है।
अंतरिक्ष लोकों की गंगा कौन सी है ?
अंतरिक्ष लोकों की गंगा ज्ञान गंगा है। जो सरस्वती है।
तीसरी गंगा यमुना है , जो उपासना कांड की विद्या है।
उपासना कांड में क्या होता है ?
उपासना कांड में आत्मा – परमात्मा के समक्ष पहुंच जाता है।
ज्ञान ,कर्म और उपासना को प्राप्त करने से क्या सिद्ध होता है ?
मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ज्ञान , कर्म व उपासना की त्रिविद्या कहां से प्राप्त की जा सकती है ?
वेद ही विद्या हैं। वेद ही प्रकाश है, वेद ही ज्ञान है,वेदों में यह तीनों विद्याएं दी हुई हैं।
यही तीनों विद्या गंगा, यमुना, सरस्वती कही जाती हैं।
तो क्या गंगा ,यमुना व सरस्वती का संगम भौतिक जगत के प्रयागराज में नहीं है ?
नहीं ,यह सब कल्पित है।
तो फिर सरस्वती नदी कौन सी है ?
ज्ञान को सरस्वती भी कहा जाता है।इस प्रकार गंगा
कर्मकांड की नदी ,यमुना नदी उपासना तथा सरस्वती ज्ञान की नदी के नाम है ।
त्रिवेणी क्या है ?
ज्ञान, कर्म ,उपासना त्रिविद्या ही त्रिवेणी है।
इड़ा ,पिंगला और सुषुम्ना क्या है ?
गंगा ,यमुना ,सरस्वती। इन्हीं को हमारे यहाँ कर्म से आकाशगंगा ,मृत्युलोक की गंगा और पातालगंगा भी कहा जाता है।
कहां से कहां तक बहती हैं ?
मूलाधार से ब्रह्मरंध्र तक।
कहां बहती हैं ?
इस 9 द्वारों वाले शरीर के अंदर रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ।
इस शरीर को पवित्र करने वाली कौन है ?
आत्मा रूपी गंगा। जब तक यह आत्मा रूपी गंगा इस शरीर को पवित्र रखती है। तब तक ही यह पवित्र माना जाता है और जब यह आत्मा शरीर से निकल जाती है। शरीर निष्प्राण हो जाता है तो शरीर अपवित्र हो जाता है, गलने व सड़ने लगता है।
मोक्ष किसको प्राप्त होता है ?
जो आत्मा उपरोक्त तीनों विद्याओं को जानने वाला हो जाता है, अर्थात उसमें स्नान करता है, पवित्र होता है।
क्या योगी इन्हीं त्रिविद्याओं के माध्यम से पवित्र होते हैं ?
अवश्यमेव , त्रिविद्या में स्नान करके आत्मा का उत्थान होता है।
आत्मा कब निर्मल होती है ?
जब आत्मा इन तीनों विद्याओं को जान लेती है तो वह निर्मल हो जाती है। मानव तभी कर्म कांड करता हुआ ध्यान में लीन हो जाता है । समाधि में जाने लगता है ।
आत्मा और प्राणों की संधि को कैसे जाना जाता है ?
आत्मा जब यह जान लेने की कोशिश करता है कि उसकी और प्राणों की संधि कैसे होती है तो इसके लिए योगी मूलाधार में जाता है।
मूलाधार में से ही त्रिवेणी की उत्पत्ति होती है , जिन्हें गंगा ,यमुना ,सरस्वती कहते हैं।जब मानव योगाभ्यासी बनकर मूलाधार में ध्यान करके रमण करता है तब उसको मृत्यु लोक गंगा का ज्ञान होता है।
मूलाधार में कुल कितनी ग्रंथियां खुल जाती हैं ?
छः ।
मूलाधार के पश्चात आत्मा कहां जाता है ?
नाभि चक्र में। इसी नाभि चक्र को प्रह्नद चक्र, सुअग्नि चक्र भी कहते हैं। जिसमें 12 ग्रंथियां खुल जाती हैं। नाभि चक्र में और भी बहुत सारी नाड़ियां नाड़ियों से मिली होती हैं । यहां पहुंचकर आत्मा निर्मल होने लगता है। इसी गंगा, जमुना, सरस्वती में आत्मा स्नान करके पवित्र होती है। इसी को गंगोत्री भी कहते हैं। नाभि चक्र को हरि का द्वार भी कहा जाता है। नाभि चक्र शरीर का केंद्र है जो ऊपर और नीचे के शरीर में करीब करीब मध्य में स्थित होता है। इस नाभि चक्र पर अधिकार हो जाने से योगी की तेजस्विता बढ़ जाती है। इसमें संयम करने से शरीर की बनावट का ज्ञान हो जाता है। शरीर त्रिदोष वात , पित्त और कफ और सात धातु त्वचा, चर्म, मांस , स्नायु,अस्थि ,मज्जा और शुक्र का समुदाय है।
इस चक्र में संयम करने से योगी को समस्त शरीर का कि वह किस प्रकार उपर्युक्त वस्तुओं से बना है और उनके संग्रह का ज्ञान हो जाता है।
मानव शरीर में प्रयागराज, मधुबन,काशीपुरी ,अयोध्या कहां है ?
अलग-अलग चक्रों में स्थित है।
भौतिक नदी गंगा क्या मानव मुक्ति का साधन नहीं है ?
बिल्कुल नहीं।क्योंकि मानव स्थूल तीर्थों की कल्पना द्वारा स्थापित करके भटक रहा है ।भौतिक नदी गंगा को ही आज का मानव मुक्ति का साधन अपनी अज्ञानता से समझ बैठा है। इस गंगा से तो केवल भौतिक शरीर ही स्वच्छ किया जा सकता है या प्यासे को उसके स्वच्छ जल से प्यास बुझा कर संतुष्ट किया जा सकता है।
नाभि चक्र के बाद आत्मा कौन से चक्र में जाता है ? मधुर आत्मा प्राण के साथ बैठा हुआ गंगाओं में रमण करता हुआ हृदय चक्र में, जिसे अनाहत चक्र कहते हैं, जिसको गणों का द्वार कहते हैं, उन गणों के समक्ष आता है। वह गण जो अंधकार में रहते हैं, उनकी अंधकारता/ अज्ञानता दूर हो जाती है ।उन गणों का भी उद्धार हो जाता है।
नाभि चक्र व हृदय चक्र में ध्यान अवस्था में योगी पहुंच जाता है तब उसे आकाशगंगा का ज्ञान होता है।
इससे ऊपर उठता हुआ आत्मा कहां जाता है ?
आत्मा गंगा, यमुना, सरस्वती में स्नान करता हुआ आगे चलता है तो कंठ चक्र में जाता है ।जिसको विशुद्धि चक्र तथा काशीपुर कहा जाता है। काशी में नाना प्रकार के मधुबन हैं। यहां आत्मा को नाना कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
क्योंकि कंठ में अनेक प्रकार की विश वस्ती आती है।
लेकिन कंठ चक्र में आत्मा का जो साथी प्राण हैं वह उसकी सहायता करता है।
प्राण को हम जान चुके हैं कि वह इस सृष्टि का प्रारंभ करने वाला है ।हमारे शरीर को बनाने वाला है ।इसलिए वह आत्मा का सारथी हो जाता है। यही प्राण कंठ चक्र से ऊपर ले चलने में आत्मा की सहायता करता है। प्राण सारी ग्रंथियों को खोलता चलता है। कंठ चक्र पर संयम करने से योगी को बाह्य की विस्मृति और आंतरिक कार्यों को करने की शुरुआत हो जाती है।
कंठ चक्र से आगे चलकर आत्मा कहां पहुंचता है ?
आगे चलकर आत्मा जहां पहुंचता है इस स्थान को प्रयागराज कहते हैं। आत्मा इस प्रयाग में स्नान करके पवित्र एवं स्वच्छ हो जाता है। तथा आगे बढ़ता है।
इससे ऊपर आत्मा कहां जाता है ?
इससे ऊपर चल कर आज्ञा चक्र से आत्मा उठता है जिसे त्रिवेणी में पहुंच जाना कहा जाता है । इस पर योगी जब संयम कर लेता है तो शरीर पर प्रभुत्व ,नाड़ी और नसों में स्वाधीनता आ जाती है। जहां गंगा ,जमुना, सरस्वती तीनों की धाराएं एकाकार हो रही होती है। यह वेद की त्रिविद्या हैं। इन्हीं त्रिविद्या ज्ञान, कर्म और उपासना से हम त्रिवेणी में पहुंच जाते हैं। जहां देवासुर संग्राम होता रहता है और आत्मा प्राणों सहित त्रिवेणी में स्नान करता होता है।
यहां से आगे और क्या होता है,?
उस त्रिवेणी में स्नान करते ही सब दैत्य अर्थात बुरे विचार अलग हो जाते हैं, दूर हो जाते हैं तथा सुविचार या देवता अलग हो जाते हैं। उसी त्रिवेणी, त्रिविद्या में स्नान करके यह आत्मा स्वच्छ और पवित्र हो जाती है ।इसी त्रिवेणी में स्नान करते हुए यह आत्मा त्रिवेणी से उपरी स्थान में स्नान करने चला जाता है।
ब्रह्मरंध्र कहां आता है?
आत्मा त्रिवेणी से भी ऊपर स्थान पर जाता है और जब आत्मा त्रिवेणी से ऊपर जाता है उस स्थान को ब्रह्मरंध्र कहते हैं। उस स्थिति में योगी को सर्व प्रकार का प्रकाश अर्थात ज्ञान हो जाता है।
इसमें योगी की आत्मा को ब्रह्मलोक की गंगा का ज्ञान होता है।
ब्रह्मरंध्र कहां हैं शरीर में ?
ललाट से करीब 3 इंच ऊपर जहां तीनों खोपड़ियां का संगम स्थल है।
क्या-क्या होता है ब्रह्मरंध्र में ?
ब्रह्मरंध्र में पहुंचते ही 100 सूर्यो के समान प्रकाशआत्मा को प्राप्त हो जाता है और उसकी दृष्टि 100 गुना हो जाती है। तत्पश्चात आत्मा कौन से चक्र में जाता है ?
शंख चक्र में।
किसके माध्यम से जाता है,?
रीड की हड्डियों के भाग में जाकर के शंख चक्र की सब ग्रंथियों खुल जाती हैं।
इससे योगी को क्या लाभ होता है ?
ऐसा होने पर योगी को प्रज्ञा बुद्धि प्राप्त हो जाती है।
प्रज्ञा बुद्धि का क्या कार्य है ? परमात्मा से मिलन कराती है। उस परमात्मा से जो हम सबका स्वामी हैं जिसके गर्भ में यह संसार बस रहा है। उस परमात्मा की गोद में हैं और परम आनंद को प्राप्त करते हैं। परमानंद में रमण करने लगते हैं। इस प्रकार यह त्रिविद्या ही तीन गंगा है। इन तीन गंगाओं में स्नान करने से हृदय पवित्र हो जाता है ।आत्मा महान बन कर संसार सागर से पार हो जाती हैं।
मोक्ष में जाने वाली आत्मा ब्रह्मरंध्र से ही शरीर छोड़ दिया करती हैं।
परमानंद को आत्म कब प्राप्त होती है ?
जब यह आत्मा इस शरीर रूपी क्षेत्र में आकर के उच्च कर्म करता हुआ प्रकाश और ज्ञान का संचय करता हुआ कर्मों का फल भोगना समाप्त कर लेता है , तब यह परमानंद को प्राप्त करता है।
परमात्मा को आत्मा कैसे पा लेता है ?
जब यह आत्मा उस परमात्मा को जानकर के इस स्वर्गीय सृष्टि का जानने वाला बन जाता है उस समय जीव परमात्मा को जानने वाला बनकर परमात्मा को पा लेता है।
रूपांतर क्या है ?
समय आने पर यह सृष्टि भी नहीं रहेगी और इस जीवन का और सृष्टि का रूपांतरण हो जाएगा।
रूपांतरण होने से पहले जीव को क्या करना चाहिए ?
— ज्ञान प्राप्ति।
वह कैसे संभव है ?
मानव को दूरदर्शी होना चाहिए । उसको समझ लेना चाहिए कि यह शरीर सृष्टि नहीं रहनी है तो इससे पहले ही हम ज्ञान को प्राप्त कर लें। शुद्ध ज्ञान के साथ नम्रता आ जाती है। जहां ज्ञान नहीं होता वहाँ विनम्रता भी कभी नहीं आती । हृदय में नम्रता का अंकुर प्रस्फुटित होना चाहिए। उसी से जीवन में उज्जवलता, मनोहरता और माधुर्य पैदा होता है। जब ज्ञान होता है उसी काल में आज्ञा पालन करने की क्षमता माता पिता के कहे के अनुसार अथवा वेद की विद्या के अनुसार चलना, कार्य करना जीव में आ जाता है। ज्ञान से ही नम्रता और धर्म में आस्था होती है।
धर्म की क्या महत्ता है ?
हमारे हृदय में धर्म की आस्था हो, अंतः करण और वाणी में नम्रता हो ,यही धर्म का सबसे बड़ा लक्षण माना गया है।
इसलिए मानव को नम्रता पूर्वक धर्म के प्रति रुचि, आस्था रखकर धर्म के लिए कर्तव्य पालन में लग जाना चाहिए।
मानव को बुद्धि पूर्वक एवं महत्वपूर्ण विचार करने चाहिए। इस प्रकार से मानव के जीवन की रूपरेखा बदलकर महान बन जाती है। मानव को सुंदर रूपरेखा बनाने चाहिए। यही मानव का कर्तव्य है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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