विजय सिंह पथिक और उनके साथियों ने कर दी थी देश की आजादी की एक तारीख निश्चित

जयंती के अवसर पर विशेषजब देश के स्वाधीनता संग्राम में सत्याग्रह और असहयोग आन्दोलन की बात चले तो इतिहास का कोई भी जिज्ञासु विद्यार्थी विजय सिंह पथिक को महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तित्व से भी पहले इसलिए नमन करना चाहेगा कि गांधीजी ने ‘पथिक’ के पथ का ‘पथिक’ बनकर उनसे बहुत कुछ सीखा था। यही कारण है कि इस महान व्यक्तित्व का भारतीय समकालीन इतिहास में अपना ही महत्व है।
पथिक जी का बचपन का नाम भूपसिंह था। इनका जन्म उत्तर प्रदेश में बुलन्दशहर जनपद के गुठावली नामक ग्राम में एक गुर्जर परिवार में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का स्वर्गवास हो जाने के कारण पथिक जी अपनी बड़ी बहन के पास इन्दौर जाकर रहने लगे थे। जहाँ उनके बहनोई राजकीय सेवा में कार्यरत थे।

उन दिनों देश में क्रान्तिकारी आन्दोलन का बोलबाला था। क्रान्तिकारियों को लोग बड़े सम्मान से देखते थे। जिस युवा में थोड़ी सी भी देशभक्ति की भावना प्रबल होती दिखती थी वह या तो स्वयं क्रान्तिकारियों को ढूंढऩे लगता था या क्रान्तिकारी स्वयं उसे ढूंढ लेते थे। ‘पथिक’ जी को भी उन दिनों ऐसी ही इच्छा थी।
”जहां चाह होती है वहां राह होती है” इस बात को चरितार्थ करते हुए इस क्रान्तिकारी युवा को शचीन्द्र नाथ सान्याल का सम्पर्क मिल गया। उधर शचीन्द्र को भी किसी ‘पथिक’ की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने भी पथिक की प्रतिभा को प्रथम भेंट में ही पहचान लिया। प्रारम्भ से ही कुछ विषम परिस्थितियों का सामना करने के कारण तथा अपने आपको देश सेवा के लिए समर्पित कर देने वाले ‘पथिक’ को अधिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला।
भूपसिंह अब विजय पथ का ‘पथिक’ बन चुका था, उसे पराधीनता के ऊंचे पहाड़ को लांघना था, क्योंकि वह जानता था कि इसी पहाड़ की ओट में स्वाधीनता का सूर्य छिपा है। अत: वह शचीन्द्र नाथ सान्याल तथा रासबिहारी बोस के साथ मिलकर सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन में सक्रिय भूमिका का निर्वाह करने लगे। शचीन्द्र नाथ सान्याल तथा रासबिहारी बोस उन दिनों ‘अभिनव भारत’ समिति के द्वारा देश में सशस्त्र क्रान्ति की एक सुदृढ़ योजना बना रहे थे।

जबकि राजस्थान में उन दिनों ‘वीर भारत सभा’ नाम का एक गुप्त क्रान्तिकारी संगठन कार्य कर रहा था। देश के युवाओं की मचलती जवानी उन दिनों किसी न किसी ऐसे क्रान्तिकारी संगठन की खोज में रहती थी जो देश को स्वाधीन कराने में विशेष भूमिका निभाना चाहता हो या निभा रहा हो। देशभक्ति थी जो वीरों के सिर चढ़कर बोलती थी। गोलियां खाना और गोलियां (किसी फिरंगी को) खिलाना उस समय के यौवन का सिनेमा था, मनोरन्जन का साधन था और जीवन का ध्येय था। ‘पथिक’ जी भी इसी सिनेमा के मनोरन्जन में समय व्यतीत करने लगे थे।तोड़ेदार बन्दूकों की कहानीउन दिनों भारत की सेना को पुलिस की पुरानी ता़ेड़ेदार बन्दूकों के स्थान पर नई राइफलें दी गयीं थी। राजस्थान सरकार ने पुरानी बन्दूकें बाजारों में बिकवाने की योजना बनायी। इसका कारण यह था कि उन दिनों रियासतों में शस्त्र रखना प्रतिबंधित था। एक तोड़ेदार बन्दूक के साथ उन दिनों कुछ कारतूस भी दिये जाते थे। पर कुछ समय के पश्चात ये कारतूस दिये जाने बन्द कर दिये गये। जिससे तोड़ेदार बन्दूकें सस्ती हो गयीं। क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस ने भूपसिंह को अजमेर भेजा कि वह तोड़ेदार बन्दूक वहां जाकर एकत्र कर ले।
भूपसिंह अजमेर जाते हैं। उन्होंने अवसर का लाभ उठाने के लिए सर्वप्रथम अजमेर के रेलवे स्टेशन पर एक वर्कशॉप में नौकरी की , जिससे कि बन्दूकों की मरम्मत करने और खाली कारतूसों को भरने का काम सीखा जा सके।

दिनकर जी के शब्दों में कहें, तो पथिक जी का जीवनोद्देश्य यह था-

”समर शेष है इस स्वराज्य को सत्य बनाना होगा।
जिसका है यह न्याय उसे सत्वर पहुंचना होगा।।
गंगा का पथ रोक इन्द्र के
गज जो अड़े हुए हैं,
कह दो , उनसे झुकें अगर तो जग में यश पाएंगे।
अड़े रहे तो ऐरावत
पत्तों से बह जाएंगे।
समर शेष है, यह प्रकाश
बन्दी घर से छूटेगा।
और नहीं तो तुझ पर
पापिनी ! महाव्रज टूटेगा।’

‘भूपसिंह के नयनों में सपना तैर रहा था और हृदय में सपनों का विचार सागर उमड़-घुमड़ रहा था। इसलिए हथियारों का प्रशिक्षण भी लेना था और हथियार एकत्र भी करने थे। ईश्वर की कृपा से उन्हें भाई बालमुकुन्द जैसे महान क्रान्तिकारी का भी सान्निध्य मिल रहा था। जो कि हथियार एकत्र कराने के उद्देश्य से राजस्थान उनके साथ भेजे गये थे। भाई बालमुकुन्द जोधपुर के महाराज कुमार के शिक्षक और अभिभावक नियुक्त हो गये थे।
भूपसिंह ने हथियारों का प्रशिक्षण किया और उनकी मरम्मत भी करनी सीख ली। उन्होंने वर्कशॉप के कारीगरों को क्रान्तिकारी दल में भर्ती करना आरम्भ कर दिया, उनकी इच्छा थी कि यदि क्रान्ति का प्रारम्भ हो तो हमारे किसी भी क्रान्तिकारी के पास हथियारों की कमी नहीं पडऩी चाहिए। कहीं भी क्रान्ति का दमन करने में अंग्रेज इसलिए सफल न हो जाएं कि वहाँ हमारे क्रान्तिकारियों के पास हथियारों की कमी पड़ गयी थी, अथवा कोई भी क्रान्तिकारी सैनिक अंग्रेजों से लोहा लेते-लेते इसलिए न स्वर्ग सिधार जाए कि अन्त समय में उसके पास लडऩे के लिए हथियार नहीं थे। भूपसिंह का विचार था कि राजस्थान में किसी सुरक्षित स्थान पर अस्त्र शस्त्रों का एक कारखाना स्थापित कर दिया जाए।

राजाओं का सहयोग लेना भी माना गया उचित

रास बिहारी बोस की योजना थी कि क्रान्ति को सफल बनाने के लिए ऐसे राजाओं को भी साथ लिया जाए जो अंग्रेजों का विरेाध करते हैं, और देश की स्वतन्त्रता के लिए किसी भी प्रकार की तड़प अपने हृदय में रखते हैं। इसी उद्देश्य के दृष्टिगत रास बिहारी बोस को जोधपुर के राजघराने में सक्रिय कर दिया गया था। इस प्रकार एक बड़ी योजना को फलीभूत करने के लिए भूपसिंह और उनके क्रान्तिकारी साथी कार्य कर रहे थे। भूपसिंह के लिए राजस्थान की भूमि कोई परायी नहीं थी। देश के क्षत्रिय गुर्जरों का निकास इसी वीर भूमि से हुआ है। कभी इसी भूमि की रज में लेटकर गुर्जर सम्राटों ने विदेशी मुस्लिम शासकों की क्रूर तलवारों का मुंहतोड़ जवाब दिया था और देश की रक्षा करने के अपने पुनीत और राष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह करते हुए इतिहास में अपने अमर बलिदानों के कारण अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित कराया था।

आज उसी वीरभूमि राजस्थान के कण-कण से भूपसिंह को अपने पूर्वजों की यशगाथा का वीर रस से ओत-प्रोत संगीत गूँजता हुआ सुनाई दे रहा था। उस वीर रस से ओत-प्रोत संगीत को सुनकर उस योद्घा के पैर थिरकने लग गये थे, और अपना सर्वस्व माँ भारती के लिए समर्पित करने की प्रेरणा देकर वह संगीत कहीं अनन्त में विलीन हो जाता था। तब माँ भारती की स्वाधीनता का यह अमर साधक और भी अधिक ऊर्जा से ऊर्जान्वित होकर अपने राष्ट्रजागरण के कार्य में तत्परता से सन्नद्घ हो जाता था।होने लगी नई क्रान्ति की तैयारीउस समय देश में एक साथ भारी क्रान्ति करके अंग्रेजों को मारकाट कर देश से बाहर भगा देने की बड़ी योजना पर कार्य किया जा रहा था। सारे क्रान्तिकारी उसी प्रकार गोपनीय ढंग से एक दूसरे से जुड़ रहे थे-जिस प्रकार 1857 की क्रान्ति के समय उस समय के क्रान्तिकारी नेता परस्पर जुड़े थे। इस बड़ी योजना को इस बार एक साथ एक झटके में मूर्त्तरूप दे देना था। क्रान्ति की तिथि (जैसा कि पूर्व में भी उल्लेख किया गया है) 21 फरवरी 1915 रखी गयी थी। योजना के अनुसार भूपसिंह को राजस्थान में खरबा नरेश तथा देशभक्त व्यवसायी दामोदर दास राठी की सहायता से अजमेर, ब्यावर व नसीराबाद पर अधिकार कर लेने का दायित्व सौंपा गया था। इसके लिए वीर योद्घा भूपसिंह ने अपनी पूर्ण तैयारी कर ली थी। उसने कई हजार क्रान्तिकारी युवकों की सेना तैयार कर ली थी जो खरवा स्टेशन से कुछ दूर जंगल में किसी भी संकेत और संदेश की प्रतीक्षा में तैयार बैठे थे। उन्हें यह बता दिया गया था कि इस बार ना तो किसी को ‘धनसिंह कोतवाल’ जैसी अंधी या ‘मंगल पाण्डे’ जैसी शीघ्रता का प्रदर्शन करना है और ना ही किसी प्रकार के प्रमाद प्रदर्शन को अपनाना है। इसलिए ये क्रान्तिकारी दूर जंगल में ही रहकर उचित समय की प्रतीक्षा करते रहे।

उन वीर क्रान्तिकारियों पर महाकवि सुब्रहमण्य भारती की ये पंक्तियां अपना पूर्ण प्रभाव दिखा रही थीं-

”सुखप्रद गृह त्यागकर
यन्त्रणायुक्त कारा में रहना पड़े
पदवी, लक्ष्मी से वंचित होकर
निन्दा का पात्र बनना पड़े
कोटि कठिनाइयां मेरा
विनाश करने को हों प्रस्तुत
तब भी हे स्वतन्त्रता देवी
तुम्हारी वन्दना भुला नहीं सकता।’

‘जब ये सैनिक अपना प्रशिक्षण लेते और उन्हें अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का भान होता, तो उसमें भी महाकवि सुब्रहमण्य भारती की ये पंक्तियां ही इनका मार्गदर्शन करती थीं-

”एक मां की कोख से ही जन्मे हम,
अरे विदेशियो! हम अभिन्न हैं।
मन मुटाव से क्या होता है,
हम भाई-भाई ही रहेंगे,
हम वन्देमातरम् कहेंगे।
हजारों जातियों का यह देश
सम्बल न मांगेगा तुमसे…
अरे विदेशियो! हम अभिन्न हैं।”

21 फरवरी 1915 को देश कराना था आजाद21 फरवरी 1915 को इन क्रान्तिकारियों ने मां भारती को वह अनुपम और अमूल्य भेंटें देने का दिन निश्चित किया था-जिसके लिए उनके पूर्वज सदियों से संघर्ष करते आ रहे थे। परन्तु दुर्भाग्यवश 19 फरवरी को ही क्रान्ति की भनक अंग्रेजों को लग गयी, जिससे पंजाब में क्रान्तिकारियों की धरपकड़ आरम्भ हो गयी। क्रान्तिकारियों की योजना थी कि अजमेर से अहमदाबाद जाने वाली यात्री गाड़ी में रास बिहारी बोस का भेजा हुआ व्यक्ति रात्रि 10 बजे बम धमाका करेगा। इसे अपने लिए संकेत मानकर सारे क्रान्तिकारी भूपसिंह के नेतृत्व में अजमेर, ब्यावर और नसीराबाद पर आक्रमण कर देंगेे।
नियत समय पर जब कोई सूचना या संकेत सैनिकों को नहीं मिली तो उन्हें कुछ व्याकुलता हुई। तब उन्हें अगले दिन लाहौर से आये एक संदेशवाहक ने लाहौर में घटी घटनाओं की सूचना दी। क्रान्तिकारियों की धरपकड़ का समाचार पाकर भूपसिंह का रक्त उबलने लगा। उनके लिए ऐसा समाचार दु:खदायक और असहनीय था। उन्होंने तुरन्त तीस हजार बन्दूकों और अन्य शस्त्रों को तथा गोला बारूद को गुप्त स्थानों पर छुपा दिया।

उस समय परिस्थितियों के अनुसार भूपसिंह के लिए यही उचित था-जो उन्होंने कर लिया था, क्योंकि अन्धे होकर ‘क्रान्ति-क्रान्ति’ का शोर मचाकर अंग्रेजों से लडऩा उस समय नीतिसंगत नहीं था। यदि ऐसा किया जाता तो हार निश्चित थी। संघर्ष से पहले यह देखा जाना नीतिसंगत होता है कि शत्रु की तैयारी क्या है हमारे लोगों के पास शत्रु से निपटने के लिए साधन कैसे हैं ? ऐसी परिस्थितियों में भूपसिंह ने अपनी शक्ति का आंकलन कर सभी क्रान्ति सैनिकों को इधर-उधर बिखर जाने का निर्देश दिया।
डा. अम्बा लाल शर्मा ने लिखा है-”मैं पथिक जी की विलक्षण बुद्घि और सामयिक सूझ पर घंटों ही सोचा करता हूं, कि वह व्यक्ति कितना जबरदस्त दिमाग वाला है ? एक बार पथिक जी से एक अंग्रेज ने कहा कि आपका सैक्रेटरी श्री रामनायण चौधरी को हमारा सैक्रेटरी बना दो, तो पथिक जी ने तुरन्त कहा- मैं तो स्वयं चौधरी के लिए एक अच्छे सेक्रेटरी की खोज में हूं।”साथी रलियाराम के साथ बनाई नई योजनाभूपसिंह ने क्रान्ति की असफलता के दृष्टिगत मौन होकर भूमिगत हो जाना उचित नहीं समझा। वे अपने एक क्रान्तिकारी साथी रलियाराम के साथ निकले और बड़ौदा तक के अपने साथियों को क्रान्ति की असफलता के विषय में बताकर आये। जिससे कि किसी प्रकार की भ्रान्ति या प्रमाद के लिए क्रान्तिकारियों के मध्य किसी प्रकार का सन्देह न रहने पाये।

उधर पुलिस को भी भूपसिंह और उनके सथियों के विषय में यह ज्ञात हो गया था कि वे कितने बड़े स्तर पर क्रान्ति की तैयारी कर रहे थे ? इसलिए पुलिस अब उन्हें खोज रही थी। जिस क्रान्ति सेना का गठन खरवा के जंगल में किया गया था, उसमें भूपसिंह के साथ खरवा नरेश भोपाल सिंह, ठाकुर मोड़सिंह तथा सवाई सिंह आदि का नाम सम्मिलित था, इसलिए पुलिस अब इन्हें भी गिरफ्तार करना चाहती थी। इन सबने अंग्रेजों से टक्कर लेने का मन बनाया। अपनी योजना के अनुसार ये सभी क्रान्तिकारी खाने-पीने की सामग्री के साथ जंगल में बनी ओहदी (शिकारी बुर्ज) में मोर्चाबन्दी कर जा डटे।

शिकारी बुर्ज में अजमेर का अंग्रेज कमिश्नर 500 सैनिकों के साथ आ उपस्थित हुआ। इसे अपने उच्चाधिकारियों से ही निर्देश प्राप्त थे कि गोली न चलाई जाए, अन्यथा स्थानीय जनता और 500 सैनिकों में नियुक्त भारतीय सैनिक अपने क्रान्तिकारियों के साथ मिल सकते हैं। जिससे सारे राजस्थान से ही अंग्रेजों को मार-मारकर भगाने की स्थिति पैदा हो जाएगी। अंग्रेज जानते थे कि यदि ऐसा हुआ तो उन्हें राजस्थान छोड़कर भागने के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं मिलेगा। अंग्रेज यह भी जानते थे कि यदि एक बार राजस्थान से पैर उखड़ गये तो हिन्दुस्तान से पैर उखडऩे में भी देर नहीं लगेगी।कमिश्नर करने लगा याचनाऐसी परिस्थितियों में अंग्रेज कमिश्नर ने हमारे पांच क्रान्तिकारियों पर हाथ डालने का या उन पर गोली चलाने का दुस्साहस नहीं किया। उसने परिस्थितियों को भांप लिया था , इसलिए वह स्वयं समझौता करने की याचना हमारे क्रान्तिकारियों से करने लगा। हमारे क्रान्तिकारी आत्मसमर्पण के लिए उद्यत नहीं थे। पर कई दिनों के विचार-विमर्श के उपरान्त अन्त में यह समझौता हुआ कि उन्हें गिरफ्तारी के पश्चात किसी जेल में न रखा जाएगा, अपितु उन्हें गिरफ्तारी के पश्चात किसी ऐसे स्थान पर नजरबन्द किया जाएगा- जहाँ आसपास के जंगल में शिकार की पूरी सुविधा हो, शिकार के लिए उन्हें बन्दूकें और तलवारें भी दी जाएंगी। घोड़े सदा उन्हें मिलेंगे, उनके आसपास जहां तक दृष्टि पड़े वहां तक पुलिस का पहरा भी नहीं रहेगा, अर्थात ऐसा कुछ भी उनके साथ नहीं किया जाएगा, जिससे उन्हें कैदी होने का आभास हो अथवा जिससे उनके स्वाभिमान को चोट पहुंचती हो।

तब हमारे इन क्रान्तिकारियों में से खरवा नरेश रावगोपाल सिंह और भूपसिंह को मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर स्थित टाडगढ़ के किले में नजरबन्द कर दिया गया। उन्हें यहाँ से तीन मील दूर तक जंगल में शिकार पर जाने की अनुमति भी दी गयी। पर यहाँ 15 दिन पश्चात ही सोमदत्त नामक मुखबिर की सूचना पर यह संदेश आया कि लाहौर षडय़ंत्र केस में भूपसिंह भी सम्मिलित था, इसलिए भूपसिंह को यहाँ से लाहौर भेज दिया जाए।महानायक बन गया भूपसिंह से ‘विजयसिंह पथिक’यह षडय़ंत्र गहरा था और इसका अर्थ था कि अंग्रेजों ने हमारे क्रान्तिकारी भूपसिंह को अपने मार्ग से हटाने के लिए बहुत बड़ी तैयारी कर ली थी। इस गिरफ्तारी से बचने के लिए भूपसिंह ने साधु का भेस बनाकर और पहरेदारों की आंखों में धूल झोंककर टाढग़ढ़ के जिले से नीचे के सघन जंगल में प्रवेश पाकर वहाँ अपना रहने का स्थान बना लिया। यहीं पर भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का यह महानायक भूपसिंह से ‘विजयसिंह पथिक’ बन गया। यहाँ उनकी साधना का एक पर्व पूर्ण होता है।

जीवन का उत्सव यद्यपि अभी शेष था, परन्तु यह भी वह पर्व है-जिस पर इस क्रान्तिवीर ने अपने नये जीवन का शुभारम्भ किया था। यद्यपि उनका जीवन अब से पूर्व भी क्रान्तिकारी था, पर अब उनके सामने क्रान्ति की नई संभावनाओं को खोजने का अनन्त आकाश था। वह कोई ऐसा पथ खोजना चाहते थे-जो उन्हें यथाशीघ्र क्रान्ति की भोर में प्रविष्ट करा दे, और उनके प्यारे देशवासियों की स्वतन्त्रता के द्वार खोल दे। वह अपने किसानों के लिए, अपने युवाओं के लिए अपने आबालवृद्घ देशवासियों के लिए मन से चिन्तित थे। उन्हें हर स्थिति में स्वतन्त्रता का मधुर संगीत अच्छा लगता था, जिसे अब वह हर देशवासी को सुना देना चाहते थे।
अंग्रेजों ने अब ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं थी कि स्वयं रास बिहारी बोस को भी देश छोडऩा पड़ गया था। तब ऐसी परिस्थितियों में -क्या किया जाए ? -यही प्रश्न भूपसिंह से विजयसिंह ‘पथिक’ बने इस महान क्रान्तिकारी के मन मस्तिष्क को कौंध रहा था। जिसने उनकी रात की नींद और दिन का चैन छीन लिया था, यही कारण था कि विजयसिंह पथिक को अब स्वतन्त्रता की देवी की आराधना के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझ रहा था।

वीर सावरकर जी की प्रेरणा से सुभाष चंद्र बोस इन्हीं रासबिहारी बोस से जाकर विदेशों में मिले थे और उनके द्वारा निर्मित की गई आजाद हिंद फौज की कमान संभाल कर देश को आजाद कराने का बड़ा कार्य किया था । यह एक शोध का विषय है कि विजय सिंह पथिक जी द्वारा निर्मित की गई सेना के सैनिकों का आगे चलकर क्या हुआ ? निश्चय ही उनमें से अधिकांश लोग आजाद हिंद फौज में सम्मिलित हुए होंगे । इस प्रकार रासबिहारी बोस और विजय सिंह पथिक जी दोनों के चिंतन और उनकी कार्यशैली का सुभाष चंद्र बोस पर भी गहरा प्रभाव पड़ना निश्चित था , क्योंकि इन दोनों के ही महान कार्य को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने क्रांतिकारी ढंग से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था। यदि गांधी जी ने सत्याग्रह की शिक्षा विजय सिंह पथिक जी से ली तो बिजोलिया आंदोलन के इस सरदार के क्रांतिकारी कार्यों से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने प्रेरणा ने नहीं ली हो , ऐसा हो नहीं सकता ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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