सांसारिक दुर्गुणों से मुक्ति ही मोक्ष का द्वार खोलती है

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मदांधता

काम , क्रोध , मद , लोभ ,मोह यह 5 अवगुण व्यक्ति के व्यक्तित्व के शत्रु हैं। यह 5 व्यक्ति के स्वाभाविक एवं प्राकृतिक गुण नहीं हैं। इनमें से मद को अहंकार भी ही कहते हैं और अहंकार हमारे पतन का कारण होता है। यह मनुष्य द्वारा स्व अर्जित मनोरोग है । यह मनुष्य द्वारा स्वयं पाला गया रोग है।
इसके प्रभाव से सज्जन भी अपना विवेक खो देता है और गलत व्यवहार करने लगता है अर्थात इससे विवेक नष्ट हो जाता है और विवेक के नष्ट होते ही मनुष्य पशुवत आचरण करने लगता है।
ऐसा इसलिए होता है कि जब मनुष्य भीतर से तो खाली होता है लेकिन संसार में वह अपने आपको कुछ अधिक प्रदर्शित करना चाहता है ,तब वह एक अनुचित आवरण अपने चारों तरफ सृजित कर लेता है और जो कूटरचित आवरण उसने अपने चारों तरफ सृजित किया है , समाज से उसकी स्वीकृति चाहता है कि मुझे ऐसा ही मानो। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है।
ऐसा व्यक्ति अपने अंदर और बाहर दोनों से ही खाली होता है। अपने अंदर बनाए गए कूटरचित आवरण की वजह से ही ऐसा व्यक्ति परमात्मा के चरणों में नमन नहीं करता और इसीलिए ऐसे व्यक्ति का पतन होता है।
यदि अधोगति से अपने आपको सुरक्षित रखना है तो घमंड , अभिमान , अहंकार अर्थात मद को त्याग देना चाहिए।

लोभ – अहंकार

मद , लोभ , मोह , क्रोध आदि अवगुण हैं। एक मनुष्य को ईश्वर की सर्वोच्चता और परम सत्ता को स्वीकार करना चाहिए और अहंकार व लोभ को त्याग देना चाहिए । अहंकारी मनुष्य वातावरण पर नियंत्रण करना चाहता है और अपने ही द्वारा गढ़ी हुई परिभाषाओं के अनुरूप सुख प्राप्त करना चाहता है अर्थात वह परमात्मा के विधान में संशोधन एवं हस्तक्षेप करना चाहता है । परमात्मा के विधान में विश्वास पैदा करता है क्रोध न करना।
वास्तव में क्रोध भी एक मनोरोग है। यह शरीर की एक ऐसी प्रक्रिया है जो हमारे शरीर के अंदर रासायनिक परिवर्तनों को जन्म देती है। क्रोध से हमारे शरीर की सहनशक्ति एवं विवेक बुद्धि सब नष्ट हो जाती हैं और जिजीविषा क्षीण होने लगती है। क्रोध आने पर मनुष्य के हृदय की धड़कन बढ़ जाती है । ऑक्सीजन कम पड़ने लगती है तो सांस फूलने लगता है । हृदय की गति तेज हो जाती है । रक्त का संचरण तेज हो जाता है । शरीर की सारी इंद्रियां अशक्त होने लगती हैं और मनुष्य का अपने आप पर काबू नहीं रह पाता है , अर्थात वह आपे में नहीं रह पाता है। इसी के कारण उच्च रक्तचाप, मस्तिष्क आघात, गुर्दे फेल होना, हृदय आघात ,शुगर आदि जानलेवा बीमारी शरीर में लग जाती है।
क्रोध पर विजय पाना संयम से ही संभव है। धारणा , ध्यान और समाधि जब तीनों एकत्रित हो जाते हैं तो वह स्थिति संयम कहलाती है । जिस प्रकार हम देखते हैं कि संयम एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थिति मनुष्य के जीवन में होती है । जितना सरलता से हम कह देते हैं कि संयम रखो , उतना सरल शब्द है नहीं बल्कि इसके अंदर बहुत सारे आयाम छिपे हैं।

साहस

मत्स्य देश में अर्जुन के सामने विशाल कुरु सेना आ चुकी है । उत्तर कुमार को उसने अपना साथी बना लिया और अकेले कौरव सेना पराजित कर दी । जिसमें पितामह भीष्म , गुरु द्रोणाचार्य , कृपाचार्य करण जैसे योद्धा थे। यह सब किस वजह से हो पाया ? इसको यदि हम देखते हैं तो अर्जुन के अंदर जो साहस और शौर्य है , उसके कारण संभव हो पाया। इसलिए साहस का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान हमारे जीवन में है और प्रत्येक व्यक्ति में साहस होना चाहिए। यदि व्यक्ति विचार करता है लेकिन उसका क्रियान्वयन नहीं करता , क्योंकि क्रियान्वयन करने के लिए उसके पास साहस नहीं है तो ऐसा व्यक्ति निष्क्रिय और महत्वहीन हो जाता है। ऐसे व्यक्ति का मन उत्साह से विमुख होकर निरुत्साहित हो जाता है। यदि मनुष्य के अंदर साहस है तो अत्यंत कठिन से कठिन कार्य भी करने के लिए वह तत्पर हो जाएगा और उसी प्रकार के साहस के भाव उस व्यक्ति के अंदर आने प्रारंभ हो जाएंगे और उसको धनात्मक ऊर्जा मिलनी प्रारंभ हो जाएगी । उसको अपने दैहिक पराक्रम का आभास होने लगता है । साहस के लिए कठोर श्रम की भी आवश्यकता होती है । शायद इसीलिए कहा गया है कि – “मन चंगा तो कठौती में गंगा।”
वास्तव में मनुष्य के जीवन में साहस एक बहुत बड़ा ऊर्जा स्रोत है । इसीलिए साहस रखने वाले व्यक्ति प्रतिक्षण सकारात्मक और आशावान रहते हैं तथा हर परिस्थिति में स्थिर रहते हैं। विपरीत परिस्थिति आने पर अपनी सकारात्मक उर्जा से विजय पाते हैं।

नैतिकता

भवसागर में यदि सफलता पूर्वक नौकायन करना है और पार उतरना है तो नैतिकता को अपनाना मनुष्य के लिए आवश्यक है । आज के मनुष्य के व्यस्ततम जीवन में निर्धनता में गरिमापूर्ण, सादगी में सौंदर्य पूर्ण, संघर्ष में हर्ष का अनुभव, समता का स्वाद और आस्था का आनंद यह सब हमारे आचरण से पतझड़ के पत्तों की भांति झर गए।
मनुष्य का दूसरे प्राणियों के प्रति सम्यक आचार विचार की अवधारणा लुप्त होती जा रही है। आज के समाचार पत्र , प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हत्या लूट , डकैती , बलात्कार व अन्य प्रकार की हिंसा से समाचार होते हैं । जिससे ऐसा आभास होता है कि हम नैतिक रूप से कमजोर हो गए हैं। योग के 8 अंगों में से एक उपांग अहिंसा किसी कठघरे में कैद हो गई है और हिंसा उन्मुक्त होकर अट्टहास कर रही है। सत्ता और संपत्ति अनैतिक रूप से एकत्र करने में मनुष्य ने रात दिन एक कर दिया है । इसीलिए भौतिक भोगवाद बढ़ रहा है और व्यक्ति की अस्मिता का ह्रास हो रहा है। आचरण की शुद्धि से नैतिकता का विकास होता है । यदि मनुष्य का आचरण नैतिकता पूर्ण है तो वह सबसे उत्तम अध्यात्म का ज्ञाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि नैतिक आचरण का पालन ही धर्म का पालन है। नैतिकता से हम अनैतिकता पर विजय पा लेते हैं और पाप कर्मों से बचे रह सकते हैं।

सत्य की खोज

योग के प्रकरण में हम यह पढ़ चुके हैं कि जब मनुष्य की शक्ति बाह्य इंद्रियों में खर्च नहीं होती अर्थात बहिर्मुखी नहीं होती और वह अंतर्मुखी हो जाती है तो उसकी आत्मिक शक्तियां जाग जाती हैं , और सांसारिक वासना वृत्ति विलुप्त हो जाती हैं।
सत्य भी एक अंतर्मुखी वृत्ति है । जब व्यक्ति अंतर्मुखी हो जाता है तो वह केवल सत्य वादन, सत्य आचरण, सत्य श्रवण ही करता है। ऐसा व्यक्ति अंधेरे को प्रकाश कभी नहीं कहेगा और प्रकाश को अंधेरा नहीं कहेगा। सत्य का आचरण करने से ईश्वर के दर्शन होते हैं। सत्य का आचरण करने से मनुष्य श्रेष्ठ सीढ़ियां चढ़ जाता है। सभी मनुष्यों को अपने जीवन में असत्य एवं कल्पनाओं से रहित होकर सत्य को समझने और उसमें प्रवेश करने का सदैव प्रयास करना चाहिए।
इसलिए महर्षि दयानंद ने आर्य समाज के 10 नियमों में यह व्यवस्था दी है कि “मनुष्य को सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।” अर्थात जीवन में जिस क्षण भी किसी भी संबंध में सत्य की जानकारी होती है उसी क्षण से सत्य स्वीकार कर लेना चाहिए , इसी से जीवन सार्थक होता है।
अध्यात्म, आस्था, भक्ति, योग और तत्वज्ञान यह भारत की आत्मा हैं। जैसे आत्मा के निकल जाने पर शरीर नष्ट हो जाता है वैसे ही इनके नष्ट होते ही भारत नष्ट हो जाएगा । सत्य का मार्ग कठिन अवश्य होता है , उसके पालन में परेशानी भी आती हैं ,लेकिन सत्य अध्यात्म का प्राण है। धर्म , अध्यात्म , आस्था , भक्ति योग और तत्वज्ञान के कारण ही भारतवर्ष पूरे विश्व में गुरु के रूप में प्राचीन काल से प्रतिष्ठित रहा है । वस्तुतः विश्व को ज्ञान , अध्यात्म , भक्ति और वैराग्य की शिक्षा केवल भारतवर्ष ने प्रदान की है । सत्य का मार्ग भी भारतवर्ष ने विश्व को दिखाया है। परंतु आज के मानव में प्रेम रस , अध्यात्म , आस्था , धर्मभक्ति और योग यह सब सूख गए हैं । वह काम, क्रोध, मद ,लोभ ,मोह रस में व्याप्त होता जा रहा है ।
इसका मुख्य कारण है सत्य से विमुख होना अर्थात सत्य से विपरीत दिशा में गमन करना। लेकिन भारतवर्ष को यदि उसके प्राचीन गौरवपूर्ण पद पर पदस्थापित कराना चाहते हैं तो भारत की वर्तमान और आगामी पीढ़ी को बिना विलंब किए सत्य के मार्ग पर अर्थात अध्यात्म के मार्ग पर उन्हें लौटना पड़ेगा।
परमात्मा की प्राप्ति भक्ति के मार्ग से हो सकती है। इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है । उस अमृतत्व अविनाशी ब्रह्म का साक्षात करने के लिए। मनुष्य को धर्म ,अध्यात्म , आस्था भक्ति और योग का सहारा सत्य का अनुगमन करते हुए लेना पड़ेगा।
असत्य एक विकार है और सत्य एक गुण है । असत्य रूपी विकार से मन निर्मल हो जाता है और सत्य से सफल हो जाता है। सत्य के प्रकाश से मनुष्य का अहम , क्रोध , लोभ , काम और मोह छूट जाते हैं। उसे कोई आघात नहीं पहुंचा सकता ।क्योंकि ऐसे मनुष्य का संसार प्रपंच , झूठ , आदि से अलग होता है। सत्यवादी मनुष्य जो अंदर से होता है वही बाहर होता है । जो उसके मन में होता है , वही बाहर होता है। वही उसका कर्म होता है । उसके मन , वचन, कर्म मैं एकरूपता होती है । उसके नैतिक मूल्य उच्च कोटि के होते हैं । वह कभी भयभीत नहीं रहता । वह कभी कुछ छुपाना नहीं चाहता।
मनुष्य के सारे कार्य धर्मानुसार होने चाहिए। सार्वजनिक हित में होने चाहिए। तभी जीवन की सच्ची सार्थकता है। मानवीय संबंध और सामाजिक संदर्भ सत्यवादी मनुष्य के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसा मनुष्य अपने मनोरथ में सफल होता है , वह धोखा दे नहीं सकता , परंतु धोखा खा सकता है। सच बहुत ही प्राकृतिक बहुत स्वाभाविक बहुत ही अच्छा अर्थ होता है । सत्य अक्षय होता है । सत्य विकारहीन होता है । सत्य का पता नहीं होता । रावण कितनी विद्वता को अर्जित करने के पश्चात विकार वामन का स्वामी होने के नाते पराजय को प्राप्त कर पाया। अर्थात जीत सत्य और धर्म की हुई । जिसके कारण मनुष्य जीवन में सफलता व विजय प्राप्त करता है, अतः शक्तियों का स्वामी होता है उसे दूसरे के सहयोग की आवश्यकता नहीं होती।

धैर्य

84 लाख योनि बताई जाती हैं । 84 लाख योनियों से गुजरता हुआ मनुष्य का जन्म जब मिलता है तो इस जीवन को बहुत धैर्य से, चातुर्य से ,गांभीर्य से व्यतीत करना चाहिए। यदि मनुष्य ऐसा करता है तो निश्चित रूप से उसको अगला जन्म भी मनुष्य योनि का प्राप्त होगा । पिछले जन्म के प्रारब्ध और संस्कार गुणों के कारण जब मनुष्य अगले जन्म में पहुंचते हैं तो धीरे-धीरे ऐसे मनुष्य का परिष्करण होना प्रारंभ हो जाता है। ईश चर्चा अथवा ईश वंदना में अथवा सत्संग में उसका मन लगने लगता है । इसके लिए मनुष्य को धैर्यवान होना अति आवश्यक है। परंतु आज का मनुष्य अति शीघ्र धनवान होना चाहता है । अति शीघ्र प्रत्येक कार्य को करना चाहता है , यानि कि शीघ्रता की जगह अब ‘फास्ट’ शब्द आ गया है। ‘फास्ट’ का अर्थ होता है शीघ्रता। अब भोजन भी ‘फास्ट’ अब जूस भी ‘फास्ट’ कार की गति भी फास्ट, और भिन्न भिन्न प्रकार के अपराध करने के बाद मंगल का ‘फास्ट’ रखना अर्थात हर प्रकार से ‘फास्ट’ हो गया।
दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि धैर्य और धीरज मनुष्य ने खो दिया है, इसीलिए मनोविकार मनुष्य के अंदर भरे रहते हैं। मनुष्य को संकल्पित और धैर्यवान बनकर ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में तत्पर रहना चाहिए।

दुख का रहस्य

अभी हम चर्चा कर रहे थे कि सुख और दुख यह दोनों इंद्रियों के विषय हैं अर्थात दोनों की जानकारी इंद्रियों से मिलती है और इंद्रियां दोनों की जानकारी मन को देती हैं। हमारे मन में अतीत की यादें संचित रहती हैं।
एक बच्चा जब पैदा होता है तो वह सोते-सोते अथवा जागते हुए भी आपने मुस्कुराता हुआ देखा होगा या एकदम बहुत जोर से रोता हुआ देखा होगा , यह सब इसलिए होता है कि उस बच्चे के अंदर जो मन है , उसमें पूर्वजन्म के सुख और दुख के भाव संचित होने से ,उनकी स्मृति से बच्चा रोता है या हंसता है। इसी तरह बड़े होने पर कभी आत्मग्लानि , अपराध बोध , हीनता , आक्रोश और कटुता जागृत करने वाले विचार आते हैं । कभी संतुष्टि , ज्ञान , धैर्य , क्षमा , नैतिकता सदाचरण आदि गुण प्रबल हो जाते हैं – यह सब मन के कारण ही है । मन में संचित भूतकाल की यादों के कारण हैं अर्थात पूर्व जन्म में जैसा – जैसा संस्कार व्यवहार होता रहा , उसके कारण ही सुख और दुख हमको आते रहे। अब हमको यह स्पष्ट हो चुका है कि मनुष्य सुख व दु:ख का निर्माता अपने लिए स्वयं है। अर्थात सुख-दु:ख पुराने कर्म फल से ही व्यक्ति को प्राप्त होते हैं और उनसे कोई बच भी नहीं सकता। कर्म फल अवश्य भोगना पड़ता है ।यह भी स्पष्ट हो चुका है। गीता सार के अनुसार मनुष्य को स्वधर्म के अनुकूल और अनुसार कर्म करना चाहिए तथा फल ईश्वर के अर्पण कर देना चाहिए । इस प्रकार मनुष्य कर्मफल से मुक्त होकर प्रतिक्रिया स्वरूप सुख-दुख से भी मुक्त हो जाता है।
संक्षेप में दुख का रहस्य अपने कर्म मात्र है । यदि दुखों से निवृत्ति चाहते हो तो सत्कर्म करें।

मोक्ष प्राप्ति साधन

मोक्ष को प्राप्त करना हर कोई मनुष्य चाहता है। यह अच्छी बात है कि हर कोई व्यक्ति मुक्ति की खोज में है। लेकिन मुक्ति तो केवल भक्ति से ही मिलती है और भक्ति के लिए सन्यास आवश्यक नहीं , बल्कि एक गृहस्थी भी मोक्ष या मुक्ति प्राप्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में कहें कि मुक्ति पर केवल सन्यासी का एकमात्र अधिकार नहीं है। एक सद्गृहस्थ व्यक्ति भी मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।अनेक ऋषि महर्षि सद्गृहस्थ में रहते हुए मोक्ष को प्राप्त कर गए। मोक्ष को प्राप्त करने के लिए ज्ञान का होना बहुत आवश्यक है । ज्ञान किसी संप्रदाय ,धर्म ,जाति ,गृहस्थ और संन्यासी में भेद नहीं करता है। संक्षेप में कह सकते हैं कि यदि मुक्ति चाहते हैं तो भक्ति करो।
मुमुक्षु बनों और भगवत धाम ,आनंद धाम का आनंद प्राप्त करो।

दुखों से छुटकारा

ऊपर बताया कि सुख और दु:ख क्या है ? लेकिन दुखों से छुटकारा कैसे हो सकता है , अब इस विषय पर विचार करते हैं। दु:ख रूपी भूत मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ता । दु:खरूपी भूत अदृश्य है। दु:ख से छुटकारा प्राप्त करने का केवल एक ही साधन है। वह है सत्कर्म। दु:खों से छुटकारा पाने का साधन है। धर्मानुसार कार्य करना।
जब मनुष्य का प्रत्येक कार्य धर्म के अनुसार होगा तो वह सत्कर्म कहा जाएगा और सत्कर्म का जो कर्म फल आएगा वह अच्छा ही आएगा । उसमें दु:ख नहीं आ सकता । इसलिए दु:खी अति दूर करना चाहते हो तो धर्म को अंगीकार करो ।

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