लॉकडाउन लगाते रहना समस्या का हल नहीं, बंदिशों के साथ आगे बढ़ना होगा

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अजय कुमार

लॉकडाउन के चलते एक तरफ केन्द्र और राज्य सरकारों के पास नकदी का संकट हो रहा है तो दूसरी तरफ कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते फैक्ट्रियों, दिहाड़ी मजदूरी करने वालों, प्राइवेट सेक्टर में लगे लोगों की नौकरियां छिनती जा रही हैं।

लॉकडाउन खुलने की तारीख (18 मई) ज्यों-ज्यों निकट आ रही है, त्यों-त्यों लोगों के दिमाग में अब आगे क्या होगा ? यह सवाल यक्ष प्रश्न बनकर लोगों के सामने खड़ा होता जा रहा है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन लगाया गया था और लॉकडाउन थ्री खत्म होने की समय सीमा करीब आने के बाद भी कोरोना महामारी थमने का नाम ही नहीं ले रही है। बल्कि और अधिक तीव्रता से बढ़ती ही जा रही है। कोरोना महामारी के चलते देश के जो हालात बने हुए हैं, उससे केन्द्र की मोदी सरकार के साथ-साथ तमाम राज्यों की सरकारें तक ‘हिली’ हुई हैं। कोरोना के चलते राज्यों का खर्चा बढ़ता जा रहा है और ‘आमदनी’ हो नहीं रही है। राज्य सरकार के राजस्व वसूली में 80 से 90 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिल रही है। वहीं केन्द्र भी इस स्थिति में नहीं है कि वह दोनों हाथों से राज्य सरकारों की मदद कर सके, क्योंकि राज्य सरकारों की तरह केन्द्र सरकार का भी राजस्व घाटा करीब 80 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इसीलिए 17 मई के बाद (लॉकडाउन की अंतिम तिथि) क्या होगा, लोग इसका जवाब तलाश रहे हैं।

दरअसल, लॉकडाउन से जहां कोरोना महामारी को नियंत्रित करने में काफी हद तक मदद मिली, वहीं इसके खतरनाक साइड इफेक्ट भी देखने को मिल रहे हैं। लॉकडाउन के चलते एक तरफ केन्द्र और राज्य सरकारों के पास नकदी का संकट हो रहा है तो दूसरी तरफ कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते फैक्ट्रियों, दिहाड़ी मजदूरी करने वालों, प्राइवेट सेक्टर में लगे लोगों की नौकरियां छिनती जा रही हैं। लॉकडाउन के चलते पूरी दुनिया सहित भारत भी मंदी से जूझ रहा है। विकास का पहिया थम गया है, जिसके चलते विकास दर अपने निम्न स्तर से भी काफी नीचे पहुंच गयी है। अप्रैल के मध्य में विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कोरोना महामारी के कारण अर्थव्यवस्था में उथल पुथल मची है और वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की आर्थिक विकास की दर तीन दशक के निचले स्तर पर आ सकती है और वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की जीडीपी ग्रोथ की दर 1.5 फीसद से 2.8 फीसद के बीच रह सकती है।

विश्व बैंक का अनुमान अगर सही बैठता है तो देश की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार 1991 के बाद के निचले स्तर पर आ जाएगी। गौरतलब है कि विश्व बैंक ने 31 मार्च, 2020 को समाप्त वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी विकास की दर 4.8 फीसद से 5 फीसद के बीच रहने की उम्मीद जताई थी, लेकिन उसके बाद जिस तेजी से हालात बिगड़े, उसके चलते पहले से सुस्त अर्थव्यवस्था कोरोना के कारण हुए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से और पीछे चली गई है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन के कारण घरेलू आपूर्ति और मांग में कमी की वजह से वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की आर्थिक विकास दर में भारी गिरावट दर्ज की जाएगी।

रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू निवेश में फिर से तेजी आने में समय लगेगा, जबकि कोविड-19 के प्रभाव के खत्म होने एवं वित्तीय और मौद्रिक नीतिगत मदद की वजह से अगले वित्त वर्ष (2021-22) में देश की जीडीपी वृद्धि दर पांच फीसद के आसपास रहने का अनुमान बैंक ने जताया है। मौजूदा हालात को देखते हुए कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भारत के आर्थिक विकास के अनुमान को घटा दिया है। एक तरफ विकास दर में कमी आ रही है तो दूसरी ओर देश में बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इसलिए अब बहुत लोगों द्वारा यह उम्मीद जताई जाने लगी है कि संभवतः अब लॉकडाउन खत्म करने की घोषणा हो जाए। कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने का खतरा बरकरार है। न तो इस खतरे को कम करके आंका जा सकता है और न ही कोई जोखिम मोल लिया जा सकता है। इसके बावजूद इसकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि कारोबारी गतिविधियों के थमे होने के कारण अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं और इसी के साथ कमजोर तबके और खासकर रोज कमाने-खाने वालों की समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

लब्बोलुआब यह है कि मौजूदा हालात में केंद्र और राज्य सरकारों को देश के आर्थिक हालात सुधारने के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। यह जो आशंका व्यक्त की जा रही है कि लंबे लॉकडाउन के चलते निर्धन वर्ग के लोग भुखमरी की चपेट में आ सकते हैं, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। हाँ, आज की तारीख में जरूर यह संतोषजनक बात देखने को मिल रही है कि केन्द्र की मोदी और तमाम राज्यों की सरकारें लोगों को अनाज बांटने में दरियादिली दिखा रही हैं। हालांकि केन्द्र और राज्य सरकारों की अपनी सीमाएं हैं, जो प्रवासी मजदूरों से रेल या बस की टिकट राशि वसूले जाने के तौर पर दिखने भी लगी है। इस बीच सबसे अधिक सुकून देने वाली बात यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संक्रमण से बचे हुए और ग्रीन जोन कहे जाने वाले तीन सौ से अधिक जिलों में कुछ रियायत देने की घोषणा की है, लेकिन यह कहना कठिन है कि इससे कारोबारी गतिविधियों को अपेक्षित गति मिल सकेगी।

फिलहाल कारोबारी गतिविधियों के सही ढंग से शुरू होने के आसार इसलिए कम हैं क्योंकि आवाजाही पर प्रतिबंध के साथ बाजार, सिनेमाघर, मॉल, शिक्षण संस्थाएं आदि खोलने की अनुमति अभी भी नहीं होगी। ऐसे में इस पर गौर किया ही जाना चाहिए कि आखिर कारोबारी गतिविधियों और विशेष रूप से जीविका के साधनों को आगे बढ़ाने की पहल कैसे सफल होगी ? बेहतर होगा कि इसकी हर दिन समीक्षा की जाए कि ग्रीन और साथ ही आरेंज जोन वाले जिलों में दी जाने वाली रियायतों के वांछित नतीजे सामने आते दिख रहे हैं या नहीं ? आवश्यकता पड़ने पर रियायत संबंधी फैसलों में हेरफेर भी किया जाना चाहिए।

आखिर जब यह स्पष्ट है कि जिंदगी बचाना एक बड़ी हद तक जीविका के साधनों पर निर्भर है तब फिर इन साधनों को संचालित करने के हर संभव जतन किए ही जाने चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को यह भी समझना होगा कि लॉकडाउन में एक और विस्तार के फैसले के साथ ही उनकी चुनौतियां बढ़ने वाली हैं। उनके सामने चुनौती केवल यही नहीं है कि अधिक संख्या में कोरोना मरीज वाले जिलों यानी रेड जोन में कोरोना संक्रमण की रोकथाम और प्रभावी तरीके से हो, बल्कि यह भी है कि वहां लॉकडाउन के नियमों का सही तरह पालन कराया जाए। यदि इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता तो फिर लॅाकडाउन को बढ़ाने का सिलसिला खत्म होने वाला नहीं।

बहरहाल, एक तरफ जनता लॉकडाउन के चलते मुसीबतें झेल रही है तो वहीं दूसरी ओर लॉकडाउन पर सियासत भी हो रही है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जानना चाहती हैं कि लॉकडाउन कब खुलेगा। सोनिया गांधी की अपनी चिंताए हो सकती हैं, लेकिन अगर सियासी रूप से देखा जाए तो यह बात समझ में नहीं आती है कि जब कांग्रेस शासित राज्य सरकारें लॉकडाउन के मामले में केन्द्र सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं तब सोनिया गांधी ऐसी बयानबाजी करके क्या सिद्ध करना चाहती हैं। सोनिया ने कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वीडियो कांफ्रेंसिंग बैठक के दौरान मोदी सरकार से पूछा कि ‘17 मई के बाद क्या ? 17 मई के बाद कैसे होगा ? भारत सरकार यह तय करने के लिए कौन सा मापदंड अपना रही है कि लॉकडाउन कितना लंबा चलेगा ? बैठक में उनकी बात का समर्थन करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, ‘‘जैसा सोनिया जी ने कहा है कि हमें यह जानने की जरूरत है कि लॉकडाउन-3 के बाद क्या होगा ?’’

लब्बोलुआब यह है क कोरोना महामारी के शुरूआती दौर में तो जरूर सभी नेता और दल एक साथ खड़े नजर आ रहे थे, लेकिन अब इस पर सियासत भी शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल और बिहार में विधान सभा चुनाव होने हैं, इसलिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सबसे पहले मोदी के खिलाफ मुखर हुई थीं, इसके बाद गांधी परिवार और अब कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारें भी सियासत के इस दलदल में उतर आई हैं, जो ठीक नहीं है। यह समय देश को बचाने का है। सियासत के लिए तो लम्बा समय पड़ा है। वैसे भी लॉकडाउन-4 के आने की चर्चा या सोच कहीं नहीं दिखाई दे रही है। कुछ बंदिशों के साथ देश को आने बढ़ना ही होगा।

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