पर्यावरण को लेकर लॉकडाउन के सकारात्मक पहलू

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अजय कुमार

पिछले करीब सवा महीने की समीक्षा की जाए तो पता चलता है कि लॉकडाउन के कारण जनता को भले ही परेशानियों का सामना करना पड़ हो, लेकिन पर्यावरण आदि कई मामलों को लेकर लॉकडाउन का सकारात्मक पहलू भी सामने आया है।
समय आ गया है कि केन्द्र और राज्य की सरकार इस बात पर गंभीरता से मंथन करें कि ऐसे कौन-कौन से उपाए किए जाएं जिससे अपनी दिनचर्या या रोजी-रोटी चलाने के लिए लोगों को कम से कम सड़क पर आना पड़े। एक अनुमान के अनुसार देश की करीब 25 से 30 प्रतिशत आबादी को अपना कामकाज निपटाने के लिए सिर्फ इसलिए सड़क पर इधर से उधर दौड़ाना पड़ता हैं क्योंकि उसके पास तकनीकी ज्ञान काफी कम है या नहीं है। यही वजह है जहां कई विकसित और विकाशसील देशों में जो काम लोग घरों में बैठे-बैठे ऑनलाइन निपटा देते हैं, उसी काम को करने के लिए आम भारतीय को सरकारी आफिसों, बैंकों, मेडिकल स्टोरों, फल-सब्जी और राशन की दुकानों आदि के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इसके चलते आम भारतीय को समय, श्रम और पैसा तीनों बर्बाद करना पड़ता है। वहीं सरकार को बेकार में ही कई सुविधाओं की व्यवस्था करनी पड़ जाती है। सड़क पर बेतहाशा दौड़ती गाड़ियों के लिए मंहगा ईंधन आयात करना पड़ता है। सड़क पर भीड़ बढ़ती है, जिसके कारण प्रदूषण बढ़ता है। प्रदूषण बढ़ता है तो इसका विपरीत प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिसके लिए सरकार को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं जुटानी पड़ जाती हैं। इन सबको लॉकडाउन से जोड़कर देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि लॉकडाउन के दौरान देश में दिल के मरीजों की संख्या में 75 प्रतिशत तक कमी आ गई। बढ़े प्रदूषण के कारण सांस के मरीजों की संख्या में भी इजाफा होता था, जो इस समय काफी कम दिखाई दे रहा है। इसी तरह से सड़क जनित हादसों में कमी आई है तो राह चलते किसी बात पर लड़ाई-झगड़े और उसके चलते चोटिल या मौत के मुंह में चले जाने वाले लोगों का भी ग्राफ गिरा है। प्रकृति को हुए फायदे की बात की जाए तो कम प्रदूषण के चलते ओजोन परत के जानेलवा छिद्र बंद हो गए हैं। नदियों का जल साफ हो गया है। प्रदूषण रहित वातावरण में पशु-पक्षी खूब आनंदित होकर अठखेलियां कर रहे हैं।
पिछले करीब सवा महीने की समीक्षा की जाए तो पता चलता है कि लॉकडाउन के कारण जनता को भले ही परेशानियों का सामना करना पड़ हो, लेकिन पर्यावरण आदि कई मामलों को लेकर लॉकडाउन का सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। पूरी दुनिया में प्रदूषण का स्तर काफी कम देखने को मिल रहा है। हवा लगभग साफ हो गई है। लॉकडाउन के कारण पर्यावरण में आया सकारात्मक बदलाव हमें इस बात का अहसास कराता है कि यदि प्रकृति और उसके संसाधनों का अनुचित दोहन नहीं किया जाए तो हम कई मुसीबतों जैसे बाढ़, सूखे, बढ़ते तापमान आदि से बच सकते हैं तो ग्लेशियरों को पिघलने से भी बचा सकते हैं। कोरोना महामारी ने हमें यह भी समझा दिया है कि यदि हमें पृथ्वी को बचाना है तो उसके संरक्षण के लिए हमें कोई कारगर नीति बनानी ही होगी। पेड़-पौधों, जंगलों और जानवरों को बचाना एवं संरक्षण देना होगा। जीवनदायिनी नदियों को प्राकृतिक तौर पर आगे बढ़ने के लिए संरक्षण दिया जाए, उसमें गिरने वाले नालों और फैक्ट्रियों के गंदे पानी पर रोक लगाई जाए। सिर्फ कानून बनाकर यह काम नहीं हो सकता है, इसके लिए जनता को जागरूक भी करना पड़ेगा।
एक मोटे अनुमान के अनुसार घर का हो या फिर बाहर का वायु प्रदूषण दोनों के कारण पूरी दुनिया में प्रत्येक वर्ष करीब एक करोड़ लोगों की असमय मौत हो जाती है, जिनमें अच्छी-खासी संख्या लगभग 7 प्रतिशत बच्चों की भी होती है। भारत वर्ष में निर्माण कार्यों और औद्योगिक प्रदूषण, भोजन बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन तथा वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण भी प्रत्येक वर्ष वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। बढ़ते प्रदूषण के मामले में विकासशील देशों की स्थिति और इसमें भी भारत की स्थिति काफी दयनीय है। वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट-2019 का जो डेटा आईक्यूएआईआर के शोधकर्ताओं ने तैयार किया है, उसके अनुसार 2018 में टॉप-30 प्रदूषित शहरों में भारत के 22 शहर शामिल थे। 2018 ही क्या, वायु प्रदूषण के सबसे खराब स्तर वाले शहरों की सालाना लिस्ट में भारत के शहर अक्सर टॉप पर रहते हैं। बीते साल जो रिपोर्ट आई थी, उसके अनुसार यूपी का गाजियाबाद इस लिस्ट में पहले नम्बर पर था। टॉप-10 में से 6 और टॉप-30 में कुल 21 शहर भी भारत के हैं। हाँ, लॉकडाउन के बाद जरूर हालात काफी तेजी से बदले हैं।
खैर, बाते आगे बढ़ाई जाए तो विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की 90 फीसदी आबादी प्रदूषित हवा में सांस ले रही है। कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण विशेषज्ञ डेविड बोयड ने भी अपने एक वक्तव्य में कहा था कि करीब छह अरब लोग नियमित रूप से घातक प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं, जिससे उनका जीवन और स्वास्थ्य जोखिम भरा है। इसके बावजूद इस महामारी पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। डेविड बोयड के अनुसार दुनिया में हर घंटे 800 लोग मर रहे हैं, जिनमें से अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं झेलने के कई वर्षों बाद मर रहे हैं। कैंसर, सांस की बीमारियां और दिल के रोगों में प्रदूषित हवा के कारण लगातार वृद्धि हो रही है। वायु प्रदूषण टाइप-2 मधुमेह को भी बढ़ा रहा है। वायु में मौजूद पीएम2.5 कण टाइप-2 मधुमेह के मामलों और मृत्यु को बढ़ाता है। इसे उच्च रक्तचाप के लिए भी जिम्मेदार माना गया है। हमारे देश में वायु प्रदूषण के कारण सांस की बीमारियों, हृदय की बीमारियों, हृदयाघात, फेफड़ों के कैंसर के कारण समय पूर्व मृत्यु की दर बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में लगातार वाहनों की संख्या बढ़ने के कारण प्रदूषण और सांस से संबंधित विभिन्न बिमारियां पनप रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ डेविड बोयड के अनुसार स्वच्छ हवा प्राप्त करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
लॉकडाउन के बाद जो भारत की नई तस्वीर उभर कर समाने आई है, उससे यह संकेत भी मिलते हैं कि भारत के पास पर्यावरण को बचाने के लिए तमाम ‘नुस्खें’ मौजूद हैं। इन नुस्खों को देश की ज्यादा से ज्यादा आबादी को ऑनलाइन सुविधाओं से जोड़ कर परखा जा सकता है। स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए कुछ प्रयास किए जाने की जरूरत है। इनमें वायु गुणवत्ता एवं मानव स्वास्थ्य पर उसके प्रभावों की निगरानी, वायु प्रदूषण के स्रोतों का आकलन और जन-स्वास्थ्य परामर्शों समेत अन्य सूचनाओं को सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराना शामिल है। यह कटु सत्य है कि वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुआं है। वायु प्रदूषण पर इस तरह के अध्ययन न केवल वाहनों के माध्यम से होने वाले वायु प्रदूषण पर हमारी आंखें खोलते हैं, बल्कि जरूरत से ज्यादा ऐशो आराम की जिंदगी जीने की लालसा पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं है। इसमें कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन तथा सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर जैसे खतरनाक तत्व एवं गैसें होती हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड जब सांस के माध्यम से शरीर के अंदर पहुंचता है तो वहां हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन नामक तत्व बनाता है। इस तत्व के कारण शरीर में ऑक्सीजन का संचार सुचारू रूप से नहीं हो पाता है। नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड एवं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भी कम खतरनाक नहीं हैं। नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड की तरह ही हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा घटाता है। वाहनों से निकलने वाला हाडड्रोकार्बन अल्प मात्रा में भी पौधों के लिए हानिकारक है। सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर छोटे-छोटे कणों के रूप में विभिन्न स्वास्थ्यगत समस्याएं पैदा करते हैं। ऐसे तत्व हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाकर सांस संबंधी रोग उत्पन्न करते हैं। वाहनों से फैलने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए जरूरी है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बेहतर बनाया जाए, ताकि लोगों की निजी वाहनों के प्रयोग की आदत को कम किया जा सके। वायु प्रदूषण को कम करने के लिए दिल्ली की केजरीवाल सरकार ऑड-ईवन का फार्मूला लेकर आई थी, जो प्रयोग ज्यादा सफल नहीं रहा।
दरअसल, देश की जनता के दिमाग से जब तक यह बात नहीं निकलेगी कि कारों का काफिला बढ़ाना कोई स्टे्टस सिंबल नहीं होता है, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। इसी थोथे स्टेट्स सिंबल के कारण तेजी से बढ़ती वाहनों की संख्या हमारे लिए सिरदर्द बनती जा रही हैं। बहरहाल लॉकडाउन के कारण प्रदूषण का स्तर कम होना हमें एक सकारात्मक संदेश दे रहा है। अगर हम अब भी नहीं जागते हैं तो यह अपने पैरों पर कुल्हाडी मारने जैसा होगा। हमें यह समझना होगा कि प्रदूषण कम होने पर ही पृथ्वी बच पाएगी, जब पृथ्वी बचेगी, तभी जीवन बचेगा। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के लेटेस्ट सेटेलाइट डाटा से पता चला है कि इन दिनों उत्तर भारत में वायु प्रदूषण 20 साल में सबसे निचले स्तर पर है। नासा ने इसके लिए वायुमंडल में मौजूद एयरोसॉल की जानकारी हासिल की। फिर ताजा आंकड़े की तुलना 2016 से 2019 के बीच खीचीं गई तस्वीरों से की। नासा में यूनिवर्सिटीज स्पेस रिसर्च एसोसिएशन (यूएसआरए) के साइंटिस्ट पवन गुप्ता के मुताबिक, लॉकडाउन के कारण वायुमंडल में बड़े पैमाने पर बदलाव देखने को मिला है। इससे पहले कभी उत्तर भारत के ऊपरी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का इतना कम स्तर देखने को नहीं मिला।

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