Categories
इतिहास के पन्नों से

भारतीय संस्कृति में नारी का योगदान

नारी शब्द ही शक्तिस्वरूप है इसके अन्य पर्यायवाची स्त्री भामिनी कांता महिला आदि हैं। नारी के लिए सबसे अधिक प्रयोग में आने वाले शब्द स्त्री व महिला हैं। स्त्री शब्द स्त्यै धातु से बना है जिसका अर्थ है सिकुड़ना इकट्ठा करना सहेजना बनाना समेटना, वास्तव में यह सब स्त्री के स्वभाव में होते हैं। महिला शब्द मह धातु के मही शब्द से बना है मही का अर्थ है पृथ्वी। इस अर्थ में महिला पृथ्वी की तरह ही सहनशील, उर्जा से परिपूर्ण, अनेक रहस्यों को अपने में छुपाए रखने वाली तथा सर्वदा दाता होती है धरती जैसे इन गुणों को धारण करने के कारण महिला को पूजनीय कहते हैं। उर्दू भाषा में नारी को ‘जनानी’ भी कहा जाता है यह शब्द भी संस्कृत भाषा के ‘जननी’ शब्द का ही एक रूप लगता है जिसका अर्थ है जन्म दात्री। वास्तव में नारी का पूर्ण स्वरूप मातृत्व में ही विकसित होता है। भारतीय संस्कृति में तो नारी ही सृष्टि की समग्र अधिष्ठात्री मानी जाती है। पूरी सृष्टि ही स्त्री है सृष्टि के विभिन्न रूपों में स्त्री ही व्याप्त है। नारी भावों की अभिव्यक्ति है। पारंपरिक दर्शन में बेशक पुरुष प्रधान समाज दिखता हो किंतु भारतीय दर्शन और संस्कृति की मूल अवधारणा में नारी ही शक्तिस्वरूपा है। भारतीय नारी ने अपने त्याग और तपस्या की शक्ति से भारतीय संस्कृति को पाला पोसा है।

नारी तत्व स्वभाव से ही प्रेम रूप है नारी प्रेम की अविरल गंगा है।नारी के बिना न पुरुष की पूर्णता है न प्रकृति की। नारी पुरुष की पूरक है, नर यदि सूर्य है तो नारी चंद्रमा। नर यदि आकाश है तो नारी रत्नगर्भा धरती है। नर यदि बादल बनकर जल वृष्टि करता है तो नारी पृथ्वी बनकर उस जल से प्राणियों का पोषण करती है। नर दाता है तो नारी पालिका है, नर क्रोध है तो नारी शांति है, नर पोखर है तो नारी नदी है, नर गृहपति है तो नारी गृहलक्ष्मी है, नर वेत्ता है तो नारी विद्या है, नर कर्ता है तो नारी क्रिया है। नारी है तो ही समाज है, नारी में प्रकृति के सभी नैसर्गिक गुण मौजूद है यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि नारी ही इस जगत की रचयिता है नारी में ऐसा प्रेम और समर्पण है जो पत्थर को भी मोम बना सकता है। नारी मां बहन बेटी बहू पत्नी आदि बनकर अपने परिवार को ममता के सूत्र में पिरोकर रखती है। नारी भावना, सेवा, समर्पण, संवेदना, दया, भक्ति, श्रद्धा और धर्म की साक्षात मूर्ति है।
नारी के लिए ये पंक्तियाँ ठीक ही हैं-
शुभ लग्न नारियां शुभ मुहूर्त सी हैं। इस धरा के लिए एक जरूरत सी हैं।
मां, बहन, बेटी, पत्नी सभी रूप में, हैं वो अनुपम कृति खूबसूरत सी हैं।।वास्तव में न केवल भारत की संस्कृति अपितु पूरी प्रकृति और सृष्टि को ही संरक्षित और सुसज्जित रखते हुए भारतीय संस्कृति को जीवंत बनाए रखने में नारी शक्ति का प्रमुख योगदान रहा है।
नारी ना केवल परिवार रूपी उपवन की माली है बल्कि भारतीय संस्कृति की मूल अंग-रक्षिका भी है।
प्रेम लुटा तन मन दिया, करती है बलिदान। ममता की वर्षा करें नारी घर का प्राण।। भारतीय नारी ने किस प्रकार से भारतीय संस्कृति को बचाने संरक्षित करने और उसे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने का महान् कार्य किया है इसे निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा और अधिक स्पष्ट करने का प्रयास है–
माता के रूप में नारी शक्ति का योगदान—
भारतीय संस्कृति और भारत की अस्मिता की रक्षा करके भारतीय संस्कृति के संरक्षण में अपना योगदान देने वाली माताओं में सतयुग से लेकर आज तक अनेक भारतीय नारियों का नाम आता है।
माता कौशल्या, माता कुंती, माता यशोदा, माता देवकी, जीजाबाई, पन्नाधाय, माता पद्मावती, गान्धारी, मदालसा, माता विदुला से लेकर आज भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की माता जी तक ने अपने कोख से महान सपूत पैदा करके उन्हें भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ा कर उनके अंदर तपस्या और सेवा की शिक्षा देकर भारतीय संस्कृति को विश्व गुरु के रूप में स्थापित करने में अपना महान योगदान दिया है।
माता विदुला का नाम इसी रूप में लिया जाता है, माता कुंती ने अपने पुत्रों को माता विदुला द्वारा अपने पुत्र संजय को धर्मयुद्ध के लिए प्रेरणा देने वाली कथा सुनाकर ही युद्ध की प्रेरणा दी थी।
हिंदवी साम्राज्य की स्थापना करके विदेशी आक्रांताओं को धूलधूसरित करने वाले वीर शिवाजी की माता जीजाबाई ने भी अपना मातृत्व धर्म निभाते हुए अपने बेटे शिवाजी को स्वदेश प्रेम के संस्कार दिए थे।माता जीजाबाई ने अनेक कष्ट सहे अपने पति से वियोग का दुख भी झेला किंतु शिवाजी के लालन-पालन में कोई कमी नहीं आने दी। वे सदा ही अपने पुत्र को वीर व धर्म परायण बनाने का पाठ पढ़ाती थी वह पुत्र को महाभारत और रामायण आदि ग्रंथों की प्रेरक गाथा सुनाती ताकि पुत्र को वीरोचित संस्कार मिल सकें। उनकी वर्षों की तपस्या फलीभूत हुई और महाराज शिवाजी हिंदू राज्य की स्थापना करने में सफल हुए यदि उन्हें जीजाबाई जैसी माँ ना मिली होती तो वे कदाचित यह सब ना कर पाते। महाराज ऋतुध्वज की पत्नी मदालसा भी एक विदुषी माता थी उनके चार पुत्र थे उन्होंने अपने तीन पुत्रों को मोहमाया से भरे संसार की निस्सारता से परिचय करा कर सन्यासी बना दिया और अपने पति की चिंता पर अपने एक पुत्र अलर्क को राजनीति की शिक्षा देकर धर्मनिष्ठ राजा बनाया। माता कौशल्या ने श्री राम जैसे पुत्र को अवतरित करके भारतीय संस्कृति को दुनिया में सिरमौर बना दिया माता कौशल्या ना होती तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम न मिलते।
माता देवकी ने सोलह कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण को अवतरित करके भारतीय संस्कृति के लिए माँ के रूप में महान योगदान दिया है। वास्तव में राम और कृष्ण भारतीय संस्कृति के प्राण हैं। मां यशोदा का भी धाय माँ के रूप में कृष्ण का पालन-पोषण करना और कृष्ण के प्रति अनंत प्रेम और समर्पण किसी से छुपा नहीं है। स्वामी दयानंद की माता यशोदाबाई, स्वामी विवेकानंद की माता भुवनेश्वरी देवी, लव-कुश की माता सीता, परम पूजनीय केशव राव बलिराम हेडगेवार की माता रेवती बाई, परम पूजनीय गुरु जी की माता लक्ष्मीबाई, आदरणीय नरेंद्र मोदी जी की माताजी हीराबेन आदि ने इस भारत को महान वीर और धर्मनिष्ठ पुत्र देकर भारतीय संस्कृति और भारतीय सनातन मूल्यों के सरंक्षण में अपना अमूल्य योगदान दिया है। इन दिव्य माताओं की शिक्षा प्राप्त करके इनके पुत्रों ने ना केवल भारतीय संस्कृति के संरक्षण में अपना अमूल्य योगदान दिया है बल्कि भारतीय संस्कृति और भारतीय जीवन दर्शन से पूरी दुनिया को परिचित भी कराया है।
पत्नी के रूप में नारी शक्ति का योगदान–
अपने पति के चरणों मे एकनिष्ठ भक्ति और पूर्ण समर्पण के कारण ही भारतीय समाज में स्त्री पति की अर्धांगिनी कहलाती है, अर्धांगिनी का अर्थ है कि पति और पत्नी अलग-अलग अपूर्ण हैं, दोनों मिलकर ही एक पूर्ण मनुष्य हैं। नारी अपने कार्य कौशल से घर में ममता की धारा प्रवाहित करने के साथ ही अपने पति की परम मित्र व सहयोगिनी होती है। भारतीय नारी का उदात्त चरित्र और पतिव्रत धर्म उसकी विशेषता रहा है। भारतीय नारियों में हजारों ऐसे उदाहरण हैं जिसमें उन्होंने एक आदर्श पत्नी के रूप में अपने संस्कारों से सत्य मार्ग पर चलते हुए अपने पतिव्रत धर्म की शक्ति से दुनियाभर को हतप्रभ किया है। अपने सतीत्व और धर्म के कारण सीता, सावित्री, उर्मिला, मंदोदरी, पांचाली, तारावती, अनुसूईया आदि महान नारियां भारतीय समाज का दर्पण हैं।
पश्चिमी देशों में एक ही स्त्री कई-कई पुरुषों से विवाह कर लेती हैं, वहां के परिवार बातों ही बातों में टूट बिखर जाते हैं, जहाँ पश्चिमी देशों में विवाह केवल दो शरीरों का गठबंधन और भोग का माध्यम समझा जाता है, वहीं भारतीय नारियों ने विवाह को आत्मा का बंधन और सात जन्म के बंधन के रूप में स्थापित किया है।भारतीयों नारियों ने दुनिया को सिखाया है कि पति और पत्नी दो शरीर किन्तु एक आत्मा हैं जो कि सात जन्मों तक भी अलग नहीं हो सकते, और विवाह भोग विलास का माध्यम न होकर सृष्टि रचना का धर्म है जिससे पति पत्नी का लक्ष्य सदाचारी सन्तति मानवता को समर्पित करके मोक्ष प्राप्ति ही है। ऐसी ही पतिव्रता नारियों में सावित्री का नाम आता है जिसने अपने सतीत्व और पतिव्रत धर्म की शक्ति से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण तक लौटा लिए थे। इसी प्रकार भारद्वाज मुनि की कन्या परम् सती श्रुतिवती थी जिन्होंने कठोर तपस्या के बाद इंद्र को पति के रूप में प्राप्त किया।
राक्षस राज रावण की पटरानी मंदोदरी भी लज्जा और विनय की देवी थी उन्होंने सदैव अपने पति को बुरे मार्ग पर चलने से रोका किंतु उनकी निष्ठा पति चरणों में ही रही।
सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारावती ने भी त्याग और पति निष्ठा में अपने पति के वचनों को पूरा करने के लिए स्वयं को सरे बाजार में बेच दिया था।
अत्रि ऋषि की पत्नी महासती अनुसुइया भी दुनिया में धर्मनिष्ठ कर्तव्यनिष्ठ और पतिव्रत धर्म की सर्वश्रेष्ठ उपासिकाओ में विख्यात हैं। इसी तरह माता-सीता का नाम आज भी महान पतिव्रता के प्रमाण के रूप में लिया जाता है।
स्वामीभक्ति व बलिदानी के रूप में नारी शक्ति का योगदान–
मेवाड़ राजवंश की रक्षा करने वाली धाय माँ पन्ना के बारे में कौन नहीं जानता? मेवाड़ के इतिहास में जिस गौरव के साथ प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप को याद किया जाता है, उसी गौरव के साथ पन्ना धाय का नाम भी लिया जाता है, जिसने स्वामीभक्ति को सर्वोपरि मानते हुए मेबाड़ राजवंश की रक्षार्थ, राजवंश के इकलौते दीपक कुंवर उदयसिंह की रक्षा करने के अपने वचन को निभाने के लिए अपने स्वयं के पुत्र चंदन का बलिदान कर दिया था। धाय माँ पन्ना के जैसी बलिदान की देवी भारत के अन्यत्र कहीं सुनने को नहीं मिलती है।
ऐसे ही महादानी कर्ण की पत्नी, माता पद्मावती ने भी नारायण द्वारा ब्राह्मण रूप में ली गयी परीक्षा में अपने पुत्र वृषकेतु का माँस मांगे जाने पर अपने वचन पर अडिग रहते हुए अपने पुत्र का बलिदान करके उसका माँस उस ब्राह्मण को सहर्ष दे दिया था और “प्राण जाएं पर वचन न जाई” की भारतीय पुरातन परम्परा को कायम रखने में अपना योगदान दिया।वेद-ऋचाओं की रचयिता एवं विदुषी के रूप में नारी का योगदान– भारतीय नारियों ने न केवल माता, पत्नी, बेटी, सेविका व साधिका के रूप में अपना अतुलनीय योगदान भारतीय संस्कृति को दिया है अपितु नारियाँ वेद-ऋचाओं और वेदांत की रचनाकार तथा प्रकांड विदुषियां भी रही हैं। इंद्र की माता और कश्यप ऋषि की पत्नी अदिति चारों वेदों की प्रकांड विदुषी रही हैं इन्होंने ऋग्वेद के चौथे मण्डल की अठारहवें सूक्त की पांचवी, छठी और सातवीं ऋचाओं की रचनाएं लिखीं। इंद्र की पत्नी देवसम्राज्ञी शची अर्थात इंद्राणी, स्वायम्भुव मनु की पत्नी सती शतरूपा, महाराज अश्वपति की पत्नी शाकल्यदेवी, महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति, कांक्षीवान की कन्या ब्रह्मवादिनी घोषा, वेदों पर अनुसन्धान करने वाली विश्ववारा, आयुर्वेद पर अनुसन्धान करने वाली सोमरस की खोज करने वाली और ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के उन्नीसवें सूक्त की ऋचाएं संकलित करने वाली विदुषी अपाला,
वेदों के अनुसार अन्न के नए बीजों का अनुसन्धान करने वाली अभृण ऋषि की कन्या वाक, वृहस्पति की पुत्री रोमशा, वेदों के शास्त्रार्थ में महृषि याज्ञवल्क को भी पराजित कर देने वाली वक्चनु की पुत्री गार्गी,
अपने पति से वेदों की शिक्षा लेकर ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए गुरुकुलों की स्थापना करने वाली याज्ञवल्क ऋषि की पत्नी विदुषी मैत्रेयी,
राजा जनक को भी शास्त्रार्थ में पराजित कर देने वाली तथा गुरूकुल खोलकर शिक्षा देने का महान कार्य करने वाली जनक राज्य की परम् विदुषी सुलभा,
राम सीता और लक्ष्मण को ज्ञान की बहुत सी बातों की शिक्षा देने वाली ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपमुद्रा,
अपने पुत्रों को वेदों की शिक्षा देने वाली महृषि कांक्षीवान तथा दीर्घश्रवा की माता और विदुषी घोषा की दादी विदुषी उशिज, विदुषी लोपमुद्रा की बहिन और महर्षि दधीचि की पत्नी विदुषी प्रातिथेई, वाचस्पति मिश्र की पत्नी विदुषी भामती, और एक अनपढ़ कालिदास को महाकवि बनाने वाली उनकी पत्नी विदुषी विद्योतमा,
आदित्य की पुत्री और सावित्री की छोटी बहिन और अयोध्या के राजा संवरण की पत्नी विदुषी तपती आदि सहस्त्रों भारतीय नारियों ने भारतीय संस्कृति के रक्षार्थ भारतीय ज्ञान और विज्ञान को अगली पीढ़ियों में हस्तांतरित करके अपना महान योगदान दिया है। ऐसी ही विदुषी सन्ध्या ने महर्षि मेधातिथि को शास्त्रार्थ में पराजित किया था, विदुषी सन्ध्या यज्ञ को सम्पन्न कराने वाली पहली महिला पुरोहित थीं, उन्हीं के नाम पर प्रातः सन्ध्या और सायं सन्ध्या का नामकरण हुआ। इस प्रकार एक नहीं, सौ नहीं बल्कि सहस्त्रों नारीयों ने वेद उपनिषदों पर अनुसन्धान करते हुए भारतीय ज्ञान-विज्ञान को आगे बढ़ाकर भारत की संस्कृति में अपना अमूल्य योगदान दिया है।
साधिका के रूप में नारी शक्ति का योगदान—
नारी का एक रूप साधिका का भी है। इस रूप में नारी भौतिक युग की मान मर्यादाओं को तज कर प्रभु प्रेम में रंग जाती है और उसका ईश्वर के प्रति प्रेम भौतिक परंपराओं में ना बंधकर दिव्य और आध्यात्मिक रूप ले लेता है। इस स्थिति में ईश्वर के प्रेम में डूबी उस नारी के शब्द ही काव्य बन जाते हैं। उसके रोम-रोम में प्रभु प्रेम की धारा प्रवाहित होने लगती है उसकी श्रद्धा और भक्ति इतनी अटूट होती है जिसे दुनिया की कोई शक्ति हिला नहीं पाती ऐसी ही ईश्वर उपासिका मेवाड़ की महारानी मीराबाई को कौन नहीं जानता है। महारानी का पद और राजकाज सब छोड़कर मीराबाई श्री कृष्ण की अनंत उपासिका बन गई और समाज की मर्यादाओं को त्याग कर श्रीकृष्ण को ही पति रूप में मानकर उन्हीं की भक्ति में लीन होकर एक महान साधिका के रूप में अमर हो गई। ऐसे ही राजकुमारी आण्डाल भी कृष्ण के ही रूप रंगनाथ प्रभु को अपना सर्वस्व और पति मानने लगी थी इन्हें दक्षिण भारत की मीरा के रूप में जाना जाता है।
कोटा नरेश पीपा की पत्नी सीतादेवी भी भगवान द्वारकाधीश की अनन्य उपासिका थी उन्होंने अतिथि सेवा को भगवान की पूजा के समान बताया और पति का वैभव मिट जाने के बाद भी सीतादेवी ने आथित्य धर्म निभाना नहीं छोड़ा। द्वार पर आए साधुओं को भोजन कराने के लिए उन्होंने स्वयं को भी बोली पर लगा दिया किन्तु भारतीय संस्कृति की ‘अतिथि: देवो भव’ की परंपरा को जीवंत रखने में अपना योगदान दिया।
स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की पत्नी माँ-शारदा ने कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करके दुनिया को बताया कि भारतीय संस्कृति ऐसी महान तपस्विनीयों को जन्म देती है जो पति के साथ गृहस्थ धर्म निभाते हुए भी आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर सकती हैं। माँ-शारदा के पति उन्हें षोडशोपचार द्वारा देवी के रूप में पूजते थे पति की तपस्या में सहयोग करने के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली मां शारदा महिलाओं को ब्रह्मचर्य पालन की प्रेरणा आज भी दे रही हैं।
साधिका के रूप में ही भील जाति की शबरी ने भी अपनी भक्ति के बल पर प्रभु श्रीराम को अपनी कुटिया में बुला लिया और भक्तिवश प्रभु राम को अपने झूठे बेर खिलाकर दुनिया को भक्ति की शक्ति का परिचय कराया।रणभूमि में जौहर दिखाने वाली वीरांगना के रूप में नारीका योगदान-
भारत में अपनी युद्ध कला के लिए विख्यात अनेक नारियां हुईं हैं जो भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म को बचाने के लिए खुद ही समरभूमि में कूद पड़ीं। अपने राज्य के बाहर एवं अंदर भारतवर्ष के प्रसिद्ध तीर्थ और स्थानों में कुँआ व मंदिरों की निर्माण कराने वाली और शास्त्रों के मनन चिंतन और प्रवचन हेतु मन्दिरों में विद्वानों की नियुक्ति करने वाली मालवा साम्राज्य इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर का भारतीय संस्कृति के उत्थान में अतुलनीय योगदान है।
मराठा शासित झांसी राज्य की रानी और 1857 की क्रांति की दूसरी शहीद वीरांगना लक्ष्मीबाई का योगदान भी महान है जिन्होंने अपने राज्य और प्रजा की रक्षा में मात्र 29 साल की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य की सेना के सामने युद्ध करके वीरगति को प्राप्त होकर, नारियों को बता दिया कि भारतीय संस्कृति और संस्कारों से पली-बढ़ी नारी युद्ध कला में भी पीछे नहीं है।
ऐसे ही महोबा के चंदेल राजा सालवाहन की पुत्री और गोंड राजा दलपत शाह की पत्नी रानी दुर्गावती ने अपने पति की असमय मृत्यु के बाद राज-काज संभाला और मुगल शासक आसिफ खान से युद्ध करके अपनी वीरता से नारीशक्ति को सिद्ध किया।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम से भी 33 वर्ष पहले अंग्रेजों से सशस्त्र मुकाबला करने वाली कर्नाटक के कित्तूर की रानी चेन्नम्मा के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के लिये सशस्त्र संघर्ष करने वाले सबसे पहले शासकों में रानी चेनम्मा को जाना जाता है। अपने महान युद्धकौशल के लिए विख्यात रानी चेनम्मा दक्षिण भारत की लक्ष्मीबाई कहलाती हैं। इन वीर वीरांगनाओं ने अपने युद्ध कौशल से रणभूमि में जाकर यह सिद्ध किया कि भारत के संस्कारों से सुसज्जित नारी एक ओर प्रेम और समर्पण की जीवंत मूर्ति है तो राष्ट्र और संस्कृति के दुश्मनों के लिए वही नारी साक्षात यमराज का रूप है।शिक्षिका के रूप में नारीशक्ति का योगदान–
वैसे तो माँ ही प्रत्येक इंसान की प्रथम गुरु और शिक्षिका होती है, माँ ही अपने बच्चों को अपनी संस्कृति, संस्कार, धर्म आचरण की शिक्षा देती है लेकिन भारत में ऐसी भी महान नारियां हुईं हैं जिन्होंन धर्ममार्ग से भटके हुए अपने पतियों की शिक्षिका बनकर उन्हें सन्मार्ग पर लाने का महान कार्य किया है। महाकवि कालिदास की पत्नी विद्योतमा, रावण की पत्नी मन्दोदरी, मेघनाद की पत्नी सुलक्षणा, धृतराष्ट्र की पत्नी गान्धारी और तुलसीदास की पत्नी रत्नावली का नाम ऐसी ही पतिव्रता नारियों और शिक्षिकाओं के रूप में योगदान के लिये प्रसिद्ध है।
तुलसीदास की पत्नी रत्नावली ने पति की शिक्षिका बनकर, मोह माया और खुद के रूप की आशक्ति में फंसे अपने पति को ईश्वर का रास्ता दिखाया और उनकी प्रेरणा से तुलसीदास ने एक महान महाकाव्य रामचरितमानस की रचना कर डाली। हिन्दी(अवधी) भाषा में रचित तुलसीदास की रामचरितमानस न होती तो आज रामायण घर-घर और जन-जन की जिह्वा तक न पहुँच पाती। नारी शक्ति ने माता, पतिव्रत पत्नी, महान बेटी, वीरांगना, स्वामीभक्त, वेदों की अनुवादिका और सूक्तों की रचनाकर, विदुषी, और शिक्षिका सभी रूपों में भारतीय संस्कृति के संवर्धन, सरंक्षण और अगली पीढ़ियों को हस्तांतरण में अनन्त प्रकार से योगदान दिये हैं।
भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति के योगदान को किसी निबन्ध के रूप में सीमित शब्दों में बाँधना बहुत कठिन ही नहीं असम्भव सा कार्य है।
वास्तव में नारी शक्ति ही प्रकृति का आधार और भारतीय संस्कृति की सर्वोच्च पोषक व संरक्षक है।
भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति के अनगिनत योगदान के कारण भारतीय शास्त्रों में भी नारी को देवी के रूप में पूजनीय कहा गया है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफलाः क्रियाः ।।लेखक- राजकुमार वैदिक, बबराला उ०प्र०

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
Hititbet Giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
meritking giriş
matbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
kralbet
kralbet
imajbet giriş
xslot giriş
betvole giriş
betvole giriş
betvole giriş
betvole giriş
gobahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
grandpashabet
grandpashabet
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
xslot giriş