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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व

गीतामृत : जो जिसका है उसे उसी के लिए छोड़ दो

 

हम तनिक कल्पना करें कि एक माता की गोद में उसका एक अबोध बच्चा है । मां ने अपने बच्चे को अपने अंक में आलिंगनबद्घ किया हुआ है। मां बहुत ही ममत्व से बच्चे के सिर को सहलाते हुए अपने आंचल से स्तनपान करा रही है। मां अभी दाहिने स्तन से स्तनपान करा रही है लेकिन दाएं स्तन में दूध समाप्त हो जाता है । बच्चा अभी भूखा है ।मां उस भूखे बच्चे की भूख की आभास कर रही है कि उसकी भूख समाप्त नहीं हो पाई । इसलिए मां बच्चे को दाहिने स्तन से छुड़ाकर बाएं स्तन से दूध पिलाना चाहती है। बच्चा दाएं स्तन के छूटने पर व्याकुल होकर बहुत जोर से रोना शुरू कर देता है। लेकिन जैसे ही मां उसको दूसरा बांया स्तन दूध पीने के लिए प्रदान करती है तो बच्चा चुप होकर दूध पीने लग जाता है।
जो स्थिति इस बच्चे की और उसकी मां की है यही स्थिति इस मनुष्य और ईश्वर की है । मां रूपी ईश्वर को यह मालूम है कि बच्चे को मुझे दूसरा स्तन रूपी स्थान देना है , लेकिन दूसरे स्तन के देने के मध्यांतर में जो बच्चे का रोना है वह वैसा ही है जैसे मनुष्य को ईश्वर जब एक स्थान से अर्थात एक योनि से दूसरी योनि में भेजता है । जैसे बच्चे को माँ के स्तन को छोड़ने में दुख होता है , वैसे ही मनुष्य को भी इस मिली हुई योनि को छोड़ने में दुख होता है । अतः जब ईश्वर एक जन्म से दूसरा जन्म देता है तो बच्चा रूपी मनुष्य रोता है , क्योंकि वह अल्पज्ञ है और वह यह नहीं जानता कि मेरी ‘मां’ मुझको दूसरा स्तन रूपी जन्म देने जा रही है ।यह ज्ञान तो केवल मां को है, ईश्वर को है। इसलिए हम अज्ञानता में रोते हैं अन्यथा मृत्यु तो एक नया जीवन है। फिर क्यों रोना ?
श्री कृष्ण जी महाराज द्वारा गीता में जो उपदेश दिया गया है उसका सार समझने की आवश्यकता है और उस सार को फिर अपने जीवन में आचरण में उतारने की आवश्यकता है। श्री कृष्ण जी बातों – बातों में अनेकों प्रसंग और अनेकों शब्द ऐसे कह गए जिन्हें हमको समझना चाहिए । वह अर्जुन को बता रहे हैं कि अर्जुन ! स्थितप्रज्ञ बनो ।
स्थित प्रज्ञ कौन हैं ? इसको भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है यदि आज का समाचार इस शब्द की गहराई को समझ ले तो संसार के अनेकों झगड़े समाप्त हो जाएंगे। इसका अर्थ बहुत गहरा है। जिसने अपने आप को जान लिया है। जिसकी इच्छाएं और वासना समाप्त हो गई हैं , जो प्रभु को सत्य मानता है, जो अपने आप में स्थित हो गया है ,जो यह जान गया है कि आत्मा नाशवान नहीं है बल्कि शरीर नाशवान है। जो यह जान गया है कि उसे नहीं मरना , अज्ञानी ही मरता है। ज्ञानी मरता ही नहीं है। वही स्थितप्रज्ञ है। जिसकी प्रज्ञा स्थिर हो गई है , जिसका ज्ञान दृढ़ हो गया। जिसकी भटकन समाप्त हो गई हो , दूसरे अर्थों में ज्ञानी ही स्थितप्रज्ञ है।
जैसे जागृति अवस्था में यह जगत नजर आता है, नींद में सपने देखता है लेकिन जब गहरी नींद होती है तो कुछ भी नहीं दिखाई देता , यह स्थिति भी स्थितप्रज्ञता की है। आत्मज्ञान में लीन होने लगे। जब हम बहुत गहरी नींद लेते हैं तो वह भी स्थितप्रज्ञता ही होती है।
जब जीव इस स्थिति से बाहर आता है तो फिर उसको जगत नजर आने लगता है ,और जो नजर आता है वह नश्वर है । आंखें खुली और अर्थात ज्ञान हुआ तो पता चला कि वह तो असत्य को सत्य मान बैठा है। जैसे मनुष्य सपने में जो देखता है वह जागृत में विलुप्त हो जाता है , ऐसे ही संसार सपना है। आत्मज्ञान जागेगा संसार की परिभाषा ही बदल जाएगी।
जो इस जगत में रहते हुए निरपेक्ष है, जो है ही नहीं, उसे वह कैसे मान ले और जो है वह उसी में स्थित रहकर सुख का अनुभव करता है। जगत तो आभास की स्थिति है ,लगता है, जगत है। लगता है इसके सुख सुखकारी हैं। लगता है ऐश्वर्य जैसी कोई वस्तु नहीं। लगता है जगत के सुख अन्यत्र नहीं ।यह केवल आभास ही है ।सुख जो केवल क्षणिक ही हैं ,लेकिन ब्रह्मज्ञान का सुख प्राप्त कर लेने के बाद अपने आत्मस्वरूप को जान लेने के बाद ये आभासमय सुख, सुख नहीं रहते। केवल इसका आभास ही रहता है ।
समता का अर्थ है सभी को समान रूप से देखें, क्योंकि सब में एक ही आत्मा है। नाम अलग-अलग हैं, वेश अलग-अलग हैं ।लेकिन हैं तो सभी एक के प्रतिरूप । जो सुख में सुखी नहीं होता , दु:ख में दु:ख नहीं मानता , जो दोनों स्थितियों में समान होता है इसी स्थिति को भी समता कहा गया है।
जिस पर ईश्वर की कृपा होती है उसकी प्रज्ञा जागृत हो जाती है , वह स्थितप्रज्ञ हो जाता है । सुख-दु:ख को एक समान समझता है जो है वही रहना चाहता है , क्योंकि वह सत्य को जान गया होता है। योगियों की दुनिया ऐसी ही होती है । मिल गया तो ले लिया , नहीं मिला तो मलाल नहीं। क्योंकि उसकी प्रज्ञा जग चुकी होती है – दोनों ही स्थितियों में समान रहने की।
मानव जीवन की यह रोने की समस्या कर्म योग से हल हो सकती है। कर्म योग और कर्मकांड दोनों में बहुत अंतर है। कर्मकांड के माध्यम से मनुष्य स्वर्ग में जाने की और कर्म अच्छे करके उसके फल भोगने की इच्छा में फंसा हुआ है। वह केवल भोगवाद है। उससे समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
कर्मयोग से इस समस्या का समाधान हो सकता है। कर्मयोगी वह है जो कर्म करने पर अपना अधिकार मानता है , कर्मफल पर नहीं । इसलिए वह कर्म करता है , निष्काम भाव से करता है । इस कामना के वशीभूत होकर कर्म नहीं करता कि मैं इसका फल अधिकारपूर्वक लूंगा । क्योंकि फल पर अधिकार किसी और सत्ता का है । कुछ लोगों ने श्री कृष्ण जी के इस उपदेश की गलत व्याख्या की है कि कर्म करो फल की इच्छा ही मत करो । ऐसा कभी नहीं हो सकता कि कर्म किया जाए और उसके फल की इच्छा ना हो । ध्यान रहे कि एक योगी भी मोक्ष की प्राप्ति के लिए योग साधना करता है , विद्यार्थी अच्छे अंक लाने की इच्छा से पूरे वर्ष पढ़ाई में मेहनत करता है । अतः इच्छाएं रखनी चाहिए , परंतु कर्म करते समय फ़ल पर अपना अधिकार नहीं मानना चाहिए । इस गंभीर अंतर को समझना चाहिए।
एक साधु और एक विद्यार्थी दोनों सकारात्मक संघर्ष कर रहे हैं । दोनों एक इच्छा के अधीन होकर इस संघर्ष को कर रहे होते हैं । यदि इच्छा मर गई तो याद रखना कि यह सकारात्मक संघर्ष की भावना समाप्त हो जाएगी । इसलिए इच्छाएं तो रहें परंतु वह फल पर अधिकार के रूप में स्थापित ना हो जाए। कर्मण्येवाधिकारस्ते माफलेषु कदाचन – कहकर श्री कृष्ण जी भी यही कह रहे हैं कि फल पर कभी भी तेरा अधिकार नहीं है। यह दृष्टिकोण ही कर्म योग का दृष्टिकोण है । यदि फल के प्रति आसक्ति छोड़ दी जाए तो मनुष्य को सुख दुख दोनों नहीं होंगे। वह समभाव से रहेगा हम दुखी जब भी होते हैं । जब हमने फल के प्रति आसक्ति ही छोड़ दी , तब दुख किस बात का होगा और जितना फल के प्रति आसक्ति होगी उतने ही फिर मनुष्य को जन्म लेने पड़ेंगे। जन्म मरण के फेरे में, बंधन में मनुष्य फंसता रहेगा। लेकिन कर्म योगी बुद्धिमान व्यक्ति कर्मफल के प्रति आसक्ति छोड़कर कर्म करता है। क्योंकि वह जानता है कि फल उसके हाथ में नहीं है , फल तो ईश्वर के हाथ में है मनुष्य केवल कर्म कर सकते हैं । मनुष्य कर्म करने के साथ-साथ फल की आशा रख सकते हैं लेकिन फल पर अधिकार नहीं मान सकते।जैसे किसान खेती कर सकता है।बीज डाल सकता है। लेकिन वर्षा न होने पर खेती सूख सकती है ।ओले पड़ने पर फसल नष्ट हो सकती है। जानवर खेती को तबाह कर सकते हैं ,तो हमको फसल प्राप्त नहीं होगी । किसान की इच्छा जरूर थी कि फसल अच्छी प्राप्त होगी , लेकिन उसका अधिकार तो नहीं था। बस , यही यथार्थ है। इसलिए यथार्थ स्थिति को कर्मयोगी समझ लेता है और इसी को यथार्थ दृष्टिकोण मानकर अपने जीवन को सफल बना लेता है। मनुष्य को कर्म के साथ निस्संगता अर्थात निष्कामता जीवन में स्थिर करनी होगी।
इंद्रियों को विषयों के पीछे दौड़ाने के स्थान पर उन्हें मन की तरफ लगाया जाए। आत्मा की तरफ लगाया जाए तो विषयों के कारण मन में उठने वाले उद्वेग अवश्य शांत होते हैं। उद्वेग विवेक से शांत होते हैं । जो उद्वेग इंद्रियों के बहिर्मुखी होने के स्थान पर अंतर्मुखी होने से शांत होते हैं ,अर्थात भटकना, अटकना सब निरुद्ध हो जाएगा। जैसे समुद्र में बहुत सारी नदियां आ करके पड़ती रहती हैं , परंतु समुद्र शांत ही रहता है , ऐसे ही उद्वेग रूपी नदियां मनुष्य को जरूर परेशान करेंगे परंतु उनको विवेक से इंद्रियों की शक्ति को अंतर्मुखी करने से शांत किया जा सकता है।
सुख ,दुख दोनों इंद्रियों के विषय हैं। मनुष्य दु:ख ,शोक और असिद्घि से अलग हटके सुख ,शुभ और सिद्धि से भी ऊपर उठकर चले तो जीवन में सफलता अवश्य मिलती है। क्योंकि यह सभी इंद्रियों के विषय हैं। सुख- दु:ख इंद्रियों के विषयों को छोड़कर अनंत आनंद की प्राप्ति कर लेना ही मनुष्य के जीवन को सफल बनाती है। ऐसी स्थिति में सुख – दु:ख , मान – अपमान , गर्मी व सर्दी मनुष्य को परेशान नहीं करते बल्कि वह अचल, स्थिर और सम अवस्था को प्राप्त कर लेता है , जो एक योग की अवस्था है और इसी को ब्राह्मी स्थिति कहते हैं।
भारतीय साहित्य में मोक्ष प्राप्ति के तीन साधन गिनाए हैं – ज्ञान, कर्म और उपासना। इनमें ज्ञान का संबंध बुद्धि से है ,कर्म का संबंध इंद्रियों से है, और उपासना का संबंध हृदय से है।
मन को वश में करना अर्थात इंद्रियों को अंतर्मुखी करना निसंदेह बड़ा कठिन कार्य है । क्योंकि मन बहुत चंचल है , लेकिन अभ्यास तथा वैराग्य से वश में किया जा सकता है , उपायों के द्वारा योग को प्राप्त किया जा सकता है। और योग के द्वारा परब्रह्म को प्राप्त किया जा सकता है। परब्रह्म वह है जो शब्दों से परे है , जिसकी शब्दों में व्याख्या नहीं की जा सकती है ,जो केवल आनंद की अनुभूति है। जो केवल गूंगे के गुड़ का रसास्वादन है। यह रसास्वादन चित्त की एकाग्रता ,जीवन में संयम, सम दृष्टि ,अभ्यास, वैराग्य और श्रद्धा से प्राप्त होता है।
ऐसा मनुष्य प्रतिक्षण ईश्वर के साथ युक्त चित् होता है और मृत्यु के समय भी ईश्वर का ही स्मरण करता है। जैसे महर्षि दयानंद ने ओ३म का उच्चारण करते हुए प्राणवायु को ब्रह्मरंध्र के माध्यम से अर्थात अन्य सभी द्वारों को ज्ञानपूर्वक बंद करके, त्याग दिया था।
कर्मफल की बात को हम एक उदाहरण से स्पष्ट करते हैं। महाभारत समाप्त हो चुका था । धृतराष्ट्र के सामने ही उसके सौ पुत्र मारे गए ।उसका दु:खी होना स्वाभाविक था। इसलिए एक दिन व्यास जी से उसने पूछ लिया कि महाराज ! मेरे ऐसे कौन से कर्म थे जिसके कारण मेरे सामने ही मेरे सौ पुत्र मारे गए और मैं जन्मांध हूं ?
यह सुनकर व्यास जी ने आंखें बंद कीं। थोड़ी देर बाद आंखें खोलीं और कहा कि राजन ! आप पूर्व जन्म में राजा थे ।एक बार आप शिकार खेलने गए। भयानक जंगल था। एक हिरण भागता हुआ आया और आपके सामने ही झाड़ी में छप गया ।आपने गुस्से में आकर उस झाड़ी में आग लगा दी ।हजारों पशु पक्षी उसमें जलकर राख हो गये । जिस हिरण के कारण आपने आग लगाई थी , वह बचकर भाग निकला किंतु उसी झाड़ी में एक सर्पिणी ने सौ अंडों को जन्म दिया हुआ था। जिससे वह आग से अंधी हुई और उसके सौ बच्चे मारे गए । इसी कारण राजा धृतराष्ट्र आप इस जन्म में अंधे हैं और आपके सामने ही आपके सौ पुत्र मारे गए हैं।
कर्म बहुत देर तक व बहुत दूर तक पीछा करता है ।देर सवेर अपना प्रभाव अवश्य दिखाता है। बुरे कर्म का बुरा फल भोगना पड़ेगा। निरपराध को मारोगे तो इस जन्म में ना सही अगले जन्म में निरापराधी मरना पड़ेगा। किसी को धोखा देकर धन ऐंठोगे तो आपके साथ भी ऐसा ही होगा । जीव जैसा करता है, वैसा फल पाता है । मनुष्य को कछुए की तरह अपने आप को समेट लेना चाहिए। आपे में आना चाहिए। आत्मस्थ अर्थात मस्त होकर आत्मरस में आनंदित रहना चाहिए। निरंहकारी होना चाहिए। अपने मूल आत्मस्वरूप में स्थित होना चाहिए ,और जो ऐसा करता है , वह कभी गलत काम नहीं कर सकता।
जो मिला है उसे भगवान का प्रसाद समझे। बैठ कर खाओ , क्योंकि जो आपके पास है वह आपका नहीं है वह किसी का दिया हुआ है जिसने दिया है उसका धन्यवाद करो और उसको याद करते हुए उसे दिए हुए का उपयोग करो । आत्मस्थ होने की पवित्र अवस्था अर्थात मस्ती की अवस्था यही है । जिस पर यह मस्ती चढ़ जाती है , वहीं आत्मरस का अनुभव करता है और वही वास्तविक स्थित प्रज्ञ होता है । हमारे पास जो भी कुछ है समझ लो कि उसका असली स्वामी तो कोई और है ,जिसका है उसी को छोड़ देना चाहिए।
जो जिसका है उसे उसी के लिए छोड़ो , उसी के संसार में छोड़ दो , उसी के श्री चरणों में छोड़ दो ।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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