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इतिहास के पन्नों से

संस्कृति रक्षक परमार शासकों के बारे में

परमार वंश के महाराज भर्तृहरि के छोटे भाई विक्रमादित्य थे। इन्हीं की 9 वीं पीढ़ी में राजा भोज परमार हुए दोनों के विषय में पूर्व में मेरे द्वारा लिखा जा चुका है । लेकिन परमार वंश के विषय में लिखने के पश्चात बहुत सारे विद्वान साथियों के टेलीफोन व संदेश आ रहे हैं कि परमारों के विषय में और बताया जाए । अतः आज की चर्चा को मैं फिर परमार वंश के शासकों के सम्बन्ध में ही रखूंगा।
वस्तुतः परमार एक ऐसा वंश है जिसकी कई स्थानों पर राज्य शाखाएं मिलती हैं । इनमें विशेष रुप से आबू के परमार, जालौर के परमार, किराडू के परमार, मालवा के परमार ,बागड़ के परमार उल्लेखनीय हैं । जिनका इतिहास में वर्णन मिलता है।
प्रमार शब्द संस्कृत का है । जिससे बिगड़कर परमार शब्द बना। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ शत्रु को प्रभावी होकर मारने वाला होता है। ‘पर’ नाम का एक राक्षस भी हुआ था । आबू पर्वत पर जिस समय यज्ञ वेदी के सम्मुख इन क्षत्रिय राजाओं ने अरब आक्रमणकारियों को मार भगाने का संकल्प लिया था, उस समय जिन लोगों ने उन्हें एक राक्षस समझकर मारने का संकल्प लिया था वे अपने आपमें परमार कहलाए। वास्तव में ये ही परमारों की विशेषता रही है कि शत्रु पर हावी व प्रभावी होकर उन्हें इन्होंने मारा है।
जैसा कि मैं पिछले 2 दिन के लेख में लिखता रहा हूं कि संन 720 में आबू में जो यज्ञ हुआ था वहां से चार क्षत्रिय यज्ञ कुंड की अग्नि के सामने प्रतिज्ञा कराने से पैदा किए गए थे जो परमार, प्रतिहार, चालुक्य ,तमर थे। सौभाग्य से ये चारों ही गोत्र गुर्जरों में आज भी उपलब्ध हैं ।
यह सर्वविदित तथ्य है कि सन 712 में मोहम्मद बिन कासिम ने भारतवर्ष के सिंध के राजा दाहिर सेन पर आक्रमण किया। इसी कारण भारतवर्ष में क्षत्रियों के तेज की कमी का अनुभव करते हुए सन 720 में आबू में वह पहला आयोजन करके राष्ट्र की बलिवेदी पर राष्ट्रहित में प्राण उत्सर्ग करने का उत्साह पैदा किया गया था। उसमें राष्ट्र व उसकी संस्कृति और सभ्यता को अक्षुण्ण रखने के लिए ,विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए आयोजन किया गया था।
आयोजन करने वालों में परमार वंश की महत्वपूर्ण भूमिका थी , क्योंकि उस समय आबू के चारों तरफ परमार वंश के लोग ही निवास करते थे । यदि यह कहा जाए कि परमार वंशीय लोग ही इस आयोजन के आयोजक थे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
मैं यहां गुर्जर और राजपूतों के विवादास्पद विषयों को नहीं छेड़ रहा हूं ।मैं उसमें जाना भी नहीं चाहता हूं क्योंकि यही गोत्र आज की अन्य जातियों में भी मिलते हैं।
इतिहासकार इसको ऐसा भी कहते हैं कि जब प्रतिहारों का ह्रास हो रहा था तो उसी समय परमार वंश का राजनीतिक दबदबा बढ़ रहा था ।जिन्होंने धीरे-धीरे मालवा के अलावा बागड़, गुजरात , सिंध,मारवाड़ आदि स्थानों पर भी अपने राज्य स्थापित किए।
आबू के प्रमारों में सर्वप्रथम उत्पल राज नामक व्यक्ति से वंशावली उत्पन्न होने का तथ्य आता है। लेकिन परमार अपना कुल पुरुष धूमराज को मानते हैं ,जो काफी पराक्रमी एवं विख्यात रहा है ।
यह दुर्भाग्य का विषय है कि इतिहास में यही चारों शाखाएं आपस में लड़ती भी रही हैं तथा एक दूसरे को कमजोर करती रही हैं। चालुक्य एवं प्रमार पड़ोसी थे। चालुक्य गुजरात की तरफ तो परमार आबू एवं उसके आसपास के क्षेत्र में और मालवा में थे ।इन दोनों के युद्ध आपस में ज्यादा हुए हैं।
इसके अलावा यहां पर उल्लेख एक और शब्द का भी करना चाहूंगा वह है राष्ट्रकूट। इस शब्द का प्राकृत शब्द रट्ट उड़ है। जिससे राठौड़ भी बना है । जब लोगों ने इस शब्द के आगे ‘महा ‘ शब्द लगाकर के और अधिक आदर सूचक बनाया तो यह महाराष्ट्र या महाराष्ट्रीक हो गया। इसी से अपभ्रंश होकर महाराठी, महरठी , महरठे, उससे अपभ्रंश हो करके मराठा, मराठी हो गया। इस प्रकार राष्ट्रकूट शब्द की उत्पत्ति और महाराष्ट्र ,मराठी की उत्पत्ति स्पष्ट हो जाती है।
अब मूल विषय पर आते हैं। सन 960 ईस्वी में आबू पर ध्रुव भट्ट नामक राजा राज्य करता था।
आबू के परमार वंश के राजाओं को अपने पड़ोसी गुजरात के सोलंकी राजाओं से अधिक संघर्ष करने पड़े , क्योंकि दोनों की ही अपने राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा थी। धूमराज परमार की चौथी पीढ़ी में धरणी वराह आबू पर राज्य कर रहा था , लेकिन मूलराज चालुक्य ( सोलंकी )ने उस पर 10 वीं शताब्दी के मध्य काल के बाद आक्रमण कर दिया।
धर्णी वराह की इसमें हार हुई और वह मूलराज से बचने के लिए हथुंडी के राष्ट्रकूट धवल की शरण में चला गया । (९९७ का धवल का शिलालेख का उल्लेख ओझा कृत ‘राजपूताना का इतिहास’ , पृष्ठ – 192 पर मिलता है) परंतु कुछ समय पश्चात धरणी बराह का आधिपत्य आबू पर फिर से हो गया।
धरणी वराह का पुत्र महिपाल था। महिपाल का एक शिलालेख सन 1002 के काल का आबू पर्वत पर इस बात का साक्षी है कि 997 के बाद पर्मारों का आबू पर पुनः आधिपत्य हो गया था। यहां कुछ इतिहासकारों का ऐसा भी आभास है कि आबू के परमार ने गुजरात के चालूक्यों के अधीन सामंत बने रहने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया हो। इसके कुछ उदाहरण अग्रिम घटनाओं में देखे जा सकते हैं।
महिपाल परमार का पुत्र धांधुक हुआ था। जो स्वभाव से उग्र एवं स्वच्छंद प्रकृति का था । इसी धांधूक ने सोलंकी राजाओं के अधीन रहने से स्पष्ट इनकार कर दिया। इस घटना से गुजरात के भीमदेव सोलंकी ने नाराज होकर आबू पर आक्रमण कर दिया।
इससे आगे की घटना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि उस समय धारा नगरी में प्रमार वंशी राजा भोज राज करता था जो धंधुक का परिजन था। राजा भोज से उसने सोलंकियों के विरुद्ध सहायता मांगी। राजा भोज के चाचा मुंज की अपने जीवन में यह इच्छा थी कि वह गुजरात के सोलंकियों को हरा दे। लेकिन मुंज की यह इच्छा अपने जीवन काल में पूर्ण नहीं हो पाई थी । इसलिए राजा भोज को अपने चाचा की इच्छा पूरी करने का एक सुअवसर हाथ लग चुका था। राजा भोज उस समय चित्तौड़ में थे । वहीं धांधूक ने उनको अपनी व्यथा सुनाई थी। राजा भोज की शक्ति का आभास राजा भीमदेव सोलंकी के पोरवाड महाजन विमल शाह को था। इसलिए विमल शाह ने धांधुक और भीमदेव में संधि करा दी। इसी विमल शाह ने अच्छे संबंधों का अवसर उठाकर 1031 ईसवी में आबू पर्वत पर आदिनाथ का भव्य मंदिर उस समय करोड़ों रुपए की लागत लगाकर बनवाया था।
जिसके ऐश्वर्य एवं भव्यता के सदृश और कोई मंदिर नहीं है। धांधूक की एक विधवा पुत्री थी , जिसने बसंतगढ़ में सूर्य मंदिर और सरस्वती वापी का जीर्णोद्धार करवाया था।

भीनमाल शिलालेख के बारे में

इसी पीढ़ी में सन 1060 के लगभग कृष्ण देव आबू का राजा बन गया। जो अपने दो भाइयों के बाद शासक बना था। लेकिन उसके शासनकाल में गुजरात के सोलंकी शासकों से संबंध फिर खराब हो गए। इसलिए भीमसेन सोलंकी ने अवसर पाकर कृष्णदेव को कैद करवा दिया । तत्समय नाडोल का चौहान राजा बाला प्रसाद राजा कृष्णदेव की सहायता के लिए आया , जिससे उसे कैद से छुटकारा मिला। यहां यह उल्लेख करना भी अति आवश्यक व समीचीन होगा कि आबू के पास एक प्राचीन नगर था , जिसके अब अवशेष मात्र रह गए हैं , वह था – भीनमाल। होशियारपुर , पंजाबऔर भीनमाल राजस्थान के समकालीन शहर हैं। राजा कृष्णदेव परमार के समय के दो शिलालेख सन 1060 और 1066 ईo के इसी भीनमाल में उपलब्ध है।
यह दोनों शिलालेख अति महत्वपूर्ण जानकारी अपने अंदर समाहित किए हुए हैं । आबू के आसपास के परमार राजाओं के काल को निर्धारित करने में काफी सहायक हैं ।
राजा कृष्णदेव परमार के पश्चात विक्रमसिंह परमार का उल्लेख इतिहास में आता है जो आबू की गद्दी पर बैठा। विक्रम सिंह परमार ने अर्नोराज और कुमारपाल के बीच होने वाले अजमेर के सन 1144 तथा 1150ई0 के दोनों युद्धों में भाग लिया था। इसी युद्ध में विजय के कारण राजा विक्रम सिंह परमार को महामंडलेश्वर की उपाधि मिली जो उसके शौर्य एवं वीरता की परिचायक है । जिसका विवरण ‘कुमरपाल प्रबंध’ में व अन्य ग्रंथों में मिलता है।

राजा धारा वर्ष

परमार राजा विक्रमसिंह के पश्चात उसका प्रपौत्र धारा वर्ष आबू के परमार कुल का प्रसिद्ध राजा है । जिसका उल्लेख सन 1163 ई0 से 1219 ई0 तक के शिलालेखों पर उपलब्ध है।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि राजा धारा वर्ष परमार ने 60 वर्ष से अधिक राज्य किया। राजा धारा वर्ष परमार की नीतियां बहुत अच्छी थीं । उसने सोलंकी राजाओं के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए और सोलंकी शासकों की तरफ से होने वाली क्षति से अपने आपको बचाया ।इसलिए वह सोलंकियों का भी चहेता हो गया था। धारावर्ष को अपने देश के हित की भी बहुत चिंता थी । वह एक दूरदर्शी राजा था । वह अपने राज्य की प्रतिष्ठा को दूर-दूर तक फैलाना चाहता था।
सन 1206 ईसवी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अनहिलवाड़ा पर चढ़ाई की और कायद्रा गांव में आबू के पास धारा वर्ष की और कुतुबुद्दीन ऐबक की लड़ाई हुई। उस समय इस युद्ध में गुजरात के सोलंकी और आबू के परमारों ने मिलकर लड़ाई लड़ी थी और इसमें धारा वर्ष मुख्य सेनापति था। यद्यपि इस लड़ाई में गुजरात का शासक हार गया । परंतु दूसरी लड़ाई में इन्हीं साथियों के सहयोग से गुजरात की विजय हुई तथा शाहबुद्दीन गौरी को यहां से घायल होकर भागना पड़ा था। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान का बदला इन लोगों के द्वारा लिया गया था।
गुजरात में धारा वर्ष के समय में चार समकालीन राजा कुमार पाल ,अजय पाल ,मूलराज और भीमदेव द्वितीय थे। इनमें भीम देव द्वितीय अल्प वयस्क थे जिसका लाभ उठाकर उसके कई सामंत् व अधिकारी अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर गए थे।
कुछ समय पश्चात गुजरात पर एक ओर से अल्तमस तथा दूसरी ओर से दक्षिण के यादव राजा सिंघल ने आक्रमण कर दिया तो धारावर्ष ने वीरधवल ,वस्तु पाल और तेजपाल द्वारा सहायता का आग्रह स्वीकार किया और गुजरात की सहायता की। यह धारावर्ष की दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि जहां उसने एक ओर सोलंकियों से मैत्री संबंध स्थापित किए वहीं दूसरी ओर नाडोल के चौहान राजा कैलहन की दो पुत्रियों श्रंगार देवी और गीगा देवी को अपनी रानी बनाया। इस प्रकार दोनों पड़ोसियों से उसके अच्छे संबंध हो गए थे । परिणामत: धारावर्ष कूटनीति का एक अच्छा जानकार भी सिद्ध होता है। इसके पराक्रम व शौर्य की गाथा पट नारायण के मंदिर के शिलालेख ईसवी सन 1287 से मिलती है। राजा धारावर्ष परमार एक ही तीर से तीन भैंसों को एक साथ खड़ा करके बींध दिया करता था।
आबू पर्वत पर अचलेश्वर पर्वत श्रृंखला पर अचलगढ़ का किला है । जिसके सामने एक झील है और झील के किनारे तीन भैंसों की आकृतियां वर्तमान में विद्यमान हैं । यह वही तीन भैसों के प्रतीक हैं जिनको धारावर्ष परमार अपने एक तीर से एक साथ बींध दिया करते थे।( जून 1995 को सपरिवार मैंने मौके पर देखा है।)
राजा धारावर्ष परमार का काल जन उपयोगी कार्यों के लिए और विद्या की उन्नति के लिए जाना जाता है।
राजा धारा वर्ष परमार का छोटा भाई प्रह्लाद नरदेव भी काफी विद्वान और वीर था । जिसकी वीरता की प्रशंसा कवि सोमेश्वर ने भी अपनी रचना “कीर्ति कौमुदी “नामक पुस्तक में की है।
जिन तीन वीर धवल, वस्तु पाल और तेजपाल के आग्रह से धारावर्ष ने गुजरात के सोलंकी शासकों की सहायता की थी , उनमें से एक तेजपाल ने लवण शाही के स्थान पर एक मंदिर बनवाया था।
प्रहलाद नरदेव प्रमार ने भी सोलंकी राजा अजय पाल और गोहिल वंशीय राजा सामंत सिंह के बीच होने वाले युद्ध में सोलंकी राजा अजय पाल की ही सहायता की थी। प्रहलाद नरदेव परमार एक अच्छा नाटककार भी था और उसने एक नाटक की रचना की है जिसका नाम है पार्थ पराक्रम व्या योग।
नरदेव ने एक शहर बसाया था जिसका नाम पह्लादनपुर था । जिसको अब पालनपुर कहते हैं।
परमार राजा धारा वर्ष का पुत्र सोमसिंह गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव द्वितीय का सामंत था । उसने अपने पिता से शस्त्र विद्या और अपने चाचा प्रह्लाद नरदेव से शास्त्रों में निपुणता प्राप्त की थी। इसके समय में वस्तु पाल के छोटे भाई तेजपाल ने आबू के दलवाड़ा गांव में लूवन सही नामक नेमिनाथ का मंदिर अपने पुत्र लूवनसही और अपनी स्त्री अनुपमा देवी के श्रेयार्थ करोड़ों रुपए लगाकर बनवाया था।
जिस मंदिर को आजकल दिलवाडे का मंदिर कहते हैं । (जिसको मैंने जून माह 1995 में आबू भ्रमण के अवसर पर ही देखा था।)
आबू की कलाकृतियों में दिलवाड़ा का मंदिर एकमात्र अपना उच्च स्थान रखता है। धारा वर्ष परमार का पोता प्रताप सिंह था , जिसका युद्ध मेवाड़ के तत्कालीन शासक जैत्र करण से हुआ था। जिसमें जैत्र करण को परास्त करके प्रताप सिंह परमार ने चंद्रावती पर अपना अधिकार स्थापित किया था।
प्रताप सिंह परमार का उत्तराधिकारी विक्रम सिंह था जिसके विषय में कुछ शिलालेखों से यह पता चलता है कि इसके समय से आबू के परमार अपना विरुद रावल(राजकुल) और महाराज कुल या महारावल लिखने लगे थे। जैसा कि मेवाड़ के शासक अपने आपको महाराणा लिखने लगे थे। एक मंदिर में आज भी इस राज्य समाज के रावल कुल के लोग पुजारी के रूप में मैंने कार्य करते देखें हैं । मैं इसको समय की एक मार ही मानता हूं , जैसे आज मुगलों के वंशजों का पता चलता है कि वह रिक्शा चला कर गुजारा करते हैं।
लेकिन उत्थान के साथ पतन और उत्थान के साथ विनाश निरन्तर प्रतिक्षण होता है । उसी प्रकार आबू के परमारों का पतन भी इसी विक्रमसिंह के समय में हुआ । क्योंकि विक्रम सिंह के शासनकाल में जालौर के चौहानों ने आबू के पश्चिम भाग को विक्रमसिंह से छीन लिया और उस पर अपना कब्जा कर लिया इससे बाबू के परमारों की शक्ति क्षीण हो गई । सन 1311 के करीब राव लूंबा ने परमारों की राजधानी चंद्रावती को भी छीन लिया था ।यहीं से आबू के परमार राज्य का अंत हुआ और चौहान राज्य की स्थापना हुई।

जालौर के परमार

इतिहासकारों की ऐसी मान्यता है कि जालौर के परमार आबू के पर मारों से अलग नहीं थे , क्योंकि जालौर और आबू में कोई विशेष अंतर भी नहीं है और यह जालौर के परमार धरणी वराह के वंशज ही हो सकते हैं ।आबू परिवार वालों की यह एक दूसरी शाखा मानी जा सकती है। 1087 ई0 के शिलालेख से जालौर के परमारों के 7 नाम प्राप्त होते हैं। वाकपति राज ,चंदनराज देवराज, अपराजित , विज्जल, धारा वर्ष और विसल।
वाकपति राज का शासनकाल 960 से 985 ईसवी के आसपास का है । जिस समय आबू पर ध्रुवभट्ट का शासन था। ओझा के ‘राजपूताना के इतिहास ‘ के पृष्ठ 204 के अनुसार जालौर के परमार वंश के सातवें राजा विशल की रानी मेलर देवी ने सिंधु राजेश्वर के मंदिर पर सन 1087 ईसवी में सोने का कलश चढ़ाया था। इनके विषय में इतिहास में और ज्यादा तथ्य प्राप्त नहीं हो पा रहे हैं। हो सकता है बाद में आबू परमार वंश के ही आधिपत्य में रहा हो इसलिए अलग से विवरण अधिक नहीं मिलता।

किराडू के परमार

किराडू में एक शिलालेख है जिस पर सन 1661 ईसवी के लेख के अनुसार किराडू के परमार शासकों की शाखा प्राप्त होती है । इनके मुख्य शासकों में कृष्णराज सौचछ राज ,उदय राज और सोमेश्वर हैं ।इनमें उदय राज गुजरात के सोलंकी शासकों का सामंत रहकर चोड़, गौड़, करण और मालवा में कई युद्ध लड़ा था। उदयराज परमार का पुत्र था सोमेश्वर परमार जो शुरू में सिद्धराज का सामंत रहा । सोमेश्वर परमार ने सिद्धराज सोलंकी की सहायता से सिद्धराज पर आधिपत्य प्राप्त किया। सिद्धराज का उत्तराधिकारी कुमारपाल सोलंकी था। कुमारपाल भी अपने पिता सिद्ध राज की तरह सोमेश्वर को बहुत चाहते थे।
सोमेश्वर ने सिद्धू राज को सुदृढ़ करने के लिए बहुत सारे कार्य किए। किराडू इस राज्य की राजधानी थी 1161 ईसवी में सोमेश्वर ने जज्जक को हरा कर जैसलमेर राज्य में स्थित तनोट और जोधपुर राज्य में स्थित नौसर के किले छीन लिए थे । 1700 घोड़े दंड के रूप में प्राप्त किए थे और जीते किले वापस कर दिए थे । जज्जक को कुमारपाल सोलंकी की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

मालवा के परमार

मालवा के प्रमारों के विषय में तो आपको मालूम ही है कि वह बहुत ही शक्ति संपन्न थे। जिसमें उज्जैन के राजा भर्तृहरि उसका भाई विक्रमादित्य ९ वी पीढ़ी में राजा भोज आदि हुए हैं ।जिनका विवरण पूर्व के लेखों में दिया जा चुका है । अतः पुनः दिया जाना आवश्यक नहीं है। परंतु यह विवरण दिया जाना आवश्यक है कि राजा भोज का पुत्र जयसिंह भी बहुत प्रतापी राजा था। जिसका सामंत बागड़ का राजा मंडलीक था । उसके चाचा उदयादित्य की लड़की श्यामा देवी का विवाह मेवाड़ के गुहिल वंश के राजा विजय सिंह के साथ हुआ था।( भेड़ाघाट का शिलालेख 12)
भेड़ाघाट के शिलालेख पेज 349 पर दिए विवरण के अनुसार जयसिंह के समय मालवा के पर मारो पर विजय सिद्धराज सोलंकी द्वारा हुई जिसके फलस्वरूप चित्तौड़ और बागड़ मालवा की भांति सिद्धराज के राज्य के भाग बन गए।
१३ वी शताब्दी में सोलंकी कमजोर हो चुके थे
प्रबंध चिंतामणि पृष्ठ 250 के अनुसार १३ वी शताब्दी के लगभग अर्जुन वर्मा नामक परमार ने सोलंकी ओं की कमजोरी का लाभ लेते हुए मालवा की अपनी राजधानी को पुनः प्राप्त कर लिया । अपने अधीन कर लिया अर्जुन वर्मा कवि, विद्वान और गायनविद्या में निपुण था।
इसी वंश में एक परमार राजा जैतुंग देव हुआ। जिसका युद्ध गुहिल वंश के राजा जैत्रासिंह से अर्थुना बांसवाड़ा में हुआ। इस युद्ध में परमार राजा जयचंद देव को गुहिल वंश के राजा से हार का सामना करना पड़ा ।
राजपूताना म्यूजियम रिपोर्ट अजमेर ,पृष्ठ – 1911-12 के अनुसार मालवा का सदियों का वैभव खिलजियों के कारण समाप्त हुआ और यहां के परमार भागकर अजमेर व बाद में कुछ बीकानेर में गए । इन्हीं के प्रसिद्ध वंशजों में महापा पंवार जो महाराणा कुंभा का समकालीन था व दूसरा करमचंद पंवार था , जो महाराणा संग्राम सिंह (महाराणा सांगा) का समकालीन था । ये अजमेर के आसपास छोटे-छोटे सामंत के रूप में रहते थे।

बागड़ के परमार

इनका संबंध भी मालवा के परमार वंश से ही है अर्थात इनकी उत्पत्ति भी मालवा के परमारों से ही है
मालवा के परमार कृष्णराज के दूसरे पुत्र डंबर सिंह के वंश से बागड़ के प्रमाण हैं । डूंगरपुर और बांसवाड़ा का भाग मिलकर के बागड़ कहा जाता है। जहां इनका राज्य होता था । राजा धनिक इनकी शाखा में दूसरे राजा थे । जिसका पोता कंकदेव मालवा के राजा श्रीहर्ष के शत्रु कर्णत से नर्मदा नदी तक लड़कर मारा गया था।
इसका पोता सतराज था जो गुजरात वालों से लड़ा। जिसकी पत्नी का नाम राजश्री था। जो चौहान वंश की थी (पानाहेड़ा का शिलालेख श्लोक 32)
इसका छोटा पुत्र मंडलीक मालवा के परमार भोज और जय सिंह का सामंत था। मंडलीक ने कन्ह नामक सेनापति को उसके हाथियों और घोड़ों सहित पकड़ कर जयसिंह के सुपुर्द कर दिया और अपने नाम से मंडलेश्वर का मंदिर 1059 ईस्वी में पाना हेड़ा में बनवाया था (राजपूताना म्यूजियम रिपोर्ट , अजमेर – 1916 -17 पृष्ठ 2 )
इस वंश का अंतिम शासक विजय राज बताया जाता है , क्योंकि उसके समय के 1108 और 1109 ईस्वी के दो शिलालेख मिलते हैं , लेकिन उसके बाद परमारों की इस शाखा का कोई महत्वपूर्ण शिलालेख नहीं मिला है।
इस विषय में कुछ इतिहासकारों का मत है कि 1179 ई0 में गोहिल राजा सामंत सिंह जब मेवाड़ छोड़कर इधर आया तो उसने गोहिल शाखा का राज्य यहाँ बागड़ में स्थापित कर दिया था। इस प्रकार यह बागड़ परमार शासकों के हाथ से निकल गया था।
राज जरूर समाप्त हो गया था बागड़ से, परंतु परमारों की जो राजधानी अर्थूना जिसका सही नाम उत्थुन्नक था , उसके अवशेष आज भी उसके वैभव की कहानी कहते हैं । उसके खंडहरों से ही पता चलता है कि अर्थूना उस समय बड़ा वैभवशाली नगर था।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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