शांता कुमार
गतांक से आगे….
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद खुदीराम का स्मारक बनाया गया। बिहार के सभी नेताओं ने उसके निर्माण में भाग लिया, परंतु श्री जवाहरलाल नेहरू ने उसमें भाग लेने से इनकार कर दिया था। शायद उनकी देशभक्ति की सूची में इस बाल शहीद को कोई स्थान प्राप्त नही। महात्मा गांधी से पूर्व भारत के हृदय सम्राट लोकमान्य तिलक ने खुदीराम की भावनाओं को ठीक समझा था। किंतु नेहरू न समझ सके। लोकमान्य ने अपने प्रसिद्घ पत्र केसरी में लिखा था-रैण्ड की हत्या के बाद यहां ऐसा कोई कार्य न हुआ था, जो अफसरों का ध्यान हमारी ओर खींच सके। ये हत्याएं दूसरी हत्याओं से बिलकुल दूसरी तरह की हैं। क्योंकि इन हत्याओं को करने वालों ने अत्यंत उच्च भावना के वश होकर यह किया। जब तक एक एक अफसर को चुन चुनकर डराया न जाए, तब तक यह पद्घति नही बदल सकती। इसी प्रकार के लेखों के दण्डस्वरूप तिलक जी को छह वर्ष का कारावास हुआ था। काल पत्रिका के संपादक को भी इस बारे में लेख लिखने पर दण्ड दिया गया था।
मुजफ्फरपुर के इस बम के धमाके ने अंग्रेजी राज्य की नींद हराम कर दी। सारा शासन चौकन्ना हो गया। चारों ओर संदिग्ध लोगों की खोज आरंभ हो गयी। खूब दौड़ धूप के बाद पुलिस को पता चला कि इन क्रांतिकारियों का अड्डा मानिक तल्ले के बगीचे में है। यह बगीचा डा. घोस सिविल सर्जन का था। वीरेन्द्र घोष ने अपने बड़े भाई अरविंद घोष से इसे मांग लिया था। उसी बगीचे में खुफिया विभाग ने कमरा किराये पर ले लिया और उनकी गतिविधियों को देखते रहे। क्रांतिकारियों को जरा भी पता न लगा। परिणामस्वरूप देश का यह सर्वप्रथम बम षडयंत्र पकड़ा गया। वीरेन्द्र घोष, उपेन्द्र उल्लासकर, अरविंद घोष, नलिनी, कन्हाईलाल दत्त आदि चालीस देश भक्त क्रांतिकारियों को जेल में डाल दिया गया। इन सब बंदियों को अलीपुर जेल में रखकर अभियोग चलाया गया। इसलिए इसका नाम अलीपुर षडयंत्र पड़ा। अभी इसी षडयंत्र का अभियोग चल रहाा था कि मानिकतला षडयंत्र का एक बंदी नरेन्द्र गोस्वामी मुखबिर बन गया। वह अब सब क्रांतिकारियों के गुप्त भेद उगलने लगा। उसके इस देशद्रोह से क्रांतिकारियों के रहे सहे प्रयत्नों पर पानी फिरने की आशंका होने लगी। चारों ओर नरेन्द्र गोस्वामी मुखबिर बन गया। वह सब क्रांतिकारियों के गुप्त भेद उगलने लगा उसके इस देशद्रोह से क्रांतिकारियों के रहे सहे प्रयत्नों पर पानी फिरने की आशंका होने लगी। चारों ओर नरेन्द्र की भत्र्सना की गयी। मुखबिर हो जाने के कारण उसे अब अन्य बंदियों से अलग करके सुरक्षित रखा जाने लगा।
कन्हाईलालदत्त जैसे नवयुवकों से यह सब न देखा गया। अपने ही एक साथी द्वारा होता हुआ द्रोह व विश्वासघात उनके हृदय में कांटा बनकर चुभने लगा। नवयुवक बंदियों के क्रोध की सीमा टूटने सी लगी। एक दिन भरी अदालत में किसी नवयुवक ने घृणा से उसके चूतड़ों पर जोर की लात दे मारी। तब से वह इन बंदियों के सामने भी न आता था।
कठिनाईयां वीरों के निश्चय को कभी बदल न पाई। निश्चय की प्रबल चट्टान के सामने कठिनाईयां व परिस्थितियों की प्रतिकूलता को चकनाचूर हो जाना पड़ता है। कन्हाई ने एक एक साथी तैयार किया। उसका नाम सत्येन्द्र बसु। दोनों ने नरेन्द्र को समाप्त करने की योजना बनाई। जेल में बड़े लोगों से परामर्श करना चाहा, पर किसी ने ध्यान से न सुना। अत: किसी के बताये बिना वे योजना में लगे। यह निश्चय हुआ कि अपना पूरा बयान देने से पूर्व ही नरेन्द्र का सफाया कर दिया जाए। पर जेल के सींखचों के भीतर यह कार्य बड़ा कठिन था। नरेन्द्र को सबसे जुदा रखा जाता था। उसकी रक्षा के लिए दो सशस्त्र पहरेदार सदा उसके साथ रहते थे। आखिर कन्हाई व सत्येन्द्र की बुद्घि ने काम किया। वैसे जो लोग कभी जेल हो आए हैं, वे जानते हैं कि पैसे के जोर पर जेल के भीतर कुछ भी मंगवाया जा सकता है। उन दिनों जेल में मछली व कटहल बाहर से आते थे। कहते हैं, इन दो नवयुवकों ने कुछ वार्डरों से सलाह करके एक दिन किसी कटहल या मछली के भीतर छिपाकर दो पिस्तौल बाहर से मंगवा लिये। वे किन वार्डरों द्वारा तथा किसने बाहर से भेजे-इस तथ्य को इतिहास कभी जान नही पाएगा, क्योंकि इस नाटक के केवल मात्र दो पात्र उस घटना के बाद किसी से मिलने से पूर्व ही यमलोक भेज दिये गये थे।
एक दिन बीमारी का बहाना बनाकर कन्हाई जेल के हस्पताल पहुंच गये। उन्होंने वहां पर ऐसा व्यवहार रखा कि वे जीवन से बिलकुल निराश हो गये हैं। कुछ दिनों के बाद सत्येन्द्र भी पेट के दर्द से कराहता वहां पहुंच गया। वह बड़ी जोर से चीखा। क्योंकि उसके आगमन की सूचना कन्हाई को देने के लिए यही तरीका तय हुआ था। उन दोनों ने अधिकारियों से कहा कि वे अब जेल के इस नारकीय जीवन से तंग आ चुके हैं और नरेन्द्र के साथ वे भी मुखबिर बनना चाहते हैं। उनका व्यवहार ऐसा था कि अधिकारियों ने विश्वास कर लिया। वे बड़े प्रसन्न हुए। उन पर निगरानी कम कर दी गयी है। अब वे दोनों नरेन्द्र से भी मिलने लगे। नरेन्द्र अपने और दो साथियों को मुखबिर बनते देख बड़ा उल्लसित हुआ। उस पतन के मार्ग पर अब वह अकेला नही है। यह विचार उसे आनंद देता था। अदालत में देने के लिए वे तीनों एक संयुक्त वक्तव्य तैयार करने लगे।
सितंबर का मास आ पहुंचा। उसी मास में नरेन्द्र ने बाबू देवव्रत के विरूद्घ गवाही देनी थी। उससे पूर्व ही उसे समाप्त करने का निश्चय हुआ। 31 अगस्त के दिन नरेन्द्र रोज की तरह सत्येन्द्र के पास आकर बैठ गया। उसके साथ रहने वाले दो संरक्षक ज्यों ही कुछ असावधान हुए सत्येन्द्र ने सिरहाने के नीचे रखी पिस्तौल निकालकर, उस देश द्रोही पर चला दी। गोली उसके पैर में लगी। पर वह गिरा नही। तब सत्येन्द्र ने दूसरी गोली चलाई। एक अंग्रेज संरक्षक ने उसका हाथ पकडऩा चाहा। सत्येन्द्र की पिस्तौल से तीसरी गोली ने उस संरक्षक का आगे बढ़ता हुआ हाथ घायल कर दिया। क्रमश:

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