‘विभूति शब्द की व्याख्या’ : राही तू आनंद लोक का

vijender-singh-aryaगतांक से आगे…
उदाहरण के लिए श्रद्घा और प्रेम को ले लीजिए। हृदय के अंदर चित्त में अवस्थित ये दो मोती ऐसे हैं जो सारे संसार के संबंधों को आवेष्ठित किये हुए हैं। माता-पिता अपनी संपत्ति धन दौलत के भंडार को प्यार और श्रद्घा के वशीभूत हो अपनी संतान को खुशी खुशी दे देते हैं, चाहे वह राजा ही क्यों न हो। वे ऐसा अनुभव करते हैं जैसे जो गाय अपने बछड़े को दूध पिलाकर खुशी और संतोष की अनुभूति करती है, किंतु यह तभी तक होता है जब तक संतान के हृदय में माता-पिता के प्रति प्यार सत्कार और श्रद्घा हो, अन्यथा परिवार कलह और क्रोध का अखाड़ा बन जाते हैं। जिस उम्र में पैरों को मंदिर की सीढिय़ां चढऩी चाहिए थीं उस उम्र में पैर कोर्ट कचहरी की सीढिय़ां चढऩे लगते हैं इसलिए हे मनुष्य! मानस के मोतियों की शक्ति पहचान, उस दाता की दिव्य भेंट को पहचान। इस दिव्य भेंट के कारण ही तू उस सृष्टा की उत्कृष्ट कृति है, अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और धनवान है। इतना ही नही जरा गंभीरता से विचार कीजिए। वाणी और मुस्कान सृष्टि में जितने भी प्राणी हैं परमात्मा ने किसी को प्रदान नही किये। हे मनुष्य! तुझे ये अमूल्य और अमोघ भेंट भी भगवान ने प्रदान की है, और न जाने कितनी कृपाएं उसकी नित्य निरंतर बरसती हैं, किंतु हे मनुष्य! तू उसके सिमरन में भी कोताही करता है। अत: भटक मत, समय रहते हुए प्रभु के श्री चरणों में ध्यान लगा ताकि तू उसकी कृपा का पात्र बना रहे, और पुन: आनंदलोक का वासी बने।
पिंजरा मिल्यो है नौ द्वार को।
सुन पंछी की पुकार को।।
इसकी, मूक तडफ़ पहचान,
रे मत भटकै प्राणी…..17
उस सृष्टा की समस्त सृष्टि में यदि कोई सुंदरतम रचना है तो वह मानव शरीर है। वैसे इसमें असंख्य छिद्र हैं किंतु इसके मुख्य द्वार नौ हैं-दो आंखें, दो कान, दो नासिका (नथुने) एक मुख तथा मल-मूत्र त्यागने की दोनों कर्मेन्द्रियां हैं। ये नौ द्वार हमेशा खुले रहते हैं किंतु इस पिंजरे (शरीर) में रहने वाला पंछी (जीवात्मा) उस समय भी निकल कर नही भागता जब मनुष्य प्रगाढ़ निंद्रा में होता है।
आजकल के विज्ञान-वेत्ताओं की दृष्टिï में इस शरीर का महत्व मात्र इतना है कि इसमें पचास ग्राम गंधक है, जिससे माचिस की 100 तीलियां बन सकती हैं, एक किलो ग्राम खांड है, दो पाव अमोनिया है, सौ ग्राम नमक है, छत्तीस किलोग्राम पानी और इतना लोहा जिससे दो इंच लंबी कील बन सके। चरबी इतनी कि जिससे साबुन की सात टिकियां बन सकती हैं।
चौबीस घंटे में हृदय एक लाख तेरह हजार बार धड़कता है। इससे कुछ कम बार सांस आता है और फिर अंदर चला जाता है। बाहर ही क्यों नही रह जाता? निकल क्यों नही जाता? कितना आश्चर्य होता है यह सब कुछ सोच कर?
महाभारत के ऋषि ने इस नौ द्वारे के पिंजरे के संदर्भ में कहा-संसार में मनुष्य शरीर से उत्तम और कुछ नही है। वेद और उपनिषद इस शरीर को केवल ऋषि भूमि कहकर ही संतुष्ट नही हुए अपितु इसे देवपुरी भी कहा। आठ चक्र नौ द्वारों वाली देवताओं की पुरी अयोध्या यही है। ऋग्वेद ने तो इसे ब्रह्मपुरी तक कहा है, क्योंकि चौरासी लाख योनियों में यही केवल ऐसा शरीर है जिसमें आत्मा को परमात्मा के दर्शन होते हैं। ऐसा है यह नौ द्वार का पिंजरा। इसलिए इसको सबसे उत्तम कहा गया है। किंतु हाय रे नादान मानव! इतनी अमूल्य वस्तु को प्राप्त करके भी तू इसके मूल्य को परख नही सका। इतना ही नही इस पिंजरे के अंदर रहने वाले उस पंछी की शब्द रहित (मूक) आवाज को जीवन पर्यन्त नही सुन सका। जबकि वह अपनी मूक आवाज में तुझसे हमेशा कहता रहा-सत्कर्म (पुण्य) कर कुकर्म (पाप) मत कर, क्योंकि तू आनंद लोक का वासी है, तुझे वहीं जाना है, वही तेरा गंतव्य है, वही तेरी आखिरी मंजिल है। इसलिए हे मनुष्य ! समय रहते हुए तू सचेत हो।
देखता रहा है तन के रूप को।
जाना कभी ना, निज के स्वरूप को।।
तू है दिव्य गुणों की खान,
रे मत भटकै प्राणी……..18
आम आदमी शरीर के रंग रूप को ही देखता है। कद काठी को ही व्यक्तित्व समझता है जबकि व्यक्ति का वास्तविक व्यक्तित्व तो उसके चित्त में रहने वाले स्थायी भावों (सेंटीमेंट्स) और आत्मा की निर्मलता से परिलक्षित होता है।
उपरोक्त पद्यांश की दूसरी पंक्ति ही विशद व्याख्या के संदर्भ में महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण का एक दृष्टांत प्रस्तुत कर रहा हूं, जो मेरे हृदय को छू गया। माता सीता अशोक वाटिका में बैठीं हैं। धीरे से हनुमान जी माता सीता के समीप पहुंचते हैं, अपना परिचय देते हैं और बताते हैं कि मुझे भगवान श्रीराम ने आपके पास भेजा है। पहचान के लिए भगवान राम ने हनुमान को जो स्वर्ण मुद्रिका दी थी वह भी हनुमान जी ने माता सीता को भेंट कर दी किंतु फिर भी माता सीता ने हनुमान जी से प्रश्न किया-हे बानर! क्या तुमने मेरे राम के स्वरूप को देखा है? इस पर हनुमान जी ने भगवान राम के शारीरिक सौष्ठव व रंग रूप का वर्णन किया। इस प्रकार हनुमान जी की बातें सुनकर माता सीता मंद मंद मुस्कायीं और बोलीं-हे बानर तुमने तो मेरे राम के शारीरिक रूप को देखा है जबकि मैंने तो उनके आंतरिक स्वरूप को बड़ी निकटता से देखा है। उनके हृदय में जहां धैर्य, शौर्य, साहस, पराक्रम, अक्ररता, कृतज्ञता, त्याग, प्रेम, स्नेह और श्रद्घा की सरिताएं हैं वहां भ्रातृत्व भावना का सागर भी ठाटें मारता है। कहीं वचन की प्रतिबद्घता की कठोर चट्टान दृष्टिगोचर होती हैं तो कहीं क्षमाशीलता के मेघ उमड़-घुमड़ कर बरसते दिखायी देते हैं। कहीं क्रोध की चपला दिखायी देती है तो कहीं नीर सी दया भी दिखाई देती है अर्थात दया और उदारता तो उनके रोम रोम में बसी हुई है। इतना ही नही वे करूणा और प्रेम से सर्वदा बादल की तरह भरे रहते हैं। वे सौम्यता की प्रतिमूर्ति हैं तो स्वाभिमान के हिमालय भी। वे प्रभाव और प्रतिभा के सूर्य हैं। जैसे जब सूर्य उदय होता है तो अन्य नक्षत्र एवं तारागण प्रभावहीन हो जाते हैं। ठीक ऐसे ही मेरे राम के स्वरूप के सामने बड़े से बड़े व्यक्तित्व भी कांतिहीन हो जाते हैं क्योंकि वे दिव्यता की खान हैं, आगार हैं, भंडार हैं। भाव यह है कि जो निजस्वरूप को अर्थात आत्मा को जान लेता है वह परमात्मा के दिव्य गुणों को प्राप्त कर लेता है। अत: हे मनुष्य तू समय रहते चेत। भटक मत। अपने निज स्वरूप को पहचान क्योंकि तू आनंद लोक का राही है।
भारतीय संस्कृति का मूल स्रोत
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति के जनक और उन्नायक प्राय: निर्जन वन तथा पर्वतों की कंद्राओं में समाधिस्थ हुए और जीवन के रहस्यों को जाना। वेद और स्मृतियों के ज्ञान का उद्भव यही से हुआ जिनसे आज भी वर्तमान सभ्यता और संस्कृति पल्लवित और पोषित हो रही है। जीवन के ठोस सत्य को जानने के लिए अंतत: हमारे ऋषि मुनि संसार के आकर्षणों को त्याग कर सुरम्य प्रकृति की गोद में बैठकर चिंतन मनन करते थे। यह अरण्य की आगोश उनकी साधना स्थली होती थी, तपोभूमि होती थी। जीवन के मूल सिद्घांत यही से प्रतिपादित होते थे। सामाजिक जीवन को गति और विकास देने के लिए उनके प्रवचन और रचनाएं मानवीय जीवन का आदर्श होती थीं। सरल शब्दों में कहा जाए तो अरण्य की आगोश हमारी सभ्यता और संस्कृति का मूल स्रोत होता था। जहां से ज्ञान की गंगा अविरल रूप से झरती थीं जो आज भी हमें अनुप्राणित करती है। इसलिए कहा गया है-
‘अरण्य भव: अरण्यकं’

क्रमश:

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