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स्वर्णिम इतिहास

गुर्जर वंश का गौरवशाली इतिहास : प्रतिहार वंशी शासकों और भारतीय संस्कृति के बारे में विद्वानों के मत , भाग — 2

राणा अली हसन चौहान क्या कहते हैं ?

राणा अली हसन चौहान पाकिस्तान के बहुत ही प्रतिष्ठित इंजीनियर, इतिहास लेखक और भाषाविद रहे हैं। वे उन कम पाकिस्तानियों में से हैं जो उर्दू, फारसी, अरबी के अलावा सिंधी, पंजाबी तथा हिंदी व संस्कृत में भी पारंगत थे। वे नागरी लिपि के एक बड़े प्रवर्तकों में से रहे हैं और मानते रहे हैं अकेले यही एक लिपि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को जोड़े रख सकती है। वे मानते थे कि इस सारे इलाके को एक हो जाना चाहिए। उनकी एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पढ़ी और समझी जाने वाली पुस्तक है- ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ द गुर्जर्स। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे पढ़ाए जाने तथा पाठ्यक्रम में स्वीकृत किए जाने की अत्यंत आवश्यकता है। यह पुस्तक भारतीय वर्णव्यवस्था और तुर्कों तथा अंग्रेजों की चालों का पर्दाफाश करने के लिए काफी है।

पुस्तक के अनुसार सातवीं से बारहवीं सदी तक भारत के पूरे मैदानी इलाके में गुर्जर प्रतिहारों का राज था। अली हसन चौहान बताते हैं कि कर्नल जेम्स टाड ने राजपूतों के पैसे से एक पुस्तक लिखी- ‘हिस्ट्री आफ राजपूताना’, इस पुस्तक में उसने एक ऐसी कहानी लिख दी जिससे लगता है कि गुर्जर विदेशी हैं। अली हसन चौहान का कहना है कि एक जमाने में पूरा हिंदुस्तान, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान और गंगा यमुना का पूरा दोआबा गुर्जर प्रतिहार राजाओं के पास था और विदेशी मुसलिमों से इन गुर्जर नरेशों ने ही टक्कर ली थी।

एक जाति ( हम किसी भी जाति के लिए किसी प्रकार का वैमनस्य भाव रखकर इस लेखमाला को नहीं लिख रहे हैं । इसलिए हमने जानबूझकर उस जाति का नाम यहां पर नहीं लिखा है , जो लोग उस जाति का नाम जानना चाहते हैं वह उक्त पुस्तक को पढ़ सकते हैं । यद्यपि जहां से हमने यह संदर्भ ग्रहण किया है , वहां पर स्पष्ट किसी जाति विशेष का नाम लिखा है – लेखक ) के इतिहास के बारे में लिखते हुए राणा अलीहसन ने लिखा है कि ये वे लोग थे जो विदेशी तुर्क आक्रांताओं से मिल गए और गुर्जर राजाओं के विरुद्ध षडयंत्र कर सत्ता पर कब्जा कर लिया। जबकि पूर्व काल के क्षत्रिय गुर्जर जरायम पेशा जाति के दर्जे में डाल दिए गए।

आर्यों केे विदेशी होने के सिद्धांत का खंडन करते हुए राणा अली हसन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, ऊपरी पंजाब, ऊपरी उत्तर प्रदेश तथा हिमालय पर्वत की एक-एक इंच जमीन आर्यों के लिए पवित्र थी। आज भी यह सारा क्षेत्र देवी-देवताओं के तीर्थ स्थानों से भरा पड़ा है। वैदिक युग में पूर्वी उत्तर प्रदेश के वर्तमान में सीतापुर जिले में नैमिषारण्य आर्यों का पवित्र तीर्थ स्थान था। ऋग्वेद में जिस तरह की भूमि का जिक्र हमें मिलता है वह यही उपमहाद्वीप था, जो अब भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश देश कहा जाता है।

अपने मत की पुष्टि के लिए वे एक और उदाहरण पेश करते हैं। वे बताते हैं वेद में ( वास्तव में वेद में इतिहास मानना उचित नहीं है , इस तथ्य को हम पूर्व में ही स्पष्ट कर चुके हैं – लेखक ) सुदास और नौ राजाओं के बीच युद्ध का वर्णन है। ये राजा असुर कहलाते थे। राणा अलीहसन के अनुसार ये सभी राजा जो असुर कहलाए वास्तव में आर्यों की ही शाखा से थे। कहा जाता है कि आर्यों ने स्थानीय लोगों को अपने अधीन कर लिया। उनके क्षेत्र की विशालता तथा अधिक आबादी की व्यवस्था को सुचारू रूप से करने के लिए उन्होंने अपने को चार वर्णों में बांट दिया- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। अधीनस्थ लोगों को शूद्र बनाया तथा स्थानीय विरोधियों को बुरे-बुरे नाम दिए। जैसे- असुर, अनार्य, राक्षस, दस्यु, दैत्य, निषाद तथा दानव। राणा अली हसन इसे गलत बताते हुए अपनी पुस्तक में कहते हैं- धार्मिक पुस्तकों की जानकारी रखने वाले सभी लोग जानते हैं कि अहले ईमान और काफिर, मोमिन व मुनाफिक मुस्लिम और मूर्ति पूजक, फासिख और फाजिर सब एक ही वंश के थे। इसी प्रकार देव, सुर, आर्य और असुर, अनार्य, राक्षस, दास, दस्यु, दैत्य, निषाद व दानव के बीच भी कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। इन दोनों समूहों की भाषा, नाम तथा परिवार एक ही थे। यह व्यक्ति की नैतिक गुणवत्ता को व्यक्त करने के लिए शब्द प्रयोग होते थे। जैसे ऋग्वेद के दस राजा एक ही जाति के सदस्य थे। उनके नाम संस्कृत में थे। इसके कई उदाहरण हैं। – —-

शुक्राचार्य नाम का एक आचार्य था उसकी शिक्षाएं अपवित्र घोषित हो गई थीं। उसके शिष्य असुर कहलाते थे और उसे असुर गुरू कहते थे। वह महान ऋषि भृगु का पुत्र था। उसकी पुत्री प्रसिद्ध राजा ययाति से ब्याही गई थी। उसी का पुत्र यदु था जिसकी संतानें आज तक हैं और यादव कहलाती हैं। इसी वंश में श्रीकृष्ण पैदा हुए। एक त्रास दस्यु था जो ऋषि सोमार का ससुर था।

रामायण काल में श्री रामचंद्र, लक्ष्मण प्रतिहार, भरत व शत्रुघ्न रघु के वंशज दशरथ के पुत्र थे यह सब आर्य थे। जनक श्री रामचंद्र की पत्नी सीता के पिता थे। जनक सांवर असुर के पुत्र थे। अब रावण राक्षस की वंशावली पर ध्यान दीजिए जो श्री रामचंद्र का शत्रु था। रावण का पिता विश्रवा एक ऋषि था उसकी पत्नी कैकसी सुमाली नामी एक राक्षस की पुत्री थी। उसकी दूसरी पत्नियां निक्षा व राका थीं। विश्रवा की चार संतानें थीं। रावण अर्थात रावत या राजा। उसका पुत्र मेघनाद था जो इन्द्रजीत भी कहलाता था। वह युद्ध में लक्ष्मण द्वारा मारा गया। लक्ष्मण इस विजय के पश्चात प्रतिहार कहलाया। – – – –

महाभारत काल में श्रीकृष्ण के मामा कंस राक्षस कहलाते थे क्योंकि उन्होंने अपने पिता उग्रसेन को जेल में डाल दिया था। शिशुपाल चेदि का शुद्ध क्षत्रिय राजा था। – – –

महाभारत नाम से प्रसिद्ध एक बहुत बड़ी लड़ाई दो परिवारों के बीच लड़ी गई थी। पांडवों और कौरवों के बीच। श्रीकृष्ण ने स्वयं पांडवों का साथ दिया। उपमहाद्वीप के सभी राजाओं ने किसी न किसी ओर से इस युद्ध में भाग लिया। – – – यह ध्यान देने की बात है कि इन क्षत्रियों को व्यवहार में कभी भी बहिष्कृत नहीं माना गया। पहलवा आधुनिक पहलवी, कंबोज और पख्तू या पख्तून शुद्ध क्षत्रिय माने जाते रहे। दुर्योधन की बहन सिंध के राजा जयद्रथ से ब्याही थी जो कौरवों के पक्ष से लड़ा था।

कम्बोज, पहलव व पुख्तू सिन्ध व गंधार से परे पश्चिमी क्षेत्रों के राजा थे। पश्चिम में पहलव व कंबोज तथा पूर्व में प्राग्ज्योतिषपुर, आधुनिक आसाम व गौड़ देश, आधुनिक बंगाल तक आर्यों का घर था । जिसको उन्होंने आर्यावर्त नाम दिया था ।स्पष्ट है कि आर्य व असुर आदि एक ही जाति से संबंध रखते हैं।

मानव की उत्पत्ति के संबंध में बहुत बड़ा स्रोत संस्कृत साहित्य है। इससे पता चलता है कि आर्यों के पूर्वज देव थे । – – –

– वेद में आर्यों के विभाजन या किसी जाति-पाति की बात कहीं नहीं मिलती। वेदों में सभी जगह राजा को राजन् तथा पुरोहित को ऋषि कहा गया है। कहीं-कहीं अध्यापक के लिए ब्राह्मण तथा सैनिक के लिए क्षत्रिय शब्द प्रयुक्त हुआ है। – – – आर्यों में विभाजन तथा जातियां बाद में आईं। इन जातियोंं ने स्थायी संस्था बनने में कई सदियां लगाईं तथा उनकी निश्चित जीवन शैली बनने में और भी अधिक वक्त लगा। यदि हम आधुनिक जातियों के गोत्र तथा परिवारों पर दृष्टि डालें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि शूद्र शेष तीनों वर्णों की ही शाखा हैं तथा आर्य जाति से हरगिज अलग नहीं है।

– आर्य संस्कृति तथा सभ्यता का आर्यावर्त से बाहर सब दिशाओं में प्रसार हुआ। यही कारण है कि संस्कृत शब्द पड़ोसी देशों की भाषा में बहुत अधिक तथा दूर देशों की भाषाओं में भी मिलते हैं। ईरान की पुरानी फारसी भाषा में 50 प्रतिशत से अधिक शब्द प्राकृत संस्कृत के हैं।

– इन शब्दों को देखने से पता चलता है कि फारसी भारत-पाक उपमहाद्वीप की क्षेत्रीय भाषाओं की तरह संस्कृत की ही एक शाखा र्है। संस्कृत शब्द ईरान के माध्यम से तुर्की तथा यूरोप में गए। इस प्रकार श्रीलंका, तिब्बत, नेपाल, बर्मा, मलेशिया, सिंगापुर, जावा, सुमात्रा, बाली, स्याम तथा कंबोडिया आर्य संस्कृति से प्रभावित हुए। यद्यपि फिलीपीन्स, चीन तथा जापान की भाषाओं में भी संस्कृत के शब्द मिलते हैं परन्तु उपमहाद्वीप की भाषाओं में संस्कृत का शत-प्रतिशत प्रभाव है।

– आर्यों की भाषा के कुछ शब्द एशिया तथा यूरोप की किसी भी आर्य भाषा में नहीं मिलते, वे वैदिक संस्कृत में मिलते हैं। इससे पता चलता है कि वैदिक संस्कृत सबसे पुरानी बिना मिलावट की भाषा है। इससे इस बात का भी खंडन होता है सप्तसिंधु आर्यों की यात्रा का अंतिम पड़ाव था। वैदिक आर्य सप्तसिंधु में आने वाली नहीं बल्कि यहां से बाहर जाने वाली जाति थी।

अली हसन लिखते हैं कि मध्यकालीन इतिहासकार- व्रद्धगर्ग, वाराहमिहिर तथा कल्हण महाभारत युद्ध को 2499 ईपू में हुआ बताते हैं। अब्बूरेहन अलबेरूनी जो इस महाद्वीप में 11वीं सदी के प्रारंभ में वर्षों रहे तथा जिनका न केवल संस्कृत साहित्य अपितु यहां के इतिहास पर भी पूरा अधिकार था, ने अपनी पुस्तक किताब-उल-हिंद अध्याय 19 में गणनाओं के साथ भिन्न-भिन्न कालों का विवेचन किया है। वे कहते हैं कि यदि यज्दीजर्द का 400 वां वर्ष परीक्षण वर्ष या तुलना का पहला पैमाना माना जाए तो हमारे मापन वर्ष से पहले 3497 वर्ष इस युुद्ध को हुए हो गए। अबुल फजल ने यह घटना 3000ईपू की बताई है।

मैगस्थनीज, चौथी सदी ईपू के यूनानी यात्री, ने श्रीकृष्ण और चंद्रगुप्त के बीच 138 राजाओं के राज्य करने का उल्लेख किया है। चंद्रगुप्त 312 ईपू में गद्दी पर बैठा। एक शिलालेख पर कलि संवत लिखा है, कलि संवत महाभारत युद्ध के तुरन्त बाद शुरू हुआ था। विक्रम संवत से तुलना करने पर, विक्रम संवत ईस्वी संवत से 57 वर्ष पुराना है, युद्ध का समय 3101 ईसा पूर्व आता है। पुराने समय में आर्यभट्ट ने भी यही समय बताया है।

राणा अली हसन ने लिखा है कि लाहौर के मशहूर अखबार जंग ने 17 अक्टूबर 1984 को दिल्ली के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में डॉक्टर डीएस त्रिवेदी के छपे एक लेख के हवाले से लिखा है कि महाभारत का युद्ध 14 नवंबर 3137 ईपू दिन मंगलवार को शुरू हुआ था। वे लिखते हैं कि यदि द्वापर, त्रेता की अवधि कम से कम दस-दस हजार साल की मानी जाए तो वेद की रचना 25 हजार साल पहले की साबित होती है। वैदिक आर्यों के पूर्वज इस उपमहाद्वीप में इससे भी पहले से रह रहे थे। अठारह पुराणों में मानव की उत्पत्ति, राजाओं तथा ऋषियों आदि का वर्णन मिलता है।

साधारण जनता के लिए उपनिषद के रूप में साधारण साहित्य की रचना हुई। समाज के लिए विधि निषेध स्मृतियों में दिए गए। श्रुतियों में ऋषियों के प्रवचन का संकलन किया गया। युद्धों तथा वीरों की वीरता का वर्णन महाकाव्यों में लिखा है। इससे यह सिद्ध होता है कि आर्यों के पूर्वज मानव की उत्पत्ति से या इतिहास के अज्ञात समय से इस देश में रह रहे हैं।

संस्कृत तथा यूरोपीय भाषाओं के सामान्य स्रोत या उद्गम की खोज की दौड़ १७८४ ईस्वी में शुरू हुई। आर्यावर्त को आर्यों की मूल मातृभूमि तथा संस्कृत को उनकी भाषा सिद्ध करने के लिए बहुत पुराना तथा विशाल संस्कृत साहित्य है। परन्तु योरोप के लोगों ने भाषा शास्त्र, ऐतिहासिक तथ्यों तथा वास्तविकताओं को बहुत तोड़ा मरोड़ा है। आर्यों को इस उपमहाद्वीप से बाहर का साबित करने के लिए विभिन्न मत प्रतिपादित किए गए परन्तु उनके द्वारा इस विषय में दिए गए तर्क आर्यावर्त को आर्यों का मूलस्थान सिद्ध करने में ही प्रयुक्त हो सकते हैं।

– महाभारत में प्राग्ज्योतिष पुर आसाम, किंपुरुष नेपाल, हरिवर्ष तिब्बत, कश्मीर, अभिसार राजौरी, दार्द, हूण हुंजा, अम्बिस्ट आम्ब, पख्तू, कैकेय, गन्धार, कम्बोज, वाल्हीक बलख, शिवि शिवस्थान-सीस्टान-सारा बलूच क्षेत्र, सिंध, सौवीर सौराष्ट्र समेत सिंध का निचला क्षेत्र दण्डक महाराष्ट्र सुरभिपट्टन मैसूर, चोल, आन्ध्र, कलिंग तथा सिंहल सहित लगभग दो सौ जनपद महाभारत में वर्णित हैं जो कि पूर्णतया आर्य थे या आर्य संस्कृति व भाषा से प्रभावित थे। इनमें से आभीर अहीर, तंवर, कंबोज, यवन, शिना, काक, पणि, चुलूक चालुक्य, सरोस्ट सरोटे, कक्कड़, खोखर, चिन्धा चिन्धड़, समेरा, कोकन, जांगल, शक, पुण्ड्र, ओड्र, मालव, क्षुद्रक, योधेय जोहिया, शूर, तक्षक व लोहड़ आदि आर्य खापें विशेष उल्लेखनीय हैं।

राणा अलीहसन चौहान लिखते हैं कि पुराने वंशों से नए नाम के साथ नई-नई जातियां और कबीले बन जाते हैं। इक्ष्वाकु, पुरु व यदुकुल के उच्च श्रेणी के क्षत्रिय रक्त व साहसिक कार्यों के आधार पर संगठित हो गए तथा गुर्जर नाम से प्रसिद्ध हुए। उस समय गुर्जरों के अधीन जो क्षेत्र था, उसे गुर्जर देश या गुर्जरात्रा कहा जाता था।

संस्कृत में यदि किसी अक्षर पर बिंदु लगा दिया जाए तो वह अक्षर नाक में बोला जाता है, जैसे मां, हां आदि। गुरं का अर्थ शत्रु होता है। उज्जर का अर्थ नष्ट करने वाला। इसमें बिंदु का धीरे-धीरे लोप हो गया तथा गुर उज्जर मिल कर कालक्रम से गुर्जर बन गया जिसका अर्थ है शत्रु को नष्ट करने वाला। यह पुल्लिंग है। अली हसन ने अपने मत की पुष्टि के लिए संस्कृत शब्दकोष, कलद्रुपम का हवाला दिया है जिसे पंडित राधाकांत शर्मा ने संपादित किया है।

गुर्जर राजाओं व गुर्जर जाति का वर्णन करते हुए राणा अलीहसन ने लिखा है कि विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं का पहला निशाना गुर्जर अधिपति ही बने। चाहे वे सिंध के राजा दाहिर रहे हों या सिकंदर से लोहा लेने वाले पोरस। गुर्जर प्रतिहार का एक जमाने में पूरे देश में एकक्षत्र राज्य था। इस जाति के एक प्रतापी नरेश राजा मिहिरभोज ने ईस्वी सन् 836 से 888 तक कन्नौज में राज किया था। उनके राज्य की सीमाएं पश्चिम में गांधार और काबुल से लेकर पूरब में बर्मा तक फैली थीं। अलीहसन साहब लिखते हैं कि पृथ्वीराज चौहान जैसे वीर गुजर शासकों के पतन के बाद राजपूताने में जो शासक बैठे वे गुर्जर नरेशों की ही संतानें थीं लेकिन उन्होंने चूंकि मुगल व उनके पहले आए तुर्कों न गुर्जरों को उपेक्षित कर रखा था इसलिए उन्होंने खुद को राजपूत कहना शुरू किया यानी राजाओं के पुत्र। बाद में 19वीं सदी में जब अंग्रेजों ने वीरगुर्जरों के विद्रोहों से आजिज आकर उन्हें जरायमपेशा घोषित कर दिया तो राजपूतों ने उनसे अलग दिखने के लिए कर्नल टॉड जैसे मुंशी का सहारा लिया और उसे रिश्वत देकर अपना एक अलग इतिहास लिखाया जिसमें राजपूतों को एक अलग जाति करार दिया गया।

( https://tukdatukdazindagi.blogspot.in से साभार , प्रस्तुति : शंभूनाथ शुक्ल )

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी क्या कहते हैं ?

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी गुजरात प्रांत के एक ब्राह्मण लेखक हुए हैं । जो स्वयं स्वतंत्रता सेनानी भी रहे और भारतीय संस्कृति एवं इतिहास पर उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं । उन्होंने अपने जीवन में अनुभव किया कि गुर्जरों के बारे में इतिहासकार श्री ओझा , वैद्य और गांगुली की इस मान्यता को निराधार और अनुसार माना कि गुर्जर राजपूत थे। उन्होंने यह स्वीकार किया कि राजपूत जाति का मुस्लिम शासन काल से पूर्व कोई अस्तित्व नहीं मिलता । मुस्लिम काल के पूर्व राजपूत जाति का अस्तित्व ना मिलने के कारण उनको ब्रिटिश इतिहासकारों और उनका अनुसरण करने वाले कुछ भारतीय इतिहासकारों ने गलत ढंग से विदेशी लिखा । उन्हें इतिहासकारों की यह मान्यता भी पूर्णतया निराधार ही प्रतीत हुई कि गुर्जरों आदि विदेशियों को आबू के हवन यज्ञ द्वारा शुद्ध करके राजपूत बनाया गया था तथा उसी समय अर्थात आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में राजपूत जाति बन गई थी। श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का यह विचार था कि यदि गुर्जर विदेशी थे और उनके प्रतिहार , परमार , चालुक्य , चौहान आदि वंश शुद्ध करके राजपूत बना लिए गए थे तो उसके पश्चात भी वे वंश शिलालेखों आदि में स्वयं को गुर्जर क्यों लिखवाते रहे ? कहीं भी उन्होंने अपने आप को राजपूत क्यों नहीं लिखवाया ?।

गुर्जरों का विदेशी होना श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की राष्ट्रीय भावनाओं के लिए एक प्रकार का कुठाराघात ही था । क्योंकि उसका ऐसा अर्थ निकालने से विदेशी शासकों के इस काल्पनिक मत की ही पुष्टि होती कि भारतीय सदा विदेशियों द्वारा ही शासित रहे हैं।

वर्तमान गुर्जरों के बारे में खोज करने पर श्री मुंशी ने पाया कि कश्मीर , पेशावर , पंजाब , हिमाचल , उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , राजस्थान , गुजरात तथा दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश तक फैले हुए गुर्जर सुंदर , सुडौल , बलिष्ठ आर्य आकृति वाले हैं और उन दूरस्थ प्रदेशों में रहते हुए उनकी वेशभूषा , भाषा , रीति – रिवाज एक जैसे हैं । इतना ही नहीं वह हर स्थान पर अपनी गुर्जरी भाषा अर्थात प्राचीन गुर्जरी अपभ्रंश के ही कुछ बदले हुए रूपों को आज भी बोलते हुए अपनाते हैं । जो वर्तमान पश्चिमी राजस्थान की भाषा है । उनका यह भी मत था कि गुर्जरों के लोकगीत आज भी राजस्थान में गुजरात के लोकगीतों जैसे ही हैं । गुर्जरों की यह गुर्जरी भाषा जिसको मध्ययुगीन साहित्य में गुर्जरी अपभ्रंश कहा गया था निश्चय ही आर्य भाषा है । श्री मुंशी के खोज वृत्तांत का सारांश है कि उन्होंने कश्मीर से आंध्र तक के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले गुर्जरों की वेशभूषा को राजस्थान में गुजरात से संबंधित बताते हुए गुर्जर महिलाओं को राजस्थानी घाघरा लहंगा पहने देखा था । उन्होंने वर्तमान राजस्थान के राजपूतों के साथ ही गुर्जरों का तुलनात्मक अध्ययन करके दोनों में काफी समानता पाई । श्री मुंशी ने अपने लेखन के माध्यम से गुर्जरों के विदेशी होने की उत्पत्ति के सिद्धांत का खंडन किया। उनके प्रतिहार , परमार , चालुक्य , चौहान आदि वंशों की विदेशी उत्पत्ति का भी खंडन किया और उसी आधार पर राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का भी खंडन किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य , संपादक : उगता भारत

2 replies on “गुर्जर वंश का गौरवशाली इतिहास : प्रतिहार वंशी शासकों और भारतीय संस्कृति के बारे में विद्वानों के मत , भाग — 2”

Dr. KIRAN Singh, ex-DDG ICAR GOI, DIR & VC NDRI, DIR & VC IVRI, Neurophysiologist AIIMS New Delhisays:

Mujhe ugta bharat ka ” gurjar ansh ka garavshali itihas ” par lekh padh kar bahut khushi hui. Rakesh ji shayad aap baallabh garh ke rahne wale hain aur main aapke parivar se parichit bhi hoon, lekin me ab kaafi budha ho gaya hun aur sampark bhi khatm ho gaye hain. Kurukshetra me ek gurjar sammelan 2002 me hua tha, Dr Arya ke Agrah par main uske samapan par chairman tha aur mere haath se Rana Ali Hasan Chauhan ko ek inam bhi diya gaya tha.
I feel very proud of him and wished to meet him in my visit to Pakistan but came to know after few months that he is no more. I felt very sorry for him. I had some sweet memories of conversations with him.
Rakesh ji, I shall feel very happy to meet you and your family. I have age related many problems and worse is that I am hard of hearing and can not use phone or mobile. However, I am most comfortable with e-mail.

मान्यवर आपकी उत्कृष्ट टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं आपको बहुत विनम्रता के साथ सूचित करना चाहूंगा कि मैं बल्लभगढ़ मैं नहीं रहता बल्कि ग्रेटर नोएडा रहता हूं। लगता है जिन आर्य साहब की बात आप कर रहे हैं वह कोई और सज्जन है।

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