माता प्रकाशवती जी को आज पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि : वैदिक विद्वान आचार्य रामनाथ विद्यालंकार ने अपनी धर्मपत्नी प्रकाशवती जी के त्यागपूर्ण सहयोग से वेदों की महती सेवा की

ओ३म्

=============
आज चैत्र कृष्णा 14, 2076 विक्रमी को माता श्रीमती प्रकाशवती जी की 38 वी पुण्य तिथि है। उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिये हम कुछ पंक्तियां लिख रहे हैं। माता जी का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है।

वैदिक विद्वान डा. आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी से आर्यसमाज की पुरानी पीढ़ी के स्वाध्यायशील लोग प्रायः परिचित हैं। उन्होंने सामवेद का संस्कृत व हिन्दी में विस्तृत भाष्य किया है। आरम्भ में कुछ मन्त्रों के एक से अधिक अर्थ भी किये हैं। आचार्य जी ने लगभग एक दर्जन उच्च कोटि के वैदिक ग्रन्थों का प्रणयन भी किया है। हमारा सौभाग्य है कि हम उनसे कुछ वर्षों तक जुड़े रहे और उनके सभी ग्रन्थ हमारे पास हैं जिनका हमने अध्ययन किया है। आचार्य जी की एक प्रसिद्धि कृति है ‘‘वैदिक नारी”। इस विषय का आर्यजगत में इतना महत्वपूर्ण एवं उपयेागी ग्रन्थ किसी विद्वान द्वारा लिखा उपलब्ध नहीं होता। प्राचीन वैदिक वांग्मय में भी इस कोटि का ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता। वस्तुतः यह एक ऋषि कोटि के विद्वान द्वारा लिखा गया ग्रन्थ है। आचार्य जी का आर्यजाति पर यह एक ऋण है। इस ग्रन्थ के प्रकाश में कोई वेद एवं वैदिक युग में नारी जाति की उच्च स्थिति को अस्वीकार नहीं कर सकता। आज की नारी वेदों में वर्णित नारी के गुणों व गौरव की दृष्टि से काफी पीछे है। वेदों में उपलब्ध नारी जाति विषयक अनेक महत्वपूर्ण विषयों को आचार्य जी ने इस पुस्तक में प्रस्तुत कर प्रकाश डाला है। हम पुस्तक में वर्णित सभी विषयों की सूची प्रस्तुत कर रहे हैं जो कि निम्न हैः

1- वैदिक विवाह, वैदिक देवियां
2- वेदों में नारी की स्थिति
3- नारी की स्थिति पर स्वामी दयानन्द के वेदमूलक विचार
4- उषा के समान प्रकाशवती
5- वीरांगना
6- वीर-प्रसवा
7- विद्यालंकृता
8- स्नेहमयी मां
9- पतिंवरा (कन्या द्वारा पति-वरण)
10- धर्मपत्नी (वर द्वारा पाणिग्रहण और वधू के प्रति उद्गार)
11- अन्नपूर्णा
12- सद्गृहिणी और सम्राज्ञी (वृद्ध जनों का वधू को आशीष व उपदेश)
13- आशीर्भाजन वधु-वर (वधु-वर दोनों को आशीष व उपदेश)
– नारी का शील, नारी महिमा, मातृ-स्तुति
– सूक्तियां

उपर्युक्त विषय सूची से ही पुस्तक के महत्व का अनुमान लगाया जा सकता है। आचार्य जी ने यह पुस्तक क्यों लिखी इसका उल्लेख उन्होंने पुस्तक के प्राक्कथन में किया है। वह लिखते हैं ‘जिन दिनों मेरा विवाह हुआ, उन दिनों मैं गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के तत्कालीन आचार्य श्री अभयदेवजी की प्रेरणा से योगी श्री अरविन्द की ‘सीक्रेट आफ द वेद’ नामक अंग्रेजी लेखमाला का ‘वेद-रहस्य’ नाम से हिन्दी भाषान्तर करने में संलग्न था और मेरे मानस-पटल पर वेद की ‘गोमती उषा’ छायी हुई थी, जिसकी श्री अरविन्द ने अपनी लेखमाला में बार-बार चर्चा की है और ‘गोमती’ का अर्थ ‘प्रकाशवती’ किया है। विवाह के पश्चात् अपनी पत्नी प्रकाशवती को प्रथम पत्र में मैंने लिखा था कि ‘‘तुम्हारा नाम मुझे वेद की ‘प्रकाशवती उषा’ का स्मरण करा देता है और मैं आशा करता हूं कि तुम मेरे जीवन में उषा के समान ही प्रकाश बखेरोगी।” और 43 वर्ष साथ रहने के पश्चात जब वे महाप्रयाण कर रही थी तब मैंने उनसे कहा था कि मेरा विचार है तुम्हारी स्मृति में ‘प्रकाशवती उषा’ या किसी अन्य नाम से वैदिक नारी पर एक पुस्तक लिखूं। यही प्रस्तुत पुस्तक के लेखन की पृष्ठभूमि है। संकल्प की पूर्ति में देर अवश्य हुई।’ यह ज्ञातव्य है कि यह प्राक्कथन आचार्य जी ने 20 नवम्बर, 1984 को पन्तनगर-नैनीताल में लिखा था।

यह भी ज्ञातव्य है कि आचार्य जी के विद्यागुरु पं. विश्वनाथ वेदोपाध्याय जी देहरादून में निवास करते थे। हमने आर्यसमाज धामावाला देहरादून में उनके कुछ प्रवचन सुने थे। आर्यसमाज में उनका सम्मान हुआ था। इस अवसर पर भी मैं समाज मन्दिर उपस्थित था। आचार्य जी ने आयु के एक सौ वर्ष पूर्व होने पर अपने निवास पर एक चतुर्वेद पारायण यज्ञ कराया था जिसके ब्रह्मा देहरादून के ही एक वैदिक विद्वान पं. रुद्रदत्त शास्त्री सपत्नीक थे। आपकी धर्मपत्नी देहरादून के एक महाविद्यालय में संस्कृत की प्रवक्ता थी। हमने पं. विश्वनाथ विद्यालंकार जी का आचार्य रामदेव जी द्वारा स्थापित कन्या गुरुकुल, देहरादून में आयोजित सम्मान समारोह में भी भाग लिया था। यह सम्मान समारोह आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब तथा आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तर प्रदेश के यशस्वी मंत्री श्री धर्मेन्द्र सिंह आर्य जी द्वारा मिलकर आयोजित किया गया था। इस अवसर हमने आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के प्रधान श्री वीरेन्द्र जी के कन्या गुरुकल, देहरादून में दर्शन भी किये थे। यह भी ज्ञातव्य है कि आचार्य जी ने देहरादून के डी.ए.वी. महाविद्यालय के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष डा. धर्मेन्द्रनथ शास्त्री जी के निर्देशन में पी.एच.डी. की थी। उनके शोध का विषय ‘वेदों की वर्णन-शैलियां’ था। यह ग्रन्थ भी पुस्तक रूप में उपलब्ध है। इस ग्रन्थ का भी हमने पाठ व अध्ययन किया है। इन कारणों से हमारी आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी से निकटता थी। हम वर्षों तक प्रत्येक माह आचार्य जी से मिलने ज्वालपुर-हरिद्वार जाते थे और अनेक सामाजिक विषयों पर उनसे चर्चा करते थे।

आचार्य जी ने अपने जीवन के कई संस्मरण हमें समय समय पर सुनाये। आज उनके द्वारा सुनाया गया उनकी धर्मपत्नी माता प्रकाशवती जी से सम्बन्धित एक संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने बताया था कि गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से सेवानिवृति के बाद उनकी नियुक्ति पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ में दयानन्द चेयर के प्रमुख व सभापति के रूप में हुई थी। वह इस पद पर पांच वर्षों तक रहे। आचार्य जी ने बताया था कि जिन दिनों वह गुरुकुल कांगड़ी में अध्ययन कराते थे, उनका वेतन कम था। इसलिये वह अपनी धर्मपत्नी माता प्रकाशवती जी को कभी मूल्यवान साड़ी आदि नहीं दिला सके थे। पंजाब विश्वविद्यालय में नियुक्ति के बाद उनको अच्छा वेतन मिलने लगा। एक बार वह चण्डीगढ़ में वस्त्रों की एक बड़ी दुकान पर गये और माता जी के लिये उनकी पसन्द की दो मूल्यवान साड़िया खरीदी। साड़ी खरीदे बहुत दिन हो गये थे परन्तु माता जी ने उन साड़ियों का प्रयोग नहीं किया था। एक दिन आचार्य जी ने इस विषय में चर्चा की और उन्हें उनमें से एक साड़ी पहनने का निवेदन किया। तब माता जी ने कहा था कि उन्होंने जीवन भर अपना जीवन अत्यन्त सादगी से बिताया है। अब इस आयु में ऐसे वस्त्र पहनना उन्हें उचित प्रतीत नहीं हो रहा था। इसलिये उन्होंने वह साड़ियां अपनी दोनों पुत्रियों को दे दी हैं। आचार्य जी के श्रीमुख से यह प्रसंग सुनकर हमने उनकी परिस्थितियों पर विचार किया था। हमारा बाल्यकाल भी आर्थिक अभावों में व्यतीत हुआ है। हमने अपने माता-पिता को साधारण वस्त्रों में ही देखा था। उन्होंने जीवन में अत्यन्त पुरुषार्थ कर हमारा पालन-पोषण किया व हमारी उत्तम शिक्षा की व्यवस्था की थी। इस कारण इस प्रसंग को सुनकर हमें माता जी की भावनाओं का मर्म विदित हुआ। उस काल में स्त्रियों के साथ ऐसा ही होता था। ऐसा हमने अपनी माताजी के जीवन में भी देखा था जिनकी मृत्यु दिसम्बर, 1982 में लगभग 38 वर्ष पूर्व ही हुई थी।

आज माता प्रकाशवती जी की पुण्य तिथि (चैत्र कृष्णा 14, 2038) पर हम उनको श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। माता प्रकाशवती जी का जीवन अति पवित्र एवं त्यागमय जीवन था। आर्यसमाज के विद्वान डा. विनोदचन्द्र विद्यालंकार जी आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी और माता प्रकाशवती जी के ही सुपुत्र हैं। डा. विनोदचन्द्र विद्यालंकार जी ने भी वेदों सहित स्वामी श्रद्धानन्द जी, आचार्य रामदेव जी, स्वामी समर्पणानन्द जी आदि के जीवन पर महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है। कुछ दिन पूर्व वह रुग्ण हो गये थे। सम्प्रति वह स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं और हरिद्वार में अपने पुत्र श्री स्वस्ति अग्रवाल जी के साथ रहते हैं। आपका हम पर स्नेह है और हमें फोन पर उनका आशीर्वाद मिलता रहता है। यह हमारे लिये गौरव की बात है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

betpark
mavibet giriş
grandpashabet
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betpark giriş
imajbet güncel
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
imajbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
imajbet güncel
bahsegel giriş
bahsegel giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet güncel giriş
imajbet giriş
imajbet güncel
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
safirbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano güncel
betnano güncel giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
casibom giriş
casibom giriş
imajbet güncel
imajbet giriş
betpark giriş
betpark
betpark
betpark giriş