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संपादकीय

क्या है शिक्षा का उद्देश्य

आजकल विद्यालयों का परिवेश विलासिता पूर्ण हो जाने से बच्चों में उच्च मानवीय नैतिक गुणों का लोप होता जा रहा है और विद्यालय केवल ‘मशीनी मानव’ के रूप में बच्चों का विकास कर रहे हैं। जबकि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को मशीनी मानव न बनाकर संस्कारित समाज की एक संस्कारित ईकाई बनाना होता है। शिक्षा यदि अपने इस उद्देश्य से भटक जाती है तो सारी व्यवस्था शीर्ष शासन कर जाती है।

कहा गया है कि यज्ञ इस विश्व की नाभि है, जिसका अभिप्राय है कि सारी वैश्विक व्यवस्था यज्ञीय भावना के अनुरूप चलनी चाहिए। यदि यज्ञीय भावना समाप्त हो गयी तो नाभि टहल जाएगी। हम देखा करते हैं कि यदि हमारी नाभि टहल जाए तो हमें पेट के रोग सताने लगते हैं और भूख हमारा साथ छोड़ जाती है। नाभि के टहलने से यदि हमारे शरीर में इतनी व्याधियां आ सकती हैं और हम अस्त-व्यस्त हो सकते हैं तो विश्व की नाभि टहलने से संपूर्ण विश्व व्यवस्था का अस्त-व्यस्त हो जाना निश्चित है। हमें अपनी भावनाएं यज्ञीय रखनी चाहिए अन्यथा सारी विश्व व्यवस्था विकृति को प्राप्त हो सकती है। आज के विद्यालयों में भावना पाप और अत्याचार की परिभाषा तक की जानकारी नही है। जिससे बच्चा जीवन पर इन तीनों शब्दों को लेकर भ्रमित रहता है उसे पता ही नही चलता कि भावना क्या है-पाप क्या है और अत्याचार क्या है ? विभिन्न विचारधाराओं को लेकर विद्यालय खोले जाते हैं, एक में इस्लाम की शिक्षा दी जाती है, एक में ईसाइयत की, तीसरे में मार्क्सवाद की तो चौथे में किसी अन्य की। अलग-अलग शिक्षा अलग-अलग चिंतन और अलग-अलग पढ़ाने का ढंग है। जिससे विखंडित मानसिकता के मानव समाज का निर्माण हो रहा है। हमारा मानना है कि संपूर्ण विश्व की एक शिक्षा संस्था हो जिसमें मानवता और विश्व मानस के विकास पर बल दिया जाए। यदि हमारी शिक्षा में मानवतावाद आ गया तो संपूर्ण विश्व के सभी लोगों की सामूहिक भावनाएं एक जैसी हो जाएंगी। भावनाओं की विभिन्नता लोगों में विखण्डनवाद को पैदा करती हैं। हमारा मानना है कि भावनाओं की विभिन्नता विभिन्न संप्रदायों के कारण आती है, इसलिए विश्व का और विश्व के लोगों का सबसे बड़ा शत्रु संप्रदायवाद है। संप्रदायवाद के कारण समाज में सर्वत्र विखण्डनवाद और हिंसा का वातारण बना हुआ है।

सब कहते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली सर्वोत्तम है, पर सबकी शिक्षा प्रणाली में दोष है-कारण कि किसी की भी शिक्षा प्रणाली मानव के बच्चे को केवल मानव बन जाना नही सिखा रही। इसके विपरीत एक की शिक्षा बच्चे को मुसलमान बना रही है, तो दूसरे की शिक्षा बच्चे को ईसाई बना रही है और तीसरे की शिक्षा इसी प्रकार कुछ और बना रही है। इन सारी विकृतियों को दूर करने का एक मात्र उपाय वैदिक शिक्षा है जो बच्चे को केवल मानव बनने के लिए प्रेरित करती है और उसका वैज्ञानिक बौद्घिक विकास करने पर बल देती है। विश्व को चाहिए कि वेद के मानवतावाद को वह अपनी शिक्षा का मूल आधार घोषित करे, हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली के लागू रहने का परिणाम यह आ रहा है कि समाज में भावनाएं आहत हो रही हैं, हर व्यक्ति अपनी भावनाओं के बोझ तले दबकर जी रहा है और जी नही रहा है-अपितु धीरे-धीरे मर रहा है जिससे समाज में बहुत सी बीमारियां फैलती जा रही हैं। क्योंकि चिंतन के दूषित हो जाने से मानसिक तनाव जन्म लेता है और मानसिक तनाव फिर गंभीर बीमारियों को जन्म देता है। इससे व्यक्ति कुंठित रहता है और कुंठाएं उसके मन मस्तिष्क में कई ऐसी भावनाओं को जन्म देती हैं जिनमें वह स्वस्थ रहकर भी स्वस्थ नही रह पाता है।

रोम रोम को पुलकित होने दो

भावनाओं के आहत हो जाने से पाप और अत्याचार की भावना बलवती होती है। भावनाओं का आहत हो जाना ही कुण्ठा कही जाती है। कुण्ठा से ही गांठ शब्द बना है। अब गांठ तो गांठ ही है, वह चाहे दिल में हो चाहे विचारों में हो, वह जहां लग गयी वहीं तनाव उत्पन्न करती है। इसलिए हमारे ऋषियों ने कहा कि स्वयं को कुण्ठाओं से मुक्त रखो, गांठों के बंधन से मुक्त रखो, किसी भी प्रकार का तनाव उत्पन्न मत होने दो। विचारों को पवित्रता के साथ सहज रूप में बहते रहने दो। उनसे तन को भीगने दो, मन को भीगने दो-रोको मत-उनका प्रवाह ।

यदि प्रवाह रोक दिया तो शरीर के रोम-रोम का स्नान नही हो पाएगा। रोम-रोम पुलकित नहीं हो पाएगा । रोम रोम की पवित्रता बाधित हो जाएगी । तब हमें उस स्नान का उतना लाभ नहीं मिला मिल पाएगा , जितने की अपेक्षा की जा सकती है ।

समाधि में या ध्यान में शरीर के रोम-रोम को पुलकित होने दो-पाप और अत्याचार की भावनाएं स्वयं ही समाप्त हो जाएंगी। इसी को ज्ञान स्नान कहा जाता है। यह ज्ञान स्नान करना ही हमारा वास्तविक स्नान करना है, स्नान का अभिप्राय है कि हमारा रोम-रोम आनंदित हो उठे, उसमें किसी प्रकार का कहीं तनाव या दबाव न हो। भजन की यह पंक्ति उसी ज्ञान स्नान की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है।

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