हमने सदैव प्रकाश की अर्थात ऊर्जा की साधना की। हमने तेज को अपना आदर्श माना और सत्य को अपने जीवन का आधार बनाया । वैज्ञानिक उन्नति के साथ – साथ हमने आत्मिक व आध्यात्मिक उन्नति भी की। आध्यात्मिक उन्नति का परिणाम यह निकला कि हमारा विज्ञान हमारे लिए कभी भस्मासुर नहीं बना और वह सदा सकारात्मक ऊर्जा के साथ प्रवाहित होता रहा । कहने का तात्पर्य है कि हमने विनाशकारी भौतिक विज्ञान को नहीं अपनाया जैसा कि आज का यूरोप अपना रहा है। हमने विज्ञान का सदुपयोग करते हुए उसका सकारात्मक शक्तियों के जागरण में उपयोग किया । सदा ऐसे अनुसंधानों को प्राथमिकता दी जिससे मानवता और प्राणीमात्र का कल्याण हो सके । बौद्धिक शक्तियों का सकारात्मक सार्थकता पूर्ण उपयोग करना ही मानव की मानसिक शक्तियों का समुचित विकास कहा जा सकता है । इससे अन्यत्र विनाशात्मक कार्यों के लिए यदि ज्ञान विज्ञान का उपयोग , उपभोग या प्रयोग किया जाता है तो वह मानव की मानसिक शक्तियों की अधोगामी दशा को दर्शाता है।

भारत की मनीषा की सात्विक वृत्ति

इसका कारण यह है कि भारतीय मनीषा सदा सात्विक रही । उसने सात्विक आहार-विहार तथा आचार – विचार पर ध्यान दिया । अपने आहार – विहार व आचार – विचार को सात्विक बनाकर सात्विक विज्ञान के माध्यम से भौतिकवाद और अध्यात्मवाद का समन्वय कर जीवन जीने की कला विकसित की । विज्ञान को सात्विकता के साथ मानव हित और प्राणी मात्र के हित में प्रयोग करना और उस पर मनुष्य का नियंत्रण भी स्थापित रखना यह केवल भारतीय मनीषा का और भारतीय चेतना का ही विषय है । शेष संसार आज तक विज्ञान पर शासन नहीं कर पाया । विज्ञान ने ही संसार पर शासन किया और विनाश मचाया । भारत ने अपनी शोध और अनुसंधान से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि विज्ञान कभी भी हृदयहीन नहीं होना चाहिए । विज्ञान को सरस , सरल , सहज और संवेदनशील होना चाहिए । यदि भारतीय ऋषि लोग हृदयहीन विज्ञान की उपासना करते तो रोबोट जैसी वस्तुओं को वह बहुत पहले बना गए होते। यह ध्यान रखने वाली बात है कि हृदयहीन विज्ञान मनुष्य के लिए हानिकारक होता है । वह कभी भी विनाश का तांडव मचा सकता है । जबकि संवेदनशील , सहज सरल और सरस विज्ञान सनातन ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मनुष्य को सृष्टि पर्यंत सुख साधन उपलब्ध कराने में सहायक हो सकता है।

आज के संसार को भी हिंदुत्व की मौलिक चेतना के इस संस्कार स्वर को स्वीकार करना होगा कि विज्ञान को सात्विकता के साथ समन्वित कर प्राणीमात्र के हितानुकूल प्रयोग करना मनुष्यमात्र का उद्देश्य होना चाहिए । हमारे ऐसा कहने का अभिप्राय यह है कि भारत ने दुष्ट और पापाचारी का विनाश करने के लिए अस्त्र-शस्त्र की खोज की। उसने कभी शरीफ और गरीब को सताने के लिए तलवार का प्रयोग नहीं किया । ये ही विज्ञान का सात्विक सदुपयोग करना है। जितना जिसका अपराध हो उसको उसके अपराध के अनुपात में उतना ही दण्ड हो । विज्ञान अपराध के अनुपात में दंड देने में सहभागी हो ना कि निर्बल और सज्जन शक्ति के विनाश के लिए आइंस्टीन के परमाणु बम की भांति विनाशकारी स्वरूप में लोगों के सामने आए । विज्ञान भय दूर करने वाला हो न कि भय फैलाने वाला हो। विज्ञान आतंकी के हृदय में भय पैदा करने वाला और सज्जन शक्ति के हृदय में से भय को भगाने वाला हो। जब इस प्रकार का विज्ञान हमारे सामने आता है तो वह सात्विक बौद्धिक शक्तियों के द्वारा दोहा गया विज्ञान होता है और यह तभी संभव है जब वेद जैसे पवित्र शास्त्रों की यौगिक एवं वैज्ञानिक व्याख्या हो और इस यौगिक एवं वैज्ञानिक व्याख्या के आधार पर विज्ञान को सहज रूप में प्रवाहित होने दिया जाए। यदि वेद में इतिहास ढूंढने की मूर्खता की गई तो विज्ञान के सात्विक स्वरूप का मनुष्य के सात्विक आहार – विहार और आचार – विचार के साथ समन्वय स्थापित नहीं हो पाएगा और विज्ञान हृदयहीन होकर विनाश मचाने के लिए उद्दंड हो जाएगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक उगता भारत

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