हमारे वेदवेत्ता विद्वानों ने जब उपनिषद या दर्शन शास्त्रों की या स्मृतियों जैसे आर्षग्रंथों की रचना की तो उनमें उनका वैदिक ज्ञान और उसका दर्शन स्पष्ट झलकता है। इतना ही नहीं रामायण और महाभारत जैसे इतिहास ग्रंथों में भी विद्वान लेखकों का वैदिक दृष्टिकोण और उनके वैदिक चिंतन की उदात्त भावना स्पष्ट परिलक्षित होती है । जिनके अध्ययन अध्यापन से कोई भी यह सहज ही अनुमान लगा सकता है कि भारत के इतिहास को भी वैदिक ज्ञान ने कितनी गहराई तक प्रभावित किया है ?

पराशर, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, व्यास, पाणिनी आदि को प्राचीन काल के वेदवेत्ता कहां जाता है। इतिहास (महाभारत), पुराण आदि ग्रन्थ भी वैदिक ज्ञान की छाया से अछूते नहीं रह पाए । कई स्थलों पर वैदिक ज्ञान पुराणों में भी इतना स्पष्ट परिलक्षित होता है कि पाठक उन्हें वेद का ही एक अंग मानने को बाध्य सा हो जाता है । यद्यपि पुराणों में अधिकांश बातें अवैज्ञानिक , अतार्किक और सृष्टि नियमों के विपरीत घुसेड़ने का कुछ लोगों ने वेद विरुद्ध आचरण किया परंतु इसके उपरांत भी वेदों में इतिहास ढूंढने में हमें बहुत अधिक सहायता मिलती है।

वेदों के प्रकांड पंडित महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार में ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान वेदों के विषय हैं। जीव, ईश्वर, प्रकृति इन तीन अनादि नित्य सत्ताओं का निज स्वरूप का ज्ञान केवल वेद से ही उपलब्ध होता है। जिन लोगों ने वेदों में मूर्ति पूजा का विधान बताया उनके इस कुतर्क को भी महर्षि दयानंद ने अमान्य सिद्ध कर दिया। जब उन्होंने वेदों के विषय में ऐसे लोगों को खुली चुनौती दी कि कहीं पर भी वह वेद में मूर्ति पूजा का विधान नहीं बता सकते।

कणाद ने कहकर वेद को दर्शन और विज्ञान का आदि स्रोत कहकर महिमामंडित किया है । संसार में राजनीतिक व्यवस्था को सबसे पहले स्थापित करने वाले और संसार को सबसे पहला लिखित संविधान देने वाले महर्षि मनु ने वेदोऽखिलो धर्ममूलम् – कहकर सम्मान प्रदान किया है। वैदिक शिक्षा के अध्ययन से हमें अपने प्राचीन इतिहास का तो नहीं , परंतु अपने पूर्वजों के ज्ञान विज्ञान की पराकाष्ठा को देखकर उनकी संस्कृति और सभ्यता का बोध अवश्य होता है। हमें पता चलता है कि हमारे पूर्वजों ने ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में वेद और वैदिक शिक्षाओं को ग्रहण कर कितने बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित किए और किस प्रकार संसार का मार्गदर्शन किया ?

विश्व को एक आदर्श राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था देने में वेदों की महत्ता को स्वीकार करते हुए ही संसार के विभिन्न विद्वानों ने इस बात को सहर्ष स्वीकार किया है कि वेद ही संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं । इतना ही नहीं कितने ही विद्वानों ने इस बात को भी स्वीकार किया है कि वेदों की शिक्षाओं के सामने संसार के अन्य देशों के ग्रंथों की शिक्षाएं कुछ भी मायने नहीं रखते।

वेदों की भाषा संस्कृत ही आज के विश्व की सभी भाषाओं की जननी है। संस्कृत के अनेक शब्द संसार की सभी भाषाओं में यत्र – तत्र बिखरे पड़े हैं । इस प्रकार वैदिक संस्कृत ही किसी ना किसी भाषा या बोली के रूप में सारे विश्व का आज भी मार्गदर्शन कर रही है। यूनेस्को ने 7 नवम्बर 2003 को वेदपाठ को मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृतियाँ और मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया।

वेद सृष्टि के ऐसे सबसे पहले ग्रंथ हैं जिन्होंने मानव की स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रत्येक प्राणी के जीवन की सुरक्षा को भी अपनी शिक्षाओं का मौलिक उद्देश्य घोषित किया है । वेद ने कहीं पर भी ऐसी कोई शिक्षा नहीं दी जिनसे किसी भी प्राणी के जीवन को संकट उत्पन्न होता हो। वेदों ने मनुष्य द्वारा जब किसी अन्य जीवधारी के प्राण हरने को ही अनैतिक और अनुचित माना है तो उसे किसी व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों का अतिक्रमण कराने को न्यायसंगत ठहराने की भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। यही कारण है कि वेद ने व्यक्ति द्वारा व्यक्ति के शोषण या किसी समूह द्वारा या किसी संप्रदाय द्वारा किसी व्यक्ति या समूह या संप्रदाय के शोषण की कोई शिक्षा नहीं दी । इस प्रकार वेद की शिक्षाएं वास्तव में पंथनिरपेक्ष मानव का निर्माण करती है।

इन्हीं गुणों से भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ है और इन्हीं गुणों ने भारत की मौलिक चेतना का निर्माण किया है । यही कारण है कि भारत ने कभी भी किसी व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों के अतिक्रमण का समर्थन नहीं किया

इसी प्रकार अनेकों संप्रदायों को भी साथ लेकर चलने का अनोखा और सफल प्रयास भारत की संस्कृति ने किया है। हमने सृष्टि प्रारंभ में वेद की शिक्षाओं के माध्यम से इन संस्कारों को अपने मानवीय और वैश्विक संस्कारों में सम्मिलित किया । इन्हीं मानवीय वैश्विक संस्कारों के आधार पर अपनी भारतीय संस्कृति का निर्माण किया । जिससे भारतीय संस्कृति किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित ना होकर वैश्विक संस्कृति बनी । इसी वैश्विक संस्कृति ने स्वाभाविक रूप से विश्वगुरु का सम्मान प्राप्त किया और सारे संसार के लोगों को अपनी अमृत वर्षा से सराबोर कर उनके जीवन को धन्य किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य

उगता भारत

Comment:

Latest Posts

kolaybet giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vdcasino
betgaranti
betpark giriş
betpark güncel giriş
vdcasino
vdcasino
jojobet güncel
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
jojobet
jojobet
favorisen giriş
hitbet giriş
betpas giriş
restbet giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş