‘‘महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां थीं । एक दिन उन्होंने अपनी पत्नियों को बुलाकर कहा – ” मैं दीक्षा लेना चाहता हूं। तुम दोनों परस्पर मेरी सारी संपत्ति का विभाजन कर लो और सुख शांति के साथ जीवन यापन करो।’’ उनकी एक पत्नी का नाम मैत्रेयी था। तब उस पत्नी ने पूछा-‘‘मुझे बंटवारे में जो धन मिलेगा क्या उस धन से ईश्वर मिल सकता है?’’

इस पर महर्षि याज्ञवल्क्य मौन हो गये। कुछ देर पश्चात उनका मौन टूटा। तब उन्होंने गंभीर शब्दों में कहा- ” मैत्रेयी ! धन से वह अमृतत्व नही मिल सकता। क्योंकि वह अमृत तत्व धन से खरीदने की वस्तु नही है। ’’

” क्यों ? ” महर्षि याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी गार्गी ने भी महर्षि से प्रश्न पूछ लिया।

तब महर्षि ने उन्हें समझाते हुए कहा-‘‘धन से ज्ञान नही मिलता, न भक्ति न ईश्वर। धन को भोगने से अभिमान होता है। धन रखने और दान करने से भी अभिमान ही उत्पन्न होता है।’’ मैत्रेयी ने महर्षि को उत्तर दिया- ‘‘जिससे मुझे अमृत तत्व नही मिल सकता, वह वस्तु मुझे स्वीकार नही।’’

इस ऊंचे संवाद में संसार के भौतिक ऐश्वर्य और धन संपदा में आनंद का अभाव देखा जा रहा है, वास्तविक आनंद तो कहीं और किसी दूसरी चीज में है।

भौतिक व्यक्ति धन में आनंद खोजता है, इस भौतिक जगत के मायामोह में आनंद खोजता है परंतु एक आध्यात्मिक व्यक्ति इस धन को वैसे ही लात मार देता है जैसे मैत्रेयी ने उसे लात मारते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य से कह दिया था कि ‘‘जिससे मुझे अमृत तत्व नही मिल सकता, वह वस्तु मुझे स्वीकार नही।’’

मैत्रेयी उससे कम पर समझौता करने को तैयार नही है, जो उन्हें मोक्ष पद दिला सके। उन्होंने संसार के समस्त धन ऐश्वर्यों को उस अमृत तत्व के समक्ष फीका और नीरस समझा जो व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य होता है। उन्हें ज्ञात था कि यदि जीवन बिना अमृततत्व की खोज के रह गया तो समझो कि जीवन निरर्थक गया। सच भी ये ही है कि जीवन तभी सार्थक होता है जब जीवन का आधार मिल जाता है।

जीवन का आधार परमेश्वर है और परमेश्वर का आनंद केवल मोक्ष में ही इस जीवात्मा को चिरकाल तक मिलना संभव है। इसलिए मैत्रेयी में याज्ञवल्क्य से कह दिया कि जिस आनंद की खोज में आप जा रहे हैं उसी आनंद के खजाने की चाभी हमें दे जाओ, यदि ऐसा करते हो तो ही हमें अच्छा लगेगा। इससे नीचे और इससे कम हमें कुछ नही चाहिए। जिस सांसारिक धन संपदा के बंटवारे की बात आप कह रहे हैं, भगवन! यह तो नश्वर है, नाशवान है, क्षणभंगुर है। इसके बंटवारे की बात कहकर हमें इसमें भटकाने का प्रयास मत करो।

मैत्रेयी की बात बहुत ऊंची थी, बहुत सच्ची थी और बहुत अच्छी भी थी। भारत का सारा आध्यात्मिक जगत और वेदादि सत्य शास्त्रों का सार इसी बात को लेकर चिंतन करता जान पड़ता है कि जैसे भी हो सांसारिक जगत की धन संपदा की केंचुली से मुक्ति मिले, और जो वास्तविक लक्ष्य हमारा है वह अमृततत्व हमें प्राप्त हो।

इस प्रकार अमृत तत्व की प्राप्ति हमारा धर्म है, और उसके लिए की जाने वाली साधना हमारी मर्यादा है। मर्यादा का अभिप्राय है एक सधा सधाया मार्ग, एक ऐसा मार्ग जिस पर आगे बढऩे से आनंद ही आनंद मिलता है। प्रकाश ही प्रकाश मिलता है-अंधकार कहीं लेशमात्र के लिए भी नही होता। जिसे प्राप्त करते ही अथवा जिसका अनुगमन करते ही हमें संसार का रहस्य, संसार का राज और संसार की वास्तविकता समझ में आने लगती है। जिसे अपनाकर हम समझ जाते हैं कि संसार क्या है, और हम संसार में क्यों आए हैं? जिसे अपनाकर इस संसार के रहस्यों को खोजने के हमारे संघर्ष का अंत होता सा जान पड़ता है। इसके लिए किसी कवि ने क्या बढिय़ा कहा है :–

‘‘बहुत कोशिशें कीं बहुत सिर खपाया,

समझ में न आया कि संसार क्या है?

अगर दर्दे दिल है तो दिल को टटोलो,

इस दिल में ही दर्दे दिल की दवा है।।’’

प्रकाश के इस मार्ग पर बढऩे वाले भक्त को ‘दर्दे दिल’ की दवा मिल जाती है।

किसी ऐसे रोगी से पूछना जो दर्द से व्याकुल हो-और उसे उस समय बहुत चाहकर भी दवाई नही मिल रही है कि तेरा धर्म क्या है? तब वह आपको बताएगा कि ‘दर्दे दिल’ की दवा खोजना मेरा धर्म है। उसे उस समय अपने दर्द से राहत चाहिए, और उसकी पीड़ा उसे राहत को पाने के लिए उस समय उसे बेचैन किये रखती है। वह बार-बार चीखता है, चिल्लाता है, कहता है कि मेरे ‘दर्दे दिल’ की दवा मुझे दे दो। जैसे ही उसे ‘दर्दे दिल’ की दवा मिल जाती है, वैसे ही वह आराम अनुभव करने लगता है।

हम सब भी रोगी हैं , ‘दर्दे दिल’ हमको भी है, किसी की तलाश हमें भी है। हमारे भीतर बैठे आत्मा को परमेश्वर की खोज है, वह उससे मिलने के लिए व्याकुल है, पर हम इसे अनुभव करके भी अनुभव नही करते। यही हमारी अज्ञानता है।

अत: उस तलाश को पूर्ण करना अर्थात अपने प्रभु की प्राप्ति करना ही हमारा धर्म है। जैसे ही उसकी झलक हमें मिलेगी, या उस प्यारे के दर्शन हमें होंगे-संसार के सारे कष्ट क्लेश मिट जाएंगे। हमारे धर्म का व्यापक स्वरूप तब हमारे समक्ष होगा। धर्म के उस व्यापक और विराट स्वरूप के दर्शन होते ही हम कृत-कृत्य हो उठेंगे। वहीं से हमें अपने वास्तविक धर्म का बोध होगा-वास्तविक मर्यादा का बोध होगा :–

ओ३म् इन्द्रं वर्धन्तु अप्तुर: कृण्वन्तो-

विश्वमार्यम अपघ्नन्तो अराव्ण:।

हमारे इस धर्म का आधार होगा-

विश्व का विशुद्घ विशद ऐसा वातावरण जो रागद्वेष से मुक्त और परस्पर प्रीति बढ़ाने वाला हो।

संसार में जो दुष्टाचारी, पापाचारी लोग हैं उनका अंत हो, अर्थात वे समाप्त किये जाएं।

समस्त संसार को श्रेष्ठ पुरूषों से युक्त बनाया जाए। तभी संसार को आर्य बनाया जा सकता है, अन्यथा नहीं।

इस प्रकार हमारी मर्यादा और हमारा धर्म विश्वजनीन है। उसमें व्यापकता है, विशालता है और उसका आधार सर्वतोन्गामी है, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबका विकास करने वाला है। जब संसार के प्रत्येक व्यक्ति का धर्म और उसकी भावनाएं ऐसी बन जाएंगी तो विश्व में सर्वत्र शांति व्याप्त हो जाएगी। इस प्रकार शांति का विश्व व्यापी स्वरूप स्थापित करना हमारे वेदधर्म का एकमेव लक्ष्य है, और इसी लक्ष्य को भेदने की उसकी साधना का नाम ही उसकी मर्यादा है। सारा का सारा वैदिक वांग्मय भारत की इसी मर्यादा और भारत के इसी धर्म की साधना करता जान पड़ता है। उसके सांसों की सरगम से ऐसा संगीत निकल रहा है जो हर क्षण और हर पल जीवन को उन्नति में ढालना चाहता है। इसलिए :-

‘‘तू कर प्रभु से प्रीत

यूं ही दिन बीतते जाते हैं।

तू हार के बाजी जीत

यूं ही दिन बीतते जाते हैं।’’

सचमुच प्यारे प्रभु के दर पर एक बार सब कुछ हारना पड़ता है, सर्वस्व समर्पण करना पड़ता है और फिर हम देखते हैं कि हमारे हारते ही बाजी को हम जीत जाते हैं। सचमुच उस अनूठे के अनूठे ही खेल हैं, हमारी हार में वह हमारी जीत घोषित कर देता है-कितना दयालु है वह ? हार के बाजी जीतने के वह क्षण ऐसे होते हैं कि जिनमेें बाजी जीतते ही हम उस समय उसी की गोद में बैठे प्रेमाश्रु बहा रहे होते हैं-हम कोई ताना नही देते उसे – कोई उलाहना नही मारते, कोई व्यंग्य नही करते उस पर, बस करते हैं तो केवल आभाराभिव्यक्ति। …..और यदि हम आभाराभिव्यक्ति को अपने धर्म और मर्यादा का मूल भी कह दें, तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी। मूल पकड़ो , शूल भगाओ।’’

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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