तीस्ता सीतलवाड़ की गुजरात में घिनौनी करतूतें

अरूण कुमार सिंह
अपने तीस्ता जावेद सीतलवाड का नाम जरूर आपने सुना होगा। वही तीस्ता, जिन्होंने एक हल्ला, एक ढोंग और गुजरात के दंगा पीड़ितों की ओट में एक मायाजाल रचा था। लेकिन छद्म सेकूलरवाद का वह गढ़ दरकने लगा है। तीस्ता का झूठ बाहर आने लगा है। न्यायालय से उन्हें डांट भी पड़ी है।
तीस्ता ने अपने आपको देश विदेश में यह बताने की कोशिश की है कि वह बड़ी सामाजिक कार्यकर्ता है और गुजरात के दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए काम कर रही है। किंतु अब उनकी पोल उनके अपने लोग ही खोल रहे हैं। यही नही तीस्ता जिनको न्याय दिलाने का दंभ भरती है वे लोग ही अब उन्हें अपने घर में घुसने तक नही देते हैं। वे लोग तीस्ता से उन 75 लाख रूपये का हिसाब भी मांग रहे हैं जो दंगा पीड़ितों की मदद के नाम पर दुनिया भर से इकट्ठे किये गये हैं।
तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद सिटीजन ऑफ जस्टिस एंड पीस नाम से एक गैर सरकारी संस्था चलाते हैं। ये दोनों कम्युनल काम्बेट नामक एक अंग्रेजी मासिक पत्रिका का संपादन भी करते हैं। गौरतलब है कि 1999 के आम चुनाव के दौरान एक अभियान भाजपा और राष्ट्रवादी शक्तियों को निशाना बनाते हुए इसी बैनर तले चलाया गया था। अपनी संस्था के लिए ये दोनों जमकर विदेशी चंदा जमा करते हैं। कुछ समय पहले यह भी खुलासा हुआ है कि ये दोनेां कांग्रेस, माकपा, भाकपा आदि राजनीतिक दलों से पैसे लेकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और अन्य हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों के खिलाफ लेख और विज्ञापन प्रकाशित करते हैं। 1999 के आम चुनाव से पहले कांग्रेस, माकपा और भाकपा से कम्युनल काम्बेट को एक करोड़ 50 लाख रूपये सिर्फ इसलिए मिले थे कि भाजपा के खिलाफ पूरे देश में मुहिम चलाओ।
यूं कूटा जाता है माल
2002 के दंगों के बाद गुजरात में गैर सरकारी संगठनों की बाढ़ आ गयी थी। अपने को सेकूलर और प्रगतिशल मानने वाले अनेक लोगों ने एनजीओ बनाकर पीड़ितों की मदद करने का ढोंग रचा। इन्हें देश की कथित सेकूलर सरकारों और राजनीतिक दलों से पैसा तो मिला ही, विदेशों से भी पैसा खूब मिल रहा है। तीस्ता की संस्था सिटीजन ऑफ जस्टिस एण्ड पीस को नीदरलैंड की एक संस्था एचआईवीओएस से 23 नवंबर 2009 को लगभग सात लाख रूपये मिले थे। इसके अलावा तीस्ता के वकील मिहिर देसाई को नवंबर 2009 में ही पहली बार 45 हजार और दूसरी बार 75 हजार रूपये मिले थे।
जैसे जैसे सच सामने आ रहे हैं तीस्ता का तिलिस्म टूट रहा है। गत 28 फरवरी को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में तीस्ता को वहां के लोगों ने घुसने तक नही दिया। मालूम हो कि हर साल 28 फरवरी को दंगा पीड़ितों की याद में गुलबर्ग सोसाइटी में एक कार्यक्रम होता है और लोग फातिहा पढ़ते हैं। जब तीस्ता को गुलबर्ग सोसाइटी में नही जाने दिया गया तब उन्होंने दंगा पीड़ितों की एक अन्य बस्ती सिटीजन नगर में मृतकों की याद में फातिहा पढ़ा। इस बार गुलबर्ग सोसाइटी के लोगों ने तीस्ता पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने दंगा पीड़ितों की आड़ में देश विदेश से करोड़ों रूपये जमा किये पर लोगों के बीच एक पैसा नही बांटा गया।
इधर तीस्ता के एक सहयोगी रहे रईस खान पठान ने भी तीस्ता पर कई गंभीर आरोप लगाये हैं। पठान ने अदालत में शपथ पत्र देकर आरोप लगाया है कि तीस्ता ने गुजरात दंगों के सिलसिले में बहुत सारे झूठे मामले दायर किये हैं। नरोदा पाटिया का मामला पूरी तरह मनगढ़ंत है। पठान के इस दावे के बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने 11 जुलाई 2011 को आदेश दिया था कि इस मामले की जांच की जाए। इस आदेश के खिलाफ तीस्ता सर्वोच्च न्यायालय पहुंची और 2 सितंबर 2011 को न्यायमूर्ति आफताब आलम की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने इस जांच पर रोक लगा दी। इस साल अप्रैल के प्रथम सप्ताह में रईस खान पठान ने सर्वोच्च न्यायालय से निवेदन किया है कि जांच होने दी जाए नही तो यह मामला बिगड़ सकता है, गवाहों को भटकाया जा सकता है। ऐसा होने पर सच कभी सामने नही आएगा। पठान ने कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय में एक और शपथ पत्र दाखिल किया है जिसमें कहा गया है कि तीस्ता की संस्था को नीदरलैंड की एक संस्था एचआईवीओएस से अनुदान मिलता है। उसी शपथ पत्र में यह भी कहा गया है कि न्यायमूर्ति आफताब आलम की बेटी शाहरूख आलम को भी उसी संस्था से पैसा मिलता है। पठान ने अदालत से यह भी निवेदन किया है कि गुजरात दंगों से जुड़े मामलों से न्यायमूर्ति आलम को दूर रखा जाए। (हालांकि न्यायमूर्ति आलम अब सेवानिवृत्त हो गये हैं)।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) ने भी अपनी रपट में तीस्ता के झूठों का पर्दाफाश किया है। एसआईटी ने लिखा है कि कौसर बानो नामक गर्भवती महिला के साथ बलात्कार नही हुआ है और न ही पेट फाड़कर उसका बच्चा निकालने की कोई घटना हुई है। नरोदा पाटिया में कुएं में लाशों को दफनाने की बात भी गलत है। जरीना मंसूरी नामक महिला, जिसे नरोदा पाटिया में जिंदा जलाने की बात की गयी थी, कुछ महीने पहले ही टीबी से मर चुकी थी। एसआईटी ने यह भी कहा है कि तीस्ता ने अदालत से भी झूठ बोला है।
अदालत से झूठ बोलने के मामले में न्यायालय ने भी तीस्ता को कई बार फटकार लगाई है। कुछ समय पहले विदेशी संस्थाओं के सामने गुजरात दंगों के मामले में उठाने पर भी न्यायालय ने तीस्ता को डांट लगाई थी। इसके बावजूद तीस्ता गुजरात सरकार को बदनाम करने के लिए झूठ बोलती रहती है। तीस्ता का जन्म एक गुजराती हिंदू परिवार में 1961 में हुआ था। मुंबई में पढ़ने के दौरान वह एक मुस्लिम युवक के प्यार में पड़ गयी। कुछ दिनों तक पति पत्नी ने पत्रकारिता की। 1992 में बाबरी ढांचे के ढहने के बाद तथाकथित साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए इन दोनों ने अगस्त 1993 में कम्युनल काम्बेट की शुरूआत की। कम्युनल काम्बेट के प्राय: हर अंक में हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों को गाली दी जाती है। शायद इसलिए सोनिया के निर्देश पर चलने वाली केन्द्र सरकार ने तीस्ता को पदमश्री से नवाजा है। तीस्ता राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की भी सदस्या है। सोनिया गांधी की अध्यक्षता में इसी परिषद ने साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक तैयार किया है। इस विधेयक में अनेक ऐसी बातें हैं, जो देश को साम्प्रदायिकता के आधार पर बांटती है।
प्रेषक : डॉ कैलाश चंद्र, नई दिल्ली

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