भारत में भाषाओं का अवैज्ञानिक वर्गीकरण

भारत में पानी और बानी (वाणी) में बड़ी शीघ्रता से परिवर्तन आता है। ‘एक कोस पर पानी और चार कोस पर बानी’ परिवर्तित हो जाने की कहावत पुरानी है। यह आश्चर्य जनक तथ्य है कि जिस भारत ने विश्व को एक भाषा और एक भूषा प्रदान किये वही भारत आज बहुभाषी हो गया है-और भी लज्जास्पद बात ये है कि यहां लोग भाषाओं के नाम पर लड़ते झगड़ते हैं।
बहुभाषी होने के कारण
भारत में बहुभाषाएं क्यों पायी जाती हैं? इस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि भारत में बहुभाषाओं के मिलने का कोई एक कारण नही है अपितु अनेक कारण हैं। इनमें से प्रमुख कारण निम्न प्रकार हैं:-
1. विदेशियों के आक्रमण और बहुत से विदेशियों का यहां बस जाना : भारत में जब तक चक्रवर्ती सम्राटों का काल रहा तब तक तो भारत की भाषा और भूषा विश्व की भाषा और भूषा थे, परंतु जब यह सम्राट परंपरा लुप्त हुई तो विश्व में कितने ही अन्य साम्राज्य स्थापित हुए।indian languages यह मानवीय स्वभाव है कि जब कोई व्यक्ति अपने मूल परिवार, वर्ग, देश आदि से अलग अपना विधान, निशान और प्रधान बनाता है तो वह अपने मूल परिवार, वर्ग, देश आदि से सर्वथा अलग चलने का प्रयास करता है। जिससे कि उसका अस्तित्व स्वीकार किया जाए। बस, इसी कारण से विश्व में जितने साम्राज्य स्थापित हुए उन्होंने अपनी अपनी भाषाएं बनायीं और विश्व में उन्हें लागू किया। कालांतर में कुछ भारत पर कुछ लोगों ने आक्रमण किये तो वो अपने ही मूल देश भारत में भी आकर अपने देश की भाषा और भूषा लाए। शक, हूण, कुषाण, सातवाहन, तुर्क, मुगल, अंग्रेज, फ्रांसीसी, डच, पुर्तगाली आदि जातियां भारत में आयीं और उन्होंने भारत पर अपने अपने समय में अपनी अपनी भाषा और भूषा को लादने का प्रयास किया। इससे भारत की मूल भाषा में विकार उत्पन्न हुआ और उस विकार से नई-नई भाषाएं (बोलियां) जन्मीं।
2. अपनी भाषा के प्रति मताग्रही होना:-
जितने लोग आक्रान्ता के रूप में भारत आए उन सबने अपनी-2 भाषाओं के प्रति मताग्रही होने का भाव दर्शाया। यद्यपि अधिकांश लोग भारत के समाज में घुल मिल गये, परंतु यदि सूक्ष्मता से उन लोगों की भाषा और भूषा की पड़ताल की जाए तो कहीं न कहीं (शताब्दियां व्यतीत हो जाने के उपरांत भी) वो लोग आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। पारसी लोग यद्यपि विदेशी हैं, और उनकी राष्ट्र भक्ति भी असंदिग्ध है, परंतु उनकी अपनी पहचान है, जिसे वह भाषा और भूषा के नाम पर बनाए हुए हैं। यही स्थिति अन्य विदेशी लोगों की है।
3. सम्प्रदायों का विकास :
भारत में जैन, बौद्घ, सिक्ख अपने मूल समाज में से निकले हुए सम्प्रदाय हैं, परंतु इन्होंने अपनी पहचान को स्थापित रखने के लिए अपनी अलग भाषा और भूषा को अपनाया।
4. प्रांतों का भाषायी आधार : स्वतंत्रता के उपरांत भारत में प्रांतों की स्थापना भाषा के आधार पर की गयी। इस प्रकार के सरकारी निर्णय की यद्यपि बहुत आलोचना की गयी परंतु यह निर्णय लागू हुआ और इसी निर्णय के कारण प्रांतों ने अपनी-2 भाषा और अपनी अपनी भूषा के प्रति मोह प्रदर्शित किया। ये मोह कभी कभी तो अति को लांघ जाता है, और लोग अपनी भाषा से अलग किसी अन्य भाषाई प्रांत के व्यक्ति को अपने मध्य सहन नही कर पाते हैं। हिंदी भाषी राज्यों में भी बहुत सी भाषाएं मिलती हैं, जो कि वास्तव में तो बोलियां हैं परंतु लोग अपनी अपनी बोली के प्रति इतने पूर्वाग्रही होते हैं कि वो उन्हें अलग भाषा का दर्जा देने की मांग तक कर बैठते हैं।
5. स्वतंत्र भाषा होने की भ्रांति :-
जैसे भारत में छोटी-2 रियासतें स्वयं को एक देश मानने की भूल करती थीं, वैसे ही बोलियां रियासत होकर भी देश (भाषा) होने का भ्रम पाल लेती हैं। जिन्हें वह अपनी क्षेत्रीय या जातीय पहचान के नाम पर बनाए रखना चाहती हैं।
6. नेताओं के छल पूर्ण भाषण :-नेता अपने क्षेत्र के लोगों के मध्य उन्हीं की बोली में भाषण देने का प्रयास करते अक्सर देखे जाते हैं, इस प्रकार की प्रवृत्ति से भी बोलियों को भाषा के रूप में स्थापित करने की लोगों की प्रवृत्ति बलवती होती है। लोग अपनी अपनी बोलियों को स्वतंत्र भाषा के रूप में संविधान की संबंधित अनुसूची में सम्मिलित कराने का प्रयास करते हैं। यह प्रयास कई बार संघर्ष का रूप भी ले लेता है, जिसे नेता लोग बनी बनाई भीड़ मिल जाने के कारण जाकर संबोधित करते हैं और इस प्रकार भाषाई संघर्षों का विकास हो जाता है।
7. भाषाओं का दोषपूर्ण विभाजन
भारत में बोलियों को भाषा मानकर उसका दोषपूर्ण विभाजन किया गया है। इसे निम्न प्रकार समझा जा सकता है:-
-सिन्धी : यह भाषा सिन्धु नदी के दोनों ओर बोली जाती है। अब यद्यपि सिन्धु नदी भारत में नही बहती परंतु सिन्धी बोलने वाले लोग भारत में बड़ी संख्या में हैं। इस भाषा की सिरैकी, लारी, बिचौली, थलेरी तथा कची पांच बोलियां हैं। बिचौली तो साहित्य रचना भी होती है, कच्छद्वीप की भाषा को कच्द्दी कहा जाता है। सिन्धी को अधिकतर मुस्लिम लोग बोलते हैं।
-पंजाबी: यह भाषा गुरूमुखी में लिखी जाती है। यह पंजाब प्रांत की भाषा है। डोगरी, टाकरी इस की मुख्य बोलियां हैं।
-गुजराती :– इस भाषा को नरसिंह मेहता (1413 ईं.) नामक कवि ने मान्यता दिलाई। इसकी लिपि का विकास पुरानी नागरी से माना गया है।
-राजस्थानी: मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी आदि इस भाषा की प्रमुख बोलियां हैं।
-पश्चिमी हिंदी :– खड़ी बोली, ब्रजी, कन्नौजी, बांगरू, बुंदेली इस भाषा की बोलियां हैं। खड़ी बोली इनमें प्रमुख हैं, जो कि दिल्ली के आसपास बोली जाने के कारण ‘ भाषा है। इसमें अरबी, फारसी के शब्दों का मिश्रण भी मिलता है, जिससे कई बार उर्दू का सा पुट इस भाषा में दीखता है।
-पूर्वी हिंदी :- अवधी, बघेलो, छत्तीसगढ़ी, इस भाषा की प्रमुख बोलियां हैं। इसकी लिपि नागरी है।
पहाड़ी भाषाएं :-दक्षिण हिमालय के समीप नेपाल और शिमला में इसका विस्तार है। पश्चिमी पहाड़ी, मध्य पहाड़ी और पूर्वी पहाड़ी इसके तीन रूप हैं।
इसके अतिरिक्त उड़ीसा में उड़िया, आन्ध्र प्रदेश में तेलुगू केरल में मलयालम, तमिलनाडु में तमिल, कर्नाटक में कन्नड़, भाषाएं अपनी अपनी बोलियों के साथ बोली जाती हैं तो बंगाल में बंगाली, असम में असमी, महा’ में मराठी, भाषा का प्रचलन है।
इस प्रकार छोटे-छोटे अंचलों के लिए भी अलग अलग बोलियों को भारत में भाषा का नाम दे दिया गया है। जबकि हमें इन सारी बोलियों की मूल भाषा का पता लगाकर उसे विकसित करना चाहिए था। इस दृष्टिïकोण से हिंदी की बड़ी शोचनीय स्थिति है।
इस भाषा को भी कई बोलियों ने देश के विभिन्न आंचलों में चुनौती दे रखी है, जिससे ‘भाषा को अपना विकास करने में कई प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। लोगबाग पुस्तकें, समाचार पत्र-पत्रिकाएं इत्यादि हिंदी में पढ़ते हैं, परंतु उस पर परस्पर संवाद अपनी स्थानीय बोली में ही करते हैं, टीका टिप्पणी के लिए सामान्यत: लोग अपनी भाषा का प्रयोग करते हैं। कई बार तो समाचार पत्रों के लिए संवाददाता जब संवाद भेजते हैं तो उसमें भी स्थानीय बोली हावी हो जाती है। हिंदी भाषी प्रांतों में भी आप समाचार पत्रों में स्थानीय भाषा का पुट देख सकते हैं। इस प्रकार के पुट से ‘भाषा के विकास और विस्तार में बाधा आ रही है। लोगों को अपनी स्थानीय भाषा या बोली के प्रति जो मोह है उसे वह राष्ट्र भाषा के लिए बलिदान करने को तैयार नही है। सरकारी स्तर पर भी इस ओर अपेक्षित ध्यान नही दिया जा रहा है जो कि दुख का विषय है।
हिंदी और उसकी उपभाषाएं
हिंदी भाषा के विषय में विद्वानों ने पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी नाम के दो क्षेत्र निश्चित किये हैं। पश्चिमी हिंदी की उपभाषाओं में निम्नलिखित प्रमुख हैं :-
-खड़ी बोली : इस उपभाषा को ‘सरहिंदी’ भी कहा जाता है। यह रामपुर, मुरादाबाद, मेरठ, बिजनौर, मुजफ्फर नगर, सहारनपुर, देहरादून, अंबाला, और पटियाला के पूर्वी भागों में बोली जाती है। दिल्ली के निकट बोले जाने के कारण इसे ही राष्ट्रभाषा कहा गया है। वैसे भी वास्तविक हिंदी के अधिकतर शब्द यथावत इसी उपभाषा में बोले जाते हैं। यद्यपि कुछ क्षेत्रों में अरबी, फारसी के शब्द भी प्रयोग होते हैं।
-हरियाणवी :-इसे जाटू या बांगरू भी कहा जाता है। हिंदी खड़ी बोली की पश्चिमी सीमा पर यह बोली जाती है, इसलिए इसे सरहदी भाषा भी कहा जाता है। यह दिल्ली, करनाल, रोहतक, हिसार, पटियाला, नाभा और जींद के क्षेत्रों में बोली जाती है।
-ब्रजभाषा : यह उपभाषा मथुरा, आगरा, अलीगढ़, तथा धौलपुर में बोली जाती है। गुड़गांव, भरतपुर, करौल तथा ग्वालियर के पश्चिमी तथा उत्तरी क्षेत्रों में इसमें बुन्देली तथा राजस्थानी की झलक देखने को मिलती है, एटा, मैनपुरी तथा बरेली में इसमें कन्नौजीपन आ जाता है।
-कन्नौजी :- यह अवध से पहले की और ब्रजभाषी क्षेत्र से आगे की भाषा है। हरदोई, शाहजहांपुर, पीलीभीत, इटावा और कानपुर के पश्चिमी भाग में इसी का प्रसार है।
-बुंदेली :-इसके बोलने वाले झांसी, जालौन, हमीरपुर, ग्वालियर, भोपाल, ओरछा, सागर नृसिंहपुर, हौसंगाबाद, छिन्दवाड़ा आदि में मिलते हैं। दतिया, पन्ना, चरखरी तथा दमोह की रियासतों में भी यह बोली जाती है।
-अवधी :-इसके बोलने वाले लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, फैजाबाद, गोण्डा, बहराइच, सीतापुर, खीरी, बाराबंकी जिलों में पाए जाते हैं। यह इलाहाबाद फतेहपुर तक बोली जाती है। जबकि इसका प्रभाव वाराणसी पर भी है।
-बघेली :-यह भाषा दमोह, जबलपुर, माण्डला, बालाघाट, जिलों के साथ त्यौहार, नगमा, सितलहा में भी बोली जाती है। कभी का रीवां राज्य इसकी उत्पत्ति का मूल केन्द्र है। यह भाषा अवधी से कुछ मिलती जुलती सी है।
-छत्तीसगढ़ी :-इस भाषा को रामपुर, बिलासपुर, कांकेर, नंदगांव, खैरगढ़, रायगढ़, कोरिया, सरगुजा, उदयपुर तथा जयपुर में बोला जाता है।
-भोजपुरी :-यह भाषा बिहार प्रांत के शाहाबाद जिले के भोजपुर कस्बे से पैदा हुई है, इसीलिए इसका नाम भोजपुरी पड़ गया है। वैसे यह वाराणसी से मिर्जापुर के कुछ भागों तक, जौनपुर शहर एवं उसके पूर्व में गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, आजमगढ़, शाहाबाद, चंपारन, सारन, तथा छोटा नागपुर में भी बोली जाती है।
-मैथिली :- यह बिहार प्रांत में चंपारन और सारन जिले को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में प्रमुखता से बोली जाती है। दरभंगा इसका मुख्य केन्द्र है।
-गगही :-गया और पटना में यह भाषा प्रमुखता से बोली जाती है। गगही मागधी का ही अपभ्रंश है।
-मारवाड़ी :-इसे पश्चिमी राजस्थानी भी कहा जाता है। यह जोधपुर बीकानेर, जैसलमेर, तथा उदयपुर में बोली जाती है।
-जयपुरी :-पूर्वी राजस्थान की जयपुरी तथा हड़ौती दो प्रधान उपभाषाएं हैं, ये जयपुर तथा कोटा बूंदी में प्रचलित है।
-मेवाती :– यह उपभाषा राजस्थान में अलवर तथा पूर्वी पंजाब के दक्षिणी भाग में बोली जाती है।
-मालवी :-इसका क्षेत्र इन्दौर (म.प्र.) जिला है।
-पश्चिमी पहाड़ी :-यह शिमला के निकटवर्ती क्षेत्रों में बोली जाती है।
-मध्य पहाड़ी :-कुमायूंनी और गढ़वाली इसी की दो उपभाषाएं हैं, जोकि अल्मोड़ा, नैनीताल, गढ़वाल तथा मंसूरी में बोली जाती है।
-पूर्वी पहाड़ी :-ये नेपाली, पर्वतिया, गुरखाली में काठमांडू की घाटी से उत्पन्न हुई है, इस पर नेपाल नरेश का संरक्षण रहा है। इसकी लिपि देवनागरी है।
ये सारा वर्गीकरण आज के भाषा वैज्ञानिकों की देन है। भाषा बीज को न पहचानकर लोगों ने अपने अपने दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों के चलते भाषा का वर्गीकरण किया है। बोलियां भाषा का विकार होती हैं और हम ‘विकार को ही अपना सौभाग्य मान रहे हैं। अब हमें कौन समझाए कि विकार को सौभाग्य मानना सौभाग्य नही दुर्भाग्य है, और यह दुर्भाग्य जब तक हमारा पीछा करता रहेगा तब तक राष्ट्रभाषा हिंदी अपने गौरवपूर्ण पद पर आसीन नही हो पाएगी। उचित यही होगा कि हम भाषाओं के अवैज्ञानिक वर्गीकरण को समाप्त कर भाषा की एक रूपता और समरूपता पर ध्यान केन्द्रित करें।

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