वैदिक धर्म की महत्वपूर्ण देन सृष्टि प्रवाह से अनादि का सिद्धांत

ओ३म्

===========
हम इस पृथिवी पर रहते हैं। यह पृथिवी हमारे सौर मण्डल का एक ग्रह है। ऐसे अनन्त सौर्य मण्डल इस ब्रह्माण्ड में हैं। इस सृष्टि व ब्रह्माण्ड को किसने बनाया है? इसका समुचित उत्तर विश्व के वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है। वेद और वैदिक धर्म के अनुयायी ऋषि-मुनि व वैदिक साहित्य के अध्येता इसका उत्तर देते है। वह बताते हैं कि हमारी यह सृष्टि सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, अनादि, अनन्त, नित्य, अमर व अविनाशी परमात्मा ने बनाई व उत्पन्न की है। इस उत्तर की पुष्ेिट वेदाध्ययन से होती है। वेदाध्ययन सहित योगाभ्यास के अन्तर्गत समाधि अवस्था में इच्छित विषय का ध्यान करने से वह विषय योग साधक को साक्षात् उपस्थित हो जाता है। इसके द्वारा भी सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य व ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यदि विश्व के वैज्ञानिक वैदिक साहित्य का अध्ययन सहित योगाभ्यास करें तो वह सृष्टि उत्पत्ति के यथार्थ रहस्य को जान सकते हैं। ऐसा करने पर वैज्ञानिकों की पूर्ण सन्तुष्टि हो सकती है। हमारे वैज्ञानिक वेद व वैदिक ज्ञान से अत्यन्त दूर हैं। उन्होंने बिना पढ़े व परीक्षा किये ही वेदों को त्याज्य ग्रन्थों की श्रेणी में डाल दिया है।

एक ओर वेदों के तत्वज्ञानी ऋषि दयानन्द वेदों को सब सत्य विद्याओं की पुस्तक बताते हैं दूसरी ओर हमारे वैज्ञानिक वेदों का अध्ययन करना आवश्यक नहीं समझते। यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है कि किसी ग्रन्थ को पढ़ने में कोई बुराई नहीं होती। आश्चर्य है कि विश्व के वैज्ञानिकों ने वेदों का बिना परीक्षा किये तिरस्कार क्यों किया? यह अवश्य है कि बाइबिल पुस्तक से उन्हें ज्ञान व विज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। इसके विपरीत उसमें उन्हें विज्ञान विरुद्ध कुछ मान्यतायें मिली। इसका यह अर्थ नहीं है कि वेद, दर्शन, उपनिषद, आयुर्वेद एवं ज्योतिष आदि ग्रन्थों में भी ज्ञान व विज्ञान की बातें न हों। रामायण काल में पुष्पक विमान का उल्लेख आता है। जिन-जिन ग्रन्थों में विमानों का उल्लेख है वह सब ग्रन्थ ईसाई मत व विज्ञान के उद्भव एवं विकास से पूर्व के हैं। हमारे देश में सृष्टि के आरम्भ से ही विमान होते थे। उन्हीं की सहायता से हमारे देश के लोग संसार के अनेक भागों में गये और वहां-वहां बस्तियां व उपनिवेश बसाये। प्राचीन काल में महर्षि भारद्वाज ने ‘वैदिक विमान शास्त्र’ की रचना की थी। यह ग्रन्थ वर्तमान समय में सुलभ है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हमारे देश के एक आर्य विद्वान श्री शिवकर बापूजी तलपडे (1864-1916) ने मुम्बई में विमान बनाया था और उसे चपाटी में अनेक लोगों की उपस्थिति में उड़ाया भी था। आधुनिक युग में इन्हें सबसे पहले वायुयान बनाने व उसे सफलतापूर्वक उड़ाने का गौरव प्राप्त है। यदि इनको आर्थिक सहायता प्राप्त होती तो यह उन्नत किस्म का वायुयान भी बना सकते थे। यह विमान तब बनाया गया था जब यूरोप के लोग विमान का नाम भी नहीं जानते थे और न ही विमान शब्द उनके शब्द कोषों में था। यह सब लिखने का तात्पर्य यही है कि प्राचीन भारत वा आर्यावर्त ज्ञान व विज्ञान से सम्पन्न था।

हमारी यह सृष्टि अनादि काल से बनी हुई नहीं है। यह ईश्वर द्वारा इस कल्प के आरम्भ में बनाई गई है। लगभग 1.96 अरब वर्ष इस सृष्टि को बने हुए हो चुके हैं। समय के साथ इसमें भी ह्रास होता है। ईश्वर ने इस समस्त ब्रह्माण्ड व इसके पिण्डों, ग्रह, उपग्रहों आदि को धारण किया हुआ है। ईश्वर का एक दिन व एक रात्रि होती है। ईश्वर का दिन 4.32 अरब वर्षों का होता है और इतनी ही रात्रि की अवधि होती है। रात्रि की अवधि को प्रलयावस्था कहा जाता है। ईश्वर के एक दिन की अवधि 4.32 अरब वर्ष में वह प्रकृति से सृष्टि को बनाकर इसका संचालन करता है। अवधि पूर्ण होने पर उसके द्वारा इसकी प्रलय होती है। प्रलय की अवधि में सृष्टि अपने कारण मूल प्रकृति में विलीन रहती है। रात्रि व प्रलय की अवधि पूर्ण होने पर परमात्मा अनादि उपादान कारण सत्व, रज व तम गुणों वाली त्रिगुणात्मक प्रकृति से इस ब्रह्माण्ड की रचना करते हैं। रात्रि व दिन की तरह से यह सृष्टि बनती व बिगड़ती रहती है। इस सृष्टि का आरम्भ अनादि काल से चला आ रहा है। सृष्टि रचना और प्रलय का यह चक्र अनन्त काल तक चलेगा। इस बात को वैदिक सिद्धान्त के अनुसार सृष्टि को प्रवाह से अनादि, अर्थात् जिसका आरम्भ नहीं हुआ और न कभी अन्त होगा, माना जाता है। इसे समझने के लिये हमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति इन तीन सत्ताओं को जानना होता है। यह तीन सत्तायें इस जगत में अनादि काल से हैं और अनन्त काल तक रहेंगी। यह चक्र कभी रुकने वाला नहीं है। सृष्टि के बाद प्रलय और प्रलय के बाद सृष्टि का होना अवश्यम्भावी है। यह सृष्टिक्रम, उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय का क्रम, अनादि काल से आरम्भ हुआ है। इसी कारण सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के सिद्धान्त को सृष्टि प्रवाह से अनादि है, कहा जाता है। विचार करने पर यह सिद्धान्त पूर्णतया तर्क एवं युक्तिसंगत प्रतीत होता है। ईश्वर कभी निठल्ला नहीं बैठता।

ईश्वर जीवात्मा एवं सृष्टि का उपादान कारण अनादि काल से विद्यमान है, अतः ईश्वर अनादि काल से ही इस सृष्टि की रचना, पालन तथा प्रलय करता आ रहा है। यह रहस्य सत्य एवं यथार्थ है। यह वेदों की और हमारे ऋषियों की महानता है जिन्होंने वेदों से इस सिद्धान्त को प्राप्त किया और जनसामान्य में प्रचार किया। इस सिद्धान्त के अतिरिक्त अन्य कोई तार्किक सिद्धान्त सृष्टि रचना विषयक संसार में नहीं है। हमारी यह सृष्टि प्रथम बार कब हुई, अब तक कितनी बार हो चुकी है और कब तक होगी व होती रहेगी, इसका यही उत्तर है कि अनादि काल से इस सृष्टि की उत्पत्ति व प्रलय अनन्त बार हो चुकी है और भविष्य में भी यह क्रम चलता रहेगा। यह क्रम कभी रुकने वाला नहीं है। यह ज्ञान मनुष्य को ईश्वर के चरणों में झुका देने व समर्पण करने में समर्थ है। इससे जानने पर सच्चा वैराग्य उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। यही कारण था कि सभी ऋषि व योगी वैराग्य को प्राप्त हुए थे। वेदों से ही हमें ईश्वर, जीवात्मा एवं प्रकृति के विषय में नाना प्रकार के सभी सिद्धान्तों, मान्यताओं व तथ्यों का ज्ञान होता है। इन रहस्यों का उल्लेख वा प्रकाश हमारे दर्शन ग्रन्थों में भी हुआ है। महर्षि दयानन्द ने वेद एवं सांख्य दर्शन के आधार पर अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में सृष्टि की उत्पत्ति पर प्रकाश डाला है। इस उत्पत्ति प्रक्रिया को हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि जो ब्रह्म (ईश्वर) और जीव (चेतन आत्मा) दोनों चेतनता और पालनादि गुणों से सदृश व्याप्य-व्यापक भाव से संयुक्त परस्पर मित्रतायुक्त सनातन अनादि हैं और वैसा ही अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात् जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न-भिन्न हो जाता है वह तीसरा अनादि पदार्थ (प्रकृति) है। इन तीनों (ईश्वर, जीव और प्रकृति) के गुण, कर्म और स्वभाव भी अनादि हैं। इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है वह इस वृक्षरूप संसार मे ंपापपुण्यरूप फलों को अच्छे प्रकार भोक्ता है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को न भोक्ता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है। जीव से ईश्वर, ईश्वर से जीव और दोनो ंसे प्रकृति भिन्न स्वरूप, तीनों अनादि हैं। अनादि व सनातन जीवरूप प्रजा के लिये परमात्मा ने वेद द्वारा सब विद्याओं का बोध किया है। उपनिषद में भी एक श्लोक आता है जिसमें कहा गया है कि प्रकृति, जीव और परमात्मा तीनों अज अर्थात् जिन का जन्म (व उत्पत्ति) कभी नहीं होती और न कभी यह जन्म लेते अर्थात् ये तीन सब जगत् के कारण हैं। इन का कारण (उत्पत्तिकर्ता) कोई नहीं। इस अनादि प्रकृति (धन, दौलत व ऐश्वर्य आदि) का भोग जीव करता हुआ फंसता (बन्धन में पड़ता) है और उस में परमात्मा न फंसता और न उस का भोग करता है।

ऋषि दयानन्द आगे लिखते हैं कि (सत्व) शुद्ध (रजः) मध्य (तमः) जाड्य अर्थात् जड़ता यह तीन वस्तु मिलकर जो एक संघात है उस का नाम प्रकृति है। उस से महत्तत्व बुद्धि, उस से अहंकार, उस से पांच तन्मात्रा सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पांच भूत, पुरुष वा जीव ये चैबीस और पच्चीसवां परमेश्वर है। इन में से प्रकृति अविकारिणी और महतत्व, अहंकार तथा पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य और इन्द्रियां मन तथा स्थूलभूतों का कारण हैं। पुरुष न किसी की प्रकृति, न किसी का उपादान कारण और न किसी का कार्य है। उपनिषद में यह भी बताया गया है कि यह जगत सृष्टि की उत्पत्ति के पूर्व सत्-असत्, आत्मा और ब्रह्मरूप था। पश्चात् वही परमात्मा अपनी इच्छा से बहुरूप (कार्य जगत तथा प्राणी जगत के अनेक व्यवहारों वाला) हो गया। ऋषि दयानन्द ने सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के विषय में सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में विस्तार से लिखा है। वहां उन्होंने सभी प्रकार की शंकाओं को उपस्थित कर उनका समाधान भी किया है। अतः सृष्टि उत्पत्ति विषयक वैदिक दृष्टिकोण व सिद्धान्त को जानने के लिये सभी जिज्ञासुओं को इस समुल्लास को अवश्य पढ़ना चाहिये।

वेदों व वैदिक साहित्य में सृष्टि की रचना विषयक युक्ति एवं तर्क के आधार पर यथार्थ स्थिति को प्रस्तुत किया गया है। संसार के मत-मतान्तरों के ग्रन्थ अल्पज्ञ मनुष्यों के बनाये हुए हैं। उनमें ज्ञान की वैसी पूर्णता नहीं है जैसी वेद एवं ऋषि साहित्य में है। ईश्वर, जीवात्मा एवं प्रकृति का जो सत्य एवं वैज्ञानिक स्वरूप वैदिक ग्रन्थों में है वह भी संसार के किसी मत-पंथ-सम्प्रदाय के ग्रन्थ में नहीं है। अतः वेदों का ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान है जो इन ग्रन्थों में उपलब्ध ज्ञान की परीक्षा से सिद्ध होता है। हमें वेदों का अध्ययन करने के साथ इसका प्रचार भी करना चाहिये। इसी से संसार में सत्य व असत्य का बोध हो सकता है और मनुष्य अपने जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को जानकर उसकी प्राप्ति में प्रवृत्त हो सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
noktabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
nitrobahis giriş