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आज का चिंतन

1984 के सिख विरोधी दंगे : न्याय के पात्र कहीं और भी हैं

1 नवंबर 1984 के वे भयानक दंगे जिन्होंने अनेकों निर्दोष सिक्खों की जान ले ली थी , अभी तक चित्त से उतरे नहीं हैं । जिन लोगों ने सिख विरोधी दंगों के घाव झेले हैं , यह केवल उनका हृदय ही जानता है कि उन्होंने इन जख्मों को कैसे झेलने का प्रयास किया है ? आज भी अनेकों ऐसे परिवार हैं जिन्हें अभी तक भी न्याय नहीं मिल पाया है ।

1984 के ये दंगे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के उपरांत भड़के थे । राजनीति में लगे लोगों ने आज तक इन पर अपने भाषणों में , वक्तव्यों में , लेखों में घड़ियाली आंसू तो बहाए हैं , परंतु जख्मों पर मरहम लगाने का कार्य उतने अनुपात में नहीं किया है , जितनी अनुपात में होना चाहिए था । इसका कारण यह है कि 1984 के सिख विरोधी दंगों के पश्चात केंद्र में अधिक समय तक कांग्रेस की ही सरकारें रहीं हैं । जिन्होंने अपने दोषी नेताओं को बचाने का प्रयास किया ।

मैं व्यक्तिगत रूप से राजीव गांधी का सम्मान करता हूं। वह भद्र पुरुष थे , परंतु उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के पश्चात सिख विरोधी दंगों को लेकर एक बयान दिया था कि जब कोई बड़ा वृक्ष गिरता है तो धरती हिलती है । उनके इस बचकाने और गैरजिम्मेदारी पूर्ण बयान ने सिख विरोधी दंगों में लगी भीड़ के कितने ही लोगों को प्रोत्साहित किया था कि यदि वह कुछ भी कर रहे हैं तो वह गलत नहीं है । साथ ही उन्हें यह भी लगा था कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो , उस पर देश की व्यवस्था पूर्ण रूप से तुम्हारे साथ है । राजीव गांधी की नजरों में चढ़ने के लिए ऐसे अनेकों बड़े कांग्रेसी नेता भी रहे , जिन्होंने सिख विरोधी दंगों में भाग ले रहे लोगों का नेतृत्व किया और सड़क पर उतर कर सिखों की हत्या करवाईं । कांग्रेस के बड़े नेताओं या लोगों ने ऐसा इसलिए किया था कि उन्हें ऐसा करने से केंद्र में मंत्री पद मिल सकता था या संगठन में कोई बड़ा सम्मान पूर्ण पद प्राप्त हो सकता था । कहने का अभिप्राय है कि मंत्री बनने या संगठन में स्थान पाने के लिए अनेकों निर्दोष लोगों की जान की कीमत इन कांग्रेसियों के लिए शून्य हो गई थी ।

मेरा मानना है कि राजीव गांधी से ‘ भारत रत्न ‘ वापस लिया जाए , क्योंकि उन्होंने अपने एक बयान से ही सुनियोजित ‘ मॉब लिंचिंग ‘ को प्रोत्साहित किया था। ऐसा गैर जिम्मेदारी भरा बयान आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं दिया , जिससे अनेकों निर्दोष लोगों को असमय ही काल का ग्रास बनने के लिए विवश होना पड़ा।

जिन लोगों ने नवंबर 1984 के दंगों में बढ़-चढ़कर भाग लिया था उनमें से कई ऐसे थे जो केवल उन हत्याओं को ‘लूट ‘ के दृष्टिकोण से कर रहे थे तो कई ऐसे भी थे जो सामाजिक ‘ फूट ‘ को पैदा करने के दृष्टिकोण से ऐसे कार्यों को अंजाम दे रहे थे , जबकि कुछ ऐसे भी थे जो सरकारी ‘छूट ‘ से प्रेरित होकर इन कार्यों को अंजाम दे रहे थे । न्याय करते समय हमें लूट , फूट और छूट से प्रेरित होकर कार्य करने वाले अपराधी लोगों के साथ इन तीनों शब्दों की अलग-अलग गंभीरता के साथ उपयुक्त व्यवहार करना चाहिए । ‘छूट ‘ देने वाले लोगों को भी कटघरे में खड़ा करना चाहिए और उनके साथ पूरी व्यवस्था को ईमानदारी से निपटना चाहिए । वैसे भी कांग्रेस की ‘छूट ‘ देने की प्रवृत्ति पुरानी है , अहिंसा के पुजारी गांधी जी के वध के समय भी कांग्रेस ने गोडसे की बिरादरी के लोगों के विरुद्ध ‘ छूट ‘ देने का अपराध किया था और इसी ‘ छूट ‘ को उसने 1984 में दोहराया था । ‘ अहिंसा परमो धर्म: ‘ में विश्वास रखने वाली कांग्रेस ने इतने व्यापक स्तर पर हत्याएं करवाईं और उसके उपरांत भी वह आज तक दूध की धुली हुई बैठी है । इतिहास के साथ इतना बड़ा छल और इतना बड़ा अन्याय संभवत: विश्व के किसी अन्य देश में कभी नहीं हुआ होगा। इसके उपरांत भी कथित सभ्य समाज , तथाकथित बुद्धिजीवी और देश की न्याय व्यवस्था मौन धारण किए हुए हैं । दृश्य कुछ वैसा ही बन रहा है जैसा द्रोपदी के चीर हरण के समय हस्तिनापुर की राज्यसभा में बना था । जब भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य आदि विद्वान नीची गर्दन किए उस दृश्य को सहन कर गए थे । परिणाम क्या होगा क्या ? क्या हम फिर किसी ‘ महाभारत ‘ की ओर बढ़ रहे हैं ?

इन सिख विरोधी दंगों में पीड़ित हुए परिवारों के साथ पूर्ण सहानुभूति रखते हुए एक बात और भी कहना चाहूंगा कि पंजाब के खालिस्तानी आंदोलन के समय अनेकों हिंदुओं की वहां पर चुन-चुन कर हत्याएं की गई थीं ।यहां तक कि गाड़ियों से उतार कर एक सीध में खड़े करके एक ही गोली से मारने का जघन्य अपराध भी उस समय के समाचार पत्रों में सुर्खियां बना था । जब हम लोग सिख विरोधी दंगों में मरे लोगों के पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने या उन्हें न्याय दिलाने की बात करते हैं तो हमें यह भी मांग करनी चाहिए कि उक्त खालिस्तानी आंदोलन के समय जिन हिंदू परिवारों को पंजाब से भगाने या मारने व काटने के या उनके साथ किसी भी प्रकार के अत्याचार करने के जघन्य अपराध किए गए , उनकी भी निष्पक्ष जांच कराकर उन पीड़ित परिवारों को भी मुआवजा और न्याय दिलाया जाए । हम भावुकता में या वोट प्राप्त करने के दृष्टिकोण से या किसी एक वर्ग की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए बात करने की अपनी चिर परिचित प्रवृत्ति से बचें । हम ये देखें कि पंजाब में उस समय जो कुछ भी हुआ , वह मानवता विरोधी था और उस मानवता विरोधी आचरण या कार्य से जिन – जिन लोगों को भी पीड़ा पहुंची , उनके साथ इस सभ्य समाज को न्याय करना चाहिए ।

इतिहास को हम अपनी आंखों के सामने मरता हुआ देख रहे हैं । जब अनेकों उत्पीड़ित हिंदू परिवारों के साथ हम पंजाब में न्याय करने की मांग तक नहीं उठा रहे हैं । जिन्हें हम देश की एकता और अखंडता के लिए उस समय के समाचार पत्रों में बलिदानी के रूप में महिमामंडित होते हुए देख रहे थे वह आज नेपथ्य में धकेल दिए गए हैं । देश की पूरी व्यवस्था को समझ लेना चाहिए कि सिख विरोधी दंगों में पीड़ित परिवारों के साथ-साथ न्याय के पात्र कुछ और भी हैं , जो नेपथ्य से अपने लिए न्याय की गुहार लगा रहे हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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