भारतीय संस्कृति की उत्कृष्टता और माता-पिता का हमारे जीवन में योगदान

— डॉ वीरेंद्र कुमार स्नातक

विश्व में भारतीय संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है। भारतीय संस्कृति मानव मात्र का कल्याण करने वाली संस्कृति है । सृष्टि के प्रारंभिक ज्ञान वेद के संपूर्ण उदात्त विचार भारतीय संस्कृति में समाविष्ट हैं । संसार में अनेक विचारधाराएं हैं , अनेक संप्रदाय हैं , भारतीय संस्कृति से इतर जितनी भी संस्कृतियां संसार में हैं , उनका दृष्टिकोण संकुचित व सीमित रहा है , जबकि भारतीय संस्कृति विस्तृत एवं उदात्त विचारों वाली रही है । इसी कारण यह कहा जाता है :—

” यूनान मिस्र रोमां सब मिट गए जहां से ।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ।। ‘

भारतीय संस्कृति त्याग प्रधान रही है , जबकि अन्य संस्कृतियों में भोग की प्रधानता रही है । विस्तृत दृष्टिकोण के कारण ही यह मानव मात्र के कल्याण तक ही सीमित नहीं रही , अपितु पशु – पक्षी , ,कृमि – कीट , पतंग सभी के कल्याण की कामना करती है । भारतीय संस्कृति का मौलिक चिंतन है कि :–

सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया ।

सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दुखभागभवेत् ।।

अर्थात सभी प्राणी सुखी हों , सभी रोग रहित निरोग एवं स्वस्थ रहें , सभी का कल्याण हो , सभी कल्याण का दर्शन करें । कोई भी दुखी ना हो ।

भारतीय संस्कृति में व्यक्तिगत व समष्टिमूलक उत्थान की चर्चा रही है । अष्टांग योग में यम , नियम आदि का उल्लेख इसीलिए किया गया कि मनुष्य अपने कल्याण कामना तक सीमित ना रहे , अपितु संपूर्ण समाज के विकास में अपना योगदान करे।

महर्षि मनु ने हम सभी को यह उदात्त संदेश दिया है कि : –

दृष्टिपूतं न्यसेतपादम वस्त्रपूतं जलंपिवेत ।

सत्यपूतां वदेद्वाचम मन: पूतं समाचरेत ।।

अर्थात हम नीची दृष्टि कर ऊंचे नीचे स्थान को देखकर चलें , वस्त्र से छानकर जल पीवें , सत्य से पवित्र कर वचन बोलें और मन से पवित्र – विचार कर आचरण करें ।

भारतीय संस्कृति में संस्कारों का महत्वपूर्ण स्थान है। इसीलिए गर्भाधान संस्कार से लेकर अंत्येष्टि संस्कार तक 16 संस्कारों का विशेष महत्व है । इन्हीं उदात्त भावनाओं से अनुप्राणित होकर प्रत्येक सदगृहस्थ को पांच महायज्ञ करने के लिए कहा गया है । वे पांच महायज्ञ इस प्रकार है ,:–

ऋषियज्ञम देवयज्ञम भूतयज्ञम च सर्वदा ।

नृयज्ञम पितृयज्ञम च यथाशक्तिन् हापयेत ।।

भारतीय संस्कृति में माता-पिता , आचार्य ,अतिथि आदि सभी का मान व सम्मान करने का निर्देश दिया गया है और इसी क्रम में सोलह संस्कारों में 10वें क्रम में उपनयन संस्कार के अंतर्गत ब्रह्मचारी को यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है । यज्ञोपवीत के तीन धागे ऋषि ऋण , देव ऋण व पितृऋण को स्मरण कराने का विधान है । इसमें पितृऋण में माता-पिता के ऋण से उऋण होने का उल्लेख है । शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्र को जन्म देने में माता-पिता जितने क्लेश व कष्टों को सहन करते हैं , उससे पुत्र सैकड़ों वर्षो में भी उऋण नहीं हो सकता है।

पुत्र का प्रथम गुरु माता को कहा गया है । पिता दूसरे व आचार्य तीसरे गुरु माने गए हैं। माता प्रथम गुरु के रूप में बच्चों को अच्छे संस्कार देती है । ‘ मातृमान पितृमान आचार्यमान पुरुषोवेद ‘ अर्थात जब 3 शिक्षक माता-पिता व आचार्य , 3 गुरु संतान को उचित शिक्षा देते हैं , तभी संतान भाग्यवान धार्मिक विद्वान होती है । मातृमान के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि माता यदि योग्य , विदुषी व धार्मिक संस्कारवती होगी , तभी संतान योग्य बनेगी । माता-पिता संस्कारवान होकर ही अपनी संतान को अच्छे संस्कार देकर योग्य नागरिक बनाते हैं और योग्य नागरिक बनकर देश सेवा में तत्पर होते हैं । संतान को जब तक अच्छे संस्कार मिलते रहे , तब तक श्रवण कुमार जैसे पुत्र माता – पिता की सेवा करते रहे और संस्कारशून्य संतानें माता-पिता को आजकल वृद्ध – आश्रमों में भेज रही हैं । संस्कारी संतानों का आचरण संस्कार युक्त ही होता है । वे सदा अपने माता-पिता , आचार्य व अतिथि आदि की सेवा में तत्पर रहते हैं । दया , सेवा , ममता , करुणा , सहानुभूति आदि मानवीय उदात्त गुणों से युक्त होकर निरंतर प्रगति करते हैं ।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम ।।

अर्थात नित्य ही वृद्धों की सेवा करने वाली संतानों की आयु , विद्या , यश और बल निरंतर वृद्धि को प्राप्त होता है।

भारतीय संस्कृति की उत्कृष्टता के मूल में है अथाह ज्ञान राशि वाला वेद चतुष्टय । भारत प्रारंभ से ही जगतगुरु और सोने की चिड़िया रहा है । भारत की ज्ञान गुरुता विश्व प्रसिद्ध है । भारतीय संस्कृति में चरित्र की प्रधानता रही है । संस्कृत की यह पंक्ति भी चरित्र की महत्ता प्रदर्शित करती है : — ” वृत्तम यत्नेन ने संरक्षेत वित्तमायाति च ‘ – अर्थात चरित्र की यत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिए । धन तो आता जाता रहता है । इसी बात को अंग्रेजी में भी इस रूप में कहा गया है :-

Wealth is lost nothing is lost ,

Health is lost something is lost ,

And character is lost everything is lost .

भारतीय संस्कृति में चरित्र रक्षा साध्य रहा है । यही उसकी उत्कृष्टता का परिचायक है। धन तो साधन है। हमने जब से धन को साध्य मान लिया तभी से हमारी मनोवृति दूषित हो गई और विचारधारा भंग हो गई ।

अब हमने अंग्रेजी के उपरोक्त आदर्श वाक्य का उल्टा कर दिया है और मानने लगे हैं कि चरित्र यदि नष्ट होता है तो कुछ भी नष्ट नहीं होता और स्वास्थ्य यदि नष्ट होता है तो कुछ नष्ट होता है , जबकि धन यदि नष्ट होता है तो सब कुछ नष्ट हो जाता है। विचारधारा के इस विपरीत प्रवाह ने समाज को बहुत अधिक क्षति पहुंचाई है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि :-

एतददेशेप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन: ।

स्वम् स्वं चरित्रम शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा ।।

अर्थात इस देश के अग्रजन्मा विद्वान पुरुषों से पृथ्वी के सभी पुरातन मनुष्यों ने चरित्र की शिक्षा प्राप्त की थी। भारतीय संस्कृति का आधार वसुधैव कुटुंबकम की भावना है , जो हमें माता-पिता के दिए संस्कारों से ही प्राप्त होती है । इस प्रकार माता-पिता का भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है जो परिवार से लेकर वसुधा रूपी परिवार तक हमारे वैश्विक मानस का निर्माण करते हैं ।

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